चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लागू होने के तरीक़े क्या हो सकते हैं?

चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत सरकार ने जिन 59 स्मार्टफ़ोन ऐप्स पर पाबंदी लगाने का फ़ैसला किया है वो गूगल और ऐपल के ऐप स्टोर से हटा दिए गए हैं और उनके आईएसपी को भी ब्लॉक कर दिया गया है जिससे वो कंप्यूटर या फिर लैपटॉप पर भी खुल नहीं पायेंगे.

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ प्रसान्तो कुमार रॉय ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि जिन मोबाइल फ़ोन पर ये ऐप पहले से ही डाउनलोड किये हुए हैं, वो खुलेंगे तो ज़रूर मगर जैसे ही उनमें कोई विडियो या कोई और जानकारी के लिए क्लिक किया जाएगा तो वो काम नहीं करेंगे.

भारत सरकार ने जब 59 ऐप पर पाबंदी का निर्देश जारी किया उसके बाद से सब यही समझना चाह रहे हैं कि पाबंदी आख़िर लगेगी कैसे? उसका प्रारूप क्या होगा या हो सकता है.

जाने माने वकील, आईटी एक्ट और साइबर क़ानून के जानकार विराग गुप्ता का कहना है कि पाबंदी सही तौर पर हो इसके लिए सरकार को क़ानूनी तौर पर तो क़दम उठाने पड़ेंगे ही साथ ही उपभोक्ताओं से भी इन्हें डाउनलोड नहीं करने की अपील भी करनी पड़ेगी.

ऐसा इसलिए क्योंकि प्रसान्तो कुमार रॉय के अनुसार पाबन्दी के बावजूद इन ऐप्स को 'वीपीएन' यानी 'वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क' के ज़रिए देखा जा सकता है.

भारत में फ़िलहाल क़रीब 50 करोड़ स्मार्ट फ़ोन हैं, जिनमें से तक़रीबन 30 करोड़ लोग बैन किए गए 59 ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे थे.

विराग गुप्ता कहते हैं कि पिछले दिनों सरकार ने पोर्न साइट पर बैन लगाया था, लेकिन कई साइट को लोग चोर दरवाज़े के ज़रिए आज भी खोल ही लेते हैं.

उनका कहना है कि सरकार को फ़ौरन ऐसा क़ानून लाना चाहिए जिससे लोगों को इन ऐप्स के अनाधिकृत 'वर्ज़न' भी उपलब्ध ना हो सकें.

अनाधिकृत वर्ज़न (ब्लैक) मार्केट में उपलब्ध ना हों, केंद्र सरकार को इस पर ध्यान देने की ज़रूरत होगी.

विराग कहते हैं कि सेकेंडरी मार्केट में तो इन ऐप्स का इस्तेमाल होगा ही, ये कोई नई बात नहीं है. लेकिन वो साथ में ये भी जोड़ते हैं कि सेकेंडरी मार्केट के बिज़नेस से इन कंपनियों को सीधे तौर पर फ़ायदा नहीं पहुँचेगा.

विराग की मानें तो जहां सरकार के पास इन ऐप्स को ब्लॉक करने के कई तकनीकी तरीक़े हैं वहीँ कंपनियों के पास भी ऐसे तरीक़े हैं जिससे इस ब्लॉक को बाइपास किया जा सके. हालांकि इससे कंपनियों को ज़्यादा फ़ायदा नहीं होगा.

साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल के अनुसार इसको ना मानने पर कंपनी के ख़िलाफ़ सरकार आईटी एक्ट के धारा 66 और धारा 43 के तहत मामला दर्ज कर सकती है. इन धाराओं में तीन साल की जेल और पाँच लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है.

टिकटॉक ऐप

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मज़ेदार बात ये है कि प्रतिबन्ध के बावजूद अगर उपभोक्ता के पास फ़ोन पर ये ऐप मौजूद हैं तो उस पर कोई कार्रवाई का प्रावधान नहीं किया गया है.

चीनी ऐप पर पीएम, मंत्री नेता मौजूद रहे हैं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के कई सरकारी प्रतिष्ठान चीनी ऐप पर मौजूद रहे हैं.

चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे. उनका वेरिफ़ाइड अकाउंट था जिसके ढाई लाख के क़रीब फ़ॉलोअर्स रहे हैं. हालांकि अब ख़बर आ रही है कि प्रधानमंत्री ने अपना अकाउंट डिलीट कर दिया है.

पीएम मोदी ने साल 2015 में वीबो पर अपना अकाउंट खोला था. ये जानकारी पीएमओ के ट्विटर हैंडल पर भी दी गई थी.

वीबो और टिकटॉक पर पीएम नरेंद्र मोदी और भारत के कई नेता और मंत्री भी इसका इस्तेमाल करते रहे हैं. वो भी काफ़ी सक्रियता से क्योंकि टिकटॉक की पहुँच छोटे क़स्बों से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाक़ों तक रही है.

चीनी ऐप्स पर बैन लगाए जाने के बाद से वीबो पर पीएम मोदी के अकाउंट पर लोग ग़ुस्से वाली इमोजी पोस्ट कर रहे थे.

चीन में भारतीय दूतावास तो अब भी (ये कॉपी लिखे जाने तक) वीबो पर मौजूद है. चूँकि चीन ने ट्विटर और फ़ेसबुक को अपने यहाँ बैन कर रखा है, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन की जनता और सरकार के लिए अपने सन्देश मंडारिन में लिखा करते थे.

सरकार ने ये फ़ैसला क्यों लिया और इतनी देर से क्यों लिया?

सरकार ने जिन ऐप्स पर पाबंदी लगाई है, उनमें से ज़्यादातर ऐप्स या तो चीन में बने हैं या उनका स्वामित्व चीनी कंपनियों के पास है.

भारत सरकार के सूचना एवं तकनीक मंत्रालय को कई स्त्रोतों से इन ऐप्स को लेकर शिकायतें मिलती आ रहीं थीं कि एंड्रॉयड और आईओएस पर ये ऐप्स लोगों के निजी डेटा में भी सेंध लगा रहे थे.

सरकार का कहना है कि पाबंदी से भारत के मोबाइल और इंटरनेट उपभोक्ता सुरक्षित होंगे क्योंकि यह देश की सुरक्षा, अखंडता और संप्रभुता के लिए मौजूदा हालात में बेहद ज़रूरी है.

लेकिन कुछ जानकारों को लगता है कि ये फ़ैसला भारत-चीन के बीच मौजूदा सीमा विवाद के मद्देनज़र ही लिया गया है. सोशल मीडिया पर चीन के सामान का बहिष्कार करने के कैंपेन पहले से ही चलाए जा रहे थे.

टिकटॉक ऐप

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चीन पर असर

लेकिन प्रसान्तो कुमार रॉय कहते हैं कि इस पाबंदी का असर चीन से ज़्यादा भारत के उपभोक्ताओं पर पड़ा है.

उनके अनुसार अगर निवेश की बात की जाए तो इन ऐप्स पर पाबंदी लगने से इनपर चीन ने जो निवेश किया है वो उसका सिर्फ़ एक प्रशिशत या उससे कुछ ऊपर ही होगा. इसलिए चीन को इससे आर्थिक नुकॉसान ज़्यादा होता नहीं नज़र आ रहा है.

वो कहते हैं कि जहाँ तक व्यापार का सवाल है तो भारत में जो व्यापारी चीन से आयात, निर्यात या दूसरा कोई व्यवसाय कर रहे थे, इसका असर उनपर भी पडेगा क्योंकि चीन में वाट्सऐप काम नहीं करता और यहाँ के व्यवसायी चीन में संपर्क के लिए वी-चैट का इस्तेमाल ही करते रहे हैं. अब उन्हें सामान्य कॉल करनी पड़ेगी जो काफ़ी महंगी है.

उसी तरह चीन की कई टेक-कम्पनियां हैं जिनके लिए भारत के हज़ारों लोग यहीं से काम करते हैं. उन पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा.

दूसरी तरफ़ ये भी सच है कि भारत के इलेक्ट्रोनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने जो रिपोर्ट वर्ष 2018 में पेश की थी उसमे कहा गया था कि 'भारत को साइबर सुरक्षा को सबसे ज़्यादा ख़तरा चीन से है.'

रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में हुए 35 फ़ीसद साइबर हमले चीन से ही किये गए हैं.

इस साल भी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने भारत सरकार को आगाह किया था.

ख़ुद सूचना और प्रसारण मंत्री ने वर्ष 2015 में राज्यसभा में उठाये गए एक सवाल के जवाब में कहा था कि जिन देशों से भारत की साइबर सिक्योरिटी को ख़तरा है उसमें 'चीन टॉप देशों' में हैं.

वी चैट

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चीन की मीडिया का क्या कहना है?

चीन के आधिकारिक मीडिया, जैसे कि शिन्हुआ समाचार एजेंसी, पीपल्स डेली और चाइना सेंट्रल टेलिविज़न की ओर से इस प्रतिबंध पर कोई प्रतिक्रिया नज़र नहीं आई है. वे सीमा तनाव को लेकर आमतौर पर चीनी विदेश मंत्रालय के रवैये को ही अपनाते हैं.

हालांकि, सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने फिर से सीमा तनाव के लिए भारत को ज़िम्मेदार बताया है और कहा है कि ऐप्स पर लगाया गया प्रतिबंध "अल्ट्रा-नेशनलिज़्म" की लहर का हिस्सा है.

इस अंग्रेज़ी अख़बार ने लिखा है, "अचानक उठाया गया यह क़दम भारतीय सैनिकों द्वारा सीमा पार करके चीन के साथ अवैध गतिविधियां शुरू करने और चीनी सैनिकों पर हमला करने के कारण दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने के बाद आया है. उसके बाद से ही भारत पर अल्ट्रा-नैशनलिज़म हावी हो गया है."

समाचार और कमेंट्री वेबसाइट Guancha.cn ने कहा है कि गलवान घाटी में 'जानबूझकर उकसाकर' फिर चीनी उत्पादों का बहिष्कार कर भारत अपना ही नुक़सान करेगा.

ग्लोबल टाइम्स की चीनी भाषा वाली वेबसाइट में इस बात को दिखाने की कोशिश की गई है कि कैसे भारतीय मीडिया इस प्रतिबंध के कारण भारतीयों की नौकरियां जाने को लेकर चिंतित है. इसमें कहा गया है कि दीपिका पादुकोण, सारा अली ख़ान, शाहिद कपूर और माधुरी दीक्षित जैसे बॉलिवुड सितारे अपने प्रशंसकों से संपर्क में रहने और अपनी फ़िल्मों को प्रमोट करने के लिए कैसे टिकटॉक इस्तेमाल करते थे.

अख़बार में यह भी कहा गया है कि बहिष्कार करने का अभियान पहले ही भारत में काम कर रही चीनी कंपनियों को प्रभावित कर रहा था. इसमें नाम दिए बिना किसी चीनी मोबाइल कंपनी के भारत में मौजूद कर्मचारी के हवाले से लिखा गया है कि कोरोना महामारी और बहिष्कार के अभियान के कारण कंपनी की सेल 'काफ़ी प्रभावित' हुई है.

टिकटॉक स्टार पारुल चौधरी

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भड़के चीनी यूज़र्स

कड़ी सेंसरशिप वाली चीनी माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट वीबो- जिसे भारत में बैन किया गया है- पर 'India bans 59 Chinese apps' पर 30 जून दोपहर तक 22 करोड़ से अधिक व्यूज़ और 9,700 कॉमेंट्स थे.

कई सारे यूज़र्स ने प्रतिबंध की आलोचना की थी और भारतीय सामान और ऐप्स के बहिष्कार की अपील की थी. हालांकि वे ये भी कह रहे थे कि ऐसा करने के लिए उन्हें कोई भारतीय उत्पाद या ऐप ही नहीं मिल रहा.

एक यूज़र ने लिखा है, "सिर्फ़ कमज़ोर ही बहिष्कार करने पर उतर सकता है. हमें भारत के बहिष्कार की ज़रूरत नहीं है क्योंकि हमारे यहां 'मेड इन इंडिया' प्रॉडक्ट इस्तेमाल ही नहीं होते."

हालांकि, कुछ यूज़र्स ने लिखा है कि भारतीय वर्चुअल प्रॉक्सी नेटवर्क (वीपीएन) इस्तेमाल करके इन ऐप्स को इस्तेमाल कर सकते हैं जैसे कि चीनी इंटरनेट यूज़र VPN के ज़रिए देश द्वारा लगाई गई 'पाबंदियों की महान दीवार' को पार करके फ़ेसबुक, ट्विटर और अन्य प्रतिबंधित वेबासइट्स इस्तेमाल करते हैं.

वीबो यूज़र्स ने भारतीय दूतावास के वेरिफ़ाइड वीबो अकाउंट पर भी बैन के विरोध में कई नाराज़गी भरी टिप्पणियां कीं.

एक यूज़र ने वहाँ लिखा था, "क्या आपने ये नहीं कहा है कि आप चीन के वीबो को भी बैन कर रहे हैं? जल्दी करो, तुरंत अपना अकाउंट बंद करो."

तो भारत में कैसे चल रहे हैं अमरीकी फ़ेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप?

भारत में प्राइवेसी या निजता से सम्बंधित कोई क़ानून नहीं है. उसके अभाव में किसी भी ऐप वाली कंपनी पर कोई कार्यवाही नहीं हो पायी. प्रसान्तो कहते हैं कि अब सही वक़्त आ गया है जब सिर्फ़ चीनी ऐप ही नहीं, भारत में उपभोक्ताओं द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे किसी भी ऐप की ऑडिट होनी चाहिए.

हलाकि वो कहते हैं कि सरकार के शक के दायरे में हर ऐप है. ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ चीनी ऐप ही हों. सरकार, डाटा पर पूरा नियंत्रण चाहती है. हर सरकार यही चाहती है.

प्रसान्तो कहते हैं, "आईटी के मामले में भारत शुरू से ही चीन से प्रभावित रहा है. जिस तरह चीन ने सारा डाटा अपने नियंत्रण में कर रखा है जिससे हर एक नागरिक की गतिविधियों पर नज़र रखी जा सके, भारत भी ऐसा ही मॉडल चाहता है."

मिसाल के तौर पर वो कहते हैं कि व्हाट्सऐप जैसा चीन का वी-चैट ऐप है. फ़र्क़ ये है कि व्हाट्सऐप के चैट एक यूज़र से दूसरे यूज़र के बीच 'एन्क्रिप्टेड' रहती है जिसे सरकारी एजेंसियां मॉनिटर नहीं कर सकती हैं. लेकिन वी-चैट में ऐसा नहीं है. अगर उसपर दो लोग बात कर रहे हैं, और वो चीनी सरकार के ख़िलाफ़ बात कर रहे हैं, तो उनकी कॉल को न सिर्फ़ ट्रेस कर लिया जाएगा बल्कि वो गिरफ़्तार भी हो सकते हैं.

इसीलिए भारत सरकार हर तरह के सोशल मीडिया ऐप को चाहती है कि उनका डाटा भारत में ही जमा हो और सरकार जब चाहे उसे भेद सके. अमरीका ने भी सोशल मीडिया के कई ऐप पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है.

डेटा और साइबर सुरक्षा के कई पहलू हैं. रॉयटर्स की एक ख़बर के मुताबिक़ 2018 में फ़ेसबुक ने माना था कि वो यूज़र्स का डाटा चार चीनी कंपनियों के साथ साझा करता है जिसमें ख़्वावे, लिनोवो और ओप्पो शामिल हैं.

ऐप्स

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भारत में नए क़ानून की तैयारी

फ़ेसबुक, ट्विटर पर भारत सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर सभी मंत्रालय, जानी मानी हस्तियाँ, नेता और अभिनेता - सभी मौजूद हैं.

हालांकि भारत साकार ने इसको लेकर एक नए क़ानून को लाने का प्रस्ताव रखा है जिससे इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सरकार पैनी नज़र रख सके और इनकी जवाबदेही तय कर सके.

इस नए प्रस्ताव पर क़ानूनविदों की राय भी माँगी गयी है जिसके तहत सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस के 24 घंटों के अन्दर ही आपत्तिजनक पोस्ट को हटाने पर बाध्य होना पड़ेगा अन्यथा उसपर क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती है.

इस क़ानून को मई महीने से प्रभावी होना था. लेकिन कोरोना वायरस की वजह से अभी इसपर फ़ैसला रुका हुआ है.

भारत में अकेले फ़ेसबुक के 30 करोड़ उपभोक्ता हैं जबकि व्हाट्सऐप के 20 करोड़. ट्विटर के भी लाखों उपभोक्ता सिर्फ़ भारत में मौजूद हैं. इसलिए सरकार चाहती है कि कोई प्रभावी क़ानून लाया जाए ताकि जो सामग्री इन प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए जा रही है उसपर निगरानी की जा सके और फ़ेक न्यूज़ को भी रोका जा सके.

लेकिन साइबर सुरक्षा से जुड़े लोगों को लगता है कि सरकार के इस फ़ैसले से भी भारतीय उपभोक्ताओं की निजता पर असर पड़ सकता है और ये सेंसरशिप की तरफ़ भी जा सकता है.

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