रोहन बोपन्नाः लॉन टेनिस ओपन एरा के इतिहास का सबसे उम्रदराज ग्रैंड स्लैम चैंपियन

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
मेलबर्न के रॉड लेबर एरिना पर शनिवार को भारतीय टेनिस खिलाड़ी रोहन बोपन्ना और उनके जोड़ीदार मैथ्यू एब्डेन का हवा में उछलना और एक-दूसरे के सीने को आपस में टकराना जताता है कि वह ऑस्ट्रेलियन ओपन टेनिस का पुरुष डबल्स ख़िताब जीतकर कितने खुश हैं.
बोपन्ना अपने दो दशक से ज़्यादा लंबे कॅरियर में पहली बार ग्रैंड स्लैम का पुरुष डबल्स ख़िताब ही नहीं जीते बल्कि ओपन एरा के सबसे उम्रदराज ग्रैंड स्लैम चैंपियन बन गए हैं.
बोपन्ना की जोड़ी ने फ़ाइनल में इतालवी जोड़ी सिमोन बोलेली और आंद्रिया वावसोरी को सीधे सेटों में 7-6(7-0), 7-5 से हराया.
बोपन्ना ने यह ख़िताब रिकॉर्ड 43 साल 329 दिन की उम्र में हासिल किया. इसके साथ ही वे सबसे अधिक उम्र में ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने वाले टेनिस खिलाड़ी बन गए हैं.
बोपन्ना की इस जीत में एक और अहम बात है. इसी ऑस्ट्रेलियन ओपन टूर्नामेंट के दौरान वे विश्व के नंबर-1 डबल्स खिलाड़ी बने. उन्होंने यह ख़िताब भी वर्ल्ड नंबर-1 पुरुष डबल्स खिलाड़ी के तौर पर हासिल किया.

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बेटी त्रिधा की मुस्कान ने ख़ुशी बढ़ा दी
रोहन बोपन्ना और मैथ्यू एब्डेन जब ऑस्ट्रेलियन ओपन पुरुष डबल्स का फ़ाइनल खेल रहे थे तब उनकी बेटी त्रिधा अपनी मां डेजी बोपन्ना की गोद में बैठकर मैच का लुत्फ़ उठा रही थीं.
बोपन्ना ने ख़िताब जीतने के बाद जब अपने परिवार की तरफ़ देखकर उनका धन्यावाद जताया तो इस मौके पर बेटी त्रिधा की मुस्कान देखकर बोपन्ना ही नहीं स्टेडियम में बैठे सभी दर्शकों के चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई.
इस मुक़ाबले को देखने के लिए बोपन्ना के सास और ससुर भी आए थे. बोपन्ना ने खिताबी जीत के बाद उनका शुक्रिया जताते हुए कहा कि मैं सोचता हूं कि वह मेरे ज्यादा मैच देखने को क्यों नहीं आते हैं. वह 2017 में जब आए थे, तब मैंने मिक्सड डबल्स का ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीता था और आज उनके आने पर मैं यह ख़िताब जीत गया हूं.

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एक वह दौर था, जब जर्नी ख़त्म होती दिखी
रोहन बोपन्ना ने इस अवसर ख़ुद को इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए अपने कोच स्कॉट डेविडऑफ़ और अपने फिजियो का शुक्रिया जताता.
वे बोले, “एक समय था, जब मैं पांच महीने तक एक भी मैच नहीं जीत सका था और मुझे लगने लगा था कि कॅरियर समाप्ति की तरफ़ है. पर कोच ने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा और लगातार कड़ी मेहनत कराई, जिससे आज मैं इस मुकाम पर हूं. मेरी उम्र बढ़ने पर भी फिट बनाए रखने में मेरे फिजियो की भी अहम भूमिका है.”
बोपन्ना ने यह भी कहा कि ऑस्ट्रेलियन ओपन के आयोजक भी बहुत अच्छे से ख्याल रखते हैं, इसलिए भी मैं बार-बार यहां खेलने आता हूं.

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यूएस ओपन वाली ग़लती यहां नहीं दोहराई
बोपन्ना और एब्डेन की जोड़ी ने पिछले साल यूएस ओपन में भी फ़ाइनल तक चुनौती पेश की थी पर तब ख़िताबी मुक़ाबले में वो अपनी धड़कनों को काबू में नहीं रख सके थे और उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.
इस बार ऑस्ट्रेलियन ओपन में इतालवी जोड़ी के ख़िलाफ़ इन दोनों ने ढिलाई नहीं दी और हमेशा ख़िताब जीतने का जज्बा बनाए रखा.
इस जीत में बोपन्ना ने अपनी सर्विस को कभी दवाब में नहीं आने दिया और नेट पर तो उनकी वॉलियों का पैनापन देखते ही बनता था.
अपने शॉट्स लगाते समय वे दिमाग का अच्छा इस्तेमाल करते दिखे. कई बार सामने वाले खिलाड़ी डाउन द लाइन शॉट आने की उम्मीद करते थे, लेकिन बोपन्ना ने क्रास कोर्ट शॉट लगाकर उन्हें हतप्रभ किया.
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बोपन्ना के नाम के साथ जुड़ी हैं कई उपलब्धियां
रोहन बोपन्ना ने इस ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट में 24 जनवरी को जब सेमीफ़ाइनल मुक़ाबला जीता तब उन्होंने सबसे ज़्यादा उम्र में टेनिस युगल की रैंकिंग में नंबर-1 खिलाड़ी बनने का रिकॉर्ड स्थापित किया.
साथ ही यहा पहली बार था जब बोपन्ना अपने लंबे करियर के दौरान टेनिस की पुरुष डबल्स वर्ल्ड रैंकिंग में नंबर- 1 पायदान पर पहुंचे.
बीते वर्ष भी जब वे एब्डेन के साथ यूएस ओपन के फ़ाइनल में पहुंचे थे, तब सबसे उम्रदराज ग्रैंड स्लैम फ़ाइनलिस्ट बनने का रिकॉर्ड स्थापित किया था.
पिछले साल ही जब वे एब्डेन के साथ इंडियन वेल्स में ख़िताब जीते तो वह सबसे अधिक उम्र में मास्टर्स 1000 ख़िताब जीतने वाले खिलाड़ी बने थे.
इन सब बातों में सबसे महत्वपूर्ण ये है कि उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से ख़ुद को इस लायक बनाए रखा और अपने अंदर जीत की भूख को बनाए रखा है.
रोहन बोपन्ना वर्ल्ड नंबर- 1 पुरुष डबल्स खिलाड़ी बनने वाले लिएंडर पेस और महेश भूपति के बाद तीसरे भारतीय टेनिस खिलाड़ी हैं.
लिएंडर पेस ने सबसे अधिक 18 ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीते हैं, जिसमें आठ पुरुष डबल्स ख़िताब शामिल हैं.
वहीं महेश भूपति के नाम भी दर्जनभर ग्रैंड स्लैम ख़िताब दर्ज हैं पर इसमें पुरुष डबल्स चार ही हैं. हालांकि भारत के लिए सबसे पहले ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने वाले खिलाड़ी भूपति ही हैं.

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पहले भी बोपन्ना का एक दौर आया था
यह बात 2010 की है, जब उन्होंने पाकिस्तान के एहतिशाम उल हक़ क़ुरैशी के साथ जोड़ी बनाई थी.
इस जोड़ी की सफलता को देखकर लगने लगा था कि वह पेस और भूपति वाली सफलता को दोहराकर झंडे गाड़ने की क्षमता रखते हैं.
यह जोड़ी अपने चरम की तरफ़ बढ़ रही थी, लेकिन तब भारत और पाकिस्तान के संबंधों में तनाव बनने की वजह से बोपन्ना ने यह जोड़ी आपसी सहमति से तोड़ ली.
बोपन्ना ने 2021 में एक बार फिर एहतिशाम के साथ जोड़ी बनाई पर यह पहले की तरह क्लिक नहीं कर पाने की वजह से टिक नहीं सकी.
सही मायने में 2021 के आसपास का बोपन्ना का दौर ख़राब था और प्रदर्शन में लगातार गिरावट होने की वजह से एक बारगी तो उन्होंने संन्यास लेने का मन भी बना लिया था.
सही मायने में घुटने का दर्द उनके ख़राब प्रदर्शन में अहम भूमिका निभा रहा था.
वह इस दौरान दिन में तीन-तीन बार दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल करके खेल रहे थे. फिर वह किसी तरह निराशा से उभरकर फ़ौलादी इरादे से अपने कॅरियर को पटरी पर लाने में सफल हो गए.

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इस चलन से बोपन्ना भी अछूते नहीं
भारत में यह आम है कि शुरुआती जीवन में सही दिशा-निर्देशों के अभाव में युवाओं को पता ही नहीं होता कि किस खेल को अपनाएं और कौन सा खेल उनके लिए उचित रहेगा.
रोहन बोपन्ना भी इस चलन से अछूते नहीं रहे.
वे बचपन में हॉकी और फ़ुटबाल खेलना ज़्यादा पसंद करते थे.
बोपन्ना के पिता एमजी बोपन्ना कॉफ़ी की खेती करते थे और चाहते थे कि बेटा टीम खेल के बजाय व्यक्तिगत खेल को अपनाए.
वह पिता की इच्छा के मुताबिक टेनिस खेलने लगे.
उन्होंने 2003 में अपने पेशेवर कॅरियर की शुरुआत सिंगल्स खिलाड़ी के तौर पर की और 2008 में ऑस्ट्रेलियन ओपन में भाग लेने के समय तक इसमें ही अपना कॅरियर बनाने का प्रयास करते रहे.
बोपन्ना ने सिंगल्स में सफलता से दूरी रहने की वजह से पेस और भूपति को देखकर डबल्स को अपना लिया.
हालांकि उन्हें ग्रैंड स्लैम ख़िताब के लिए 2017 तक इंतज़ार करना पड़ा.
पिछले साल एब्डेन के साथ वे यूएस ओपन में फ़ाइनल में हार गए. वहीं वह अपनी बचपन की जोड़ीदार सानिया मिर्जा के कॅरियर के आखिरी मैच को भी यादगार नहीं बना सके.
रोहन बोपन्ना जब 14 साल के थे, तब वह राजधानी दिल्ली में श्रीराम टूर्नामेंट में पहली बार जोड़ी बनाकर खेले थे. इस कारण वह पिछले साल सानिया के विदाई ग्रैंड स्लैम यानी ऑस्ट्रलियन ओपन में उतरे.
वह बचपन की जोड़ीदार के साथ मिक्सड डबल्स के फ़ाइनल में तो पहुंचे पर ख़िताब के साथ विदाई नहीं करा सके थे.
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