ये गुस्सा है आंदोलन नहीं
मैं बलात्कार के ख़िलाफ़ हूं.......मैं मृत्युदंड के भी ख़िलाफ़ हूं.
मैं आंदोलनों की आलोचना करता हूं लेकिन मैं गुस्से का समर्थन करता हूं.
मैं विरोध के साथ हूं लेकिन राष्ट्रपति भवन और नॉर्थ ब्लॉक में जबरिया घुसने का विरोध करता हूं.
मैं दिल्ली पुलिस के पुलिसिया रवैए का विरोध करता हूं और इंडिया गेट पर पहुंचे प्रोफेशनल नेताओं का भी.
मैं कैमरा देख कर आंखों में आंसू लाने वालों का भी विरोध करता हूं लेकिन उन सभी के साथ हूं जो बिना कहे अपनी बात चुपचाप रख रहे हैं.
आक्रोश है और गुस्सा है......इसे आंदोलन का नाम देकर इसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने का भी मैं विरोध करता हूं.
मैं उन सभी पोस्टरों का भी विरोध करता हूं जो पोस्टर पर नारे कम और अपने संगठन का नाम बड़े अक्षरों में लिखते हैं.
भ्रमित मत होइए......मैं विरोध के साथ हूं......लेकिन थोड़ा सोच समझ कर...क्योंकि मैं जानता हूं इस विरोध में कई लड़के ऐसे भी हैं जो मौका मिलने पर लड़कियों को छेड़ते भी होंगे.
ऐसे ही लोग उस फ्लाईओवर के नीचे भी खड़े होंगे जब वो लड़की और उसका दोस्त निर्वस्त्र पड़े थे..किसी ने अपनी जैकेट खोल कर नहीं डाली थी उन पर.
यही पुलिस आई थी और होटल से चादर लेकर डाली थी उन पर. इंडिया गेट पर हल्ला करना आसान है......बलात्कार की गई लड़की की मदद करना शायद मुश्किल....
बदलना उस मानसिकता को होगा....
मैं समझता हूं कि गुस्सा है और गुस्से की आवाज़ दूर तक असर करती है...असर कर भी रही है....इस असर को किसी भी ऐसे कदम से नुकसान हो सकता है जो उठाया जा रहा है गुस्से के नाम पर.
रोष, आक्रोश, गुस्सा, नाराज़गी सब अपनी जगह है और ये चलने भी चाहिए लेकिन इसके नाम पर पुलिस के साथ लड़ने से कुछ हल नहीं होने वाला है.
इंडिया गेट पर जाइए...शांति से विरोध जताइए..गुस्सा दिखाइए....क्योंकि आप वही दिखाने आए हैं..
क्योंकि आप भी जानते हैं...बलात्कारी इंडिया गेट पर नहीं बैठे हैं....वो दिल्ली की रग रग में हैं....हर गली और हर चौराहे पर हैं...उन्हें बदलने के लिए सभी को बदलने की ज़रुरत है.....और दिल्ली की इस फिज़ा को बदलने में अभी समय लगेगा....
सावधान होइए......इंडिया गेट नहीं बदलना है.....बदलना पूरी दिल्ली को होगा..दिल्ली क्या पूरे देश को बदलना होगा अपनी आधी आबादी के लिए........मैं उस बदलाव के साथ हूं..

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
सुशील जी, मैं आपके इस बकवास लेख का बीबीसी पर लिखने का पूरा विरोध करता हूँ. क्या हो गया है बीबीसी को जो इतना घटिया लेख पढ़ने को हम श्रोता मजबूर हैं?
सुशील जी ये सच है कि ये गुस्सा है आंदोलन नहीं. लेकिन लोगों का गुस्सा जायज है. आखिर सरकार कड़े कानून क्यों नहीं बनाती. वोट बैंक वाले मुद्दों पर सरकार तुरंत संशोधन करने को तैयार हो जाती है.
जो हुआ बहुत गलत हुआ. ऐसे लोगों को जनता के बीच में फांसी होनी चाहिए.
सुशील आप बिल्कुल सही हैं..... इस आन्दोलन से तो यही लगता है कि कुछ लोग भीड के जरिए इस देश को चलाना चाह रहे हैं. वह हमने अन्ना के आन्दोलन के दौरान भी देखा था और अब इस 'आन्दोलन रेप' में भी देख रहे हैं.
मैं आपसे सहमत हूँ.
सुशील भाई, आपकी बात एकदम सही है.
घबराइए नहीं सुशील जी. मैं आपकी बात से 99 प्रतिशत सहमत हूँ. मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि शायद मारकंडे काट्जू के विचार भारतीयों के बारे में सही थे कि 90 प्रतिशत भारतीय बेवकूफ हैं.
आपकी सोच की दाद देता हूँ. आपने वहाँ से देखने की कोशिश की है जहाँ से एक पत्रकार को देखना चाहिए.
बिलकुल सत्य सुशील जी, मैं आपसे सहमत हूँ. क्या आपको नहीं लगता कि अब बलात्कार का बाजारीकरण किया जा रहा है. खबरिया चैनल पानी पी-पी कर दिल्ली पुलिस को कोसने में लगे हैं, खबरों को दिखने में नहीं ब्रेकिंग के चक्कर में उनकी भाग भाग खबर दिखने में हाँफते रिपोर्टर, लोगो की भावना भड़काने में लगे राजनेता आखिर क्या चाहते हैं, यह मामला लॉ आर्डर का नहीं नैतिकता का है, क्या सिर्फ इन बलात्कारियों को फ़ासी दे देने से इन घटनावो की पुनरावृति नहीं होगी, इस रात की सुबह तो तभी सम्भव है जब हम नैतिक रूप से इसकी जिम्मेदारी लें, हमारी बेटियां तब तक सुरक्षित नहीं जब तक हमरी नजरे उन्हें सम्मान न दें.
आंदोलन तो जायज है. हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं औऱ सिर्फ जनता का कानून जनता के लिए और जनता द्वारा बनाया जाता है.
क्या बीबीसी हिंदी एक लाउडस्पीकर बन गया है, रक्त शोशक, शासक लोगों का?
ये निराशाजनक टिप्पणी है.
जी हा आप ने जैसे कहा वैसे लोग वहापे जरूर होंगे और वहापे कुछ पत्रकार ऐसे भी होंगे जो सिर्फ ब्लोग लिखकर और दुसरो कि सिर्फ खामियोकोही देखते होंगे, या फिर ऐसे पत्रकार भी होंगे जो खबर रुकवानेके लिये किसी उद्योगपतीयोको blackmail करते होंगे , या प्रिन्स हरी या केट midalatan कि निर्वस्त्र फोटो खिचवानेके के लिये जी जान लगा देते होंगे …… बीबीसी के लोग हर आंदोलन , या विरोध प्रदर्शन को अतिआदर्शवाद दृष्टि से क्यों देखते हो ये समझ से परे है …. …… (अण्णा हजारे आंदोलन में आपकी राय कुछ ऐसे ही थी)
सुशील जी, माफ़ कीजियेगा मुझे आपका लेख सामान्य दर्जे का लगा जिसमें आपने एक प्रकार से अपनी भड़ास निकाली है. आपकी शैली कुछ-कुछ वैसी ही है जैसी कांग्रेस को समर्पित एक पत्रकार संजय झा की है, जो टीवी बहसों में उस दल के सभी निर्णयों का पक्ष लेते हैं, किंतु उन सवालों का सीधा जवाब नहीं देते जो उनसे पूछे जाते है. वे मैं उसी पर आ रहा हूं, मैं उसी पर आ रहा हूं, की रट लगाते हुए जवाब टाल जाते हैं. आप इन बिंदुओं पर विचार करें:
१. आप विरोध जताने के पक्षधर हैं परंतु यह नहीं बताते कि विरोध केवल रस्मअदायगी के लिए होना चाहिए या उसे प्रभावी भी होना चहिए? क्या भैंस के आगे बीन बजाकर उसे नियंत्रित किया जा सकता है? क्या सरकार को हर मुद्दे पर जगाने की कोशिशें लोग नहीं करते आ रहे हैं? फिर भी वह सुनती है? दुर्भाग्य से इस लोकतंत्र में ’लोकतंत्र’ हैं नहीं और सरकार तब तक सुनती नहीं जब तक उसे भय नही लगने लगता?
२. मैं हिंसा का पक्षधर नहीं हूं किंतु मैं कदापि नहीं स्वीकार सकता कि सभी अहिंसा के पुजारी होते हैं और सभी अहिंसा के माध्यम से बताई जा रही बात मान लेते हैं. इस समाज की वास्तविकतावों को नकारते हुए आदर्शों का ढ़िढोरा पीटना निहायत मूर्खता है.
3. इस पर गंभीरता से सोचें कि क्या अहिंसक आंदोलन सफल होते ही हैं, हर हाल में. नहीं! ऐसे आंदोलनों की सफलता उनके हिंसक हो जाने की सक्षमता (अंगरेजी में पोटेंशिअल) पर निर्भर करता. संवेदनशून्य लोगों (राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, इस वर्ग में आते हैं!) के सामने ऐसे विरोध माने नहीं रखते हैं। वे विरोध के हिंसक हो जाने के डर से ही कुछ सुनने को तैयार होते हैं।
4. इसमें दो राय नहीं कि समाज में लोगों की सोच बदलने की जरूरत है। कहना आसान है, किंतु ऐसा करना नहीं. प्रकृति का नियम है (मैं एक वैज्ञानिक हूं) कि किसी तंत्र को विगाड़ना सरल होता है, न अधिक मेहनत और न अधिक समय। लेकिन उसे सुधारना श्रम एवं समय साध्य होता है। समाज में स्वस्थ सोच पैदा करने में पीढियां लगती हैं न कि दो-चार साल। इतिहास गवाह है कि कितनों ही सुधारकों ने कोशिशें कीं, लिकिन अधिक सफल नहीं हुए। याद रहे कि एक नंगी औरत एकांत में किसी पुरुष के सामने आ जाये तो भी वह उसके साथ यौन संबंध बना डाले ऐसा नहीं होगा। उसका मन इजाजत नहीं देगा, वह आंख बंद कर लेगा, भाग जायेगा। पर हर इंसान ऐसा ही करेगा यह उम्मींद नहीं कर सकते। कानून बनते ही हैं इसी प्रकार के तथ्यों के कारण।
५. जरा सोचिए कि यह कैसा लोकतंत्र है कि देश के राष्ट्रपति को यह साहस नहीं हो पाता कि वह अपने ही लोगों के सामने आकर उनको आश्वस्त कर सके? उसको ’किले’ में सुरक्षित रखने के लिए पूरा पूलिस बल मुस्तैद हो जाता है, क्या शर्म की बात नहीं है? वे न सही, क्या यह काम प्रधानमंत्री नहीं कर सकते थे, या गृहमंत्री? क्या वहां लोग उनके संहार के लिए पहुचे थे। और एक सिपाही से जोखिम उठाने की उम्मीद की जाए और उच्चस्थ नेता सुरक्षा घेरों में बंद रहें यह क्या लोकतंत्र के लिए शर्म की बात नहीं है?
६. अपने ’माननीय’ सुशील कुमार शिंदे का बयान सुनिए: "मैं प्रदर्शनकारियों से बात करने क्यों जाऊं? कल आतंकवादी और नक्सलवादी भी ऐसी मांग करें तो क्या उनके पास चला जाउंगा? गोया कि वे प्रदर्शनकारी हिंसक उपद्रवी थे जो उनको मार डालते!! शिंदे सा’ब यह भूल जाते हैं कि वे प्रथमतः जनप्रतिनिधि हैं न कि मंत्री। ये लोकतंत्र का मजाक नहीं है कि जनप्रतिनिधि को आम जनता से मिलना गवारा नहीं। ऐसे लोगों के सामने प्रदर्शन कैसा होना चाहिए के उपदेश देने से पहले आपने कुछ सोचना चाहिए था।
७. और देखिए एक टीवी कार्यक्रम में पूछे गये सवाल के उत्तर में कितना गैरजिम्मेदाराना जवाब अपने ’माननीय’ सत्यव्रत चतुर्वेदी जी बोलते हैं, "ठीक है, हमारी पार्टी आपराधिक छबि के लोंगों को टिकट देती है, लेकिन जनता उनको क्यों चुनती है? वाह, क्या (कु)तर्क है! क्या सत्तासुख भोगना ही नेताओं का काम है या आम जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण रखना भी? नेता किस बात के जब जनता को रास्ता दिखाना ही आप भूल गये हों?
इन बातों पर क्या-क्या बोला जाए?