दिल्ली की लाइब्रेरी में पढ़ते हुए तीन छात्रों की मौत कितनी बड़ी त्रासदी: ब्लॉग

    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

इस देश में ‘लाइब्रेरी’ का होना सिर्फ ‘पढ़ने की किसी जगह’ का होना नहीं है.

बल्कि उससे कहीं ज़्यादा, ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले सैकड़ों भारतीय छात्रों के लिए यह शब्द उनके मुफ़लिसी भरे अंधेरे जीवन में जलते उम्मीद के एक दीप का पर्याय है.

इसलिए दिल्ली के एक कोचिंग संस्थान की लाइब्रेरी में पढ़ते हुए तीन छात्रों का यूँ डूब कर मरना, सिर्फ़ ‘छात्रों का डूब कर मरना’ नहीं है.

यह उस ग़रीब और निम्न मध्यवर्गीय भारत के युवा स्वप्नों का डूब कर मर जाना भी है, जो अपने छोटे घरों में जगह की कमी से निराश, ‘लाइब्रेरी’ की ओर अंतिम शरणस्थल की दृष्टि से देखते हैं.

बीते दिनों जैसे ही लाइब्रेरी में ‘डूब जाने’ वाले तीन छात्रों- उत्तर प्रदेश की श्रेया यादव, तेलंगाना की तान्या सोनी और केरल के नवीन दलविन- की मृत्यु की ख़बर सामने आई, मीडिया उनके घरों तक जा पहुँची.

और फिर हमने देखी उन परिवारों की त्रासद तस्वीरें, जहाँ हर मुश्किल से लड़ते हुए भी अपने बच्चों को अफ़सर बनाने का सपना बरसों से पल रहा था.

पढ़-लिख कर अफसर बनने के लिए भेजे गये युवाओं की लाशें उनके घर पहुँच रही थीं. पच्चीस वर्षीय तान्या के मामले में तो उनका पार्थिव शरीर सीधे बिहार के औरंगाबाद ज़िले में मौजूद उनके पैतृक निवास तक ले जाया गया.

भारत में पुस्तकालय के मायने

लाइब्रेरी में ‘पढ़’ रहे युवा छात्रों की यह बेरहम मौतें, अपने होने की क्रूरता में जितनी त्रासद हैं, उतनी ही अकल्पनीय भी.

दरअसल, पढ़ पाने के लिए शांत जगह तलाशते हुए दर दर भटकते भारतीय छात्रों के जीवन में ‘लाइब्रेरी’ एक ऐसा मेटाफ़र है जिसे मेरे जैसे वही लोग समझ सकते हैं जिन्होंने मात्र एक घंटा पढ़ पाने के लालच में अपने यूनिवर्सिटी के बरस तीन-तीन बसें बदल कर शहर के दूसरे कोनों में बने पुस्तकालयों तक जाते हुए बिताए हों.

चाहे गाँव-देहात में बसी कोई वाचनालय नुमा छोटी सी जगह हो या महानगरों में मौजूद पुरानी विशालकाय इमारतों वाली लाइब्रेरी, निजी हों या सरकारी-- पुस्तकालय, फिर चाहे वह कहीं भी क्यों न हो, भारत में ग़रीबी रेखा के नीचे बसर कर रहे युवाओं के साथ साथ निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए भी आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता होते हैं.

कम से कम मैंने तो पुस्तकालयों को अपनी आर्थिक और सामाजिक परिस्थति बेहतर करने के एक रास्ते के तौर पर ही देखा है.

उन तमाम ग़ुरबतों और दुश्वारियों से पीछा छुड़ाने का एक पासपोर्ट जो जन्म से ही मेरे साथ क़िस्मत की तरह चिपक गई थीं.

पुस्तकालयों के प्रति मेरे मन में इतनी गहरी कृतज्ञता है कि जब मुझे दुनिया भर के श्रेष्ठ पत्रकारों के बीच एक पुरस्कार का ऐक्सेप्टेंस स्पीच देने के लिए अमरीकी राजधानी के एक महत्वपूर्ण मंच पर खड़ा किया गया तब अपनी माँ के साथ साथ मैंने अपने शहर भोपाल के उस छोटे से पुस्तकालय को भी धन्यवाद दिया, जहाँ पढ़ते हुए मैं बड़ी हुई थी.

भोपाल का स्वामी विवेकानंद पुस्तकालय एक ऐसी शांत जगह थी जहाँ घर की तमाम उलझनों और बाहर के शोर शराबे से दूर, आख़िरकार, मैं पढ़ सकती थी.

2011 के उस दशक में लाइब्रेरी की सदस्यता लेने के लिए एक छोटा सा वार्षिक शुक्ल देना पड़ता था.

उस रकम को जमा करने के बाद मुझे बीसियों तरह की अंग्रेज़ी किताबें और दर्जन भर हिन्दी-अंग्रेज़ी अख़बार हर रोज़ मुफ़्त पढ़ने को मिल जाते.

मुश्किलों में सुकून की छाया

यह भोपाल की एकमात्र ऐसी लाइब्रेरी थी जहाँ छोटा सा चार कंप्यूटरों वाला एक इंटरनेट स्टेशन भी था. सदस्य नंबर लगा कर बारी बारी से एक-एक घंटे के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल कर सकते थे.

पुस्तकालय के नियमों के हिसाब से मैं वहाँ से एक बार में तीन किताबें, दो डीवीडी और तीन पत्रिकाएँ इश्यू करवा सकती थी. यह मेरे लिये बहुत था.

वहाँ टेबल कुर्सियों के साथ साथ कुछ सोफ़े भी थे जहाँ बैठ कर मैंने सालों अपनी कई कई दुपहरें गुज़ारी हैं. कम कमरे और कई सदस्यों वाले छोटे घरों में रहने वाले मेरे जैसे कई युवा छात्र वहाँ पढ़ते थे.

वहाँ हमें कड़ी मैदानी गर्मियों के महीनों में धूप से छाया मिलती, पीने को वाटर कूलर का ठंडा पानी मिलता और पढ़ने को किताबें- अख़बार. और क्या चाहिए था हमें?

अब यह छोटी बातें कितनी ही गैर-मामूली क्यों न लगें, उन मुश्किल दिनों में मेरे जैसे छात्र के लिए यह बड़ी मदद थी.

अगर वह पुस्तकालय नहीं होता तो शायद मैंने जीवन में कुछ भी किया, जो भी कर पायी और जो भी बन पायी, वह नहीं कर पाती.

मैंने हमेशा ख़ुद को ऑटो-डाइडैक्ट माना है – खुद को खुद पढ़ाने वाला इंसान. मुझे खुद को यूँ ख़ुद पढ़ा पाने के लिए भी एक जगह चाहिए थी - एक माहौल चाहिए - जो छोटे शहर और दमघोटूँ सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच उस लाइब्रेरी ने मुझे दिया.

इस दृष्टि से देखने पर यह स्पष्ट है कि लाइब्रेरी का भारतीय छात्रों के जीवन में गहरा दार्शनिक और मार्मिक महत्व है. इसलिए लाइब्रेरी में डूब कर तीन पढ़ते हुए छात्रों का मरना मुझे बहुत ज़्यादा कष्टकारक लग रहा है- एकदम दिल तोड़ने वाला.

सजदे में बैठे हुए मनुष्य का जाना

मृत्यु हर तरह से और हर परिस्थति में दुखद ही होती है, ख़ासकर तब जब वह किसी निर्दोष युवा व्यक्ति की हो रही हो. और यह तीनों छात्र तो बिल्कुल युवा थे.

इतने घोर असमय आयी मृत्यु – और वह भी पुस्तकालय में! हमारे देश में मौजूद शैक्षणिक व्यवस्थाएँ और उनका आधारभूत संरचनात्मक ढाँचा इतना लचर है कि यहाँ कि सच्चाइयाँ भी मुझे साइंस फिक्शन जैसी लगती हैं. त्रासद और गहरी विडंबना में डूबा साइंस फिक्शन.

अगर एक बार ध्यान से सोच कर देखें तो आख़िर कौन मानेगा कि हमारे देश में, जहाँ आगे बढ़ने तो तड़प रहे मेहनतकश युवाओं के बीच लाइब्रेरी एक नाज़ुक सेंटिमेंट से कम नहीं, उस देश में पढ़ रहे छात्रों के सरों के ऊपर अचानक पानी भर गया! और इस कदर भरा कि देश की राजधानी के बिल्कुल बीच बैठे तीन युवा बिना नितांत असमय, काल के गाल में समा गए!

कौन मानेगा? क्या दूर से देखने पर यह घटनाक्रम हरिशंकर परसाई के किसी व्यंग का हिस्सा नहीं लगता? या फिर ग्लोबल वॉर्मिंग पर बनी किसी साइंस फ़िक्शन फ़िल्म का हिस्सा? क्या ऐसा वाक़ई हो सकता है? यह बच्चे तो घूम फिर भी नहीं रहे थे – सड़क पर भी नहीं थे.

यह तो उन जगहों पर पढ़ रहे थे जहाँ रिवायती तौर पर इन्हें सुरक्षित होना चाहिए था. यह छात्र उस अंतिम शरणस्थल में जाकर जहाँ भारत के हज़ारों लाखों छात्रों को पढ़ पाने की अंतिम उम्मीद बंधती है : लाइब्रेरी.

किसी भी छात्र का यूँ असमय अकारण अपनी जान से जाना कष्टप्रद और अन्यायपूर्ण है. लेकिन पढ़ते हुए छात्रों का यूँ जान गँवा देने में इतनी तीखी और त्रासद चोट है, जिसके पार लग पाना शायद ही कभी संभव हो.

कोई भी जगह अवैध तरीक़े से चलाना गलत है. लेकिन पुस्तकालय को अवैध रूप से चलाने की तो कोई माफी हो ही नहीं सकती. यह सबसे निष्पाप जगह है जहाँ भारत के वह बच्चे पढ़ते हैं जिनके घरों में पढ़ने को जगह नहीं और जेब में किताबों के पैसे नहीं. लाइब्रेरी समतामूलक समाज की स्थापना की परिकल्पना के बीज में मौजूद है.

यह भारत के युवाओं को अमीरी-ग़रीबी और जाति जैसी तमाम सामाजिक विषमताओं से परे जाकर पढ़ने का और पढ़ कर अपनी पहचाना बनाने का एक मौका देती हैं.

इन पुस्तकालयों को अवैध और असुरक्षित तरह से चला कर तीन युवाओं को मौत के मुख तक पहुँचाने को जघन्य अपराध माना जाना चाहिए. यह ज्ञान की साधना और सजदे में बैठे किसी निर्दोष मनुष्य के प्राण उसके पवित्रतम क्षणों में लेने जैसा है.

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