बात जीन्स या सलवार सूट की नहीं......
मेरे घर खाना बनाने के लिए आने वाली महिला रोज़ सलवार सूट पहनकर आती है. उसके सर पर हमेशा दुपट्टा रहता है. यानी पूरा बदन ढका हुआ.
यहाँ पर पहनावे का ये विस्तृत ब्यौरा आपको थोड़ा अटपटा लग सकता है लेकिन इसे लिखने की एक वजह है.
दरअसल दो-तीन दिन पहले वो जब काम पर आई तो थोड़ी परेशान सी दिखी. मुझसे रहा न गया तो मैनै पूछ डाला. तो उसने बताया कि शाम को काम करने का बाद जब वो पैदल घर जा रही थी तो एक व्यक्ति उसका पीछा करने लगा.
घटना के समय वो जिस कदर डर गई होगी, ठीक वैसा ही डर उसके चेहरे पर मैं देख सकती थी.
"पीछा करने वाले की तो उम्र भी बहुत ज़्यादा थी. ऐज भी नहीं देखी.", उसने झुंझला कर बोला.
इस घटना के बाद से वो डर गई है. घर में कहा गया कि या तो काम छोड़कर घर बैठ जाए या कोई घर से रोज़ उसे लेने आए.
मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि सलवार सूट पहने होने के बावजूद छेड़छाड़ की ये घटना कैसे हो गई क्योंकि बकौल कुछ लोग 'जीन्स पहनने से लड़कियों की ओर ध्यान जाता है और वे छेड़छाड़ की शिकार होती हैं'.
अभी कुछ दिन पहले ही हरियाणा में एक कॉलेज में लड़कियों के जीन्स पहनने पर पाबंदी लगा दी गई है. वजह वही- पश्चिमी संस्कृति और लड़कियों की ओर लड़कों का ध्यान जाना. ऐसे फरमान आते ही रहते हैं.
जीन्स न हो मानो कोई चुंबक हो कि उसे पहनते ही लड़के उनकी ओर खिंचे चले आते है.
मैं हर पहनावे का सम्मान करती हूँ. सलवार सूट हो, साड़ी हो, जीन्स हो.....पहनावा एक निजी सवाल है.
लेकिन समाज में छेड़छोड़, यौन प्रताड़ना, बलात्कार जैसे अपराधों को अकसर जब-तब लड़कियों के पहनावे के तर्क से ढकने की कोशिश होती है.
समझ में नहीं आता कि इस पर गुस्सा करूँ, हँसू या इसे नज़रअंदाज़ करूँ.
कभी कभी ये सारे तर्क बहुत ही हास्यास्पद और बचकाने नज़र आते हैं तो कभी अंदर से बहुत ही कुंठा होती है.
दरअसल हर रोज़ लड़कियों से आते-जाते होने वाली छेड़छाड़ भारतीय समाज में शायद समस्याओं के दायरे में आती ही नहीं.
छेड़छाड़ का क्या है... होती ही रहती है. मैं जिन भी लड़कियों के साथ बात करती हूँ कि उनमें से ज़्यादातर छेड़छाड़ की शिकार होती हैं. हाँ इस पर खुलकर बात नहीं होती.
जो खुलकर बात करती हैं या आवाज़ उठाती हैं उनमें से कईयों का हश्र झारखंड की सोनाली या अमृतसर में पुलिसवाले की बेटी जैसा होता है.
सोनाली के साथ जब छेड़छाड़ की इंतहा हो गई तो उसने लड़कों से सवाल किया. सवाल का जवाब
उसे अपने चेहरे पर फेंके गए तेज़ाब के रूप में रोज़ दिखता है.
वहीं अमृतसर में जब बेटी ने पिता से शिकायत की कि उसे लड़के छेड़ते हैं तो लड़कों ने पिता को ही गोलियों से भून डाला.
महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित माने जाने वाले देशों में भारत ने काफी नाम कमाया है.भारत में 'नैतिककता के ठेकेदार' शायद ये स्वीकार ही नहीं करना चाहते कि जहाँ तक महिलाओं की स्थिति की बात है तो समाज को बदलने की ज़रूरत है...इनमें महिला और पुरुष दोनों शामिल है.
कहीं कन्या भ्रूण हत्या, कहीं इज्ज़त के नाम पर हत्या, कहीं दहेज, कहीं भेदभाव, कहीं छेड़छाड़, कहीं बलात्कार .... समस्या जीन्स या सलवार सूट से कहीं गहरी है.
काश कोई इनकी आँखों पर चढ़ा जीन्सनुमा चश्मा उतारे तो इन्हें आईना थोड़ा साफ नज़र आए.

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आदरणीय वंदनाजी, मैं जो कुछ भी कहूँगा आप उससे इत्तेफाक रखें ये ज़रूरी नहीं. मैं नहीं जानता कि आपकी शिक्षा कहाँ हुई पर ये ज़रूर समझ सकता हूँ कि आपका वास्ता बड़े खानदान से है. आप कपड़ों के आधार पर छेड़छाड़ की बात कह रहे हैं.
इस बात का संबंध कपड़ों के साथ साथ व्यक्ति के परिवेश से भी है. आप जिस परिवेश में रही होंगी उस जगह जीन्स आम बात होगी. पर अगर कोई गाँव की लड़की जीन्स पहनती है तो पहली बार वो लोगों के आकर्षण का केंद्र बन जाती है.
अब आप ये कह सकती हैं कि कोई भी लड़की कुछ भी पहने इस बात से पुरुषों को क्या मतलब. मतलब होता नहीं हो जाता है. भारतीय पुरुषों की मानसिकता को आप भी समझती होंगी. जब हर लड़की ये बात समझती है तो जानबूझकर भड़काऊ कपड़े क्यों पहनते हो. जीन्स भी कभी कभी भड़काऊ हो जाती है. और कभी कभी सलवार सूट भी भड़काऊ हो जाता है.
ये दोश व्यक्ति का है. उसकी नज़र का है. लड़कियाँ इतना तो कर ही सकती हैं कि शालीनता बनाए रखे. मुंबई के चर्च में फादर को महिलाओं से अनुरोध करना पड़ा कि शालीन कपड़ों में आएं. मैडम कपड़ों का संबंद इन बातों से सीधा नहीं पर कभी कभी शालीनता की हद लांघ दी जाए तो इसमें मदद कर देती हैं.
मैं नहीं जानता कि आप मेरी बात कितनी समझ पाएँगी. भारत-इंडिया में ये फासला काफी देर तक रहेगा. बहस जारी रह सकती है. मैं तो यही दुआ करूँगा कि देश की हर महिला महफूज़ रहे. आमीन
ये एक अहम मुद्दा बनता जा रहा है. हमारे समाज में नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है. पर ये एक बड़ी समस्या के रूप में एक दिन ज़रूर सामने आएगा. मैं खुद एक छात्र हूँ और कॉलेज में ये सब देखता हूँ. शायद कभी खुद भी कहीं न कहीं इसमें शामिल रहा हूँ. लड़कों की निगाह और विचार इतने ज़्यादा निकृष्ट हो गई है कि उन्हें हर जगह और हर लड़की में वही दिखता है. मेरा मानना है कि पहनावा कुछ हद तक इसके लिए ज़िम्मेदार है पर पूरी तरह से नही. हम पाश्चचात्य की ओर बढ़ रहे हैं. हमारे विचार और भावनाएँ पतन हो रही हैं. इसका कारण हमें अपने आप ही पूछना चाहिए. राष्ट्र कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं- हम कौन थे, क्या हो गए हैं. और क्या होंगे...आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएँ सभी
आपने सही लिखा है
बहुत बढ़िया
भारत और अफगानिस्तान में कुछ खास फर्क नहीं हैं. मानसिकता वही है. और फिर कुछ लोग कहते हैं भारत सुपर पॉवर बनेगा.. ख़ाक बनेगा. हाँ कुछ सालों में अराजकता जरूर फ़ैल सकती है.
ये सही बात है कि लड़कियों के जीन्स पहनने से फर्क तो पड़ता है. मैं एक लड़का हूँ और मैने ये महसूस किया है कि जीन्स पहनी हुई लड़की ज़्यादा आकर्षक लगती है. हालांकि ये बात भी सही है कि कपड़े पहनना एक निजी मामला है. लेकिन दिक्कत ये है कि हमारा समाज इतना सभ्य नहीं है कि वो लड़कियों के पहनावे को नज़रअंदाज़ कर दे.
बिलकुल बेतुका ब्लॉग और बेतुकी बात लिखी गयी है।
लिखने का तरीका लेखिका के नौसिखियेपन को दर्शाता है और कुछ नहीं।
मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूँ. हमें समाज की मानसिकता बदलनी होगी. लोगों को लगता है कि वो सही कर रहे हैं. लेकिन ये सच नही हैं.
आपने सच्चाई लिखी है. काश इसे पढ़ने के बाद हम औरतों के बीच की फुसफुसाहटें बोल भी बदल जाएँ. धन्यवाद
ब्लॉग में लिखी टिप्पणियाँ बिल्कुल सही हैं. पुरुषों को महिलाओं के प्रति अपना रवैया बदलने की ज़रूरत है. ये बहुत ही खराब बात है कि जीन्स पहनने की वजह से लड़कियों को प्रताड़ित होना पड़ता है.
नैतिकता, सभ्यता और संस्कृति क्या है? इससे तथाकथित हाईटेक और आधुनिक स्कूलों और समाज का क्या लेना देना है? अगर ये बहुत अच्छे होते तो लड़कियों को छेड़ने की और बलात्कार की ज़्यादा घटनाएँ अच्छी सोसाइटी में नहीं होनी चाहिए थी. जहाँ तक जीन्स पहनने की बात है तो इससे ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता. लेकिन समाज में सोच का असर ज़रूर पड़ता है. हमारे यहाँ जब तक पढ़ाई सिर्फ पैसों के लिए होगी तब तक शायद ये यक्ष प्रश्न बने रहेंगे. वंदना जी अच्छे विषय पर ब्लॉग लिखने के लिए धन्यवाद
हिजाफ पहनने लोग. फिर देखो कौन सा मर्द तुम्हारी तरफ आकर्षित होता है. ऐसा केस एक भी नहीं आएगा.
ब्लॉग लेखन और शैली सटीक है. लेकिन समाज में हज़ार बुराइयाँ हैं. किंतु कभी कभार देवता के दर्शन भी मिल जाते हैं. मेरी प्रार्थना है कि नकारात्मक विषयों पर अपना और पाठकों का समय नष्ट न कर सकारात्मक विषयों पर रचनात्मक लेख लिखा जाए. एक शेर की पंक्ति- जीने की नई तरकीब निकाली जाए, चलो किसी रोते हुए बच्चे को हसाया जाए..
कहानी का कोई सुबूत नहीं दिया आपने. कहानी बनाकर आपने मुद्दा उठाया है इन कपड़ों का.
आपकी बनी हुई कहानी अच्छी थी
सही कहा- पहनावा निजी मसला.
आपने जो भी लिखा है वह बिल्कुल सही है.
आज समाज के असभ्य होने की बात करती हैं, खुद अपने आप पे काबू नहीं रखते तो भला आप समाज को सुधारने की उम्मीद कैसे कर सकते हो.
बहुत बढ़िया
मेरा मानना है कि ये जब तक लड़कियों को माँ की कोख में मारना बंद नहीं होगा तब तक छेड़खानियाँ होती रहेगी क्योंकि अगर हर घर में लड़का और लड़की बराबर पैदा होंगे और उनका पहनावा, चाल ढाल शालीन होगा और साथ में हिजाब का इस्तेमाल होगा तो सभी लड़कें ये सोच कर किसी लड़की को छेड़ने से परहेज़ करेंगे..वो सोचेंगे कि कहीं ये मेरी बहन या बेटी तो नहीं. इस लिए कपड़ा कोई भी हो हिजाब का होना ज़रूरी है. तब जाकर हमारी सभ्यता कायम रहेगी.
आपने लिखा तो सही है लेकिन आप शायद एक बात भूल रही है कि भारत सभ्यता और संस्कृति वाला देश है. तड़क भड़क वाले कपड़े आदमी को आकर्षित करते है. जब चर्च का पादरी शालीन कपड़े पहनने के लिए लोगो से कह सकता है, तो साड़ी वाली संसकृति मे इस को कैसे स्वीकारा जायेगा हमारी संस्कृति इस की इजाजत नही देती है. यह लोगों की इच्छा है कि वो कैसा भी लिबास पहने उनकी मर्जी भारत के लोग सबको स्वीकार कर लेते है.!अभी लोगों की मानसिकता बदलने मे समय लगेगा. अंत मे जो बात शालीन वस्त्र में है वो जींस मे नहीं.
मैं इन विचारों से बिल्कुल सहमत हूँ. मैं यह यकीन के साथ कह सकता हूँ कि इन विचारों के पीछे पुरुषों की पुरुषवादी मानसिकता ज़िम्मेदार है. हमारे समाज में शुरू से ही शोषण सहना पड़ता है. लेकिन जब आज वो शिक्षित हो गई है और इसका विरोध कर रही है और अपने मन मुताबिक चीज़ें कर रही है तो लोगों को अच्छा नहीं लग रहा .
"...पहनावा एक निजी सवाल है." कहना सैद्धांतिक तौर पर सही हो सकता है, लेकिन सामान्य मानव समाज में नहीं. ढेर सारी बातें गिनाई जा सकती हैं जिनके बारे में ’निजी मामला’ कहा जा सकता है. ऐसी दलील देते समय हम भूल जातें कि कोई व्यक्ति कैसे व्यवहार करता है, कैसे चलता-फ़िरता है, क्या पहनता-ओढ़ता है, आदि दूसरों के लिए भी माने रखता है. अवश्य ही अधिकांश लोग इन बातों को नजरअंदाज कर लेते हों पर हर कोई नहीं. हर कोई नहीं, तो फिर ये बातें बेमानी नहीं रह जाती हैं. हमें यह याद रखना चाहिए कि सब लोग किसी एक व्यक्ति की सोच के हिसाब से नहीं चलते. ये ही बातें समाज में परंपराओं के रूप में परिलक्षित होतीं है. कानून भी कुछ ऐसी ही बातों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं.
अवश्य ही जींस पहनने का अधिकार युवतियों को होना चाहिए. लेकिन कुछ लोगों को, भले ही वे हजार में दो-एक ही क्यों न हों, को यह भड़काऊ या उत्तेजक लग सकता है. आपको उनका भी तो सामना करना पड़ सकता है? उनके लिए ’यह नहीं करना चाहिए’ के उपदेश क्या माने रखता है? वे अप्रिय हरकत पर उतर सकते हैं. घटना हो जाए तो कानून का सहारा लिया जा सकता है, किंतु घटना से पहले तो वह भी कुछ नहीं कर सकता. कानून के होने मात्र से तो समाज ’उतोपिया’ (आदर्श संसार) नही बन जाता. समाज में बहुत कुछ नहीं होना चाहिए, फिर भी वह सब होता आया है, हो रहा है, और होता रहेगा!!
बहुत अच्छा ब्लॉग है. मैं बिल्कुल सहमत हूं. मैं समाज में बदलाव देख सकता हूँ जहाँ हम विकास तो कर रहे हैं लेकिन बिना नैतिक मूल्यों के. सब सोचते हैं कि इसे रोकना तो पुलिस का काम है. पर वो ये नहीं जानते कि अगर कोई आवाज़ उठाए तो ये रुक सकता है.
जो लोग इस ब्लॉग का समर्थन कर रहे हैं उनसे एक सवाल है. आपके विचार से पहनावा कुछ मायने नहीं रखता? आप लोग चाहते हैं कि लड़कियाँ कुछ भी पहने कोई बात नहीं. मर्दों को अपनी नज़र नीची रखनी चाहिए और खुद पे काबू रखना चाहिए ? बताइए क्या धर्म अर्ध नग्न कपड़ों की इज़्जत देता है ? लड़कियाँ अपनी मुसीबत की ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. लेखिका जी आपको जो जीन्स नहीं पहनता उस पर हँसी आती है. ज़रा खुद पीछे देखिए कि आपके साथ भी कहीं न कहीं कुछ ऐसा हुआ होगा. लेकिन शायद आप उसे नज़रअंदाज़ करती हो.
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वंदना जी जीन्स पहनने से पहले एक अच्छी सोच पैदा करनी होगी. हिजाब पहनने से हो सकता है कि ये बुराई रुक जाए ( जो नामुमकिन है) लेकिन एक हज़ार और बुराइयाँ पैदा हो जाएँगी जिनके अभी कभी कभार दर्शन होते हैं. तब क्या करोगे? कपड़े नहीं सोच बदलो. सिर्फ कपड़े बदलने से अगर सोच बदलती हो तो आज अच्छी शिक्षा के नाम पर लाखों न लूटे जाते.
लड़कियों को तो हिदायत हे की क्या पहने और क्या नहीं। लडको के लिए क्या आदेश हैं। हर लड़कियों के स्कूल के सामने लडको का जमघट। क्योंकि देश आज़ाद हे। लड़कियों पर फब्तियां, कंकरी फेंकना। मौके की तलाश में रहना की कब मौका मिले तो छू लें या कुछ आगे का कर लें।
लड़कियों को तो हिदायत है कि क्या पहने और क्या नहीं. लडकों के लिए क्या आदेश हैं? हर लड़कियों के स्कूल के सामने लडको का जमघट? क्योंकि देश आज़ाद है... लड़कियों पर फब्तियां, कंकरी फेंकना? मौके की तलाश में रहना की कब मौका मिले तो छू लें या कुछ आगे का कर लें?
वंदना जी को एक अत्यंत ही ज्वलंत व चिंतनीय मुद्दे पर लिखने के लिए बधाई. यहाँ कमेंट भी कई मिले हैं. कईयों का रवैया आपके ब्लॉग के प्रति वही है जो हमारे पुरुष-प्रधान समाज का है. कुछ भी हो, महिलाओं को ही दोषी व जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. तो इनलोगों से मैं ये कहना चाहूँगा कि आपकी महिलाओं के साथ ऐसा कुछ हो जाए तो आप तो चुप ही बैठे रहेंगे क्योंकि आपके तर्क के हिसाब से तो वही ग़लत होंगी. और अगर आप पुलिस में शिकायत करने जाएँ और वहाँ बैठे लोग भी यही तर्क दें तो आपको समझ में आएगा कि वंदना जी क्या कहना चाह रहीं हैं. इन पुरुषों से अगर कहा जाए या यूँ कहिए कि ज़बर्दस्ती इन्हें किसी विशेष पहनावे के लिए मजबूर किया जाय तो कैसा रहेगा?
आपका आर्टिकल काफी अच्छा और सटीक है.. जीन्स और सलवार-सूट के पहनने का सम्बन्ध किसी भी संस्कृति या समाज से जुड़ा हुआ नहीं है.. ये एक मनोवैज्ञानिक मामला है.. आपने एक कमाल की बात कही की "दरअसल हर रोज़ लड़कियों से आते-जाते होने वाली छेड़छाड़ भारतीय समाज में शायद समस्याओं के दायरे में आती ही नहीं" आपका ये तर्क सौ फीसदी सच है.. दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है की अगर हमारी संस्कृति इतनी परिष्कृत है जहा हम कहते है की महिलाएं देवी का रूप होती है, तो फिर उस देवी की ओर अप्राकृतिक आकर्षण का मामला इस बात को स्पष्ट करता है कि दरअसल कमी हम पुरुषों में है.
वंदना जी को एक ज्वलंत मुद्दा उठाने पर बधाई.
जीन्स पर पाबन्दी की मांग करने वालों से मेरे कुछ सवाल है -
1. क्या साड़ी पहनने वाली, हिजाब या अन्य पारंपरिक लिबासों में रहने वाली महिलाओं पर बलात्कार नहीं होता ?
2. क्यों नहीं एक भी टिप्पणीकार ने बेटों, भाइयों , पिताओं, दोस्तों आदि पुरुष रिश्तेदारों में विवेक, संयम और महिलाओं के प्रति गरिमामयी दृष्टिकोण विकसित करने की बात की ?
3. क्यों नहीं बेटे, पति, भाई, आदि के अनावश्यक रूप से देर रात घर से बाहर रहने पर प्रश्न किया जाना चाहिए?
4. क्यों नहीं शरीर दिखाऊ ,नाभि प्रदर्शना साड़ी (जैसी कि इन दिनों आदर्शवादी टीवी वाली बहुएँ पहनती हैं ) के स्थान पर शरीर ढकने वाली जीन्स बेहतर है ?
5. क्या स्त्री-गरिमा तब धराशायी नहीं होती जब नायिकाएँ आइटम-गीतों पर उत्तेजक नृत्य करती नज़र आती हैं ? और दिन-भर टीवी चैनलों पर चलने वाले ऐसे गीत क्या व्यक्ति में विकृत मानसिकता का प्रादुर्भाव नहीं करते ?
6. उन स्कूली छात्राओं के साथ क्यों छेड़खानी होती है जो स्कूल यूनिफार्म में सलवार -सूट ( जो जीन्स नहीं है ) पहनकर जाती हैं ?
कृपया अपनी सोच बदलें
आवश्यकता इस बात की है कि हम पीड़ित - वर्ग यानी अपनी बेटियों पर बंधन न थोपें , बल्कि प्रयास करें बेटों में उनके प्रति स्वस्थ , गरिमामयी दृष्टिकोण उत्पन्न करने की ।