जापान ने भूकंप के साथ जीना कैसे सीखा, जानिए कामयाबी की कहानी

    • Author, रूपर्ट विंगफ़ील्ड-हेस
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, ताइपे

तक़रीबन 13 साल पहले जापान में भयंकर भूकंप आया था, जिसके बाद सुनामी आई और इसके कारण फ़ुकुशिमा में परमाणु संयंत्र में हादसा हुआ था.

ये घटना जापान के लोगों के ज़ेहन में अब भी ताज़ा है और सोमवार को इसने एक बार फिर लोगों को उस घटना की याद दिला दी है. सोमवार को इशिकावा तेज़ भूकंप से थर्रा गया और जापान में सुनामी के अलार्म बजने लगे.

हालांकि ये अलार्म चेतावनियां जापान में बिल्कुल भी असामान्य नहीं हैं.

जब मैं पहली बार वहाँ गया था तब अपने बेड से उठा तो हमारी इमारत हिल रही थी.

लेकिन बीते कुछ महीनों के अंदर मैं भूकंप के झटकों के बीच सोता था. जापान में तुरंत आने वाले भूकंप के झटके आपकी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं. एक समय आप इसके आदी हो जाते हैं.

हालांकि, आपके दिमाग़ में एक ख़याल हमेशा रहता है कि अगला बड़ा भूकंप कब आएगा या क्या आपकी इमारत इसके लिए सुरक्षित है?

2011 में जब दो मिनट तक हिली धरती

लेकिन इस पीढ़ी ने अपनी ज़िंदगी के सबसे भयानक भूकंप का सामना 11 मार्च 2011 को किया.

पूरे दो मिनट के लिए ज़मीन इस तरह हिली कि पूरी ज़िंदगी में किसी ने इस तरह का अनुभव नहीं किया था. भूकंप के ये झटके चलते रहे और चलते रहे.

जो कोई भी इस घटना से गुज़रा होगा वह बिल्कुल ठीक-ठीक बता सकता है कि वो उस समय कहां था और कितना डरा हुआ महसूस कर रहा था. लेकिन इससे भी बुरे हालात तो आगे आने वाले थे.

40 मिनट के अंदर ही पहली सुनामी तट की ओर आई, जापान के उत्तर-पूर्वी तट पर सैकड़ों किलोमीटर अंदर समुद्र के आसपास की दीवारों को तोड़ते हुए शहरों और गांवों में ये लहरें पहुंच गईं. सेंदाई शहर के ऊपर मंडराते हेलिकॉप्टर ने इस घटना को लाइव टीवी पर दिखाया.

इसी दौरान इससे भी डरावनी ख़बर ये सामने आई कि परमाणु पावर प्लांट भी ख़तरे में है.

फ़ुकुशिमा में दुर्घटना घटी और लाखों लोगों को अपना घर छोड़ देने का आदेश दिया गया. यहां तक कि टोक्यो को भी सुरक्षित नहीं माना जा रहा था.

इस दिन की घटनाओं ने लोगों को गहरे सदमे में डाल दिया.

कुछ महीनों बाद मैंने टोक्यो में रहने के लिए नई जगह ढूंढनी शुरू की. मेरी पत्नी ने भूवैज्ञानिक मानचित्रों का अध्ययन ये समझने के लिए किया कि कहाँ पर मिट्टी के नीचे चट्टान है और कौन सी जगह किसी भी नदी से ऊपर जगह पर मौजूद है. वो इमारत की आयु को काफ़ी गहराई से जांच रही थी.

वो इस बात को लेकर साफ़ थी कि ‘हम 1981 से पहले बनी इमारत को नहीं देखेंगे.’

जापान की कामयाबी की कहानी

जब हम अपनी 1985 की इमारत में रहने आए तो हमने खाना और पानी जमा करना शुरू कर दिया. बाथरूम सिंक के नीचे पहले से पैक्ड डिब्बों को रख दिया गया, जिनकी उपयोग की अवधि पांच साल तक थी.

साल 2011 का डर सोमवार को वापस लौट आआ लेकिन ताज़ा भूकंप जापान की कामयाबी की एक उल्लेखनीय कहानी को भी बताता है.

जापान देश में आने वाले भूकंप को तीव्रता के आधार पर नहीं मापता है.

ये देखता है कि उसकी ज़मीन कितनी बार हिली है. इस दौरान भूकंप की तीव्रता 1 से 7 तक जाती है. और सोमवार को इशिकावा में भूकंप अधिकतम 7 बार आया था.

वहां पर बड़े पैमाने पर सड़क और पुल तबाह हुए हैं. इससे बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ लेकिन अधिकांश इमारतें अब भी खड़ी हैं.

टोयामा और कानाज़ावा जैसे बड़े शहरों में एक तरह से आम जनजीवन वापस पटरी पर लौट आया है.

काशिवाज़ाकी के नज़दीक मैंने एक दोस्त से बात की थी तो वो कह रहा था, “वास्तव में ये बहुत ही ख़ौफ़नाक था.”

उन्होंने कहा, “अभी तक मैंने इससे बड़ा भूकंप महसूस नहीं किया था. हमें समुद्र तट को छोड़कर दूर जाना पड़ा लेकिन अब हम घर वापस लौट आए हैं और सबकुछ ठीक है.”

इंजीनियरिंग की सफलता

यह इंजीनियरिंग की सफलता की एक असाधारण कहानी है जो एक सदी पहले 1923 में शुरू हुई थी जब टोक्यो में काफ़ी भयानक भूकंप आया था.

ग्रेट कांतो भूकंप के नाम से प्रसिद्ध इस घटना के दौरान शहर का एक बड़ा हिस्सा समतल हो गया था. यूरोप की शैली पर बनीं आधुनिक ईंटों की इमारतें ढह गई थीं.

इस दुर्घटना के बाद जापान का पहला भूकंप प्रतिरोधी बिल्डिंग कोड बनाया गया. उसके बाद से बनने वाली सभी नई इमारतों के लिए स्टील और कंक्रीट का इस्तेमाल ज़रूरी हो गया. वहीं लकड़ियों की इमारतों के लिए मोटे बीम का होना बेहद ज़रूरी था.

हर बार जब देश बड़े भूकंप का सामना करता है तब नुक़सान का आकलन किया जाता है और इन नियमों में तब्दीली की जाती है. सबसे बड़ा बदलाव साल 1981 में तब देखने को मिला जब सभी नई इमारतों के लिए भूकंप के नए उपायों को लागू कर दिया गया.

1995 में कोबे भूकंप के बाद और अधिक उपायों को इसमें जोड़ा गया.

साल 2011 में 9.0 के भयानक भूकंप के बाद इन उपायों की सफलता देखी गई. ये उसी तरह का भूकंप था, जिस तरह का जापान की राजधानी ने 1923 में महूसस किया था.

साल 1923 में शहर समतल हो गया था और 1.4 लाख लोग मारे गए थे. वहीं साल 2011 में बड़े स्काईस्क्रैपर्स बह गए थे, खिड़कियां टूट गई थीं लेकिन कोई भी बड़ी इमारत नहीं ढही थी.

ये केवल सुनामी थी जिसकी वजह से हज़ारों लोग मारे गए थे जबकि ज़मीन पर भूकंप की वजह से लोग नहीं मरे थे.

इशिकावा से ऐसी तस्वीरें आई हैं, जिसमें लकड़ी के मकान भूकंप की वजह से ढह गए हैं और एक आधुनिक इमारत गिर गई है. हालांकि समाचार चैनलों ने तुरंत ये बताया कि ये इमारत 1971 में बनाई गई थी.

इस दुर्घटना में कुछ ही लोगों के मारे जाने की ख़बर है जबकि कई लोग घायल हुए हैं.

लेकिन ये सोचना बेहद कठिन है कि पृथ्वी पर कोई और ऐसा देश है, जिसने इस तरह के भूकंप के झटके सहने के बाद भी कोई नुक़सान न झेला हो.

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