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आसमान में सात ग्रह एक साथ कब नज़र आएंगे, इसका धरती पर क्या असर होगा?
- Author, जॉनथन ओ कैलहैन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
आने वाले दिनों में अंतरिक्ष में एक अद्भुत घटना घटने जा रही है. इस दौरान सात ग्रह एक साथ एक ही दिन में नज़र आएंगे.
यह घटना बुधवार, 28 फ़रवरी को घटेगी, जब बुध ग्रह आसमान में पहले से दिखाई दे रहे बाकी के 6 ग्रहों के साथ आ जाएगा. उस दिन खगोल वैज्ञानिक सात ग्रहों को एक साथ देख पाएंगे.
यह दुर्लभ घटना वैज्ञानिकों के लिए कितनी महत्वपूर्ण है, आइए जानते हैं.
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जनवरी-फ़रवरी में दिखेंगे अद्भुत दृश्य
अगर आप जनवरी और फ़रवरी महीने में रात के दौरान साफ़ आसमान की ओर देखेंगे तो आपको एक अद्भुत नज़ारा देखने को मिलेगा.
वर्तमान में छह ग्रह- शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून रात में आसमान में देखे जा सकते हैं. बुध ग्रह भी इन सभी के साथ नज़र आएगा, लेकिन ऐसा सिर्फ एक रात को ही होगा और ये फ़रवरी के आख़िर के महीने में होगा.
यह घटना न केवल खगोल विज्ञान के प्रति उत्साही व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह घटना सौरमंडल में पृथ्वी के स्थान को समझने के लिए नई जानकारी भी मुहैया कराएगी.
हमारे सौरमंडल के सभी आठ प्रमुख ग्रह अलग-अलग गति से सूर्य की परिक्रमा करते हैं. सूर्य के सबसे नज़दीक का ग्रह बुध 88 दिनों में सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है, यानी बुध में एक साल 88 दिनों का होता है.
पृथ्वी में एक साल 365 दिनों का होता है, जबकि सूर्य से सबसे दूर के ग्रह नेपच्यून को यह परिक्रमा पूरी करने में करीब 60 हज़ार 190 दिन या पृथ्वी के समय के हिसाब से देखें तो 165 साल लगते हैं.
सभी ग्रह अलग-अलग गति से सूर्य की परिक्रमा करते हैं, इसकी वजह से ये कभी-कभी सूर्य के एक तरफ एक लाइन में आ जाते हैं.
अगर सभी ग्रह ठीक से पंक्तिबद्ध हो जाएं तो हम पृथ्वी से रात में एक ही समय में कई ग्रहों को देख सकते हैं. कुछ दुर्लभ घटनाओं में रात के समय आकाश में सभी ग्रहों के पंक्तिबद्ध होने के साथ एक्लिप्टिक भी दिखाई देता है.
दरअसल, सूर्य सालभर जिस मार्ग पर चलता हुआ पृथ्वी से प्रतीत होता है, उसे एक्लिप्टिक कहते हैं.
बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि, ये सभी इतने चमकीले हैं कि इन्हें नंगी आंखों से देखा जा सकता है, जबकि यूरेनस और नेपच्यून को देखने के लिए दूरबीन या टेलीस्कोप की ज़रूरत होती है.
हम इस घटना को घटित होते हुए जनवरी और फ़रवरी महीने में देख सकते हैं. वास्तव में ये ग्रह एक पंक्ति में नहीं हैं. सौरमंडल में अपनी कक्षाओं के कारण ये सभी अर्धवृत्ताकार दिखाई देते हैं. इन दोनों महीनों के दौरान बुध को छोड़कर सभी ग्रहों को रात में देखा जा सकता है.
इस घटना को 'ग्रहों की परेड' के तौर पर भी जाना जाता है. अगर 28 फ़रवरी को मौसम साफ रहा तो सभी सातों ग्रह एक पंक्ति में देखे जा सकेंगे. पृथ्वी से इस घटना को देखने वालों के लिए यह एक शानदार नजारा होगा.
ब्रिटेन के फिफ्थ स्टार लैब्स में विज्ञान संचारक और खगोलशास्त्री जेनिफ़र मिलार्ड का कहना है, "ग्रहों को अपनी आंखों से देखना स्पेशल है. आप गूगल पर जाकर इन सभी ग्रहों का और भी शानदार नज़ारा देख सकते हैं. लेकिन जब आप इन्हें देख रहे होते हैं तो ये फोटॉन होते हैं, जो अंतरिक्ष में लाखों या अरबों मील की यात्रा करके आपके रेटिना तक पहुँचते हैं."
इससे धरती पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
यह देखना दिलचस्प है कि क्या इस तरह के अलाइमेंट (एक पंक्ति में आना) का पृथ्वी पर कोई प्रभाव पड़ता है? या क्या इनका उपयोग हमारे सौरमंडल और उससे परे की हमारी समझ को बढ़ाने में हो सकता है?
जेनिफ़र मिलार्ड कहती हैं, "वास्तव में यह एक संयोग है कि सभी ग्रह अपनी कक्षाओं में इस स्थिति में हैं."
कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के ग्रहों के अलाइमेंट से पृथ्वी पर असर पड़ सकता है. लेकिन ऐसे दावे वैज्ञानिक दृष्टि से कमज़ोर हैं.
साल 2019 में शोधकर्ताओं ने दावा किया कि ग्रहों के अलाइमेंट ने सौरमंडल की गतिविधियों को प्रभावित किया है. सूर्य के बारे में मुख्य प्रश्नों में से एक यह है कि सूर्य में सबसे ज़्यादा गतिविधि और सबसे कम गतिविधि का चक्र, जो कि हर 11 साल का होता है, वह कैसे चलता है? जर्मनी के ड्रेसडेन-रोसेंडॉर्फ में हेल्महोल्ट्ज़-ज़ेंट्रम अनुसंधान केंद्र के भौतिक विज्ञानी फ्रैंक स्टेफ़नी का मानना है कि शुक्र, पृथ्वी और बृहस्पति की संयुक्त ज्वारीय ताकतें इसका जवाब हो सकती हैं.
हालांकि सूर्य पर हर एक ग्रह का ज्वारीय खिंचाव बहुत कम है. स्टेफ़नी का कहना है कि जब दो या अधिक ग्रह सूर्य के साथ पंक्ति में आते हैं, उसे सिज़ीगी के रूप में जाना जाता है. इस स्थिति में ये मिलकर सूर्य के अंदर रॉस्बी तरंगें पैदा कर सकते हैं. ये मौसम को प्रभावित कर सकते हैं.
स्टेफ़नी कहती हैं, "पृथ्वी पर रॉस्बी तरंगें साइक्लोन और एंटी साइक्लोन का कारण बनती हैं. हमारे पास सूर्य में भी वही रॉस्बी तरंगें हैं."
स्टेफ़नी की गणना से पता चलता है कि शुक्र, पृथ्वी और बृहस्पति के अलाइमेंट से सौर गतिविधि की अवधि 11.07 वर्ष होगी, जो कि लगभग सोलर साइकिल के बराबर है.
हालांकि, हर कोई इस विचार से सहमत नहीं है. कुछ लोगों का मानना है कि सौर गतिविधि को पहले से ही सूर्य के भीतर की प्रक्रियाओं के ज़रिए समझाया जा सकता है.
रॉबर्ट कैमरन जर्मनी में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर सोलर सिस्टम रिसर्च के एक सौर वैज्ञानिक हैं और उन्होंने इस विषय पर साल 2022 में एक पेपर प्रकाशित किया था.
कैमरन कहते हैं, "रिसर्च संबंधी साक्ष्य बताते हैं कि सौर चक्र को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले ग्रह नहीं होते हैं. इसमें किसी भी तरह का कोई सबूत नहीं है."
अनुसंधान में सहायक होंगी खगोलीय घटनाएं?
लेकिन ग्रहों के अलाइमेंट की अन्य विवादस्पद विचित्रताएं हैं जो निश्चित रूप से हम पर प्रभाव डालती हैं, जैसे कि वैज्ञानिक अवलोकनों के लिए उनकी उपयोगिता, विशेष रूप से सौरमंडल को एक्सप्लोर करने के संदर्भ में.
अंतरिक्ष यान के साथ बाहरी ग्रहों तक पहुँचना मुश्किल है क्योंकि ये ग्रह अरबों मील यानी बहुत दूर हैं और वहाँ पहुँचने में दशकों लग जाएँगे. हालाँकि, बृहस्पति जैसे अच्छे स्थान पर स्थित ग्रह के गुरुत्वाकर्षण बल का उपयोग करके अंतरिक्ष यान को बाहर की ओर भेजने से यात्रा का समय नाटकीय रूप से कम हो सकता है. ऐसा नासा के वॉयेजर यान से बेहतर कोई अंतरिक्ष यान नहीं कर पाया है.
साल 1966 में नासा के वैज्ञानिक गैरी फ्लैंड्रो ने पता लगाया कि 1977 में चार सबसे बाहरी ग्रहों- बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून का अलाइमेंट होगा. इसकी वजह से इन चारों ग्रहों में सिर्फ़ 12 साल के अंतराल में जाया जा सकता है. जबकि अगर ये ग्रह अलाइंड नहीं होते तो इनमें जाने में 30 साल का समय लग सकता था. यह सौभाग्यपूर्ण अलाइमेंट हर 175 सालों के अंतराल में केवल एक बार होता है. इसके कारण नासा ने साल 1977 में ट्विन वॉयजर 1 और 2 अंतरिक्ष यान को बाहरी सौरमंडल के "ग्रैंड टूर" पर भेजा.
वॉयजर-1 ने 1979 में बृहस्पति और 1980 में शनि के पास से उड़ान भरी, लेकिन यूरेनस और नेपच्यून को छोड़ दिया. क्योंकि वैज्ञानिक शनि के आकर्षक चंद्रमा टाइटन के पास से उड़ान भरना चाहते थे. हालांकि स्लिंगशॉट अफ़ेक्ट को बर्बाद किए बगैर ऐसा नहीं किया जा सकता था.
लेकिन वॉयजर 2 ने इस अलाइमेंट का इस्तेमाल करते हुए सभी चार ग्रहों की यात्रा की और 1986 और 1989 में यूरेनस और नेपच्यून की यात्रा करने वाला इतिहास का एकमात्र अंतरिक्ष यान बन गया.
अमेरिका के बोल्डर में कोलोराडो यूनिवर्सिटी के खगोल भौतिक विज्ञानी और वॉयजर विज्ञान टीम के सदस्य फ़्रैन बैगेनल कहते हैं, "इसने बढ़िया से काम किया. अगर वॉयजर-2 साल 1980 में रवाना हुआ होता तो उसे नेपच्यून तक पहुंचने में 2010 तक का समय लग जाता. मुझे नहीं लगता कि ऐसे में इसे समर्थन मिलता. ऐसी चीज़ के लिए कौन फंड देगा?"
ग्रहों का अलाइमेंट सिर्फ़ हमारे सौरमंडल में ही उपयोगी नहीं है. खगोलशास्त्री ब्रह्मांड के कई अलग-अलग पहलुओं की जांच करने के लिए अलाइमेंट का उपयोग करते हैं और सबसे ज़्यादा इसका उपयोग एक्सोप्लैनेट की खोज और अध्ययन में किया जाता है. एक्सोप्लैनेट सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं.
ऐसे ग्रहों को खोजने के प्रमुख तरीके को ट्रान्ज़िट मैथड के रूप में जाना जाता है. जब कोई एक्सोप्लैनेट किसी तारे के सामने से हमें गुजरता हुआ दिखाई देता है तो यह तारे के प्रकाश को मंद कर देता है, जिससे उसके आकार और कक्षा का पता लगाया जा सकता है.
इस विधि की बदौलत हमने कुछ खास तारों की परिक्रमा करने वाले कई ग्रहों की खोज की है. ट्रैपिस्ट-1 पृथ्वी से 40 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित एक लाल बौना तारा है. इसमें पृथ्वी के आकार के सात ग्रह हैं और ये ग्रह हमें तारे से होकर गुजरते हुए दिखाई देते हैं.
इस तरह के ग्रह वास्तव में एक दूसरे के साथ रेज़ोनेंस में हैं. इसका मतलब है कि सबसे बाहरी ग्रह अगले ग्रह की हर तीन परिक्रमाओं के लिए दो परिक्रमाएँ पूरी करता है. मतलब कि ऐसे कई मौके हैं जब इस प्रणाली के कई ग्रह एक सीधी पंक्ति में आ जाते हैं, जो कि हमारे सौरमंडल में नहीं होता है.
ट्रान्ज़िट का इस्तेमाल करके हम ऐसे ग्रहों पर वायुमंडल के अस्तित्व का अध्ययन कर सकते हैं. कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में नासा एक्सोप्लैनेट साइंस इंस्टीट्यूट के खगोलशास्त्री जेसी क्रिस्टियन्सन कहती हैं, "अगर वायुमंडल वाला कोई ग्रह किसी तारे के सामने से गुजरता है तो उस अलाइमेंट का मतलब है कि तारों का प्रकाश ग्रह से होकर गुजरता है और ग्रह के वायुमंडल में अणु और परमाणु कुछ निश्चित तरंगदैर्घ्य पर प्रकाश को अवशोषित करते हैं."
इससे कार्बन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन जैसी विभिन्न गैसों की पहचान की जा सकती है. क्रिस्टियन्सन कहती हैं, "हमारे वायुमंडलीय संरचना के विश्लेषण का अधिकांश हिस्सा अलाइमेंट के कारण है."
बहुत बड़े अलाइमेंट हमें दूर के ब्रह्मांड यानी आकाशगंगाओं की जांच करने में मदद कर सकते हैं. शुरुआती ब्रह्मांड की आकाशगंगाओं का अवलोकन करना मुश्किल है क्योंकि वे बहुत धुंधली और दूर हैं. हालाँकि, अगर कोई बड़ी आकाशगंगा या इनका समूह हमारी दृष्टि रेखा और बहुत दूर की प्रारंभिक आकाशगंगा के बीच से गुजरता है तो इसका विशाल गुरुत्वाकर्षण खिंचाव अधिक दूर स्थित वस्तु के प्रकाश को बढ़ा सकता है. इससे हम उसका अवलोकन और अध्ययन कर सकते हैं और इस प्रक्रिया को ग्रैविटेशनल लेंसिंग कहा जाता है.
क्रिस्टियन्सन कहती हैं, "पूरे ब्रह्मांड में बहुत बड़े अलाइमेंट्स हैं." इनका इस्तेमाल जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप जैसे दूरबीनों के ज़रिए दूर के तारों और आकाशगंगाओं का निरीक्षण करने के लिए किया जाता है. जैसे कि एरेन्डेल, यह पृथ्वी से सबसे दूर का ज्ञात तारा है. टेलीस्कोप के ज़रिए देखा गया कि प्रकाश ब्रह्मांड के 13.7 अरब साल के इतिहास के पहले अरब साल से आया और यह केवल ग्रैविटेशनल लेंसिंग के कारण दिखाई देता था.
अलाइमेंट के कुछ और नए उपयोग हैं, जैसे कि सौर प्रणालियों में एक्ज़ोप्लैनेट के अस्तित्व की जांच करना, जहां एक्ज़ोप्लैनेट एक दूसरे के सामने से गुजरते हुए हमें दिखाई देते हैं.
साल 2024 में अमेरिका की पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में स्नातक छात्र निक टुसे ने इन अलाइमेंट्स का इस्तेमाल ट्रैपिस्ट-1 प्रणाली की दुनिया के बीच भेजे जा रहे किसी भी स्पिलओवर कम्युनिकेशन को देखने के लिए किया. जैसे कि पृथ्वी से हम अपने सौरमंडल के मंगल जैसे ग्रहों में रोवर्स और अंतरिक्ष यान से बात करने के लिए सिग्नल कैसे भेजते हैं.
टुसे कहते हैं, "जब भी दो ग्रह अलाइंड होते हैं तो यह दिलचस्प हो सकता है."
इस अवसर पर खोज पूरी नहीं हुई. लेकिन हमारे अपने सौरमंडल की ओर देखने वाली कोई एलियन सभ्यता इसी उद्देश्य के लिए समान अलाइमेंट्स का इस्तेमाल कर सकती है.
हालांकि इस महीने ग्रहों की अलाइमेंट आपके देखने के नज़रिए पर निर्भर करती है. अगर आप सही कोण पर स्थित हैं तो हमारे सिस्टम में कोई भी दो ग्रह अलाइंड हो सकते हैं. लेकिन यह कल्पना करना संभव है कि दूसरी ओर कोई और भी इसे देख रहा है.
टुसे कहते हैं, "शायद कोई अन्य एलियन सभ्यता इसे जांच करने के अपने अवसर के रूप में देख सकती है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.