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नेपाल में 'बड़े भूकंप का ख़तरा' क्यों बना हुआ है?
- Author, फणींद्र दाहाल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ नेपाली
नेपाल के जाजरकोट में शुक्रवार रात 6.4 तीव्रता वाले भूकंप के बाद एक बार फिर से विश्लेषकों का ध्यान पश्चिमी नेपाल में सालों से मौजूद बड़े भूकंप के ख़तरे की ओर गया है.
वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक़, पश्चिमी नेपाल की सतह के नीचे 500 वर्षों से भूकंपीय ऊर्जा जमा हो रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह शक्ति इतनी अधिक है कि इससे रिक्टर स्केल पर आठ या उससे भी अधिक तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है.
शुक्रवार रात 11:47 बजे नेपाल में 6.4 तीव्रता वाला भूकंप आया, जिसका केंद्र जाजरकोट के रमीडांडा में था.
राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के अनुसार, तब से शनिवार सुबह तक 4 तीव्रता के अधिक के तीन झटके और 35 से अधिक छोटे झटके दर्ज किए गए.
दरअसल, पिछले कुछ महीनों में पश्चिमी नेपाल के ज़िलों में लगातार भूकंप आ रहे हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक़, जिस इलाक़े में 500 साल पहले भीषण भूकंप आया हो, उस इलाके में 8 या उससे ज़्यादा तीव्रता वाला शक्तिशाली भूकंप आने का ख़तरा होता है.
पश्चिमी नेपाल में क्यों है भूकंप का ख़तरा?
नेपाल के राष्ट्रीय भूकंप निगरानी और अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ प्रभागीय भूकंप विज्ञानी लोकविजय अधिकारी के मुताबिक़, पिछले कुछ महीनों से पश्चिम नेपाल में भूकंप आने की संख्या बढ़ी है.
उन्होंने कहा कि रोज़ाना छोटे और कभी-कभी मध्यम भूकंप आने से पता चलता है कि इलाके में भूकंपीय ख़तरा मौजूद है.
उन्होंने कहा, ''वहां भूकंपीय शक्ति जमा हो गई है. जितने भी छोटे और मध्यम भूकंप आ रहे हैं, उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इलाके़ में बड़ा भूकंप आ सकता है. इससे पता चलता है कि हम भूकंपीय जोख़िम में हैं."
विशेषज्ञों का कहना है कि पृथ्वी की सतह के नीचे की भारतीय प्लेट प्रति वर्ष दो सेंटीमीटर की दर से उत्तर की ओर यूरेशियन प्लेट की ओर बढ़ रही है, जिससे हिमालय क्षेत्र में भूकंपीय दरारें पैदा हो रही हैं.
विशेषज्ञों के मुताबिक़ पृथ्वी की चुंबकीय प्लेटों की गति के कारण नेपाल में हर साल भूकंपीय ऊर्जा जमा हो रही है.
लोकविजय अधिकारी ने कहा, "जितना अधिक समय होगा, उतनी अधिक भूकंपीय ताक़त जमा होगी. जितने समय तक बड़ा भूकंप न आएगा, उतना ही उसके आने की आशंका ज़्यादा होगी."
अधिकारियों के मुताबिक़, नेपाल में रोज़ाना रिक्टर स्केल पर दो से अधिक तीव्रता के लगभग 10 भूकंप आते हैं. लेकिन जो भूकंप बड़ी त्रासदी छोड़कर गए हैं, उनमें 2015 में गोरखा के बारपाक में 7.8 तीव्रता का भूकंप की याद लोगों में आज भी सिरहन पैदा करती है. इस भूकंप में नौ हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो गई थी.
अब तक के अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र में ख़तरा है क्योंकि बीते पांच सौ सालों में भारतीय शहर देहरादून से 800 किलोमीटर पूर्व के दायरे में कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है.
क्या मध्यम भूकंप जोख़िम को कम करते हैं?
भू विज्ञानी प्रोफ़ेसर डॉ. विशालनाथ उप्रेती का मानना है कि क्षेत्र में जमा हुई भूकंपीय शक्ति की वजह से 1505 में नेपाल में आए भीषण भूकंप से भी अधिक शक्तिशाली भूकंप आने का ख़तरा बना हुआ है.
उन्होंने कहा, "सन 1505 का भूकंप कितना गंभीर था, इसे जांचने का कोई उपकरण हमारे पास नहीं है. भूकंप के बाद बने गड्ढों के नीचे की दरारों को देखने से पता चला कि ज़मीन 20 मीटर तक खिसक गई थी. इसका विश्लेषण करते हुए कहा जाता है कि उस वक्त 8.5 से 8.7 तीव्रता का भूकंप आया था.''
उप्रेती कहना था कि इसी भूकंप से दिल्ली की कुतुब मीनार से लेकर ल्हासा तक नुक़सान हुआ था.
सन् 1505 के उस भूकंप के बाद सबसे भयावह भूकंप 1934 के भूकंप को माना जाता है. नेपाल के चैनपुर में उसका केंद्र था. काठमांडू से लेकर बिहार तक भारी नुक़सान हुआ.
उप्रेती ने कहा, ''उस इलाक़े में जहाँ पर 500 साल से खतरनाक भूकंपीय ताक़त जमा हो रही है वहां 6, 5 और 4 तीव्रता वाले भूकंप का आना एक महासागर से कुछ बूंद पानी निकालने जैसा है."
नेपाल के राष्ट्रीय भूकंप निगरानी और अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ प्रभागीय भूकंपविज्ञानी लोकविजय अधिकारी का भी कहना है कि मध्यम या छोटे भूकंप से बड़े भूकंप का ख़तरा कम नहीं होता है.
वह कहते हैं, ''एक रिक्टर स्केल का अंतर ताक़त में 32 गुना का अंतर है. इसका मतलब यह है कि 5 तीव्रता वाले भूकंप की तुलना में 6 तीव्रता वाले भूकंप 32 गुना अधिक शक्ति उत्सर्जित करते हैं. जबकि पांच रिक्टर स्केल की तुलना में सात रिक्टर स्केल में 1,000 गुना अधिक शक्ति उत्सर्जित होगी.''
भूकंप से बचाव की तैयारियों पर देना होगा ध्यान
उप्रेती पश्चिमी नेपाल के अलावा पूर्वी नेपाल में भी बड़े भूकंप का ख़तरा होने का ज़िक्र करते हैं और कहते हैं कि इससे बचाव की तैयारियों पर ज़ोर दिया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, ''कोशी से लेकर सिक्किम-दार्जिलिंग तक 1,300 साल से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है. हिमालय में वह जगह जहां उस साल कोई भूकंप नहीं आता, बहुत ख़तरनाक हो जाती है.”
कहा जाता है कि सन 1255 में 8 से अधिक तीव्रता का भूकंप आया था जिसका केंद्र पूर्वी नेपाल था. माना जाता है कि राजा अभय मल्ल की मृत्यु उसी भूकंप में हुई थी. ऐसा माना जाता है कि उस भूकंप ने नेपाल का एक तिहाई हिस्सा नष्ट कर दिया था.
लोकविजय अधिकारी ने कहा, "हालांकि यह अनुमान लगाना असंभव है कि बड़ा भूकंप कब आएगा. लेकिन जितना लंबा अंतराल होगा, यह उतना ही शक्तिशाली होगा."
विशेषज्ञों ने किन सुधारों पर ज़ोर दिया है?
8 या इससे अधिक तीव्रता वाले भूकंप को बड़ा भूकंप कहा जाता है. ऐसा कहा जाता है कि आठ या इससे अधिक तीव्रता का भूकंप.. भूकंप के केंद्र के आसपास के क्षेत्र को पूरी तरह से नष्ट करने की क्षमता रखता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि कमज़ोर ढांचागत संरचना के कारण भूकंप से जन-धन की भारी हानि होती है और इसमें सुधार किया जाना चाहिए.
लोकविजय अधिकारी ने कहा कि जाजरकोट में आए भूकंप से कमज़ोर इमारतों के कारण काफ़ी ज़्यादा नुक़सान हुआ है.
उन्होंने कहा, ''भूकंप में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों की मौत हमारी बनाई इमारतों के ढहने से होती है. जब तक हम संरचनाओं को मज़बूत नहीं करेंगे तब तक हम कभी भी सुरक्षित नहीं होंगे."
चिली जैसे भूकंप के उच्च जोख़िम वाले देश, भूकंप से निपटने के लिए मज़बूत इमारतें बनाते हैं.
उन्होंने कहा कि नेपाल को भी इस तरह के बुनियादी ढांचे का निर्माण करना चाहिए. उन्होंने कहा कि सरकार को कमज़ोर मकानों के स्थान पर मज़बूत मकान बनाने के लिए अभियान चलाना चाहिए और इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार को इसके लिए सब्सिडी देनी चाहिए.
उप्रेती जैसे विशेषज्ञों की राय है कि सरकार को भूकंप से संबंधित खोज एवं बचाव में लगे सुरक्षाकर्मियों के प्रशिक्षण में निवेश बढ़ाना चाहिए. नेपाल सरकार से उन्होंने पूर्व चेतावनी प्रणालियों के लिए बजट आवंटन करने की मांग की है.
भूकंप की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. लेकिन हाल के वर्षों में, भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ लोगों को आपदा से बचाने में मदद कर रही हैं.
यूएसजीएस के अनुसार, जब पृथ्वी की सतह के नीचे भूकंपीय लहरें दिखाई देती हैं तो शेकअलर्ट जैसी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ तत्काल चेतावनी जारी कर सकती हैं.
ऐसा कहा जाता है कि भूकंप के दौरान सबसे पहले बहुत तेज़ पी तरंग दिखाई देती है, उसके बाद धीमी एस तरंग दिखाई देती है, फिर लहरें ज़मीन की सतह पर पहुंचती हैं.
सेंसर तुरंत पी तरंग का पता लगाते हैं और उस डेटा को शेकअलर्ट के सिस्टम तक पहुंचाते हैं. यह भूकंप के स्थान और संभावित ताक़त का पता लगाकर तुरंत सूचनाएं जारी करने के काम आ सकता है और इससे काफ़ी नुक़सान से बचा जा सकता है.
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