इस विषय के अंतर्गत रखें मार्च 2012

'बेचारे' पैदल यात्री

वंदनावंदना|गुरुवार, 29 मार्च 2012, 10:21

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खतरों के खिलाड़ी, जान हथेली पर रखके, जान पर खेलकर.........ये सारे शब्द सुनकर शायद आपको लग रहा हो यहाँ टीवी के किसी खतरनाक रिएलिटी शो की बात हो रही है.

लेकिन ये कोई रिएलिटी शो नहीं है. मैं यहाँ उन शब्दों और वाक्यों को बयां कर रही हूँ जो भारत की सड़कों को पैदल पार करते हुए मेरे ज़हन में आते हैं.

सड़कों का हाल देखकर लगता है कि यातायात नियम न मानना जैसे लोगों का मौलिक हक हो. इसका खामियाजा सबको भुगतना पड़ता है. बेचारे पैदल यात्री की तो पूछिए ही मत. मैं उन लोगों में से हूँ जो अपने वाहन के बजाए सार्वजनिक यातायात के जरिए ऑफिस आती हूँ और कुछ रास्ता पैदल तय करना होता है.यहाँ सड़कों पर पैदल चलना मुझे करतबबाज़ी ज्यादा लगता है.

सड़क पार करने के लिए लाल बत्ती पर मेरे जैसे पैदल यात्री का इंतज़ार, हरी बत्ती होते ही सड़क के दूसरी ओर पहुँचने के लिए मेरा दौड़ लगाना, इसी बीच दूसरी तरफ रेड लाइट होने के बावजूद राज्य परिवहन की बस का 'साँय साँय हॉर्न' बजाते हुए दनदना के भागना, इस भारीभरकम बस को देखकर पैदल यात्री का घबराना और भागकर दोबारा पीछे की ओर आना और फिर सड़क पार करने की कोशिश..

इस बार कोई अन्य वाहनचालक लालबत्ती तोड़ता है, मैं ज़ोर-ज़ोर से हाथ के इशारों से उसे रुकने का इशारा करती हूँ...अगर वो रहम कर दो तो दौड़ते हाँफते सड़क पार करती हूँ, लगता है कोई बाधा दौड़ हो............

दफतर से आते-जाते मेरे रोज़ का ये रूटीन मुझे तो करतबबाजी ही लगता है. आस-पास के कितने ही लोगों को मैं ऐसी ही मुश्किल से गुजरते देखती हूँ.

आँकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल एक लाख तीस हज़ार से ज़्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. इनमें से बड़ी संख्या पैदल यात्रियों की होती है.

ऐसा नहीं है कि पैदल यात्री गलतियाँ नहीं करते लेकिन आमतौर पर भारत में इनके लिए सड़कों पर कोई ख़ास सुविधाएँ नहीं होती. जुगाड़-तुगाड़ से ही सड़क पार करनी पड़ती है.

पैदल यात्रियों के सड़क पार करने के लिए यूँ तो ज़ैबरा क्रॉसिंग होती है पर ये बस नाम के ही हैं. मजाल है कि कोई ज़ैब्रा क्रॉसिंग पर अपनी गाड़ी रोकता हो. सोचती हूँ सड़कों पर ज़ैब्रा क्रॉसिंग बनाने में यूँ ही सरकारी पैसा और मेहनत बर्बाद की जाती है....अब तो मुझे ये क्रॉसिंग देखकर हँसी आती है.

अगर पैदल यात्री का सम्मान करना सीखना होता हो तो यूरीपय देश अच्छी मिसाल हैं. लंदन में रहते हुए पैदल सड़क पार करते वक़्त मुझे बड़ा शाही एहसास होता था....जब सभी गाड़ियाँ पैदल सड़क पार करने के लिए बड़े अदब से अपने आप रुक जाती हैं...

यहाँ किसी अन्य देश से तुलना की कोई मंशा नहीं है. जाहिर है हर देश की परिस्थितियाँ अलग होती हैं..लेकिन इतनी तो भारत में भी उम्मीद की सकती है कि सबको सड़क पर चलने का हक हो...या कहें कि सुरक्षित चलने का हक़ हो...वरना पैदल यात्री हमेशा ही 'बेचारा' पैदल यात्री रहेगा.

ब्रिटैनिका की याद में...

सुशील झासुशील झा|रविवार, 25 मार्च 2012, 16:48

टिप्पणियाँ (7)

कुछ खबरें होती हैं जो आती हैं और चली जाती हैं. काम की भागमभाग में इन खबरों के असर का पता नहीं चलता. जब घर लौटते हैं तो याद आती है ऐसी ही एक ख़बर और आपको लगता है कि अरे इससे तो ज़िंदगी बदल जाएगी.

इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका की छपाई बंद होना कुछ ऐसा ही रहा. खबर देखी बनाई और फिर भूल गए. दो तीन पहले कोई जानकारी खोज रहा था किताबों में तो याद आया कि ये तो ब्रिटैनिका में मिल जाएगा.

मेरे घर में ब्रिटैनिका नहीं है लेकिन मुझे याद है कि हमारी कालोनी में और फिर बाद में दिल्ली में एक वरिष्ठ सहयोगी के यहां गहरे भूरे रंग की जिल्द में करीने से रखे ब्रिटैनिका के कई वाल्यूम देखे हैं और उन्हें पलटा भी है.

तब इंटरनेट और गूगल घर घर नहीं था. अब लोग जानकारी के लिए गूगल, विकीपीडिया और पता नहीं किन किन साइटों पर जाते हैं लेकिन बचपन में स्कूल की लाइब्रेरी में ब्रिटैनिका को हम यूं देखते थे मानो पूरी दुनिया का ज्ञान इसी में भरा हुआ हो.

ये इश्यू नहीं की जाती थीं लाइब्रेरी में. तब बड़ी तमन्ना थी पैसे होंगे तो घर में ब्रिटैनिका ज़रुर रखूंगा. पैसे हुए तो ब्रिटैनिका ने छपना बंद कर दिया.

ब्रिटैनिका एक स्टेटस सिंबल था. किताबों का राजा. ज्ञान का भंडार. ये इंटरनेट पर उपबलब्ध है सारी जानकारियों के साथ लेकिन वर्चुएल और रियल में अंतर तो होता ही.

हाथों में किताब लेकर पढ़ने और मोबाइल पर कुछ पढ़ने में वो बात तो नहीं ही आती है.

जब पन्ने हाथों को न छू रहे हों तो दिलो दिमाग तक कैसे पहुंचते होंगे. मैं पुराने ख्यालों का आदमी नहीं हूं. ऑनलाइन वेबसाइट के लिए काम करता हूं लेकिन किताबों के पन्नों से प्रेम बरकरार है क्योंकि वो रियल है जो सत्य लगता है वर्चुअल विकीपीडिया की जानकारियों को तरह सत्य भी हो सकता है और असत्य भी. टीचर कहते थे ब्रिटैनिका कभी ग़लत नहीं लिखता....ये बात किसी इंटरनेट वेबसाइट के बारे में शायद ही कभी इतनी ठसक के साथ कही जा सकेगी.

क्यों अलग है भारत मेरे लिए

हफ़ीज़ चाचड़हफ़ीज़ चाचड़|मंगलवार, 20 मार्च 2012, 11:32

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भारत हमेशा से ही मेरे लिए अलग रहा है और जब भी मैं भारत आया हूँ हर बार नए अनुभव देखने का अवसर मिला है. मैं करीब एक हफ्ते के लिए विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में हूँ और दो अनुभव आप मित्रों से बाँटना चाहता हूँ.

मुझे लगता है कि आपको इस पर कोई खास अचरज नहीं होगा और शायद आपको यह बातें छोटी सी लगें लेकिन सच मानिए मेरे लिए बहुत बड़ा अचरज है.

मैं वाघा सीमा पार कर लाहौर से अमतृसर पहुँचा और वहाँ से टैक्सी ले कर दिल्ली के लिए रवाना हुआ.
जब हम जालंधर पहुँचे तो देखा कि टोल प्लाजा की जिस लाइन में हम खड़े हुए थे वहाँ ट्रैफिक जाम हो गया था और एक निजी कार जिस पर नीली बत्ती लगी हुई थी, वह टोल प्लाजा के काउंटर पर मौजूद लड़के से बहस कर रहा था.

करीब 20 मिनटों की बहस और टोल प्लाजा प्रसाशन के लोगों के हस्तक्षेप के बाद जब हम काउंटर पर पहुँचे और मैंने काउंटर वाले लड़के से पंजाबी में पूछा कि भाई साहब क्या हुआ? वह क्यों बहस कर रहा था? तो कहने लगा कि वह हमको टोल टैक्स नहीं दे रहा था और कहा रहा था कि वह सेना में है और हमने कहा कि आप चाहें कहीं भी होंगे लेकिन टैक्स तो देना पड़ेगा. उनके मुताबिक उन्होंने 50 रुपय का टैक्स कार वाले से लिया गया.

भारत में इस तरह की घटनाएँ कहीं न कहीं होती होंगी और लोगों का पता भी होगा और उन के लिए कोई नई बात नहीं है लेकिन मेरे लिए सच में यह बहुत बड़ी बात है क्योंकि मैं उस देश का नागरिक हूँ जहाँ सेना ही सब कुछ है. इस्लामाबाद से लेकर कराची तक करीब 1200 किलोमीटर की यात्रा करने वाले व्यक्ति को कई बार टोल टैक्स देना पड़ता है लेकिन सेना के किसी अधिकारी या जवान से कोई टैक्स नहीं लिया जाता है.

पाकिस्तान में जो टैक्स देता है उसको बिल्कुल सुविधा नहीं मिलती बल्कि जो टैक्स नहीं देता है, उसको तमाम सुविधाएँ मिलती हैं. दूसरी बात जिसने मुझे हैरान किया, वह यह है कि भारत में टैक्सी चलाने के लिए परमिट होता और टैक्सी वाले को निजी गाड़ियों की तुलना में अधिक टैक्स देना पड़ता है.

पाकिस्तान में ऐसा संविधान में है लेकिन उस पर कोई अमल नहीं करता है. जिस गाड़ी में दिल्ली पहुँचा उसकी नंबर प्लेट निजी थी और मैंने पूछा कि ऐसा क्यों है तो ड्राइवर मनप्रीत सिंह ने बताया कि कमर्शियल नंबर के लिए अधिक टैक्स देना पड़ता है.

ब्रिटेन और यूरोप में निश्चित रुप से ऐसा होता होगा और नियमों का पालन करना पड़ता होगा लेकिन उस पर हम लोगों को अचरज नहीं होता है क्योंकि वह लोग हम पाकिस्तानियों से बहुत अलग हैं. भारत और भारतीयों को देख कर हमको अचरज इसलिए होता है कि यह देश बिल्कुल हमारे देश जैसा है और यहाँ के लोग बिल्कुल हमारे लोगों जैसे हैं. लेकिन कुछ मामलों में भारत पाकिस्तान से अलग क्यों हैं? इसके कारणों पर आप प्रकाश डाल सकते हैं.

गधों की ज़रूरत है

अविनाश दत्तअविनाश दत्त|बुधवार, 14 मार्च 2012, 19:31

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उत्तर प्रदेश का चुनाव संपन्न हुआ. खूब सारे पत्रकार गए थे इस हिट पिच्चर को देखने. मैं भी गया था. सबको अच्छी लगी. हमको भी.

उत्तर प्रदेश की पिच्चर में सब अच्छा था. सबने अपना अपना काम किया. मायावती ने, राहुल ने, उनकी बहन प्रियंका ने, मुलायम सिंह ने और उनके बेटे अखिलेश यादव ने.

रामलाल, शामलाल, भूरेलाल, हीरालाल, अलीम, सलीम, कलीम जैसे मतदाताओं ने भी अपना काम किया. बस नहीं किया तो पत्रकारों ने. मैंने चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के सही गलत होने की बात नहीं कर रहा. मैं चुनाव बाद के काम की बात कर रहा हूँ.

जब से अखिलेश यादव जीते हैं तब से चारों तरफ उनका ऐसा गुणगान हो रहा है कि बाप रे बाप. वो इतने कमाल के हैं वो उतने कमाल के हैं.

वो इतने किलोमीटर चले वो उतने किलोमीटर दौड़े उन्होंने इतने किलोमीटर साईकल चलाई. अरे भैया यह भी तो बताओ कि वो कितने हज़ार का जूता पहन कर दौड़े, उनकी फायरफॉक्स कंपनी की बनी बहुत कीमती विदेशी सायकल कितने की है. वो कितने लाख रूपये के फ़ोन रखते हैं.

अखिलेश ना जीतते और राहुल चमकते तो उनका चरण चांपन देह दाबन शुरू हो जाता. मायावती जीततीं तो माया चारित मानस का अखंड पाठ होने लगता.

अरे भाई अखिलेश यादव पर , उनकी पत्नी डिम्पल पर और उनके सौतेले भाई प्रतीक पर सीबीआई के आय से अधिक संपत्ति के मुकदमों कि क्या कैसे क्यों गत हुई. कोई तो याद करो. याद करो कि उन पर आरोप लगाने वाले की क्या दशा हुई थी.

मीडिया और नेता के बीच तो सांप नेवले का रिश्ता होना चाहिए, खंबे और कुत्ते का रिश्ता होना चाहिए दूध और नीबू का रिश्ता होना चाहिए.

पर यहाँ तो गाय बछड़े का रिश्ता हो गया है खूब प्यार से चाट रहे हैं एक दूसरे को देख कर आखें भर आईं मेरी तो.

चारो तरफ देखता हूँ तो मीडिया में अरबी घोड़ों भरे दिखते हैं. सबके आँखों के अगल बगल परदे लगे हैं सब केवल सीधे देखते हैं और दुलाकी चाल चलते हैं. राणा कि पुतली मुड़ी नहीं कि चेतक झट से फिर जाता था.

कहाँ गए वो गधे जो चारों तरफ देखें, कहीं भी चल दें, वक़्त बे-वक़्त दुलत्ती झाड़ें और डंडा पड़ने पर जोर जोर से रेंकें भी.

कोई तो लाओ इन गधों को.

भंग की तरंग का दोष

विनोद वर्माविनोद वर्मा|बुधवार, 07 मार्च 2012, 15:54

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दोष मतदाताओं का नहीं है. यकीन मानिए, दोष उनका है ही नहीं.

ये दोष मौसम का है. फागुन का महीना होता ही इतना मादक है. इसमें अच्छे से अच्छा आदमी तक बौरा जाता है. ये तो फिर भी मतदाता थे. और जब पानी में भंग घुली हुई हो तो अच्छे बुरे का फर्क कौन कर पाता है भला. तरंग में जो हो गया सो हो गया.

अब उत्तराखंड को ही ले लीजिए. मतदाता भ्रष्टाचार से परेशान थे. उनका मूड भांपकर भाजपा ने मुख्यमंत्री रमेशचंद्र पोखरियाल निशंक को हटाकर कथित ईमानदार, मेहनती और कर्मठ बीसी खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया. चुनाव में जनता ने ईमानदार खंडूरी को हरा दिया और कथित रुप से भ्रष्ट पोखरियाल को जिता दिया. ऐसा तो कोई भंग की तरंग में ही कर सकता है.

आरोप लगे कि भ्रष्टाचार करके मायावती ने अपनी मूर्तियाँ लगवाईं हैं. पार्क बनवाए हैं. वो नोटों की मालाएँ पहनती हैं. जनता ने सोचा होगा कि इन्हें हटाया जाए. तो समाजवादी पार्टी को वोट दे दिया. अब सीबीआई सोच रही होगी कि समाजवादी पार्टी के मुखिया और उसके परिजनों के ख़िलाफ़ जो आय से अधिक संपत्ति का मामला है, उसका क्या करे. अब सीबीआई सुप्रीम कोर्ट से ये कहेगी कि भंग की तरंग में जनता ने जो किया, उसे ही फैसला मान लिया जाए. आखिर जनतंत्र में जनता की राय ही तो सर्वोपरि होती है.

मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग का इतना अच्छा पाठ पढ़ाया था, जनता को. लेकिन फागुन आया तो उसे सिविल इंजीनियरिंग में इतनी खोट दिखी कि सोशल इंजीनियरिंग की धज्जियाँ उड़ गईं.

टेलीविजन पर अनथक बहस करते विद्वानों ने कहा कि अन्ना हज़ारे के आंदोलन का असर हुआ है. लोग बेईमानी को बर्दाश्त करना कम कर रहे हैं. लेकिन चुनाव आयोग ने महीना ही ग़लत चुना था, मतदान के लिए. फागुन में वोट हुए तो सब गड़बड़ हो गई. जिस बादल परिवार पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप लगाए जा रहे थे, उसी बादल परिवार को जनता ने फिर सत्ता सौंप दी. अपेक्षाकृत ईमानदार राजा पटियाला कैप्टन अमरिंदर सिंह के मंसूबे धरे के धरे रह गए. ना, पंजाब के मतदाताओं ने शराब नहीं पी थी, क्योंकि लाखों लीटर शराब तो चुनाव आयोग ने ज़ब्त कर ली थी. ये हवा में घुली भंग की तरंग ही दिखती है.

गोवा को आमतौर पर सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष किस्म का राज्य माना जाता है. वैसे वहाँ कैथोलिक की संख्या अच्छी खासी है. लेकिन फागुनी हवा में झूमती जनता को देखिए, वहाँ हिंदूवादी भाजपा की सरकार बनवा दी.

अपने राहुल बाबा पढ़ाई लिखाई के चक्कर में इधर कम ही रहे इसलिए वो फागुनी बयार को पहचान नहीं पाते. कभी वे अपनी आस्तीनें चढ़ाकर लोगों की आत्मा को जगाने की कोशिश कर रहे थे, तो कभी त्यौरियाँ चढ़ाकर. कभी वे दलित के घर में खाना खा रहे थे तो कभी हुक्का पीते किसानों के साथ खटिया पर बैठकर उनका दुख साझा कर रहे थे. लेकिन वोट देने का मौका आया तो कम्बख़्त जनता बौरा गई. वोट न दिया. अरे दो सौ रैलियाँ कीं, दस रैली पर एक सीट भी देते तो पिछली बार से बीस सीटें तो ज्यादा दे ही देते. प्रियंका गांधी भी अपने भोले भाले पति और चतुर बच्चों को लेकर मंच पर गईं. लेकिन लगता है कि ऐन वक्त पर लोग बहक गए.

अपने कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने क्या क्या नहीं किया जनता के लिए. कभी मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए चुनाव आयोग से पंगे लिए तो कभी बाटला हाउस एनकांउटर के मामले में सोनिया गांधी को रुलाया. लेकिन जनता ठहरी बुद्धू. वोट देने की बारी आई तो तरंग में बह गई. उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद को पाँचवें नंबर पर पटक दिया.

विद्वान हैरान हैं. पत्रकार और सेफ़ोलॉजिस्ट नामक विद्वान और कई कई चाणक्यनुमा राजनीतिज्ञ भी.

अब वे चाहते हैं कि चुनाव आयोग अगली बार इस मौसम में चुनाव करवाए तो फागुनी बयार के बहने पर पहले रोक लगा दे और भंग की तरंग को ज़ब्त कर ले.

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