इस विषय के अंतर्गत रखें दिसम्बर 2012

बाल ठाकरे के बिना मुंबई कैसी?

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|सोमवार, 31 दिसम्बर 2012, 18:05

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पिछले लगभग पचास सालों से बॉम्बे या मुंबई और बाल ठाकरे का नाम एक ही सांस में लिए जाता रहा, लेकिन 2013 ऐसा पहला साल होगा जब मुंबई के साथ बाल ठाकरे का नाम नही जोड़ा जा सकेगा.

इस साल उनकी मौत से पूरा मुंबई शहर सदमे में आ गया क्योंकि मुंबई और महाराष्ट्र में एक पूरी पीढ़ी बाल ठाकरे की तेज़ तर्रार राजनीति की आदी सी हो गयी थी.

कुछ उनसे खौफ खाते थे तो कुछ उनकी पूजा करते थे, लेकिन कोई उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था.

उन्होंने ही 1966 में शिव सेना की स्थापना की थी और तभी से वो मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति के बेताज बादशाह बने रहे. कभी चुनाव नहीं लड़ा लेकिन हमेशा सियासी अखाड़े में अपना मुकाम बना कर रखा.

तो नए साल में कदम रखने पर बाल ठाकरे के एक इशारे पर पूरी तरह से बंद हो जाने वाला मुंबई शहर राहत की सांस लेगा या उनके क्लिक करें विवादास्पद लेकिन कद्दावर व्यक्तित्व को मिस करेगा?

कुछ लोगों का मानना है कि उद्धव ठाकरे अपने पिता जैसी लोकप्रियता कभी नहीं हासिल कर सकते.

उनके समर्थकों को उनकी कमी तो ज़रूर खलेगी लेकिन उनके विरोधी नेताओं को भी उनकी कमी का एहसास होगा.

कुछ लोगों का ख्याल है कि क्लिक करें उद्धव ठाकरे अपने पिता जैसी लोकप्रियता कभी नहीं हासिल कर सकते.लेकिन, उनके भतीजे राज ठाकरे को एक दबंग नेता माना जाता है.

जिस दिन से राज ठाकरे शिव सेना और बाल ठाकरे से बगावत कर के अलग हुए हैं उन्होंने अपनी सियासत को अपने चाचा की राजनीति के अंदाज़ में ढालने की कोशिश की है जिससे उन्हें सीमित सफलता मिली है.

2014 में न सिर्फ संसद का चुनाव होगा बल्कि महाराष्ट्र विधान सभा का भी चुनाव होने वाला है. कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठबंधन 1999 से विधान सभा का चुनाव जीतता चला आ रहा है.

सवाल है कि क्या बाल ठाकरे की अनुपस्थिति में शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी का गठजोड़ कांग्रेस और एनसीपी के गठजोड़ को ऐसा करने से रोक सकेगा? क्या बाल ठाकरे की मौत से उनकी पार्टी को चुनाव में हमदर्दी का वोट मिलेगा?

फिलहाल इन सवालों का जवाब ढूँढना मुश्किल है लेकिन साल 2013 में इनके संकेत ज़रूर मिलने लगेंगे.

पिछले दस सालों में दिल्ली शहर बुनयादी ढाँचे में मुंबई से काफी आगे निकल चुका है.

मेट्रो का जाल हो या फिर फ़्लाईओवरो का निर्माण दिल्ली मुंबई के मुकाबले कहीं अधिक विकसित हो चुकी है.

लेकिन बुनयादी ढाँचे के मैदान में साल 2013 मुंबई का साल होगा. तीन चरणों में तैयार होने वाले मेट्रो के पहले चरण का उद्घाटन मार्च में होने वाला है.

और इसी महीने में ही मोनो रेल भी चलने लगेगी. अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को शहर से जोड़ने वाला एक लम्बा फ्लाईओवर भी अगले साल के चंद महीनों में ट्रैफिक के लिए तैयार हो जाएगा.

मुंबई अगर दिल्ली से बुनयादी ढाँचे में पीछे है तो आर्थिक गतिविधियों में और शेयर बाज़ार की हलचल में उससे कहीं आगे.

पिछले दो सालों से शेयर बाज़ारों में कुछ अधिक उछाल देखने को नहीं मिला लेकिन शेयर दलाल को उम्मीद है कि 2013 में शेयरों में निवेश करके पैसे कमाने वालों के लिए अच्छा साल होगा

ये भीड़तंत्र है

विनोद वर्माविनोद वर्मा|रविवार, 23 दिसम्बर 2012, 16:19

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हम लोकतंत्र में हैं. लोक इंडिया गेट पर तंत्र से भिड़ा हुआ है.

वह दिल्ली की एक बस में एक लड़की के साथ हुए बर्बर बलात्कार से नाराज़ है, वह न्याय की मांग कर रहा है.

शनिवार को टेलीविज़न चैनलों के माध्यम से पूरे देश ने देखा कि युवा प्रदर्शनकारी कितने नाराज़ थे.

नाराज़ युवा किसी राजनीतिक दल या किसी एक संस्था के आह्वान पर वहाँ नहीं पहुँचे थे. ख़ुद पहुँचे थे.

नाराज़गी वाजिब है. उनका विरोध प्रदर्शन वाजिब है. इसके लिए इंडिया गेट पर इकट्ठा होना भी सही है.

लेकिन उन भवनों में जाने की ज़िद हरगिज़ वाजिब नहीं है जहाँ देश के शीर्ष हुक्मरान बैठते हैं. राष्ट्रपति भवन नें बल पूर्वक घुस जाने की कोशिशें भी बेवजह हैं.

ग़ुस्सा, चाहे वो कितना भी बड़ा हो, इस लोकतंत्र किसी को अधिकार नहीं देता कि वह क़ानून अपने हाथों में ले ले. नाराज़गी ये हक़ किसी को नहीं देती कि आप अपनी मर्ज़ी के मालिक हो जाएँ.

पुलिस को युवाओं को राष्ट्रपति भवन की ओर जाने से रोकने के लिए पानी की बौछारें फेंकनी पड़ी, आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और कई बार लाठीचार्ज करना पड़ा.

इस पर नाराज़गी और बढ़ गई. देश की मीडिया (ख़ासकर टीवी चैनलों ने) ने इसे और हवा दी.

लोकतंत्र नागरिकों को अधिकार देता है लेकिन उसकी एक सीमा है. संविधान के जिस पन्ने पर अधिकारों की बात है लगभग वहीं कर्तव्यों की भी बात लिखी है.

कर्तव्यों को जेब में रखकर अधिकार माँगना किसी भी ज़िम्मेदार नागरिक को शोभा नहीं देता, चाहे वो युवा ही क्यों न हो.

संसद, प्रधानमंत्री निवास, राष्ट्रपति भवन सहित किसी भी सरकारी दफ़्तर में घुसकर विरोध प्रदर्शन की ज़िद, पुलिस पर हमला करने की नादानी, पुलिस और दूसरे सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ की गुस्ताख़ी लोकतंत्र नहीं है, भीड़तंत्र है.

बलात्कार के लिए फाँसी की सज़ा मांगिए, पुलिस से घोर नाराज़गी जताइए. अगर ये सरकार निकम्मी है तो उसे अपने वोट से उखाड़ फेंकिए लेकिन लोकतंत्र को भीड़तंत्र में मत बदलिए.

भीड़ का दिमाग़ नहीं होता, आप युवा हैं अपने दिमाग़ का इस्तेमाल कीजिए और नियंत्रणहीन भीड़ में शामिल होने से बचिए.

याद रखिए, लोकतंत्र का भीड़तंत्र में तब्दील होना भी ख़तरनाक और शर्मनाक है.

ये गुस्सा है आंदोलन नहीं

सुशील झासुशील झा|रविवार, 23 दिसम्बर 2012, 15:48

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मैं बलात्कार के ख़िलाफ़ हूं.......मैं मृत्युदंड के भी ख़िलाफ़ हूं.

मैं आंदोलनों की आलोचना करता हूं लेकिन मैं गुस्से का समर्थन करता हूं.

मैं विरोध के साथ हूं लेकिन राष्ट्रपति भवन और नॉर्थ ब्लॉक में जबरिया घुसने का विरोध करता हूं.

मैं दिल्ली पुलिस के पुलिसिया रवैए का विरोध करता हूं और इंडिया गेट पर पहुंचे प्रोफेशनल नेताओं का भी.

मैं कैमरा देख कर आंखों में आंसू लाने वालों का भी विरोध करता हूं लेकिन उन सभी के साथ हूं जो बिना कहे अपनी बात चुपचाप रख रहे हैं.

आक्रोश है और गुस्सा है......इसे आंदोलन का नाम देकर इसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने का भी मैं विरोध करता हूं.

मैं उन सभी पोस्टरों का भी विरोध करता हूं जो पोस्टर पर नारे कम और अपने संगठन का नाम बड़े अक्षरों में लिखते हैं.

भ्रमित मत होइए......मैं विरोध के साथ हूं......लेकिन थोड़ा सोच समझ कर...क्योंकि मैं जानता हूं इस विरोध में कई लड़के ऐसे भी हैं जो मौका मिलने पर लड़कियों को छेड़ते भी होंगे.

ऐसे ही लोग उस फ्लाईओवर के नीचे भी खड़े होंगे जब वो लड़की और उसका दोस्त निर्वस्त्र पड़े थे..किसी ने अपनी जैकेट खोल कर नहीं डाली थी उन पर.

यही पुलिस आई थी और होटल से चादर लेकर डाली थी उन पर. इंडिया गेट पर हल्ला करना आसान है......बलात्कार की गई लड़की की मदद करना शायद मुश्किल....

बदलना उस मानसिकता को होगा....

मैं समझता हूं कि गुस्सा है और गुस्से की आवाज़ दूर तक असर करती है...असर कर भी रही है....इस असर को किसी भी ऐसे कदम से नुकसान हो सकता है जो उठाया जा रहा है गुस्से के नाम पर.


रोष, आक्रोश, गुस्सा, नाराज़गी सब अपनी जगह है और ये चलने भी चाहिए लेकिन इसके नाम पर पुलिस के साथ लड़ने से कुछ हल नहीं होने वाला है.

इंडिया गेट पर जाइए...शांति से विरोध जताइए..गुस्सा दिखाइए....क्योंकि आप वही दिखाने आए हैं..

क्योंकि आप भी जानते हैं...बलात्कारी इंडिया गेट पर नहीं बैठे हैं....वो दिल्ली की रग रग में हैं....हर गली और हर चौराहे पर हैं...उन्हें बदलने के लिए सभी को बदलने की ज़रुरत है.....और दिल्ली की इस फिज़ा को बदलने में अभी समय लगेगा....


सावधान होइए......इंडिया गेट नहीं बदलना है.....बदलना पूरी दिल्ली को होगा..दिल्ली क्या पूरे देश को बदलना होगा अपनी आधी आबादी के लिए........मैं उस बदलाव के साथ हूं..

होश की दवा खाओ, शरीफ़ा बीबी!

राजेश जोशीराजेश जोशी|गुरुवार, 20 दिसम्बर 2012, 21:01

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प्रिय शरीफ़ा बीबी,

तुमसे हुई उस छोटी सी मुलाक़ात के बाद अब भी मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा हूँ.

तुम इतनी ज़िद्दी क्यों हो? जो कुछ हुआ उसे भूल जाओ ना !

दस साल गुज़र गए हैं. दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई. आठ साल के बच्चे अब अठारह साल के नौजवान हो चले हैं.

देखों तुम्हारे शहर की सड़कें कितनी चौड़ी हो गई हैं. कितनी तो ऊँची ऊँची कॉलोनियाँ बन गई हैं. कारें, कितनी तो चमचमाती कारें हो गई हैं. और शॉपिंग मॉल्स?

अब तो लगातार तीसरी बार तुम्हारे रहनुमा तुम्हें विकास यानी तरक़्क़ी की राह पर ले जाने को तैयार हैं.

पर तुम हो कि अब भी हर आने जाने वाले को वही पुरानी कहानी सुनाती हो.

जैसे कि मुझे सुनाई तुमने अपनी रामकहानी कि कैसे उस सुबह तुम चाय पी के बैठी थीं और अचानक तुमने देखा कि टुल्ले के टुल्ले आ रहे थे. हथियारों से लैस लोगों की भीड़.

कैसे तुम और तुम्हारा आदमी पुलिस वालों के पास मदद माँगने पहुँचे और फिर पुलिस वालों ने तुम्हें ये कह कर भगा दिया कि आज तुम्हारा मरने का दिन है, वापिस घर जाओ.

अब ऐसी भारी भीड़ के सामने पुलिस वाले क्या कहते भला? बोर हो गया मैं तुम्हारी दास्तान सुनकर.

और अब तुम ये याद करके करोगी भी क्या कि जब तुम और तुम्हारे बच्चे जान बचाने को इधर-उधर भाग रहे थे, तुम्हारा सबसे बड़ा बेटा पीछे छूट गया?

ये याद करके भी क्या करोगी कि उसको भीड़ ने पाइप, लाठियों और तलवारों से मारा.

और ये याद करके भी क्या करोगी कि जब उसका कत्ल किया जा रहा था तो तुम जाली के पीछे से छिपकर देख रही थी और तुम्हारी आँखों के सामने ही भीड़ ने उसपर मिट्टी का तेल डालकर उसे जला डाला?

देखो सब आगे बढ़ गए हैं. तुम कब तक उन यादों में उलझी रहोगी. तुम लोगों की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि तुम भूल नहीं सकते.

ग़ुस्सा सबको आया था तब. आया था कि नहीं? सब पढ़े-लिखे अँग्रेज़ी बोलने वाले लोगों ने रुँधे गले से कहा था - दिस इज़ अनएक्सेप्टेबल.

फिर एक्सेप्ट कर लिया ना?

अमिताभ बच्चन ने किया. अंबानी ने किया. रतन टाटा ने किया.

शरीफ़ा बीबी तुम बड़ी कि रतन टाटा? तुम बड़ी कि अंबानी और अमिताभ बच्चन? रहो अपनी ज़िद पर अड़ी हुई. अरे कहाँ इतने नामवर लोग और कहाँ तुम? कुछ सोचो.

अब देखो ना, अहमदाबाद में अपने होटल के कमरे में बैठकर जिस समय तुमको मैं ये ख़त लिख रहा हूँ, टेलीविज़न की स्क्रीन से पूरे देश का ग़ुस्सा फटा पड़ रहा है.

दिल्ली की एक बस में चार लोगों ने नर्सिंग की पढ़ाई कर रही 23 साल की एक लड़की के साथ चार लड़कों ने बलात्कार किया, लोहे के सरियों से उसके पेट पर इतने प्रहार किए कि उसकी आँते तक कुचल गईं. उस लड़की और उसके दोस्त के कपड़े उतारकर हमलावर उन दोनों को चलती बस से फेंक कर चलते बने.

अभी फिर से सभी नेता और अभिनेता रो रहे हैं. कह रहे हैं कि दिस इज़ अनएक्सेप्टेबल.

आज जिसे अनएक्सेप्टेबल कहा जाता है, पढ़े लिखे लोग कल उसे एक्सेप्टेबल मान लेते हैं या फिर उसका ज़िक्र ही नहीं करते.

तुम्हारी क्या मत्ति मारी गई है, शरीफ़ा बीबी? तुम भी धीरे से कहना सीखो --दिस इज़ अनएक्सेप्टेबल. और फिर भूल जाओ.

होश की दवा खाओ, शरीफ़ा बीबी, होश की दवा!

(नोट: शरीफ़ा बीबी एक काल्पनिक चरित्र नहीं है. कई मरने वालों ने मरने से पहले इन्हें अपनी आँखों से देखा है. ज़िंदा लोग अब भी उन्हें देख सकते हैं. आप भी अगर ज़िंदा हैं तो इस ज़िद्दी औरत से अहमदाबाद की नरोदा पाटिया बस्ती में मुलाक़ात कर सकते हैं.)

रूपमती का वीज़ा

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|शनिवार, 15 दिसम्बर 2012, 04:41

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31 दिसंबर के इंतजार में उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. कुछ और बदले या न बदले, साल जरूर बदल जाएगा. सुना है कि सब ठीक ठाक रहा तो भारत और पाकिस्तान के बीच कम से कम ये सर्दियां गर्मा-गर्मी बढ़ाने के बजाय गर्मजोशी में इजाफे का कारण भी बन सकती है.

बादल देख कर घड़े फोड़ देने वाले लोग कहते हैं कि नई वीज़ा नीति के तहत बिछड़े हुए खानदानों के लिए बढ़े ना बढ़े, पर दोनों देशों के व्यापारियों के लिए यात्रा सुविधाएं जरूर बढ़ गई हैं.

नई नीति के तहत शहर बेचे और खरीदे जाएंगे. जिसकी इतनी आमदनी होगी, उसे पांच शहरों का पुलिस रिपोर्टिंग वाला वीज़ा मिलेगा, जिसकी उतनी आमदनी होगी, उसे दस शहरों का मल्टीपल पुलिस रिपोर्टिंग से छूट वाला वीज़ा मिलेगा और जो सफेदपोश होगा, वो हमेशा की तरह वीज़ा अफसर के रहमो करम पर होगा.

दूसरी अच्छी खबर ये है कि भारत और पाकिस्तान के बीच मुक्त व्यापार के रास्ते में आने वाली अड़चनें अगर 31 दिसंबर नहीं, तो अप्रैल-मई तक जरूरत खत्म कर ली जाएंगी.

तो जिस तरह वाघा के रास्ते प्याज, टमाटर, चीनी, अनाज, संसदीय शिष्टमंडल, फैज अहमद फैज का 'हम देखेंगे' गाने वाले मशाल-बरदार आ जा सकते हैं, इसी तरह किताबों, पत्रिकाओं और अखबारों से भरे ट्रक भी आ जा सकेंगे?

जिन अड़चनों को दूर करने की बात हो रही है क्या उनमें भारत और पाकिस्तान के खबरिया चैनलों का प्रसारण आर-पार जाने पर लागू घोषित और अघोषित पाबंदी का खात्मा करना भी शामिल होगा?

क्या थियेटर की मंडलियों, गायकों के दलो, शिक्षकों, लेखकों, वैज्ञानिकों और छात्रों की बेरोक टोक आवत जावत को प्राथमिकता सूची में जगह दी जाएगी?

इन सवालों का सबब ये है कि हाल ही में पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी गायकों का एक मुकाबला दुबई में हुआ क्योंकि इसके आयोजक वीजा हासिल करने में आने वाली जिल्लत से बचना चाहते थे.

अभी अभी कराची में जो पांचवी अंतरराष्ट्रीय ऊर्दू कांफ्रेंस खत्म हुई है, उसके लिए भारत से सात विद्वान आना चाहते थे, जिनमें से सिर्फ एक यानी डॉ. शमीम हनफी को ही वीजा मिल सका.

और इस वक्त कराची में जो आठवा अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला चल रहा है, इसमें पाकिस्तानी प्रकाशकों के बाद सबसे ज्यादा भारतीय प्रकाशक शामिल होने थे. लेकिन 21 भारतीय प्रकाशकों में सिर्फ सात प्रकाशक ही वीजा पाने में कामयाब रहे. नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया की किताबें तो आ गईं, लेकिन किताबें भेजने वाले दिल्ली में ही अटक गए. ऐसे में उनके स्टॉल का जिम्मा पाकिस्तान के नेशनल बुक फाउंडेशन वाले ही देख रहे हैं.

कराची प्रेस क्लब के सफाई कर्मचारी ज्ञान चंद की 65 वर्षीय मां रूपमती का आधा परिवार विभाजन के बाद मुंबई चला गया था. रूपमती मरने से पहले एक बार मुंबई जाना चाहती है. उसके पास पासपोर्ट भी है. उसने चंद हजार रुपये भी जमा कर रखे हैं. लेकिन तड़पने और फड़कने के बावजूद वीजा के लिए आवेदन करने का हौसला नहीं है.

मैंने पूछा क्यों? कहने लगी कि पहली बार वीजा लेने के लिए इस्लामाबाद जाना पड़ेगा. सारे पैसे तो वहीं खत्म हो जाएंगे. वीजा मिल भी गया तो मुंबई जाने का किराया कहां से लाऊंगी?

आप लाख मशालें जलाते रहें, कबूतर के गले में बांध कर आर पार मुहब्बत के पैगाम भेजते रहे, साझा विरासत, इतिहास और संस्कृति के नारे लगाते रहें, गले से गला मिला कर हवाई चुंबन उछालते रहें, लेकिन आखिरी फैसला तो साउंड प्रूफ शीशे की खिड़की के दूसरी तरफ बैठने वाले वीज़ा अफसर को ही करना है, जिसके एक हाथ में गृह मंत्रालय, दूसरे हाथ में विदेश मंत्रालय और गले में खुफिया विभागों की डोरी बंधी हैं.

आंखों पर घोषित और अघोषित निर्देशों का काला चश्मा है और कानों में विकृत इतिहास की रुई ठुंसी है.

ऐ डेढ़ अरब इंसानों के नीति निर्माता क्लर्क राजनेताओ... चरमपंथियों को वीजा की जरूरत नहीं होती.

एक था चिंटू

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|गुरुवार, 13 दिसम्बर 2012, 01:08

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चिंटू ऐसा सामान्य नाम है, जिसे सुनते ही चंचल, चपल, दौड़ता-भागता बचपन याद आता है. आस-पड़ोस के किसी बच्चे का नाम चिंटू न हो, ऐसा शायद ही हो. वो भी वैसा ही था, चंचल, चपल, ऊर्जा और ज़िंदगी से भरपूर. बात 1989 की है, जब मेरे पिताजी का तबादला बिहार के सिवान ज़िले में हुआ था.

मुझे अच्छी तरह तो याद नहीं, लेकिन कुछ महीनों में ही उससे अच्छी जान-पहचान हो गई थी. चिंटू और उसके कई दोस्तों से मैं सीनियर था, इसलिए मैं उनका भइया बन गया. मोहल्ले में चिंटू के हमउम्र कई लड़के थे, जिनके साथ क्रिकेट, फ़ुटबॉल और अन्य खेल खेलने का मौक़ा मिलता था. खेल-कूद के बहाने कई बार उसके घर भी जाने का मौक़ा मिला और फिर धीरे-धीरे चिंटू हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया.

समय बीतता गया, खेल-कूद के अलावा भी राजनीति और फ़िल्मी बहसबाज़ी में वो हमलोगों का साझीदार हुआ करता था. पढ़ने में चिंटू काफ़ी तेज़ था और उसकी हैंडराइटिंग इतनी अच्छी होती थी कि पूछिए मत.

फिर पढ़ाई और करियर मुझे दिल्ली खींच लाई और धीरे-धीरे संपर्क कम हुआ. हमारा मोहल्ला भी बदल गया. लेकिन साल में जब भी घर जाना हुआ, चिंटू से आमना-सामना ज़रूर होता रहा. फिर एक दिन चिंटू का एक दूसरा रूप देखा. नशे में धुत चिंटू. गिरता-पड़ता चिंटू. मेरे पास समय कम होता था, लेकिन जितना संभव हो सका, हमने चिंटू को बहुत समझाया.

लेकिन इसके बाद जब भी सिवान जाना हुआ, हर बार एक नए चिंटू से सामना हुआ. उसकी दाढ़ी बढ़ गई थी. दोस्त-यार कम हो गए थे. उसके हमउम्र दोस्त करियर की दौड़ में उससे काफ़ी आगे निकल गए थे. मैं भी लंदन चला गया, लेकिन उसका हाल समाचर मिलता रहा. उसकी हालत दिनों-दिन ख़राब होती जा रही थी.

इस बार नवंबर में सिवान जाना हुआ. पड़ोस के अपने एक दोस्त के यहाँ बैठा हुआ था, तो उसने बताया कि चिंटू की हालत काफ़ी ख़राब है. हम सभी चिंटू के यहाँ गए. एक कमरे में पड़े चिंटू को देखकर एकबारगी मुझे नहीं लगा कि मेरे सामने वही चिंटू है, जो कुछ साल पहले दौड़ता-भागता ऊर्जावान चिंटू था.

दाढ़ी बढ़ी हुई, बाल बढ़े हुए. शरीर गल गया था. मन तो उस समय और दुखी हुआ, जब वो मुझे पहचान नहीं पाया. कई बातें याद दिलाईं, तो एकाएक उसके चेहरे पर एक चमक दिखी. बोला- पंकज भैया. मैंने उससे ख़ूब बातें की. पुराने दिनों को याद किया. उसके बालों में हाथ फेरा, तो आँखों का कोना कहीं भींग सा गया. उसकी विधवा माँ मेरे सामने अपने एकमात्र बेटे की हालत देखकर फूट-फूट कर रो रही थीं.

चिंटू ने मुझसे वादा तो किया कि वो आगे शराब नहीं पीएगा. लेकिन मैं समझ गया था कि चिंटू बहुत आगे निकल गया है. उसके घर से बाहर निकलते समय मेरी साँसें उखड़ी हुई थी. एक प्रतिभावान और ऊर्जावान बच्चे को इस रूप में देखना पीड़ादायक था.

एक सप्ताह बाद जब मैं सिवान से बाहर था, मुझे मेरे दोस्त अभिषेक ने फोन किया- चिंटू नहीं रहा. चिंटू की मौत हो गई. लगा जैसे जिंदगी रुक सी गई हो.

चिंटू की मौत के बाद मोहल्ले से इक्का-दुक्का लोग ही उसके घर गए. पता चला उसके बुरे दिनों में मोहल्ले के ज़्यादातर लोगों ने उसका बहिष्कार कर दिया था. शुरुआती दिनों में चिंटू उसी समाज के हाथों ख़ूब इस्तेमाल हुआ. कई बार कुछ लोग शराब के नशे में धुत्त चिंटू को बुलाकर उससे अनर्गल प्रलाप करवाते थे और कहीं न कहीं उसे गर्त में धकेलने के लिए कुछ हद तक ज़िम्मेदार थे. धीरे-धीरे वही चिंटू उनके लिए अछूत बन गया.

समाज ने चिंटू को उस समय छोड़ दिया, जब उसे समाज की सबसे ज़्यादा आवश्यकता था. एकाकीपन ने चिंटू को और बीमार बनाया. आख़िरकार वो काल के गर्त में समा गया. उसकी मौत के बाद उसके घर गया. पता चला उसकी अकेली माँ उसके अंतिम संस्कार के लिए गाँव गई है. पास ही एक घर में ख़ूब गाना-बजाना हो रहा था, पता चला वहाँ शादी थी.

अच्छा लगा, किसी की नई दुनिया बस रही थी. शायद चिंटू की भी दुनिया बस सकती थी, लेकिन....

बात जीन्स या सलवार सूट की नहीं......

वंदनावंदना|मंगलवार, 11 दिसम्बर 2012, 12:21

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मेरे घर खाना बनाने के लिए आने वाली महिला रोज़ सलवार सूट पहनकर आती है. उसके सर पर हमेशा दुपट्टा रहता है. यानी पूरा बदन ढका हुआ.

यहाँ पर पहनावे का ये विस्तृत ब्यौरा आपको थोड़ा अटपटा लग सकता है लेकिन इसे लिखने की एक वजह है.

दरअसल दो-तीन दिन पहले वो जब काम पर आई तो थोड़ी परेशान सी दिखी. मुझसे रहा न गया तो मैनै पूछ डाला. तो उसने बताया कि शाम को काम करने का बाद जब वो पैदल घर जा रही थी तो एक व्यक्ति उसका पीछा करने लगा.

घटना के समय वो जिस कदर डर गई होगी, ठीक वैसा ही डर उसके चेहरे पर मैं देख सकती थी.

"पीछा करने वाले की तो उम्र भी बहुत ज़्यादा थी. ऐज भी नहीं देखी.", उसने झुंझला कर बोला.

इस घटना के बाद से वो डर गई है. घर में कहा गया कि या तो काम छोड़कर घर बैठ जाए या कोई घर से रोज़ उसे लेने आए.

मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि सलवार सूट पहने होने के बावजूद छेड़छाड़ की ये घटना कैसे हो गई क्योंकि बकौल कुछ लोग 'जीन्स पहनने से लड़कियों की ओर ध्यान जाता है और वे छेड़छाड़ की शिकार होती हैं'.

अभी कुछ दिन पहले ही हरियाणा में एक कॉलेज में लड़कियों के जीन्स पहनने पर पाबंदी लगा दी गई है. वजह वही- पश्चिमी संस्कृति और लड़कियों की ओर लड़कों का ध्यान जाना. ऐसे फरमान आते ही रहते हैं.

जीन्स न हो मानो कोई चुंबक हो कि उसे पहनते ही लड़के उनकी ओर खिंचे चले आते है.

मैं हर पहनावे का सम्मान करती हूँ. सलवार सूट हो, साड़ी हो, जीन्स हो.....पहनावा एक निजी सवाल है.

लेकिन समाज में छेड़छोड़, यौन प्रताड़ना, बलात्कार जैसे अपराधों को अकसर जब-तब लड़कियों के पहनावे के तर्क से ढकने की कोशिश होती है.

समझ में नहीं आता कि इस पर गुस्सा करूँ, हँसू या इसे नज़रअंदाज़ करूँ.

कभी कभी ये सारे तर्क बहुत ही हास्यास्पद और बचकाने नज़र आते हैं तो कभी अंदर से बहुत ही कुंठा होती है.

दरअसल हर रोज़ लड़कियों से आते-जाते होने वाली छेड़छाड़ भारतीय समाज में शायद समस्याओं के दायरे में आती ही नहीं.

छेड़छाड़ का क्या है... होती ही रहती है. मैं जिन भी लड़कियों के साथ बात करती हूँ कि उनमें से ज़्यादातर छेड़छाड़ की शिकार होती हैं. हाँ इस पर खुलकर बात नहीं होती.

जो खुलकर बात करती हैं या आवाज़ उठाती हैं उनमें से कईयों का हश्र झारखंड की सोनाली या अमृतसर में पुलिसवाले की बेटी जैसा होता है.

सोनाली के साथ जब छेड़छाड़ की इंतहा हो गई तो उसने लड़कों से सवाल किया. सवाल का जवाब
उसे अपने चेहरे पर फेंके गए तेज़ाब के रूप में रोज़ दिखता है.

वहीं अमृतसर में जब बेटी ने पिता से शिकायत की कि उसे लड़के छेड़ते हैं तो लड़कों ने पिता को ही गोलियों से भून डाला.

महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित माने जाने वाले देशों में भारत ने काफी नाम कमाया है.भारत में 'नैतिककता के ठेकेदार' शायद ये स्वीकार ही नहीं करना चाहते कि जहाँ तक महिलाओं की स्थिति की बात है तो समाज को बदलने की ज़रूरत है...इनमें महिला और पुरुष दोनों शामिल है.

कहीं कन्या भ्रूण हत्या, कहीं इज्ज़त के नाम पर हत्या, कहीं दहेज, कहीं भेदभाव, कहीं छेड़छाड़, कहीं बलात्कार .... समस्या जीन्स या सलवार सूट से कहीं गहरी है.

काश कोई इनकी आँखों पर चढ़ा जीन्सनुमा चश्मा उतारे तो इन्हें आईना थोड़ा साफ नज़र आए.

खिड़की से लटका लड़का और दम तोड़ती उम्मीदें

मोहम्मद हनीफ़मोहम्मद हनीफ़|बुधवार, 05 दिसम्बर 2012, 05:23

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ना इसे तालिबान ने मारा और ना वो किसी सांप्रदायिक गुट का निशाना बना. ना किसी भाषाई समुदाय से उसे कोई ख़तरा था और न ही कोई भत्ताखोर उसकी ताक में था.

औवेस बेग तो नई नौकरी के लिए इंटरव्यू देने आया था. इंटरव्यू का भी आखिरी दौर चल रहा और ये तकरीबन तय था कि उसे नौकरी मिलने वाली थी.

इंटरव्यू कराची में स्टेट लाइफ (पाकिस्तान की सरकारी बीमा कंपनी) बिल्डिंग की आठवीं मंजिल पर था. वही स्टेट लाइफ जो हमें बचपन से सुनवाता आया है, ऐ मेरे खुदा, अबु सलामत रहें.

बिल्डिंग में आग लगी. जो लोग बिल्डिंग के अंदरूनी रास्तों को जानते थे, वो या तो सी़ढ़ियों से नीचे आ गए या उन्होंने छत पर जाकर जान बचाई. औवेस बेग बिल्डिंग के अंदरूनी रास्तों से वाकिफ नहीं था. और संभवतः वहां धुआं भरने से ठीक तरह से देख भी नहीं सकता था. इसलिए वो एक खिड़की और आठवीं मंजिल से लटक गया.

बड़े शहरों की बड़ी इमारतों में कभी कभार ऐसे हादसे हो जाते हैं, लेकिन जैसे ही औवेस बेग खिड़की से लटका, उसके बाद जो कुछ हुआ वो हमारे मौजूदा हालात और हमारी बढ़ती हुई नाउम्मीदी को समझने में मदद करता है.

इस बात पर सहमति नहीं है कि वो कितनी देर खिड़की से लटका रहा. एक अखबार ने पंद्रह मिनट लिखा है तो एक ने आधा घंटा. लेकिन कम से कम इतना वक्त जरूर था कि सैकड़ों लोगों का हुजूम भी जमा हो गया.

फ़िल्म भी बन गई और टीवी चैनलों पर लाइव कवरेज भी शुरू हो गई.

हमें इस बात पर एतराज नहीं है कि मीडिया को ये तस्वीरें दिखानी चाहिए थीं या नहीं. वैसे दुनिया का शायद ही कोई टीवी चैनल या अखबार होगा जो इस तरह की नाटकीय तस्वीरें दिखाने से परहेज बरते.

लेकिन एक दूसरी तस्वीर जो मैंने कहीं नहीं देखी, वो उन सैकड़ों लोगों की है जो हक्के बक्के खड़े थे और आसमान की तरफ नजरें गड़ाए हुए आठवीं मंजिल से लटके इस लड़के को देख रहे थे.

दर्जनों एंबुलेंस गाड़ियां और कई दमकल वाहन अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन इस हुजूम को क्या करना चाहिए था? क्या ये सैकड़ों लोग सिवाय आसमान की तरफ देखने और दिल ही दिल में औवेस बेग की सलामती की दुआ करने के अलावा कुछ कर सकते थे?

एक वक्त था जब पाकिस्तान के सरकारी स्कूलों में और कभी कभार पार्कों में सिविल डिफेंस और फायरिंग ब्रिगेड वाले अपने करतब दिखाया करते थे ताकि आम लोग सीख पाएं कि आग लगने की स्थिति में उन्हें क्या करना है. इसका एक जरूरी हिस्सा ये होता था कि एक वॉलेंटियर को आग से जान बचाने के लिए ऊपर की मंजिल से छलांग लगानी होती थी. नीचे आठ या दस लोग दरी, तिरपाल या किसी कपड़े की चादर पूरी ताकत से तान कर खड़े हो जाते थे और गिरने वाला सुरक्षित जमीन पर पहुंच जाता था.

औवेस बेग को आठवीं मंजिल से लटका देख कर मुझे पहला ख्याल ये आया स्टेट लाइफ बिल्डिंग जीनत मार्केट के बिल्कुल सामने स्थित है और जीनत मार्केट कराची में कपड़ों के बड़े बाजारों में से एक है. यहां पर कालीनों और दरियों की दुकानें हैं.

क्या किसी भी एक आदमी को ये ख्याल नहीं आया कि आसमान की तरफ देखने और दुआ करने के बजाय भाग दौड़ करके एक दरी का इंतजाम किया जाए, जो गिरने वाली की जान बचा सके.

क्या ये हो सकता है कि सैकड़ों के हुजूम में किसी एक भी व्यक्ति ने ऊंची इमारत में फंसे लोगों की जान बचाने का ये आसान सा तरीका जिंदगी भर देखा ही न हो. या सिर्फ कसूर सिर्फ इस हुजूम का नहीं है, बल्कि हम एक राष्ट्र के तौर पर दुआओं से भरे दिल को लेकर अपनी तरफ आती हर मुसीबत को देख आसमान की तरफ नजरें गड़ाए हैं और उम्मीद करते हैं कि अभी कोई चमत्कार होगा और बला टल जाएगी.

आठवीं मंजिल से गिरने वाले व्यक्ति के लिए मजबूत हाथों से तानी गई चादर ही अकेला करिश्मा हो सकता है और ये करिश्मा हुजूम में मौजूद सिर्फ कुछ लोग ही कर सकते हैं, वरना खिड़की से लटके हुए लड़के की बाज़ू आखिरकार कमज़ोर होंगे और नीचे कंक्रीट का फर्श और एक हुजूम की दुआएं उसका स्वागत करेंगीं.

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