कर्नाटक के बाद, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी ऑपरेशन कमल की तैयारी?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कर्नाटक में कांग्रेस और जेडी(एस) के गठबंधन को मिली हार के बाद भारतीय जनता पार्टी की अब राजस्थान और मध्यप्रदेश पर आँखें टिकीं हैं. मध्यप्रदेश की परिस्थितियां भी कर्नाटक के जैसी ही हैं जहाँ कुल 231 सीटों में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच काफ़ी कम अंतर है.
साल 2018 में हुए विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को जहाँ 114 सीटें मिलीं, वहीं भारतीय जनता पार्टी के पास 108 सीटें हैं. ऐसे में बहुजन समाज पार्टी के दो, समाजवादी पार्टी के एक और निर्दलीय चार विधायकों की अहमियत काफ़ी बढ़ गई है. इनमें से एक निर्दलीय विधायक को तो मंत्रिमंडल में शामिल भी कर लिया गया है.
आशंका है कि कर्नाटक की कामयाबी के बाद भाजपा की महत्वकाँक्षा कांग्रेस शासित राज्यों में काफ़ी बढ़ गई है. इसलिए कांग्रेस ने इन राज्यों में अपने विधायकों को बचाये रखने की क़वायद शुरू कर दी है.

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राजस्थान में हालात थोड़े मुश्किल हैं क्योंकि सत्तारूढ़ कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीटों का अंतर ज़्यादा है. यहाँ कांग्रेस के पास 112 सीटें हैं जबकि भाजपा के पास सिर्फ़ 72. हाँ, इस अंतर को कम करने के लिए अगर दूसरे दलों के विधायकों की तरफ़ भाजपा दाना भी डालती है तो भी बात नहीं बन पाएगी. इसलिए बिना कांग्रेस के टूटे, भाजपा की नैया पार नहीं लग सकती है. लेकिन भाजपा को फिर भी संभावनाएं नज़र आ रहीं हैं.
बात मध्यप्रदेश की करें तो कहा जाता है कि यहाँ कांग्रेस के अंदर ही कई ख़ेमे हैं. एक मुख्यमंत्री कमलनाथ का, दूसरा दिग्विजय सिंह का. कमलनाथ अभी भी मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने हुए हैं. यहां आधिकारिक तौर पर इस प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का कोई मुखिया नहीं है.

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मध्य प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे अविनाश बीबीसी से कहते हैं कि कांग्रेस की अंदरूनी सांगठनिक खींचा तानी से कोई प्रदेश नहीं बचा हुआ है. चाहे वो पंजाब हो, राजस्थान हो या फिर मध्यप्रदेश. यहाँ तक कि छत्तीसगढ़ में प्रदेश अध्यक्ष रहे भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाया गया. काफ़ी महीनों के बाद नए प्रदेश अध्यक्ष को नियुक्त किया गया.

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लेकिन अब भाजपा का सारा ध्यान मध्यप्रदेश में सत्ता हासिल करने पर लगा हुआ है.
क़वायद शुरू हो चुकी है क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आज अचानक अपने पुराने 'फॉर्म' में दिखे जब उन्होंने कहा, "कमलनाथ सरकार चलती का नाम गाड़ी है. जब तक चलेगी, तब तक चलेगी.''
वहीं मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शिवराज सिंह चौहान को चुनौती देते हुए कहा कि अगर भाजपा में हिम्मत है तो मध्य प्रदेश विधान सभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश कर के देखे. कमलनाथ के अनुसार बीजेपी के सारे मुग़ालते दूर हो जाएंगे.

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वहीं प्रदेश में कांग्रेस के प्रवक्ता पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के वक्तव्य का अर्थ कुछ इस रूप में निकाल रहे हैं कि भाजपा सरकार कर्नाटक के बाद मध्यप्रदेश में सेंधमारी की कोशिश में लग गई है.
उन्होंने आरोप लगाया, "अब हमारी सरकार में बहुजन समाज पार्टी की विधायक हैं रामबती बाई जिन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें दल बदलने के लिए भाजपा ने 50 करोड़ रूपए देने की पेशकश की. अब आप बताइये ये पैसों से विधायकों को ख़रीदने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इन सब के बाद कांग्रेस एकजुट है और हमारे सहयोगी भी हमारे साथ हैं. एक लोकतांत्रिक तरीक़े से बनी सरकार को अपदस्त करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं."
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी के अनुसार केंद्र सरकार ने कमलनाथ के ख़िलाफ़ 1984 के सिख नरसंहार के मामले खोलने के संकेत पहले से ही दे दिए हैं, साथ ही उनके ख़िलाफ़ आय से अधिक संपत्ति का कोई पुराना मामला भी खुलने की बात कही जा रही है.
जोशी के अनुसार भाजपा की रणनीति है कि जिस किसी राज्य में विपक्षी दल की सरकार है और जहां बहुमत का अंतर बहुत कम है या बहुत ही नाज़ुक संतुलन से सरकार चल रही है उन सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश की जाए.
राम विचार नेताम भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष हैं. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, ''कांग्रेस 'सांगठनिक और वैचारिक' रूप से ख़त्म हो रही है. इसलिए लोगों को लगता है कि उनका राजनीतिक भविष्य भाजपा के साथ सुरक्षित है. कांग्रेस के लोग कहते हैं कि हम तोड़फोड़ कर रहे हैं. ये ग़लत है. कोई किसी के साथ ज़बरदस्ती नहीं कर सकता."

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लेकिन राजस्थान में कांग्रेस की प्रवक्ता अर्चना शर्मा कहती हैं कि भाजपा कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कुछ भी करे राजस्थान में उसके मंसूबे कामयाब नहीं होंगे हालंकि बीजेपी गहलोत सरकार को अपदस्त करने की पूरी कोशिश कर रही है.
वो कहती हैं, "कांग्रेस अपने दम पर 112 सीटें जीतकर आयी है जबकि भाजपा के पास सिर्फ़ 72 विधायक हैं. राजस्थान की सत्ता पर क़ाबिज़ होना मुंगेरी लाल के हसीन सपने जैसा ही है."
मगर राजस्थान की भारतीय जनता पार्टी की इकाई उत्साहित है और दावा कर रही है कि कई कांग्रेसी विधायक और उनके साथ जुड़े दल उनकी पार्टी के संपर्क में हैं.
मुकेश पारिख भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और प्रवक्ता भी. वो इस बात से इंकार करते हैं कि राजस्थान में उनकी पार्टी किसी भी तरह से कांग्रेस के विधायकों को लुभाने की कोशिश कर रही है.

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उनका कहना है, " कांग्रेस के अंदर ही अंदर जमकर गुटबाज़ी चल रही है. केंद्रीय अध्यक्ष भाग गए. दूसरा कोई अध्यक्ष नियुक्त नहीं हुआ. कार्यकर्ता और विधायक मायूस और नाउम्मीद हैं. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के दरवाज़े खुले हैं. हम सबका स्वागत करते हैं. मगर ख़रीद फ़रोख़्त नहीं करते हैं.
हालाकि जानकारों का कहना है कि सिर्फ़ मध्यप्रदेश ही ऐसा राज्य है जहाँ भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने की संभावना नज़र आ रही है क्योंकि सत्तारूढ़ कांग्रेस के विधायकों और भाजपा के विधायकों की संख्या में अंतर काफ़ी कम है.
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