एक था चिंटू
चिंटू ऐसा सामान्य नाम है, जिसे सुनते ही चंचल, चपल, दौड़ता-भागता बचपन याद आता है. आस-पड़ोस के किसी बच्चे का नाम चिंटू न हो, ऐसा शायद ही हो. वो भी वैसा ही था, चंचल, चपल, ऊर्जा और ज़िंदगी से भरपूर. बात 1989 की है, जब मेरे पिताजी का तबादला बिहार के सिवान ज़िले में हुआ था.
मुझे अच्छी तरह तो याद नहीं, लेकिन कुछ महीनों में ही उससे अच्छी जान-पहचान हो गई थी. चिंटू और उसके कई दोस्तों से मैं सीनियर था, इसलिए मैं उनका भइया बन गया. मोहल्ले में चिंटू के हमउम्र कई लड़के थे, जिनके साथ क्रिकेट, फ़ुटबॉल और अन्य खेल खेलने का मौक़ा मिलता था. खेल-कूद के बहाने कई बार उसके घर भी जाने का मौक़ा मिला और फिर धीरे-धीरे चिंटू हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया.
समय बीतता गया, खेल-कूद के अलावा भी राजनीति और फ़िल्मी बहसबाज़ी में वो हमलोगों का साझीदार हुआ करता था. पढ़ने में चिंटू काफ़ी तेज़ था और उसकी हैंडराइटिंग इतनी अच्छी होती थी कि पूछिए मत.
फिर पढ़ाई और करियर मुझे दिल्ली खींच लाई और धीरे-धीरे संपर्क कम हुआ. हमारा मोहल्ला भी बदल गया. लेकिन साल में जब भी घर जाना हुआ, चिंटू से आमना-सामना ज़रूर होता रहा. फिर एक दिन चिंटू का एक दूसरा रूप देखा. नशे में धुत चिंटू. गिरता-पड़ता चिंटू. मेरे पास समय कम होता था, लेकिन जितना संभव हो सका, हमने चिंटू को बहुत समझाया.
लेकिन इसके बाद जब भी सिवान जाना हुआ, हर बार एक नए चिंटू से सामना हुआ. उसकी दाढ़ी बढ़ गई थी. दोस्त-यार कम हो गए थे. उसके हमउम्र दोस्त करियर की दौड़ में उससे काफ़ी आगे निकल गए थे. मैं भी लंदन चला गया, लेकिन उसका हाल समाचर मिलता रहा. उसकी हालत दिनों-दिन ख़राब होती जा रही थी.
इस बार नवंबर में सिवान जाना हुआ. पड़ोस के अपने एक दोस्त के यहाँ बैठा हुआ था, तो उसने बताया कि चिंटू की हालत काफ़ी ख़राब है. हम सभी चिंटू के यहाँ गए. एक कमरे में पड़े चिंटू को देखकर एकबारगी मुझे नहीं लगा कि मेरे सामने वही चिंटू है, जो कुछ साल पहले दौड़ता-भागता ऊर्जावान चिंटू था.
दाढ़ी बढ़ी हुई, बाल बढ़े हुए. शरीर गल गया था. मन तो उस समय और दुखी हुआ, जब वो मुझे पहचान नहीं पाया. कई बातें याद दिलाईं, तो एकाएक उसके चेहरे पर एक चमक दिखी. बोला- पंकज भैया. मैंने उससे ख़ूब बातें की. पुराने दिनों को याद किया. उसके बालों में हाथ फेरा, तो आँखों का कोना कहीं भींग सा गया. उसकी विधवा माँ मेरे सामने अपने एकमात्र बेटे की हालत देखकर फूट-फूट कर रो रही थीं.
चिंटू ने मुझसे वादा तो किया कि वो आगे शराब नहीं पीएगा. लेकिन मैं समझ गया था कि चिंटू बहुत आगे निकल गया है. उसके घर से बाहर निकलते समय मेरी साँसें उखड़ी हुई थी. एक प्रतिभावान और ऊर्जावान बच्चे को इस रूप में देखना पीड़ादायक था.
एक सप्ताह बाद जब मैं सिवान से बाहर था, मुझे मेरे दोस्त अभिषेक ने फोन किया- चिंटू नहीं रहा. चिंटू की मौत हो गई. लगा जैसे जिंदगी रुक सी गई हो.
चिंटू की मौत के बाद मोहल्ले से इक्का-दुक्का लोग ही उसके घर गए. पता चला उसके बुरे दिनों में मोहल्ले के ज़्यादातर लोगों ने उसका बहिष्कार कर दिया था. शुरुआती दिनों में चिंटू उसी समाज के हाथों ख़ूब इस्तेमाल हुआ. कई बार कुछ लोग शराब के नशे में धुत्त चिंटू को बुलाकर उससे अनर्गल प्रलाप करवाते थे और कहीं न कहीं उसे गर्त में धकेलने के लिए कुछ हद तक ज़िम्मेदार थे. धीरे-धीरे वही चिंटू उनके लिए अछूत बन गया.
समाज ने चिंटू को उस समय छोड़ दिया, जब उसे समाज की सबसे ज़्यादा आवश्यकता था. एकाकीपन ने चिंटू को और बीमार बनाया. आख़िरकार वो काल के गर्त में समा गया. उसकी मौत के बाद उसके घर गया. पता चला उसकी अकेली माँ उसके अंतिम संस्कार के लिए गाँव गई है. पास ही एक घर में ख़ूब गाना-बजाना हो रहा था, पता चला वहाँ शादी थी.
अच्छा लगा, किसी की नई दुनिया बस रही थी. शायद चिंटू की भी दुनिया बस सकती थी, लेकिन....

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इस मर्मस्पर्शी ,संवेदनशील रपट के लिए धन्यवाद.
इस मर्मस्पर्शी कथा को सुनकर मेरा हृदय द्रवित हो गया. धन्यवाद.
हृदय को द्रवित कर देने वाली रपट. धन्यवाद.
सच में काफ़ी मार्मिक कहानी है.
पंकज जी आपने बहुत ही हृदय स्पर्शी कहानी शेयर की है. हमारी सबकी ज़िंदगी में कोई न कोई चिंटू ज़रूर रहा है. मैं मानता हूँ कि कहीं न कहीं माहौल और परवरिश चिंटू की इस हालत की वजह हो सकती है.
बहुत ही शानदार और मर्मस्पर्शी. मेरा मानना है कि प्रतिभा नहीं बल्कि समय किसी व्यक्ति को सफल बनाती है. बहुत ही शानदार लेखन.
पंकज जी, आप ने बहुत ही अच्छा लिखा है. सब लोग जानते हैं, चाहे पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, कि शराब बुरी चीज़ है. फिर भी लोग पीते हैं, पता नहीं क्यों? ईश्वर चिंटू की आत्मा को शांति दे.
पंकज जी, ये तस्वीर आज लगभग बिहार के हर गाँव की है. नीतीश बाबू के सुशासन में आज हर एक हाँव में एक शराब का ठेका ज़रूर मिल जाएगा, इसकी गारंटी है. लेकिन कोई अस्पताल मिलेगा या नहीं, ये कहना मुश्किल है.
पढ़कर दुख हुआ, किंतु ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए हमे ही आगे आना पड़ेगा. हमारी पहल किसी की जान बचा सकती है. धन्यवाद.
मैं बहुत हैरान हूँ इस घटना को लेकर. ऐसा मेरे दोस्त के साथ भी हो चुका है. कृपया ऐसी घटनाओं को अनदेखा न करें और प्लीज़ लोगों को बताएँ कि नशा हमेशा दशा ख़राब करता है. प्रियदर्शी जी को धन्यवाद.
सिवान में किस गाँव की बात है. मैं भी सिवान का रहने वाला हूँ. पंकज जी, आप भी सिवान के रहने वाले हो क्या?
पंकज जी, मर्मस्पर्शी. सिवान में ही नहीं चिंटू आज हमारे देश के हर कोने मे है. ना हम व्यक्तिगत स्तर पर और ना सामाजिक स्तर पर इनके लिए कुछ कर रहे हैं.
हम आज भी कुछ लोगों की दशा के लिए केवल मूक दर्शक बने रह जाते हैं. क्योंकि इस प्रतियोगी दौर में समय कहाँ है, जो दूसरों को भी साथ लेकर चल पाए.
संवेदना की एक मिशाल पेश की है आपने और चिंटू को इस्तेमाल करने वालों का चेहरा भी उजागर कर दिया है आपने.
पंकज जी, शराब के नुकसान के बारे में बताने के लिए शुक्रिया.
मेरी भी हालत आपके इस चिंटू से मिलती जुलती है बस किसी मक़सद के जी रहा हूं. जिसको बयां करने से भी कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि यहां की व्यवस्था ही ऐसी है.
बढ़िया, दिल को छू गया.
कोई कोई न कोई चिंटू इस वक़्त भी हमारे आसपास ज़रूर होगा ...