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इलेक्टोरल बॉन्ड: रेड, बॉन्ड की ख़रीद और कॉन्ट्रैक्ट के आवंटन के समय पर उठते सवाल
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को कहा है कि 21 मार्च तक वो इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ी सब जानकारियां उपलब्ध करवाए.
इन जानकरियों में वो अल्फा-न्यूमरिक कोड भी शामिल है, जिसके मिलने से ये पता चलेगा कि किस ख़रीदार का दिया हुआ बॉन्ड, किस राजनीतिक दल ने भुनाया.
अभी तक स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने जो डेटा जारी किया है, वो सिर्फ़ दो बातें बताता है.
पहली ये कि किस तारीख़ को किसने कितने रुपए के बॉन्ड ख़रीदे और दूसरी ये कि किस राजनीतिक दल ने किस तारीख़ को कितने बॉन्ड भुनाए.
लेकिन ख़रीदार का बॉन्ड किस राजनीतिक दल को मिला ये बात साफ़ नहीं है.
अल्फा-न्यूमरिक कोड की जानकारी मिलने के बाद ये मिलान आसानी से किया जा सकेगा.
क्यों उठ रहे हैं सवाल
अल्फा-न्यूमरिक कोड की जानकारी आने से पहले ही एसबीआई के पहली खेप में जारी किए गए डेटा का विश्लेषण करने पर कई तरह के पैटर्न नज़र आए हैं.
कुछ ऐसे पैटर्न, जिनकी वजह से इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को देश का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला तक कहा जा रहा है.
अब तक उपलब्ध डेटा को ध्यान से देखें तो ऐसे कई उदाहरण दिखते हैं, जहाँ किस साल किसी प्राइवेट कंपनी पर एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी) या आयकर विभाग की छापेमारी हुई और उसके कुछ ही दिन बाद उस कंपनी ने इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे.
ऐसे भी उदाहरण हैं, जिनमें किसी कंपनी ने इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे और कुछ दिन बाद उस पर छापेमारी हुई और उसके बाद कंपनी ने फिर इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे.
कुछ मामलों में ये आरोप भी हैं कि इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदने के कुछ वक़्त बाद ही किसी निजी कंपनी को कोई बड़ा सरकारी प्रोजेक्ट मिल गया.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 15 मार्च को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, "इलेक्टोरल बॉन्ड्स के नाम पर ‘हफ्ता वसूली सरकार’ ने दुनिया का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार किया है."
इसे एक आपराधिक खेल बताते हुए राहुल गांधी ने कहा कि इस खेल में "एक तरफ़ कॉन्ट्रैक्ट दिया, दूसरी तरफ़ से कट लिया" और "एक तरफ़ से रेड की, दूसरी तरफ़ से चंदा लिया."
गांधी ने कहा कि ईडी, इनकम टैक्स और सीबीआई जैसी जांच एजेंसियां वसूली एजेंट बन कर काम कर रही हैं.
18 मार्च को कर्नाटक के मेडिकल एजुकेशन मंत्री शरण प्रकाश पाटिल ने कहा है कि ईडी और आईटी विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों द्वारा छापेमारी के तुरंत बाद कई कॉर्पोरेट घरानों और व्यापारिक संस्थाओं द्वारा चुनावी बॉन्ड ख़रीदना महज़ संयोग नहीं है.
क्या हैं पैटर्न
इस विश्लेषण पर बात करने से पहले ये साफ़ कर दें कि इन पैटर्न्स में जो बातें सामने आ रही हैं वो एक अधिकृत जांच के विषय हैं.
इनमे से बहुत सी बातें तब भी साफ़ हो जाएंगी जब ख़रीदार के बॉन्ड को भुनाने वाली राजनीतिक पार्टी के बीच का सम्बन्ध अल्फा-न्यूमरिक कोड की वजह से साफ़ हो जाएगा.
तो आइये नज़र डालते हैं कुछ कंपनियों और उनसे जुड़ी घटनाओं पर:
1. फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड
- इस कंपनी ने अक्टूबर 2020 और जनवरी 2024 के बीच 1368 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे.
- दो अप्रैल 2022 को एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी) ने लॉटरी घोटाला मामले में इस कंपनी की 409.92 करोड़ की चल संपत्ति अटैच कर दी.
- सात अप्रैल 2022 को कंपनी ने 100 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे
- 11 अप्रैल 2023 को कंपनी ने फिर 60 करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे
- 11 और 12 मई 2023 को प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्डरिंग एक्ट के प्रावधानों के तहत ईडी ने फ्यूचर गेमिंग के अध्यक्ष सैंटियागो मार्टिन और अन्य लोगों के चेन्नई में आवासीय परिसरों और कोयंबटूर में व्यावसायिक परिसरों में तलाशी अभियान चलाया. तलाशी के दौरान क़रीब 457 करोड़ रुपये की चल/अचल संपत्ति बरामद की गई.
- छह जुलाई 2023 को कंपनी ने फिर 62 करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड ख़रीदे.
2. टोरेंट पावर लिमिटेड
- इस कंपनी ने सात मई 2019 और 10 जनवरी 2024 के बीच 106.5 करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड ख़रीदे.
- सात मार्च 2024 को इस कंपनी ने कहा कि उसे पीएम-कुसुम योजना के तहत 1,540 करोड़ रुपये की 306 मेगावाट की सौर परियोजनाएं स्थापित करने के लिए महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड से कॉन्ट्रैक्ट मिला है.
- 9 जनवरी 2024 को इस कंपनी ने इस कंपनी ने 15 करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे थे.
- 10 जनवरी 2024 को कंपनी ने10 करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे.
3. यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल
- इस कंपनी ने चार अक्टूबर 2021 और 11 अक्टूबर 2023 के बीच 162 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे
- कंपनी पर 22 दिसंबर 2020 को आयकर विभाग की रेड हुई
- 4 अक्टूबर 2021 से इस कंपनी ने इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदने शुरू किए
4. औरोबिन्दो फार्मा
- इस कंपनी ने तीन अप्रैल 2021 और आठ नवंबर 2023 के बीच 51 करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे
- 10 नवंबर 2022 को कंपनी के डायरेक्टर पी सरथ चंद्र रेड्डी को ईडी ने मनी लॉन्डरिंग मामले गिरफ़्तार कर लिया.
- 15 नवंबर 2022 को कंपनी ने पाँच करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे.
- साल 2022 में पाँच जनवरी और दो जुलाई के बीच भी कंपनी ने 19.5 करोड़ के बॉन्ड ख़रीदे थे.
5. शिरडी साई इलेक्ट्रिकल्स
- 18 दिसंबर 2023 को इस कंपनी की कडप्पा स्थित फैक्टरी में आयकर विभाग की रेड हुई.
- 11 जनवरी 2024 को 40 करोड़ रूपए के बॉन्ड ख़रीदे
6. कल्पतरु प्रोजेक्ट्स इंटरनेशनल लिमिटेड
- इस कंपनी ने सात अप्रैल 2023 और 10 अक्टूबर 2023 के बीच 25.5 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे
- सात अप्रैल 2023 को इस कंपनी ने 10 करोड़ रूपए के बॉन्ड ख़रीदे.
- पाँच जुलाई को इस कंपनी ने फिर 10 करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे.
- चार अगस्त 2023 को आयकर विभाग ने इस कंपनी पर छापेमारी की जो अगले कई दिन तक चली.
- 10 अक्टूबर 2023 को कंपनी ने 5.5 करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे.
7. माइक्रो लैब्स
- इस कंपनी ने 10 अक्टूबर 2022 और 9 अक्टूबर 2023 के बीच 16 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे
- 6 जुलाई 2022 को इस कंपनी पर इनकम टैक्स विभाग की रेड हुई.
- 10 अक्टूबर 2022 को कंपनी ने 6 करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे.
- 15 नवंबर 2022 को कंपनी ने फिर एक बार 3 करोड़ के बॉन्ड ख़रीदे.
8. हीरो मोटोकॉर्प
- इस कंपनी पर 23 से 26 मार्च 2022 के बीच आयकर विभाग की छापेमारी हुई.
- कंपनी ने सात अक्टूबर 2022 को 20 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे.
9. एपीसीओ इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड
- इस कंपनी ने 15 जनवरी 2020 और 12 अक्टूबर 2023 के बीच 30 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे
- 10 जनवरी 2022 को कंपनी ने 10 करोड़ रूपए के बॉन्ड ख़रीदे.
- कुछ ही दिन बाद जनवरी 2022 में ही इस कंपनी को एक अन्य कंपनी के साथ जॉइंट-वेंचर में 9000 करोड़ रुपए की लागत वाला वर्सोवा-बांद्रा सी लिंक बनाने का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया.
10. डॉ रेड्डीज़ लैब
- आठ मई 2019 और चार जनवरी 2024 के बीच 80 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे.
- 12 नवंबर 2023 को आयकर विभाग ने इस कंपनी से जुड़े लोगों और उनके सहयोगियों पर अवैध नक़द लेनदेन के मामले में छापेमारी की.
- 17 नवंबर 2023 को इस कंपनी ने 21 करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे.
- चार जनवरी 2024 को कंपनी ने 10 करोड़ रुपए के बॉन्ड ख़रीदे.
जेएनयू के पूर्व प्राध्यापक प्रोफ़ेसर अरुण कुमार आर्थिक मामलों के जानकार हैं. उन्होंने काले धन और उसके अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर पर "द ब्लैक इकॉनमी इन इंडिया" नाम की किताब भी लिखी है.
इस डेटा से उभरे पैटर्न पर वे कहते हैं, "सवाल क्विड प्रो क्वो (कुछ हासिल करने के लिए कुछ देना) का उठता है. हमें पता है कि देश में हर किस्म की अवैध गतिविधियां चलती हैं. ख़ासकर सत्तारूढ़ पार्टियां इनकम टैक्स, ईडी का इस्तेमाल करती रही हैं, लोगों को निचोड़ने के लिए. लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड का डेटा दिखा रहा है कि ये बहुत ज़्यादा हो गया था. पहले भी होता था पर अब ये बहुत ज़्यादा हो गया है. जो सत्तारूढ़ पार्टी है वो इन एजेंसियों का इस्तेमाल कर के पैसा उगलवाती है और विपक्ष पर दबाव बनाने के लिए इन एजेंसियों का इस्तेमाल किया जाता है."
प्रोफ़ेसर कुमार के मुताबिक़ राज्यों में भी सत्तारूढ़ पार्टियां दबाव डाल कर पैसे उगाहती हैं लेकिन "ईडी और इनकम टैक्स केंद्र सरकार के हाथ में हैं."
वे कहते हैं, "सबसे बड़े प्रोजेक्ट भी केंद्र सरकार के हाथ में हैं. इसीलिए ये माना जा रहा है कि बीजेपी में इसका सबसे ज़्यादा दुरुपयोग किया क्यूंकि वो सत्ता में है."
बॉन्ड ख़रीदने के बाद रेड का क्या मतलब
डेटा के विश्लेषण से ये भी दिख रहा है कि चुनावी बॉन्ड ख़रीदने के बाद भी कंपनियों पर रेड हुई हैं.
सरकार के पक्ष में एक तर्क ये दिया जा रहा है कि सरकारी एजेंसियों ने निष्पक्षता से काम किया और उन कंपनियों पर भी छापा मारने से नहीं हिचकीं, जिन्होंने इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे थे.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, "जिन पर भी आरोप होगा वो इसे रेशनलाइज (तर्कसंगत बनाना) तो करेंगे ही. एक तर्क ये भी हो सकता है कि बॉन्ड ख़रीदने के बाद भी अगर रेड हुई तो वो इसलिए हुई कि पार्टी इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए मिले धन से संतुष्ट नहीं थी और ज़्यादा धन चाहती थी. ये हो सकता है कि अगर किसी ने पर्याप्त मात्रा में धन नहीं दिया है तो उसे और निचोड़ेंगे और ज़्यादा पैसा निकलवा लेंगे. तो कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि दोनों तरह की संभावनाएं हैं."
प्रोफ़ेसर कुमार के मुताबिक़ अगर ये पता हो कि कौन कितने रुपए के बॉन्ड ख़रीद रहा है तो उसे निचोड़ना और आसान हो जाता है.
वे कहते हैं, "अगर किसी कंपनी को दस हज़ार करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट मिल रहा है तो आप उसमें से 8-10 फ़ीसदी निचोड़ सकते हैं. इससे ये भी पता चलता है कि नौकरशाही को पता होता है कि कौन कितना कमा रहा है और इसी जानकारी का इस्तेमाल उसे निचोड़ने में किया जाता है."
'सच बाहर आना चाहिए'
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह कहते हैं कि कब ईडी या आईटी रेड हुई और कब इलेक्टोरल बॉन्ड से चंदा दिया गया या चंदा देने के बाद किसी कंपनी को सरकारी एजेंसी की कार्रवाई से राहत मिली हो ये कोई भी इंटेलिजेंस एजेंसी पता लगा सकती है.
वे कहते हैं, "मेरी समझ में ये नहीं आ रहा है कि जब आईटी में डेटा मौजूद है तो क्यों सॉफ्टवेयर के ज़रिये उससे ये पता नहीं लगाया जा सकता कि क्या किसी ने रेड होने के बाद इलेक्टोरल बॉन्ड ख़रीदे या क्या किसी के बॉन्ड ख़रीदने के बाद मामला बंद कर दिया गया और क्या मामला बंद कर देने के बाद फिर चंदा मिला."
विक्रम सिंह कहते हैं कि ये सभी सवाल करोड़ों लोग पूछ रहे हैं. वे कहते हैं, "इसका जवाब सबको चाहिए क्यूंकि इलेक्टोरल बॉन्ड जब लाए गए थे तो पारदर्शिता की बात की गई थी... कि जो चंदा राजनीतिक दलों को दिया जाए वो पारदर्शी हो, बिना किसी दबाव के हो. ये जानने का अधिकार सबको है और जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये सार्वजानिक हो जाना चाहिए तो सार्वजानिक होना चाहिए. पूरा डेटा बिना किसी तरह से चीज़ों को छुपाते हुए सामने आना चाहिए... ऐसा नहीं होना चाहिए कि ज़रूरी बातों को छुपा लिया जाए और ग़ैर-ज़रूरी बातों को ज़ाहिर कर दिया जाए."
विक्रम सिंह के मुताबिक़ शेल कंपनियों और उनसे जुड़े लोगों की जानकारी भी सामने आनी चाहिए. वे कहते हैं, "मूल डोनर का पता लगाया जाना चाहिए. जब मिलीभगत की जांच की जाती है तो ज़रूरी है कि उसकी तह तक पहुंचा जाए. इस मामले में अगर जानकारी छुपाई जाती है तो वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बिल्कुल ख़िलाफ़ होगा."
क्या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच ज़रूरी
प्रोफ़ेसर कुमार कहते हैं कि इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में अब ज़्यादा तो कुछ निकलेगा नहीं लेकिन अल्फा-न्यूमरिक नंबर आने के बाद साफ़ हो जाएगा कि किस पार्टी को किसने कितना पैसा इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिये दिया.
वे कहते हैं, "एजेंसियों के दुरुपयोग और क्विड प्रो क्वो को लेकर अवैधता का सवाल है तो उस अवैधता की जांच की जा सकती है. लेकिन ऐसी जाँच न सरकार चाहेगी न ही कोई भी राजनीतिक दल. साथ ही व्यावसायिक समुदाय भी ये नहीं चाहेगा.''
''जांच होगी तो बहुत सी बातें खुलेंगी लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा. ये तर्क भी दिया जा सकता है कि रेट्रोस्पेक्टिव (पूर्वप्रभावी) तरीक़े से इस मामले को खोलना बिज़नेस के लिए अच्छा नहीं है. मुझे नहीं लगता कि कोर्ट मॉनीटर्ड एसआईटी या कमिशन गठित की जाएगी. पर ये होना चाहिए और जनता के सामने ये बात खुल कर आनी चाहिए."
विक्रम सिंह कहते हैं कि "सुप्रीम कोर्ट को एक कमिटी बनानी चाहिए क्योंकि आज सभी सरकारों की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल लगा हुआ है."
वह कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट की अध्यक्षता वाली कमिटी ही होनी चाहिए जो 15 दिन के अंदर इन सब सवालों का जवाब दे दे. सरकार को भी इस पर एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए."
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