ये 'भारतीय चप्पल' मिलेगी 85000 रुपये की, इटली की कंपनी ने किया लॉन्च

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इमेज कैप्शन, ग्लोबल फैशन ब्रांड प्राडा ने भारतीय कोल्हापुरी चप्पलों से प्रेरित फुटवियर रेंज लॉन्च करने की घोषणा की है
    • Author, दीपाली जगताप
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ग्लोबल फैशन ब्रांड प्राडा ने भारतीय कोल्हापुरी चप्पलों से प्रेरित लिमिटेड-एडिशन फुटवियर की एक नई रेंज लॉन्च करने की घोषणा की है.

इटली की कंपनी प्राडा ने यह कदम उस विवाद के कुछ महीनों के बाद उठाया है जब ब्रांड पर कोल्हापुरी चप्पलों की डिज़ाइन की नकल करने का आरोप लगा था.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यह इटैलियन लग्ज़री ब्रांड महाराष्ट्र और कर्नाटक में 2,000 जोड़ी चप्पलें बनाएगा. इसके लिए प्राडा ने दो सरकार समर्थित संस्थाओं के साथ समझौता किया है.

प्राडा के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी हेड, लोरेंज़ो बर्टेली ने कहा, "हम मूल निर्माताओं की स्टैंडर्ड क्षमताओं को अपनी मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों के साथ मिलाएंगे."

यह कलेक्शन फ़रवरी 2026 में ऑनलाइन और दुनिया भर में प्राडा के 40 स्टोर्स में बिक्री के लिए उपलब्ध होगा.

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एक जोड़ी चप्पल की कीमत करीब 939 डॉलर बताई जा रही है, जो लगभग 85,000 रुपये के बराबर है.

इस समझौते पर गुरुवार को इटली-इंडिया बिज़नेस फ़ोरम 2025 के दौरान हस्ताक्षर किए गए.

सांस्कृतिक अपहरण के आरोप

कोल्हापुरी चप्पलें

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जून में, प्राडा उस समय विवादों में घिर गया था जब उसने ऐसी चप्पलें पेश कीं जिनका खुली उंगलियों वाला और चोटीदार पैटर्न वाला डिज़ाइन पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पलों से काफी मिलता-जुलता था. कोल्हापुरी चप्पलें महाराष्ट्र और कर्नाटक में बनाई जाती हैं.

प्राडा ने इन चप्पलों को "लेदर फ़ुटवियर" बताया था लेकिन यह नहीं बताया कि उनका मूल भारत में है. इससे भारत में नाराज़गी व्यक्त की गई और सांस्कृतिक अपहरण के आरोप लगे.

बाद में ब्रांड ने यह मान लिया कि इस डिज़ाइन की जड़ें भारत में हैं.

इस बयान के बाद प्राडा की एक टीम ने कोल्हापुर का दौरा किया. टीम ने उन कारीगरों और दुकानदारों से मुलाक़ात की जो ये चप्पल बनाते और बेचते हैं. टीम के मुताबिक़, ये दौरा उनके काम को क़रीब से समझने के लिए था.

अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स पर अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं वे भारतीय या दक्षिण एशियाई कारीगरों या कला परंपराओं से प्रेरणा लेकर अपने कलेक्शन को नया बनाने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन ऐसा करते वक्त ब्रांड अक्सर श्रेय नहीं देते.

इसलिए एक दुर्लभ उदाहरण माना गया कि किसी ग्लोबल फैशन ब्रांड ने यह स्वीकार किया कि उसने स्थानीय कारीगरों और उनके शिल्प को श्रेय दिए बगैर फ़ायदा उठाया.

उस समय प्राडा के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया था कि कंपनी ने हमेशा "कला-कौशल, विरासत और डिज़ाइन परंपराओं का सम्मान किया है".

प्रवक्ता ने यह भी कहा था कि वह इस विषय पर "महाराष्ट्र चैंबर ऑफ़ कॉमर्स, इंडस्ट्री एंड एग्रीकल्चर" के संपर्क में हैं. यह राज्य का एक प्रमुख उद्योग संगठन है.

इटली में मिलेगी कारीगरों को ट्रेनिंग

सरकार का कहना है कि कुछ कारीगरों को प्राडा और लिडकॉम से विशेष प्रशिक्षण दिलवाया जाएगा

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शुक्रवार को महाराष्ट्र के सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट ने बीबीसी मराठी को बताया कि इस नई पहल का नाम होगा 'Prada Made in India – Inspired by Kolhapuri Chappals'.

उन्होंने कहा, "प्राडा की ज़रूरतों और मांग को ध्यान में रखते हुए, कुछ कारीगरों को प्राडा और लिडकॉम (लिडकॉम- महाराष्ट्र में लेदर इंडस्ट्री को सपोर्ट करने वाली सरकारी संस्था) से विशेष प्रशिक्षण दिलवाया जाएगा. इसके अलावा, लगभग 200 कोल्हापुरी चप्पल कारीगरों को इटली में तीन साल का प्रशिक्षण दिया जाएगा."

शिरसाट ने बताया कि यह समझौता पांच साल के लिए हुआ है, लेकिन उन्हें भरोसा है कि इसे आगे बढ़ाया जाएगा.

उन्होंने कहा, "राज्य सरकार इस उद्देश्य के लिए कारीगरों को वित्तीय सहायता भी देगी."

कोल्हापुरी चप्पलें महाराष्ट्र के शहर कोल्हापुर के नाम पर रखी गई हैं, जहां इन्हें बनाया जाता है.

चमड़े से बनने वाली इन चप्पलों पर कभी-कभी प्राकृतिक रंग का इस्तेमाल भी किया जाता है. पारंपरिक हस्तनिर्मित चप्पलें मज़बूत होती हैं और भारत की गर्म जलवायु के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं.

विवाद के बाद, कोल्हापुर के कई कारीगरों ने कहा था कि प्राडा के श्रेय दिए बिना डिज़ाइन का इस्तेमाल करने से वे दुखी हैं.

संजय शिरसाट का बयान

कोल्हापुरी चप्पलों का सात सौ साल का इतिहास

शाहू महाराज के पैरों में कोल्हापुरी चप्पल

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कोल्हापुर में इन्हें चप्पल की बजाय 'कोल्हापुरी पायताण' के नाम से जाना जाता है. चमड़े से बनी और कई बार प्राकृतिक रंगों में रंगी ये चप्पलें महाराष्ट्र की गर्म और कठोर जलवायु में भी मज़बूती से टिकती हैं और लंबे समय तक चलती हैं.

इन चप्पलों में लकड़ी के तलवे होते हैं, जिन पर पंजे और पंजों को जोड़ने वाली पट्टियां लगी होती हैं. कुछ सैंडल चमड़े की लट, पट्टियों, मोतियों और लटकनों से भी सजाए जाते हैं.

साधारण, मनपसंद और जटिल डिज़ाइन, यही कोल्हापुरी चप्पलों की ख़ास पहचान हैं.

इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता कि ये चप्पलें कोल्हापुर में कब और कहां से आईं. हालांकि, 13वीं शताब्दी के आसपास कोल्हापुरी जूते और चप्पलों से जुड़े कुछ संदर्भ ज़रूर मिलते हैं.

चालुक्य वंश के शासनकाल से ही कर्नाटक-महाराष्ट्र की सीमा से लगे इलाक़ों में इन चप्पलों का इस्तेमाल होने लगा था. उस समय ये चप्पलें अलग-अलग गांवों के नाम से पहचानी जाती थीं, जैसे कापशी, अथनी, क्योंकि इन्हीं गांवों के कारीगर इन्हें बनाते थे.

लेकिन इतिहासकार इंद्रजीत सावंत बताते हैं कि शाहू महाराज के शासनकाल में इन चप्पलों को 'कोल्हापुरी चप्पल' के रूप में ख़ास पहचान मिली. उनका कहना है कि शाहू महाराज ख़ुद ये चप्पलें पहनते थे, ताकि इन्हें सम्मानजनक दर्जा मिल सके.

उन्होंने बताया कि महाराजा ने कोल्हापुर शहर के जवाहरनगर और सुभाषनगर में इस व्यवसाय को बढ़ावा देने की व्यवस्था की. चमड़े के कारीगरों को ज़मीनें दी गई और चमड़ा ख़रीदने की भी उनके लिए विशेष व्यवस्था की गई.

इसके बाद इन चप्पलों का नाम कोल्हापुर से जुड़ गया और यह शहर की पहचान बन गई.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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