मोदी-नेतन्याहू के बीच लाल सागर में हूती विद्रोहियों के ख़तरे पर बात, भारत पर क्या असर होगा?

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- Author, प्रियंका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हमास के साथ जारी जंग के बीच इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने मंगलवार को पीएम नरेंद्र मोदी से फ़ोन पर बात की.
सात अक्टूबर को इसराइल पर हमास के हमले के बाद दोनों नेताओं ने दूसरी दफ़ा बात की है.
दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच शांति और स्थिरता बनाए रखने को लेकर तो बात हुई लेकिन इस दौरान रेड सी यानी लाल सागर से गुज़रने वाले कमर्शियल जहाज़ों पर हूती विद्रोहियों के हमलों की वजह से उपजे सुरक्षा खतरे का मुद्दा भी उठा.
हूती विद्रोहियों ने हमास का समर्थन करते हुए ये कहा है कि वो इसराइल जाने वाले जहाज़ों को निशाना बना रहे हैं. हालांकि, ये स्पष्ट नहीं है कि अभी तक उन्होंने जितने भी जहाज़ों पर हमला किया है, वो इसराइल ही जा रहे थे.
जानकारों का कहना है कि दुनियाभर के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमले से वैश्विक आपूर्ति बाधित हो सकती है. इससे कच्चे तेल और अन्य ज़रूरी उत्पादों के दामों में भी तेज़ी आ सकती है.
अमेरिका के रक्षा मंत्री लॉएड ऑस्टिन ने मंगलवार को ये बयान दिया कि पिछले चार सप्ताह के भीतर यमन के हूती विद्रोहियों ने 12 बार या तो कमर्शियल जहाज़ों पर हमले किए हैं या फिर इनपर कब्ज़ा कर लिया है.
दुनिया की कई बड़ी शिपमेंट कंपनियों ने हमले का ख़तरा देखते हुए लाल सागर की बजाय लंबे रास्तों से अपने मालवाहक जहाज़ भेजने शुरू कर दिए हैं. इससे न सिर्फ़ समय बल्कि लागत में भी बढ़ोतरी हुई है.
भारत पश्चिम एशिया, अफ़्रीका और यूरोप के साथ कारोबार के लिए इसी रास्ते पर निर्भर है.
विश्लेषकों का मानना है कि ये असर धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी होगा. ज़ाहिर है कि भारत भी इससे अछूता नहीं रह पाएगा. रोज़मर्रा के सामान के दाम में उछाल संभवतः आम लोगों की जेब पर भी भारी पड़े.
मोदी-नेतन्याहू में लाल सागर की सुरक्षा पर क्या हुई बात?

इसराइल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने दोनों नेताओं की बातचीत के बाद एक बयान जारी किया.
इसमें कहा गया है कि दोनों नेताओं के बीच बाब-अल-मंदेब में मुक्त आवाजाही के महत्व पर चर्चा हुई, जो कि हूतियों के आक्रमण से खतरे में हैं, जिन्हें ईरान उकसा रहा है. दोनों नेताओं ने माना कि हमले रोकना ही भारत और इसराइल की अर्थव्यवस्थाओं के साथ ही वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिए हितकारी है.
भारत की ओर से जारी किए गए बयान में भी कमोबेश यही जानकारी दी गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने ट्वीट में ये ज़िक्र किया कि उन्होंने नेतन्याहू के साथ समुद्री आवाजाही से जुड़ी सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताओं पर चर्चा की.
अब तक क्या हुआ है?

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इसराइल और हमास के बीच अक्तूबर में जंग शुरू होने के बाद ही हूती गुट ने अपने हमले तेज़ कर दिए.
अरब देशों में सबसे गरीब मुल्कों में गिने जाने वाले यमन में साल 2014 से हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच संघर्ष जारी है. हूती विद्रोही यमन में उत्तरी इलाके के शिया मुसलमान हैं.
राजधानी सना सहित उत्तरी यमन में हूती गुट का कब्ज़ा है. इस गुट को ईरान का समर्थन मिलता है.
ईरान और इसराइल एक-दूसरे के धुर विरोधी मुल्क हैं. ईरान ने युद्ध की शुरुआत से ही फ़लस्तीन के प्रति समर्थन दिखाया है.
हूतियों ने कहा है कि वे ग़ज़ा में फ़लस्तीनी चरमपंथियों पर इसराइली सेना की कार्रवाई के विरोध में ये हमले कर रहे हैं.
ईरान समर्थित ये विद्रोही गुट बाब अल-मंदाब स्ट्रेट से गुज़रने वाले विदेशी मालवाहक जहाज़ों पर ड्रोन और रॉकेटों से हमले कर रहा है. ये एक 20 मील चौड़ा चैनल है जो अफ़्रीका की ओर से एरिट्रिया और जिबूती को बांटता है और अरब सागर में यमन को.
जहाज़ आमतौर पर दक्षिण से मिस्र की स्वेज़ नहर पहुंचने के लिए और आगे उत्तर की ओर बढ़ने के लिए इसी रास्ते से जाते हैं.
लेकिन हूती विद्रोहियों के हमले और भविष्य में दूसरे हमलों के खतरे को देखते हुए दुनिया की कई बड़ी-बड़ी शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाज़ों को इस रास्ते से भेजना बंद कर दिया है. उन्हें अब बड़े रास्तों से भेजा जा रहा है.
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

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एस एंड पी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस में सप्लाई चेन रिसर्च के प्रमुख क्रिस रॉजर्स का कहना है कि लाल सागर में जहाज़ों के लंबा रास्ता लेने की वजह से उपभोक्ता सामग्रियों की आपूर्ति पर 'बहुत बड़ा असर' देखने को मिलेगा.
दुकानों तक ज़रूरी सामान पहुंचने में देर हो सकती है क्योंकि केप ऑफ़ गुड से गुज़रने की वजह से हर जहाज़ को 10 दिन अधिक सफर करना पड़ेगा.
ये लंबा रास्ता कंपनियों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ाएगा. पिछले सप्ताह शिपिंग रेट में चार फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई. ये बढ़त कारोबारियों से होते हुए आखिरकार उपभोक्ताओं की जेब पर भी असर करेगी.
आशंका ये भी है कि मौजूदा बाधाओं की वजह से तेल के दामों में उछाल आएगा, जिससे ईंधन महंगा हो सकता है.
भारत के निर्यातकों के अनुसार लाल सागर में चल रहे मौजूदा सुरक्षा खतरे की वजह से यूरोप और अफ़्रीका जाने वाले भारतीय सामान का भाड़ा करीब 25-30 फ़ीसदी बढ़ सकता है.
अधिकांश बीमा कंपनियों ने हूती विद्रोहियों के एक जहाज़ पर बैलिस्टिक मिसाइल दागने के बाद लाल सागर से गुज़रने वाले मालवाहक जहाज़ों को बीमा मुहैया करवाने से इनकार कर दिया है.
कुछ बीमा कंपनियों ने तो 5,200 डॉलर तक वॉर रिस्क सरचार्ज भी वसूलना शुरू कर दिया है. ये राशि माल भाड़े के अतिरिक्त है.
बड़ी-बड़ी शिपिंग कंपनियों ने इस रास्ते से अपने मालवाहक जहाज़ों की आवाजाही रोक दी है. बहुत से एशियाई, अफ़्रीकी देश और यूरोप के देशों को भारत जो भी सामान बेचता है, वो लाल सागर के ज़रिए बेचते हैं. भारत इस रास्ते से मुख्यतः पेट्रोलियम पदार्थ, दालें और मशीनी उपकरण भेजता है. मोटा-मोटी भारत के ट्रेड का 30 फ़ीसदी इसी रास्ते से होकर जाता होगा.
ऐसे में ये संकट भारत के लिए कितना बड़ा ख़तरा हो सकता है?
वाणिज्य मंत्रालय के तहत काम करने वाले फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइज़ेशन के डायरेक्टर जनरल और सीईओ डॉक्टर अजय सहाय कहते हैं, "अभी जो गतिविधियां हैं उसने अनिश्चतता बढ़ा दी है क्योंकि जो दुनिया की 10 सबसे बड़ी शिपिंग लाइन्स हैं, उनमें से सात ने बोला है कि वो रेड सी में नहीं जाएंगे. इससे चुनौतियां बढ़ गई हैं.हालांकि, कुछ देशों ने मिलकर पट्रोलिंग के लिए जो गठबंधन बनाया है, उससे अगले सात से 10 दिनों में स्थितियां सुधरने की संभावना है."
डॉक्टर सहाय का मानना है कि अभी भी काफ़ी नुकसान हो गया है. क्योंकि काफ़ी सारा माल जो भारत में आना था वो नहीं आ रहा है. जहाज़ रुके हुए हैं. कुछ शिपिंग लाइन्स केप ऑफ़ गुड के रास्ते ट्रांसपोर्ट जारी रखने की बात कर रही हैं, लेकिन इससे समय भी बहुत ज़्यादा लगेगा. अगर ये समस्या जल्दी हल हो जाती है, तो ये नुक़सान क्षणिक होगा लेकिन अगर ये मामला खींचेगा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी उभरती चुनौती हो सकती है.
सहाय कहते हैं, "अगर ये समस्या चलती रही तो भारत में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ सकते हैं, जो कि अभी काफ़ी कम हैं. अगर जैसे मध्य पूर्व के देश पेट्रोल सप्लाई नहीं कर पाएंगे, तो एनर्जी प्राइस बढ़ सकते हैं. अगर ये लंबा चलता है तो भारत के निर्यात पर भी असर पड़ने की आशंका है. तत्कालिक असर यही है कि भारत के लोगों को पेट्रोल-डीज़ल के लिए ज़्यादा कीमतें देनी पड़ेंगी."
क्यों ज़रूरी है ये रास्ता?

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करीब 2000 किलोमीटर लंबा लाल सागर स्वेज़ नहर के ज़रिए भूमध्य सागर से हिंद महासागर को जोड़ता है.
वर्ष 1869 में स्वेज़ नहर के बनने से पहले यूरोप से एशिया के बीच आवाजाही के लिए जहाज़ों को दक्षिण अफ़्रीका के केप ऑफ़ गुड से होकर गुज़रना पड़ता था. स्वेज़ नहर से जहाज़ों के सफ़र में लगने वाला समय तो घटा ही, साथ में लंबे रास्ते के लिए संसाधनों की ज़रूरत भी घटी.
स्वेज़ नहर से होकर हिंद महासागर से आने और जाने वाले किसी भी जहाज़ को बाब-अल-मंदाब और लाल सागर से आना पड़ता है.
स्वेज़ नहर एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा रास्ता है. कच्चे तेल और लिक्विफ़ाइड नैचुरल गैस यानी एलएनजी को एक से दूसरी जगह लाने-ले जाने के लिहाज से ये अहम है.
एनालिटिक्स फ़र्म वॉर्टेक्सा के अनुसार साल 2023 के शुरुआती छह महीनों में हर दिन करीब 90 लाख बैरल तेल स्वेज़ नहर से गुज़रा.
एस एंड पी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस के विश्लेषक कहते हैं कि एशिया और खाड़ी देशों से यूरोप, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका पहुंचने वाला 15 फ़ीसदी सामान समुद्र के रास्ते ही भेजा जाता है. इननें 21.5 फ़ीसदी रिफ़ाइंड तेल और 13 फ़ीसदी से अधिक कच्चा तेल भी शामिल है.
लेकिन बात सिर्फ़ तेल की नहीं है. कंटेनर जहाज़ टीवी, कपड़े, खेल उपकरण सहित दुकानों में दिखने वाली हर तरह की उपभोक्ता सामग्री इस रास्ते से ले जाते रहे हैं.
क्या लाल सागर के रास्ते का कोई विकल्प है?
इस पर सहाय कहते हैं, "ये लंबे रास्ते हैं. जिसमें 10 से 14 दिन ज़्यादा समय लगेगा और इससे ट्रेड कॉस्ट भी 30 से 40 फ़ीसदी तक बढ़ जाएगा, जिसका सीधा असर आम लोगों पर भी आएगा."
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