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संभल इतिहास के आईने मेंः बाबर के नाम पर गढ़ी जा रही पहचान और मस्जिद-मंदिर का विवाद
- Author, सुमेधा पाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मशहूर इतिहासकार प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया इतिहास और स्मृतियों के बारे में एक दिलचस्प बात कहते हैं.
"अतीत के बारे में लोक स्मृतियाँ अक्सर बदलती रहती हैं. इतिहास के संदर्भ में हमें स्मृति गढ़ने की मिसाल अयोध्या के मस्जिद-मंदिर विवाद में भी दिखती है.
"अयोध्या में मस्जिद बनने के तीन सौ साल बाद 18वीं शताब्दी में लोक स्मृतियाँ बननी शुरू हुईं."
"जब ऐसी लोक स्मृतियाँ बनती हैं तो इनका ख़ास मक़सद होता है. यहाँ भी यह एक ख़ास मक़सद से लोकप्रिय स्मृति बनाई जा रही है."
क्या संभल में भी ऐसा ही हो रहा है?
संभल, उत्तर प्रदेश का एक ज़िला है. देश की राजधानी से महज़ तीन घंटे की दूरी पर है. यह शहर पिछले कुछ दिनों से सुर्ख़ियों में है.
सुर्ख़ियों में क्यों है संभल
19 नवंबर, 2024 को संभल की ज़िला अदालत में एक याचिका दायर की गई थी. इसमें दावा किया गया कि शाही जामा मस्जिद एक मंदिर की जगह पर बनी है. यह हरिहर मंदिर है.
अदालत के आदेश पर उसी दिन शाम को पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में मस्जिद का सर्वेक्षण हुआ.
उस दिन सब कुछ शांति से हो गया. इसके बाद 24 नवम्बर को दोबारा सर्वेक्षण हुआ. इसी सर्वेक्षण के दौरान हिंसा हुई, जिसमें पाँच लोगों की मौत हो गई.
अभी संभल हिंसा से उबर ही रहा था कि प्रशासन ने अतिक्रमण विरोधी अभियान शुरू कर दिया. इस दौरान कई पुराने मंदिरों, बावड़ियों और कुओं का पता चला.
संभल की संकरी गलियों में घनी आबादी वाले इलाक़े हैं. यहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के लोग सदियों से रहते हैं. यह मस्जिद एक टीले पर है. एक तरह से यह शहर की पहचान है.
संभल का इतिहास, शाही जामा मस्जिद के इतिहास से गहरे रूप से जुड़ा है. मंदिर के दावे का मुक़दमा और उसके बाद की घटनाओं ने संभल के इतिहास को केंद्र में ला दिया है.
दावा और दावे का तर्क
ज़िला अदालत में याचिका महंत ऋषिराज गिरी ने दायर की है. वे दावा करते हैं, "संभल एक प्राचीन नगर है. यही वह नगर है, जहाँ भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि का जन्म होगा."
केला देवी मंदिर में बैठे महंत का कहना है कि वह मस्जिद नहीं मूलतः एक मंदिर है. वे इसके परिसर में पूजा-अर्चना करने की तैयारी कर रहे हैं.
महंत संभल का एक मानचित्र भी दिखाते हैं. यह त्रिकोणीय आकार का है.
वे बताते है, "इस बात का वर्णन स्कंद महापुराण में है. विष्णु महापुराण में उल्लेख है. सभी पुस्तकों का संकलन करके एक पुस्तक बनाई गई है. इसका नाम है 'संभल महात्म्य'."
"उसमें इन सारी चीज़ों का उल्लेख है. संभल में बहुत से तीर्थ हैं. यहाँ पर 68 तीर्थ और 19 कूप हैं. इनकी दूरी भी इस पुस्तक में लिखी हुई है."
बृजेन्द्र मोहन शंखधर की किताब है- 'संभल, एक ऐतिहासिक सर्वेक्षण'. उनके भाई संजय शंखधर मंदिर पक्ष के दावों को मज़बूत करने की कोशिश करते हैं.
वो कहते हैं, "मेरे भाई ने अपनी किताब में संभल को भारत का रोम कहा है. पहले यहाँ हरिहर मंदिर था."
"अगर आप 'बाबरनामा' पढ़ेंगे, तो वहाँ भी यह बात पाई जाएगी. मिर्ज़ा हिंदू बेग ने यहाँ तोड़-फोड़ की. कब्जा कर इस हरिहर मंदिर को मस्जिद बना दिया."
ऐसे ही 'तथ्य' संभल की शाही मस्जिद के इर्द-गिर्द चल रहे विवाद का केंद्रीय बिंदु बन गए हैं.
मंदिर का दावा करने वाले पक्ष की तरफ़ से प्रचारित संभल का यह मानचित्र शहर की दीवारों पर देखा जा सकता है. व्हाट्सएप ग्रुप में मिल सकता है.
यों कहें कि यह मानचित्र लोगों की कल्पना का हिस्सा बन चुका है.
बाबरनामा में क्या है
चाहे क़ुतुबुद्दीन ऐबक का साम्राज्य हो या तुग़लक या लोदी शासकों का राज हो, संभल हमेशा एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है.
साल 1526 में बाबर ने पानीपत की लड़ाई में इब्राहीम लोदी को हराया था. इसके बाद संभल मुग़लों के अधीन आया.
बाबर के दौर का एक प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत 'बाबरनामा' है.
मुग़ल बादशाह बाबर ने 12 साल की उम्र से अपनी आत्मकथा 'बाबरनामा' लिखना शुरू की थी. वो इसे साल 1530 में अपनी मृत्यु तक लिखते रहे. पहली बार यह साल 1531 में प्रकाशित हुई थी.
बाबर के शासनकाल के दौरान तीन महत्वपूर्ण मस्जिदों का ज़िक्र मिलता है. ये मस्जिदें आधुनिक समय तक रहीं.
इनमें संभल की जामा मस्जिद, पानीपत की क़ाबुली बाग मस्जिद (1527-28) और अयोध्या की बाबरी मस्जिद (1529) है. बाबरी मस्जिद को साल 1992 में कार सेवकों ने ध्वस्त कर दिया था.
अमेरिकी इतिहासकार हावर्ड क्रेन ने एक रिसर्च पेपर पेट्रोनेज़ ऑफ़ ज़हीर अल-दीन बाबर लिखा था. यह 1987 में बुलेटिन ऑफ़ द एशिया में प्रकाशित हुआ था.
इसमें उन्होंने कहा कि बाबर की आत्मकथा में संभल की मस्जिद का उल्लेख नहीं मिलता है. वो लिखते हैं कि हिंदू बेग बाबर के साथ क़ाबुल से आए थे. उन्हें संभल का प्रशासक नियुक्त किया गया था.
हालाँकि, विवाद तब शुरू हुआ जब ब्रितानी अनुवादक ऐनेट बेवरेज ने साल 1912 से 1922 के बीच 'बाबरनामा' का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया.
इस अनुवाद में उन्होंने एक फुटनोट यानी अनुवादक की टिप्पणी जोड़ी. इसमें कहा गया कि हिंदू बेग ने बाबर के आदेश पर संभल में मस्जिद बनाई थी.
यही नहीं, बेवरेज ने इस बात की संभावना भी जताई कि इस स्थान पर पहले एक मंदिर था.
प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से जुड़े थे. वे मध्यकालीन इतिहास के विशेषज्ञ हैं. उन्होंने इस दौर के ऐतिहासिक ग्रंथों का गहरा अध्ययन किया है.
वे ज़ोर देकर बताते हैं, "बाबर कभी संभल नहीं गए. उन्होंने साल 1526 में हिंदू बेग को संभल भेजा था. उसे संभल पर शासन करने के लिए नहीं बल्कि प्रशासन चलाने के लिए भेजा था.''
"बेवरेज को फुटनोट जोड़ने की आदत थी. उन्होंने यही काम अयोध्या के बारे में किया था. वहाँ उन्होंने राम मंदिर के विध्वंस का ज़िक्र किया था.''
संभल के बारे उनकी राय है, "संभावना है कि संभल की जामा मस्जिद की मरम्मत हिंदू बेग ने करवाई थी. उसे वास्तव में नया नहीं बनाया गया था."
"जैसा कि उस समय की सामान्य प्रथा थी, मस्जिद को बाबर से जोड़ दिया गया. हालाँकि, मंदिर के अस्तित्व का भी कोई उल्लेख नहीं मिलता है."
प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया एक बात की ओर ध्यान दिलाते हैं, "साल 1526 वह साल था, जब बाबर ने पानीपत की लड़ाई जीती थी. ऐसी हालत में बाबर के लिए यह बहुत जल्दी था कि वह मस्जिदें बनवानी शुरू कर दे."
इसके साथ-साथ ही मंदिर पक्ष के दावे कुछ नए ऐतिहासिक पहलुओं को सामने ला रहे हैं.
मंदिर पक्ष का दावा है कि मस्जिद की जगह पर एक मंदिर था. इसके संकेत मस्जिद की संरचना में अभी भी देखे जा सकते हैं. इनका दावा है कि मंदिर के हिस्से, मस्जिद के निर्माण में इस्तेमाल हुए थे.
इनमें एक है, मस्जिद के गुंबद से लटकी एक चेन. वो मानते हैं कि इसमें पहले एक घंटी लटकी हुई थी.
इसके अलावा, मंदिरों के स्तंभ से मिलते-जुलते मस्जिद के स्तंभ हैं और मस्जिद के अंदर एक 'परिक्रमा' पथ भी है.
वास्तुकला और मिली-जुली संस्कृति
सैयद अली नदीम रेज़ावी अलिगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में इतिहास के प्रोफ़ेसर हैं.
वे भी मध्यकालीन इतिहास के विशेषज्ञ हैं. वे इस विवाद को बेहतर तरीके से समझने के लिए वास्तुकला का अध्ययन करने के महत्व पर ज़ोर देते हैं.
मंदिर का दावा करने वालों के तर्कों का जवाब प्रोफ़ेसर रेज़ावी देते हैं.
वे बताते हैं, "घंटी और चेन का इस्तेमाल लालटेन बाँधने के लिए होता था. यह सब जगह मिलता है. इसे मंदिर, मस्जिद या घरों में भी देखा जा सकता है."
"उस समय के मज़दूर और कारीगर एक तरफ़ तो मुग़लों के हिसाब से इमारतें बना रहे थे, वहीं पहले से चली आ रही वास्तुकला और तकनीकी शैली का भी इस्तेमाल कर रहे थे."
"हमें एक मिली-जुली वास्तुकला की तस्वीर मिलती है. इसे हम गंगा-जमुनी तहज़ीब के एक अहम हिस्से की तरह देखते हैं."
प्रोफ़ेसर रेज़ावी बताते हैं, "वास्तुकला की विशेषताएँ, एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में ली गई हैं. इन्हें अब धार्मिक अर्थ दे दिए गए हैं. संभल की मस्जिद की वास्तुकला वही है, जो क़ाबुली बाग मस्जिद की है."
"इसे बाबर ने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई जीतने के बाद बनवाया था. यही नहीं, क़ाबुली बाग मस्जिद का प्रमाण 'बाबरनामा' में मिलता है. संभल की मस्जिद का कोई प्रमाण 'बाबरनामा' में नहीं मिलता."
वह कहते हैं कि मस्जिद के निर्माण के बारे में अलग-अलग राय प्रचलित हैं.
इनमें एक है कि बाबर के बेटे हुमायूँ ने एक राजकुमार के रूप में संभल में मस्जिद बनाने का आदेश दिया था.
प्रोफ़ेसर रेज़ावी ज़ोर देते हैं कि वास्तुकला के दृष्टिकोण से ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि वहाँ कोई मंदिर तोड़ा गया था.
एक दावा यह भी है
मस्जिद पक्ष वाले भी इतिहास का दूसरा पहलू प्रस्तुत करते हैं. मौलाना मुईद 'तारीख़-ए-संभल' के लेखक हैं.
इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहते हैं, "मेरी तहक़ीक़ात और मेरी समझ यह है कि बाबर ने मस्जिद की तामीर नहीं करवाई. मस्जिद पहले से मौजूद थी. बाबर ने उसकी मरम्मत करवाई."
"यहाँ पहले से मुसलमान मौजूद थे. कहने का मतलब यह है कि बाबर को सिर्फ़ चार साल की मियाद मिली थी. मेरी समझ में नहीं आता कि बाबर ने कैसे बाबरी मस्जिद भी तामीर की और संभल की मस्जिद भी."
"इतनी कम मियाद में इंसान न तो सही से काम कर सकता है और न ही ऐसे किसी काम की तैयारी कर सकता है."
एक ज़िले के इतिहास से जुड़े इस विवाद ने कुछ बड़े मुद्दों को सामने ला दिया है.
इतिहासकारों का मानना है कि लोक स्मृति में अतीत की घटनाओं का ख़ास तरह से पुनर्निर्माण हो रहा है. प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया इस ओर ख़ासतौर पर ध्यान दिलाते हैं.
एक पुराना अदालती मामला क्या है
ऐसा पहली बार नहीं है, जब संभल में मस्जिद और मंदिर का मुद्दा उठाया गया है. इसी तरह की एक याचिका साल 1878 में भी दायर की गई थी.
मशहूद अली फ़ारूक़ी, मस्जिद कमिटी की ओर से वकील हैं. वो संभल के इतिहास और क़ानूनी विवाद पर रोशनी डालते हैं.
वो बताते हैं, "छेदा सिंह नाम के एक व्यक्ति ने केस दायर किया था. इसमें उन्होंने यह माँग की थी कि उन्हें मस्जिद में जाने की अनुमति दी जाए.''
''हालाँकि, उन्होंने पूजा की अनुमति नहीं माँगी थी. वह यह केस हार गए थे. उस समय मुरादाबाद कचहरी में इस मामले की सुनवाई हुई थी.''
"साल 1878 में इसमें दो महत्वपूर्ण मुद्दे उठे. सबसे पहला सवाल था, क्या यहाँ पहले कभी मंदिर था या इस जगह मस्जिद थी? दस्तावेज़ी साक्ष्यों के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे मस्जिद ही माना.''
''उच्च न्यायालय ने यह भी पाया कि यहाँ कभी भी कोई पूजा नहीं हुई. न ही यह कोई मंदिर था, जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई हो. यह याचिका खारिज हो गई.''
मशहूद अली के मुताबिक़, "हाईकोर्ट में भी हमारे पूर्वज मोहम्मद फ़ज़ल ने इस मामले को उठाया था.''
संभल का हिंसक अतीत
नवम्बर 2024 की हिंसा ने साल 1976, 1978 और 1992 में संभल में हुई हिंसा की यादें ताज़ा कर दी हैं.
साल 1976 का दंगा लोगों की यादों में सबसे ताजा है. उस वक़्त एक मौलाना की हत्या मस्जिद परिसर में हो गई थी.
अफ़वाह फैली कि मौलाना की हत्या राजकुमार सैनी नामक व्यक्ति ने कर दी है. इसके बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई.
लेकिन, साल 1978 के दंगे कहीं बड़े पैमाने पर हुए और लंबे समय तक चले थे. ये साफ़ नहीं है कि हिंसा कैसे शुरू हुई. संसद में भी हिंसा का मुद्दा उठा.
24 नवम्बर 2024 को हुई हिंसा के बाद पुरानी यादें फिर से ताजा हो गईं. हालाँकि, स्थानीय लोग यह मानते हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव ही वह भावना है, जो संभल में सौहार्द को बनाए रखती है.
संभल का स्वतंत्र इतिहास
संभल का कोई स्वतंत्र और निर्विवादित इतिहास नहीं है. इस मुद्दे ने संभल के इतिहास के अंतर्विरोधों को उजागर किया है. साथ ही इसके हिंसक अध्याय को भी सामने लाया है.
साद उस्मानी संभल के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इस बारे में वो कहते हैं, "देखिए, संभल का कोई स्वतंत्र इतिहास नहीं है. स्थानीय स्तर पर कोई ऐसा इतिहासकार नहीं है, जो बहुत विश्वसनीय हो."
"ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है. 'सम्भल महात्म्य' भी विभिन्न शास्त्रों को संकलित करके लिखा गया है. 'तारीख-ए-संभल' पर जिन लोगों ने काम किया है, उनका काम भी संकलन के रूप में है."
"उन्होंने कोई मूल काम नहीं किया है. संभल को बाबर से जोड़ा जा रहा है. यह ठीक उसी तरह से हो रहा है, जैसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद और राम मंदिर आंदोलन के दौरान बाबर को एक खलनायक के रूप में पेश किया गया. उसी विवाद को अब संभल में लाया जा रहा है."
यह बयान दर्शाता है कि संभल का इतिहास और उसकी सांप्रदायिक पहचान किस प्रकार बाहरी विवादों और कथाओं के बीच उलझी हुई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.