ये भीड़तंत्र है
हम लोकतंत्र में हैं. लोक इंडिया गेट पर तंत्र से भिड़ा हुआ है.
वह दिल्ली की एक बस में एक लड़की के साथ हुए बर्बर बलात्कार से नाराज़ है, वह न्याय की मांग कर रहा है.
शनिवार को टेलीविज़न चैनलों के माध्यम से पूरे देश ने देखा कि युवा प्रदर्शनकारी कितने नाराज़ थे.
नाराज़ युवा किसी राजनीतिक दल या किसी एक संस्था के आह्वान पर वहाँ नहीं पहुँचे थे. ख़ुद पहुँचे थे.
नाराज़गी वाजिब है. उनका विरोध प्रदर्शन वाजिब है. इसके लिए इंडिया गेट पर इकट्ठा होना भी सही है.
लेकिन उन भवनों में जाने की ज़िद हरगिज़ वाजिब नहीं है जहाँ देश के शीर्ष हुक्मरान बैठते हैं. राष्ट्रपति भवन नें बल पूर्वक घुस जाने की कोशिशें भी बेवजह हैं.
ग़ुस्सा, चाहे वो कितना भी बड़ा हो, इस लोकतंत्र किसी को अधिकार नहीं देता कि वह क़ानून अपने हाथों में ले ले. नाराज़गी ये हक़ किसी को नहीं देती कि आप अपनी मर्ज़ी के मालिक हो जाएँ.
पुलिस को युवाओं को राष्ट्रपति भवन की ओर जाने से रोकने के लिए पानी की बौछारें फेंकनी पड़ी, आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और कई बार लाठीचार्ज करना पड़ा.
इस पर नाराज़गी और बढ़ गई. देश की मीडिया (ख़ासकर टीवी चैनलों ने) ने इसे और हवा दी.
लोकतंत्र नागरिकों को अधिकार देता है लेकिन उसकी एक सीमा है. संविधान के जिस पन्ने पर अधिकारों की बात है लगभग वहीं कर्तव्यों की भी बात लिखी है.
कर्तव्यों को जेब में रखकर अधिकार माँगना किसी भी ज़िम्मेदार नागरिक को शोभा नहीं देता, चाहे वो युवा ही क्यों न हो.
संसद, प्रधानमंत्री निवास, राष्ट्रपति भवन सहित किसी भी सरकारी दफ़्तर में घुसकर विरोध प्रदर्शन की ज़िद, पुलिस पर हमला करने की नादानी, पुलिस और दूसरे सरकारी वाहनों में तोड़फोड़ की गुस्ताख़ी लोकतंत्र नहीं है, भीड़तंत्र है.
बलात्कार के लिए फाँसी की सज़ा मांगिए, पुलिस से घोर नाराज़गी जताइए. अगर ये सरकार निकम्मी है तो उसे अपने वोट से उखाड़ फेंकिए लेकिन लोकतंत्र को भीड़तंत्र में मत बदलिए.
भीड़ का दिमाग़ नहीं होता, आप युवा हैं अपने दिमाग़ का इस्तेमाल कीजिए और नियंत्रणहीन भीड़ में शामिल होने से बचिए.
याद रखिए, लोकतंत्र का भीड़तंत्र में तब्दील होना भी ख़तरनाक और शर्मनाक है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
भाई विनोद हम आपके नियमो पर चलकर कानून को कतई बदल नही पाएंगे. अगर कानून को बदलकर हम सख्त करना चाहते है और दोषी को फांसी की सजा दिलाना चाहतें है तो इसके लिए कानून तो तोड़ना ही पड़ेगा नही तो सरकार इस पर ध्यान नहीं देगी. अगर इस बदलावों के लिए कुछ जाने भी जाती है तो जायज है पर बलात्कार की ऐसी घिनौनी हरकत दोबारा देखना हमे मंजूर नही.
लोकतंत्र का भीड़तंत्र में बदलना बहुत ही खतरनाक है लेकिन जब इस तरह के राजनीतिक वातावरण में जहाँ नेताओं को कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है, जो अपने को ही सुनना चाहते हैं, आम आदमी की उन्हें परवाह ही नहीं है, तो एक आदमी के पास और कोई चारा भी नहीं बचता इन गूँगे बहरे नेताओं को कुछ सुनाने के लिए शायद कुछ समय के लिए लोकतंत्र का भीड़तंत्र में बदलना भी सही दिखाई दे रहा है.
सही है. हर जगह का गुस्सा कहीं भी निकाल रही है जनता. हे भगवान, इस देश को बचाओ.
हमे तो ये सारा कार्यक्रम राजनीति से प्रेरित लगता है, किसी एक खास केस को लेकर ऐसा हँगामा मेरी समझ से बाहर है, अगर हँगामा करना है तो इस बात के लिए करना चाहिए की न्याय व्यवस्था मे सुधार के लिए आंदोलन हो, पुलिस को चुस्त दुरुस्त बनाना चाहिए, और किसी भी आपराधिक केस मे कड़ी और तुरंत सज़ा का प्रावधान होना
मेरे हिसाब से भारत की जनता की जिद तभी जिद बनती है जब किसी उच्च जाति की लड़की के साथ कोई गलत काम होता है. यही काम अगर किसी निम्न जाति की लड़की के साथ होता तो इतनी भीड़ हम शायद ही देख पाते और इतना गुस्सा भी.अगर मीडिया की बात करे तो मै यह अवश्य कहना चाहूँगा कि भारत का मीडिया जितना भ्रष्ट है उतना शायद कोई है.
विनोद जी, ये काम आप बीबीसी पर लिख कर नहीं, बेइमान नेताओं, अधिकारियों को ईमेल करें तो बेहतर होगा.
कानून बनाना, सुंदर ब्लॉग लिखना एक बात और बलात्कार के वीभत्स परिणाम दूसरी बात. ये बात आपकी, औऱ सम्मानीय (तथाकथि) नेता की समझ से बाहर है.
अगर लोकतंत्र भीड़तंत्र में तब्दील हुआ है तो उसका जिम्मेदार भी यही तंत्र है. जब भीड़ उमड़कर आई तो उस भीड़ को योग्य उत्तर मिलना चाहिए था जो नहीं मिला, जिसके कारण ही ये बात बढ़ गई.
किसे समझा रहे हो? इस देश में लोगों ने पढ़ाई लिखाई सिर्फ अंग्रेजी बोलने के लिए पाई है.
आप जैसे संवेदनहीन लोग बकवास तो कर सकते हैं पर किसी बेटी का दर्द नहीं समझ सकते.
और कितना चुप रहें, तुम्ही कहो?
बिल्कुल सही कि हमारे सर्वोच्च पद पर आसीन लोगों ने भीड़ के मन को समझा पर उसके साथ सही-सही संवाद नहीं किया बल्कि उपेक्षा की. इन्होंने ही इस सिस्टम को कमजोर और लाचार बना कर रख दिया है.