ब्रिटैनिका की याद में...
कुछ खबरें होती हैं जो आती हैं और चली जाती हैं. काम की भागमभाग में इन खबरों के असर का पता नहीं चलता. जब घर लौटते हैं तो याद आती है ऐसी ही एक ख़बर और आपको लगता है कि अरे इससे तो ज़िंदगी बदल जाएगी.
इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका की छपाई बंद होना कुछ ऐसा ही रहा. खबर देखी बनाई और फिर भूल गए. दो तीन पहले कोई जानकारी खोज रहा था किताबों में तो याद आया कि ये तो ब्रिटैनिका में मिल जाएगा.
मेरे घर में ब्रिटैनिका नहीं है लेकिन मुझे याद है कि हमारी कालोनी में और फिर बाद में दिल्ली में एक वरिष्ठ सहयोगी के यहां गहरे भूरे रंग की जिल्द में करीने से रखे ब्रिटैनिका के कई वाल्यूम देखे हैं और उन्हें पलटा भी है.
तब इंटरनेट और गूगल घर घर नहीं था. अब लोग जानकारी के लिए गूगल, विकीपीडिया और पता नहीं किन किन साइटों पर जाते हैं लेकिन बचपन में स्कूल की लाइब्रेरी में ब्रिटैनिका को हम यूं देखते थे मानो पूरी दुनिया का ज्ञान इसी में भरा हुआ हो.
ये इश्यू नहीं की जाती थीं लाइब्रेरी में. तब बड़ी तमन्ना थी पैसे होंगे तो घर में ब्रिटैनिका ज़रुर रखूंगा. पैसे हुए तो ब्रिटैनिका ने छपना बंद कर दिया.
ब्रिटैनिका एक स्टेटस सिंबल था. किताबों का राजा. ज्ञान का भंडार. ये इंटरनेट पर उपबलब्ध है सारी जानकारियों के साथ लेकिन वर्चुएल और रियल में अंतर तो होता ही.
हाथों में किताब लेकर पढ़ने और मोबाइल पर कुछ पढ़ने में वो बात तो नहीं ही आती है.
जब पन्ने हाथों को न छू रहे हों तो दिलो दिमाग तक कैसे पहुंचते होंगे. मैं पुराने ख्यालों का आदमी नहीं हूं. ऑनलाइन वेबसाइट के लिए काम करता हूं लेकिन किताबों के पन्नों से प्रेम बरकरार है क्योंकि वो रियल है जो सत्य लगता है वर्चुअल विकीपीडिया की जानकारियों को तरह सत्य भी हो सकता है और असत्य भी. टीचर कहते थे ब्रिटैनिका कभी ग़लत नहीं लिखता....ये बात किसी इंटरनेट वेबसाइट के बारे में शायद ही कभी इतनी ठसक के साथ कही जा सकेगी.

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दिल को छूने वाला और बिल्कुल सही बात लिखी गई है
इतना संदर्भ प्रेम तो आज शायद ही दिखता है । टाइम्स नाउ की ख़बर से लोग विकिपीडिया संपादित कर देते हैं और कुछ लोगों को वही सच्चाई लगने लगती है । निस्संदेह विकिपीडिया ब्रिटानिका की तर्ज पर बना है पर यह यहीं तक सीमित नहीं रहा था । कमाल पाशा के सपने देखने के बाद तीन तुर्क लेखकों ने एक तुर्क एनसाइक्लोपीडिया लिखी थी । इस्लामी और ईरानिक एनसाइक्लोपीडिया इसी से प्रेरित थी । लेकिन मेरी नज़र में भारतीय ज्ञान या विश्वासों (अंधे ही सही) और ग्रामीण शब्दावलियों वाला ऐसा कोई कोश आजतक नहीं बना - आश्चर्य है कि राहुल सांकृत्यायन ने ऐसा करने का सुझाव भी किसी को नहीं दिया । ज्ञानपीठ पुरस्कारों का आधार तो एक वक़्त दूरी ही पैदा करेगा अगर हमको इस तरह के कोशों की बजाय अबुल कलाम आज़ाद की बनाई पुरानी और असंतुलित शिक्षा नीति पर आधारित किताबें पढ़ाई जाएंगी ।
मैं भी चौंक गया था ये पढ़कर. काग़ज़ पर पढ़ने की तुलना ई-रीडिंग से नहीं हो सकती.
सुशील जी के ब्लॉग दिल को छू लेते हैं. बड़ा ही प्रासंगिक ब्लॉग है.
सचमुच, रियल, रियल ही रहेगा और वर्चुअल, वर्चुअल.
पुस्तकें हर देश-काल में प्रासंगिक रही हैं.
बंधुवर, ब्रिटैनिका पर आपका ये आलेख बढ़िया बन पड़ा है। आपकी दो बातें दिल को छू गईं। पहली तो ये कि जब पैसे नहीं थे तब ब्रिटैनिका थी और आज जब पैसे हैं तो ब्रिटैनिका नहीं। दूसरी बात ये कि आज किसी भी साइट के बारे में ये दावे से नहीं कहा जा सकता कि उसमें दी गई जानकारी सही ही होगी। अब तो शायद ब्रिटैनिका को यादों में ही सहेजा जाएगा।