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मोदी सरकार का ‘श्वेत पत्र’ क्या चुनावी मक़सद से लाया गया है?
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आठ फरवरी को संसद में भारतीय अर्थव्यवस्था पर ‘श्वेत पत्र’ जारी किया.
वित्त मंत्रालय की ओर से तैयार ये श्वेत-पत्र 2004 से 2014 के बीच कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार और 2014 से 2024 के बीच बीजेपी की अगुआई वाली एनडीए सरकार के आर्थिक प्रदर्शन की तुलना करता है.
2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह ने यूपीए सरकार का नेतृत्व किया था. वहीं 2014 से एनडीए सरकार का नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं.
‘श्वेत पत्र’ किसी ख़ास मुद्दे पर जानकारी देने के लिए जारी किया जाता है.
उदाहरण के लिए सरकार काले धन पर ‘श्वेत पत्र’ जारी कर सकती है ताकि लोगों को इस समस्या, इसके असर और इसके संभावित हल के बारे में पता चल सके.
विश्लेषकों का कहना है कि सरकार भले ही इसे ‘श्वेत पत्र’ कह रही हो लेकिन ये तकनीकी तौर पर सही नहीं है. इसके बजाय ये अलग-अलग आर्थिक पैमानों पर दो सरकारों के प्रदर्शन की तुलना है.
जब मोदी सरकार उस समय के आर्थिक हालात की व्यापक समीक्षा करती, जब उसने पहली बार सरकार की ज़िम्मेदारी संभाली थी, तो उसे ‘श्वेत पत्र’ कहा जा सकता था. लेकिन इसने शुरुआत के बजाय अपने शासन के दसवें साल में इसे पेश किया.
सरकार का कहना है कि वो शुरुआत में ‘श्वेत पत्र’ इसलिए नहीं लाई क्योंकि यूपीए सरकार के आखिरी कार्यकाल में अर्थव्यवस्था की स्थिति काफी ख़राब थी.
इससे नकारात्मकता फैलती और भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेशकों का विश्वास डगमगा जाता.
उस समय लोगों में उम्मीद पैदा करने करने की ज़रूरत थी ताकि देश में विदेशी निवेश आ सके और घरेलू अर्थव्यवस्था में सुधारों को तेज रफ्त़ार मिले.
मोदी सरकार ने कहा है कि अर्थव्यवस्था पर ‘श्वेत पत्र’ जारी करने के चार मक़सद हैं.
'श्वेत पत्र' में क्या कहा गया है?
मोदी सरकार ने कहा है कि अर्थव्यवस्था पर ‘श्वेत पत्र’ जारी करने के चार मक़सद हैं.
1. उन आर्थिक संकटों की जानकारी देना, जो 2014 में एनडीए सरकार के लिए छोड़ दिए गए थे.
2. एनडीए सरकार की ओर से अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए उठाए गए क़दमों की जानकारी देना.
3. राष्ट्रीय हित और राजकोषीय ज़िम्मेदारी पर एक सार्थक बहस पैदा करना.
4. नई प्रेरणा, चेतना और संकल्प के साथ देश के विकास में जुट जाना, क्योंकि इसके सामने अपार मौके खुल रहे हैं.
58 पन्नों के इस ‘श्वेत पत्र’ में तीन हिस्से हैं. पहले हिस्से में यूपीए सरकार के दस साल के कार्यकाल में मैक्रो इकोनॉमिक के हालात का ज़िक्र किया गया है.
दूसरे हिस्से में यूपीए सरकार के दौरान भ्रष्टाचार के मामलों की ताज़ा स्थिति की जानकारी दी गई है और तीसरे में ये बताया गया है कि एनडीए सरकार ने अर्थव्यवस्था का कैसे कायाकल्प किया है.
इस ‘श्वेत पत्र’ में मोदी सरकार ने दावा किया है कि यूपीए सरकार को विरासत में अच्छी अर्थव्यवस्था मिली थी, जो और ज़्यादा सुधारों को लिए तैयार थी. लेकिन उसने दस साल में ही अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन ख़राब कर दिया.
याद रहे कि इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार काम कर रही थी.
दूसरा अहम दावा ये है कि यूपीए ने दस साल के दौरान आर्थिक सुधारों को पूरी तरह छोड़ दिया.
तीसरा दावा ये किया गया है कि 2008 के ग्लोबल वित्तीय संकट के बाद यूपीए सरकार किसी भी तरह ऊंची विकास दर को बनाए रखना चाहती थी. लेकिन इसके लिए उसने मैक्रो इकोनॉमिक बुनियादों की परवाह नहीं की. जैसे इस दौरान महंगाई दर काफी ज़्यादा हो गई.
राजकोषीय घाटा काफी बढ़ गया. बैंकों का एनपीए संकट भी काफी ज़्यादा हो गया, जिससे देश में आर्थिक गतिविधियों को झटका लगा.
यूपीए सरकार पर क्या आरोप लगाए गए?
‘श्वेत पत्र’ में कहा गया है कि यूपीए सरकार ने बाज़ार से भारी मात्रा में कर्ज़ लिया और इसे गैर उत्पादक खर्चों में लगाया. भारतीयों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर काफी कम खर्च किया गया और सरकार ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ में फंसी रही.
यानी सरकार आर्थिक सुधारों को लेकर कोई कदम नहीं उठा रही थी.
इसमें ये कहा गया है कि ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ की वजह से सेना की तैयारियों में बाधा आई.
साथ ही ये भी कहा गया है कि यूपीए सरकार का दशक गलत नीतियों और घोटालों से भरा पड़ा था.
इसमें आईएमएफ के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि मोदी सरकार की तुलना में मनमोहन सरकार में महंगाई किस कदर ज़्यादा रही.
‘श्वेत पत्र’ में ये भी कहा गया है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में स्वच्छता अभियान के तहत बड़ी संख्या में शौचालय बनाए गए समावेशी बैंकिंग की दिशा में बड़े कदम उठाए गए.
बहुत बड़ी आबादी का बैंक में खाता खुला और सीधे उनके खातों में कल्याणकारी योजनाओं का पैसा पहुंचा.
कांग्रेस नेताओं ने मोदी सरकार के इस ‘श्वेत पत्र’ को चुनावी घोषणा पत्र करार दिया है.
कांग्रेस ने मोदी सरकार के इस ‘व्हाइट पेपर’ के जवाब में ‘ब्लैक पेपर’ पेश किया है, जिसमें इसके दावे का जवाब दिया गया है.
अब सवाल ये है कि क्या मोदी सरकार के ‘श्वेत पत्र’ में यूपीए सरकार पर अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचाने और आर्थिक सुधारों को तिलांजलि देने का जो आरोप लगाया गया है वो सही है.
क्या मनमोहन सिंह सरकार के ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ में फंसे होने का दावा सही है?
क्या मोदी सरकार के दौरान महंगाई नियंत्रित रही है और मनमोहन सिंह सरकार में ये बेकाबू हो गई थी?
और सबसे अहम सवाल ये कि दोनों में किस सरकार का आर्थिक प्रदर्शन अच्छा था?
आरोपों में कितना दम
‘श्वेत पत्र’ में इनवेस्टमेंट बैंक मॉर्गेन स्टेनली के एक नोट का हवाला दिया गया है, जिसमें 2013 में भारत को दुनिया की सबसे पांच ‘नाज़ुक’ अर्थव्यवस्था में शामिल किया गया था.
लेकिन ये सच है कि 2004 से 2014 के दौरान भारत में ऐसी स्थिति नहीं रही.
ग्लोबल वित्तीय संकट के बावजूद 2004 से 2009 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में अब तक की सबसे तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई.
2008 में यूपीए सरकार को ग्लोबल वित्तीय संकट के असर का सामना करना पड़ा था. ये अभूतपूर्व स्थिति थी.
पूरी दुनिया ग्लोबल वित्तीय संकट की वजह से आर्थिक मंदी का सामना कर रही थी.
लेकिन भारत इससे अछूता रहा है. इसके अगले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 8.5 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की.
डॉ. बी.आर आंबेडकर स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स यूनिवर्सिटी के वाइस चासंलर एनआरबी मूर्ति ने बीबीसी से कहा, "यूपीए-1 सरकार के दौरान ऐतिहासिक ग्रोथ दर्ज की गई. अब तक किसी भी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में इतनी अधिक ग्रोथ दर्ज नहीं गई थी. हां ये सच है कि यूपीए 2 की सरकार में अर्थव्यवस्था कई वजहों से संकट में फंस गई थी.’’
हालांकि श्वेत पत्र में मोदी सरकार ने यूपीए-1 सरकार में अच्छी ग्रोथ का श्रेय इससे पहले की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को दे दिया है.
इसमें कहा गया है कि 2004 से 2008 (यूपीए-1 सरकार का कार्यकाल) तक अर्थव्यवस्था ने तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की लेकिन ये अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के आर्थिक सुधारों और अनुकूल ग्लोबल हालात का नतीजा थी.
विश्लेषकों का कहना है कि यूपीए सरकार का पहला कार्यकाल ऊंची विकास दर, कम महंगाई और बेहतर वित्तीय प्रबंधन का दौर था.
2003 में एफ़आरबीएम एक्ट लागू होने के बाद 2007-08 में एक ही बार इसका टारगेट हासिल हो पाया था.
उनका कहना है कि इसके उलट एनडीए सरकार ने कभी भी एफआरबीएम (वित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन) का टारगेट पूरा नहीं किया. इसने इसके नियमों को ही बदल दिया. इसने राजस्व घाटे का लक्ष्य सीमित करने का नियम ही हटा दिया.
एफआरबीएम के तहत ही राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने के प्रावधान किए जाते हैं. इससे वित्तीय अनुशासन पर नज़र रखी जाती है.
'चुनावी मक़सद से लाया गया दस्तावेज़'
जाने-माने अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने ‘श्वेत पत्र’ से जुड़े सवालों पर बीबीसी से बात करते हुए कहा, ‘’इसमें कोई शक नहीं कि ये दस्तावेज़ चुनावी मक़सद से ही लाया गया है. इसलिए कि इसमें अपने प्रदर्शन की ज़्यादा बात न कर अपने पहले की सरकार के प्रदर्शन पर सवाल उठाया गया है.’’
उन्होंंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "यूपीए-2 सरकार के दौरान जो संकट आया था उसकी वजह बाहरी थी. लेकिन एनडीए सरकार ने अर्थव्यवस्था में जो संकट पैदा किया था वह इसकी घरेलू नीतियों का नतीजा है. नोटबंदी, गलत ढंग से जीएसटी का लागू होना और एनबीएफसी संकट. ये तीन बड़े झटके तो कोरोना महामारी आने से पहले ही लग चुके थे.’’
वो कहते हैं, "मोदी सरकार को 2014 में जो अर्थव्यवस्था मिली वो 2012-13 की गिरावट के बाद रिकवरी कर रही थी. 2014 में जब मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था का दायित्व मिला तो ये आठ फीसदी की ग्रोथ दर्ज कर चुकी थी. तो ये कहना गलत है कि उन्हें विरासत में लड़खड़ाई हुई अर्थव्यवस्था मिली.’’
अरुण कुमार ये भी कहते हैं यूपीए सरकार ने शिक्षा के अधिकार, रोज़गार के अधिकार जैसे कानून बनाए. उससे अर्थव्यवस्था को फायदा हुआ और कोरोना महामारी के बाद अर्थव्यवस्था की रिकवरी में ये मददगार साबित हुए.
वो कहते हैं कि मोदी सरकार मनरेगा की आलोचना कर रही थी लेकिन कोरोना महामारी के बाद अर्थव्यवस्था की रिकवरी में यही योजना काम आई.
'आंकड़ों के बगैर तुलना कैसी'
अरुण कुमार ने एक और बात का ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा, "बीजेपी कहती है उसने भ्रष्टाचार पर नकेल कसी. उनका दावा है कि ब्लैक मनी को खत्म कर दिया गया. इसका मतलब है कि डायरेक्ट टैक्स और जीडीपी का रेश्यो बढ़ जाना चाहिए लेकिन ये 5.4 से 6.2 फीसदी के बीच ही रहा. जो कि काफी कम है. करप्शन खत्म करने का मतलब ये है कि आय में बढ़ोतरी दिखती. लेकिन ये नहीं हुआ.’’
वो कहते हैं कि 'मोदी सरकार अपने प्रतिकूल आंकड़ों को नकार देती है. जैसे बेरोज़गारी में बढ़ोतरी और उपभोग में गिरावट के आंकड़ों को सरकार ने नकार दिया. ऐसे में मोदी सरकार अपने आर्थिक प्रदर्शन की तुलना मनमोहन सरकार के आर्थिक प्रदर्शन से कैसे कर सकती है.'
प्रोफेसर भानुमूर्ति का मानना है कि यूपीए-2 सरकार के दौरान सरकार से गलतियां हुईं. सरकार पॉलिसी पैरालिसिस की शिकार हुई और रुपये के मूल्य में भारी गिरावट आई.
लेकिन अरुण कुमार का कहना है कि 'संकट अंदर से नहीं बाहर से आया था. अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने क्वांटेटिव इजिंग यानी अर्थव्यवस्था में पैसा छोड़ना रोक दिया था. इस वजह से भारतीय रुपया संकट में फंस गया था. लेकिन मोदी सरकार में कई बार अर्थव्यवस्था उसकी गलत नीतियों की वजह से फंसी.'
उदाहरण के तौर पर वो नोटबंदी और ग़लत ढंग से जीएसटी को लागू करने का हवाला देते हैं.
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