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सीरिया के भूकंप में बची 'चमत्कारी बच्ची' का क्या हुआ?
- Author, फेथी बेनाइसा
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ अरेबिक
आज से क़रीब छह महीने तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप में हज़ारों लोगों की मौत हुई थी.
लेकिन सीरिया के ज़िंदेरिस कस्बे में भूकंप में गिरी इमारतों के मलबे से एक नवजात बच्ची को ज़िंदा बचाया गया था.
जब इस बच्ची को ज़िंदा बचाने का वीडियो सामने आया तो लोगों ने इसे किसी 'चमत्कार' से कम नहीं माना.
आज ये बच्ची छह महीने की हो गयी है. इसका नाम आफ़रा रखा गया है और ये ज़िंदेरिस कस्बे में ही अपने रिश्तेदारों के साथ रह रही है.
बच्ची के अंकल ख़लील अल-सवादी ने कहा, “वो अभी बहुत छोटी है लेकिन उसकी मुस्कान मुझे उसके पिता और उसकी बहन की याद दिलाती है. वे अक्सर हमारे यहां आते थे. उसकी वजह से हमें कोई मुश्किल नहीं हो रही.”
कैसे बचाई गयी आफ़रा?
छह फ़रवरी को जब जिंदेरिस में विनाशकारी भूकंप आया तो उसके कुछ देर बाद ही आफ़रा की मां को लेबर पेन शुरू हुआ और उन्होंने अपने घर के मलबे में उसे जन्म दिया.
हालांकि, राहत और बचावकर्मियों के आने से पहले ही उनकी मौत हो गई.
अपने परिवार में आफ़रा इकलौती सदस्य है जो विनाशकारी भूकंप में बच गई. उसके पिता अबू रुदैना और उसके चार अन्य भाई - बहन समेत हादसे में कोई भी नहीं बच सका.
ख़लील कहते हैं, “हमने देखा कि अबू रुदैना का घर ध्वस्त हो गया था. मेरी पत्नी चिल्ला रही थी - मेरा भाई मेरा भाई.”
ख़लील को अभी भी वो पल याद है जब उन्होंने आफ़रा को मलबे के नीचे से निकाला था.
वो कहते हैं, “उनके ऊपर छत गिर गई थी. किसी ने मुझे बुलाया और कहा कि उन्हें एक महिला का शव मिला है. पहुंचते ही मैंने मलबा हटाना शुरू कर दिया, तभी मैंने एक आवाज़ सुनी.”
“ये आवाज़ थी आफ़रा की, जो अभी तक अपनी मां से गर्भनाल से जुड़ी हुई थी. हमें लगा अब बचाया जा सकता है, हम जानते थे कि उस परिवार की वो आख़िरी याद है.”
इस बचाव अभियान का एक नाटकीय वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया गया और वायरल हो गया.
बच्ची को अस्पताल ले जाया गया और शुरू में उसका नाम रखा गया आया, अरबी में जिसका मतलब चमत्कार होता है.
जिस डॉक्टर ने इलाज किया, उसने बताया कि बच्ची को छोटी - मोटी चोटें लगी थीं और वो मुश्किल से सांस ले पा रही थी.
छह महीने बाद अब उन जख़्मों के निशान ख़त्म हो गए हैं.
जब रिश्तेदारों को लगा, आफ़रा छिन जाएगी
ख़लील कहते हैं, “भूकंप के तुरंत बाद मलबे की धूल आदि से उसके सीने में थोड़ी दिक्कत थी लेकिन अब उसकी सेहत बिल्कुल ठीक है.”
लेकिन ये छह महीने मुश्किल भरे रहे. जब आफ़रा अस्पताल में थी, दुनिया में हज़ारों लोगों ने उसे गोद लेने की पेशकश की थी, इसलिए ख़लील और उनकी पत्नी हाला को ये साबित करना था कि वे ही उसके असली रिश्तेदार हैं.
ख़लील कहते हैं, “मुझे लगा कि वे आफ़रा को हमें नहीं देना चाहते.”
हाला को डीएनए टेस्ट कराना पड़ा.
ख़लील कहते हैं, “शुरू में तो सिर्फ खून की जांच थी. एक हफ़्ते बाद उन्होंने दोबारा बुलाया. उन्होंने मेरी पत्नी के खून और बाल के नमूने लिए. इसमें दस दिन लगे.”
आफ़रा की कहानी में लोगों की इतनी दिलचस्पी पैदा हो गई थी कि डीएनए टेस्ट के जब तक नतीजे नहीं आए ख़लील और उनके परिवार को लगता था कि कहीं कोई आफ़रा का अपहरण न कर ले जाए.
इसलिए उन्होंने अस्पताल में और समय बिताना शुरू कर दिया और अतिरिक्त सावधानी बरतने लगे.
वो कहते हैं, “पुलिस और सेना दोनों ने ही उसकी सुरक्षा में हमारी बहुत मदद की. उनमें से अधिकांश ने आफ़रा के कमरे से सटे कमरे में रहकर उस पर दिन रात नज़र बनाए रखी.”
जब डीएनए टेस्ट का नतीजा आया तब इसकी पुष्टि हुई कि हाला आफ़रा की सगी बुआ हैं और इसके बाद ही बच्ची को अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया.
मां के नाम पर रखा बच्ची का नाम
इसके बाद ख़लील और हाला ने सबसे पहला काम उस बच्ची का नाम उसकी मां के नाम 'आफ़रा' पर रख दिया.
ख़लील कहते हैं, “वह अब हमारे बच्चों में से एक है. मैं उससे बहुत देर तक दूर नहीं रह सकता.”
“जब वो बड़ी हो जाएगी तो मैं उसे बताऊंगा कि उसकी मां के साथ क्या हुआ और उसकी मां, पिता और भाई बहनों की तस्वीर दिखाऊंगा. हमने उन्हें पास के गांव हज इस्कंदर में दफ़न किया, जहां सिविल डिफ़ेंस ने सामूहिक कब्रें खोद रखी थीं.”
ये संयोग है कि जिस समय आफ़रा की मां गर्भवती हुईं उसी समय हाला भी गर्भवती थीं और आफ़रा के जन्म के तीन दिन बाद हाला ने भी एक बच्ची को जन्म दिया.
उन्होंने इसका नाम भूकंप में मारी गई एक और आंटी के नाम पर 'अता' रखा.
लेकन जिंदेरिस में उनके घर इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे, वे वहां और नहीं रुक सकते थे.
ख़लील कहते हैं कि ‘उनका घर और कार नष्ट हो चुकी थी. ऐसा लगा कि फिर शुरू से शुरुआत करनी होगी. बच्चों को भी स्कूल भेजने लायक स्थिति नहीं बची थी.’
उन्होंने दो महीने तक एक टेंट में गुजारा किया जहां ‘ज़िंदगी बहुत कठिन थी और दो - दो नवजातों की देखभाल भी करनी थी.’
घर पाने की जद्दोजहद
हालांकि, अपने परिवार के लिए ख़लील को किराए पर एक नया घर मिल गया लेकिन वो वहां बहुत दिन तक नहीं ठहर सकते थे.
वो कहते हैं, “ये बहुत महंगा है और पता नहीं कि हम यहां कब तक रह पाएंगे.”
लोगों ने उन्हें यूएई या ब्रिटेन भेजने की पेशकश की लेकिन ख़लील ने मना कर दिया, “मुझे अभी भी डर है कि अगर हम विदेश गए तो वे आफ़रा को हमसे ले लेंगे.”
ख़लील का होम टाउन भूकंप से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र था और हज़ारों लोगों की स्थिति उनके जैसी ही है.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, सीरिया और तुर्की में आए इस भूकंप से 50,000 के क़रीब लोग मारे गए, जिनमें उत्तरी पश्चिमी सीरिया में 4,500 लोग मारे गए थे और यहां 50,000 परिवार बेघर हो गए.
सीरिया में विद्रोहियों के दबदबे वाले इस इलाक़े में 40 लाख लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाना बहुत मुश्किल काम है.
देश में 12 साल तक चले गृह युद्ध में पहले ही यहां के लोगों को बहुत संकट में डाल रखा है.
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