भंग की तरंग का दोष
दोष मतदाताओं का नहीं है. यकीन मानिए, दोष उनका है ही नहीं.
ये दोष मौसम का है. फागुन का महीना होता ही इतना मादक है. इसमें अच्छे से अच्छा आदमी तक बौरा जाता है. ये तो फिर भी मतदाता थे. और जब पानी में भंग घुली हुई हो तो अच्छे बुरे का फर्क कौन कर पाता है भला. तरंग में जो हो गया सो हो गया.
अब उत्तराखंड को ही ले लीजिए. मतदाता भ्रष्टाचार से परेशान थे. उनका मूड भांपकर भाजपा ने मुख्यमंत्री रमेशचंद्र पोखरियाल निशंक को हटाकर कथित ईमानदार, मेहनती और कर्मठ बीसी खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया. चुनाव में जनता ने ईमानदार खंडूरी को हरा दिया और कथित रुप से भ्रष्ट पोखरियाल को जिता दिया. ऐसा तो कोई भंग की तरंग में ही कर सकता है.
आरोप लगे कि भ्रष्टाचार करके मायावती ने अपनी मूर्तियाँ लगवाईं हैं. पार्क बनवाए हैं. वो नोटों की मालाएँ पहनती हैं. जनता ने सोचा होगा कि इन्हें हटाया जाए. तो समाजवादी पार्टी को वोट दे दिया. अब सीबीआई सोच रही होगी कि समाजवादी पार्टी के मुखिया और उसके परिजनों के ख़िलाफ़ जो आय से अधिक संपत्ति का मामला है, उसका क्या करे. अब सीबीआई सुप्रीम कोर्ट से ये कहेगी कि भंग की तरंग में जनता ने जो किया, उसे ही फैसला मान लिया जाए. आखिर जनतंत्र में जनता की राय ही तो सर्वोपरि होती है.
मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग का इतना अच्छा पाठ पढ़ाया था, जनता को. लेकिन फागुन आया तो उसे सिविल इंजीनियरिंग में इतनी खोट दिखी कि सोशल इंजीनियरिंग की धज्जियाँ उड़ गईं.
टेलीविजन पर अनथक बहस करते विद्वानों ने कहा कि अन्ना हज़ारे के आंदोलन का असर हुआ है. लोग बेईमानी को बर्दाश्त करना कम कर रहे हैं. लेकिन चुनाव आयोग ने महीना ही ग़लत चुना था, मतदान के लिए. फागुन में वोट हुए तो सब गड़बड़ हो गई. जिस बादल परिवार पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप लगाए जा रहे थे, उसी बादल परिवार को जनता ने फिर सत्ता सौंप दी. अपेक्षाकृत ईमानदार राजा पटियाला कैप्टन अमरिंदर सिंह के मंसूबे धरे के धरे रह गए. ना, पंजाब के मतदाताओं ने शराब नहीं पी थी, क्योंकि लाखों लीटर शराब तो चुनाव आयोग ने ज़ब्त कर ली थी. ये हवा में घुली भंग की तरंग ही दिखती है.
गोवा को आमतौर पर सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष किस्म का राज्य माना जाता है. वैसे वहाँ कैथोलिक की संख्या अच्छी खासी है. लेकिन फागुनी हवा में झूमती जनता को देखिए, वहाँ हिंदूवादी भाजपा की सरकार बनवा दी.
अपने राहुल बाबा पढ़ाई लिखाई के चक्कर में इधर कम ही रहे इसलिए वो फागुनी बयार को पहचान नहीं पाते. कभी वे अपनी आस्तीनें चढ़ाकर लोगों की आत्मा को जगाने की कोशिश कर रहे थे, तो कभी त्यौरियाँ चढ़ाकर. कभी वे दलित के घर में खाना खा रहे थे तो कभी हुक्का पीते किसानों के साथ खटिया पर बैठकर उनका दुख साझा कर रहे थे. लेकिन वोट देने का मौका आया तो कम्बख़्त जनता बौरा गई. वोट न दिया. अरे दो सौ रैलियाँ कीं, दस रैली पर एक सीट भी देते तो पिछली बार से बीस सीटें तो ज्यादा दे ही देते. प्रियंका गांधी भी अपने भोले भाले पति और चतुर बच्चों को लेकर मंच पर गईं. लेकिन लगता है कि ऐन वक्त पर लोग बहक गए.
अपने कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने क्या क्या नहीं किया जनता के लिए. कभी मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए चुनाव आयोग से पंगे लिए तो कभी बाटला हाउस एनकांउटर के मामले में सोनिया गांधी को रुलाया. लेकिन जनता ठहरी बुद्धू. वोट देने की बारी आई तो तरंग में बह गई. उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद को पाँचवें नंबर पर पटक दिया.
विद्वान हैरान हैं. पत्रकार और सेफ़ोलॉजिस्ट नामक विद्वान और कई कई चाणक्यनुमा राजनीतिज्ञ भी.
अब वे चाहते हैं कि चुनाव आयोग अगली बार इस मौसम में चुनाव करवाए तो फागुनी बयार के बहने पर पहले रोक लगा दे और भंग की तरंग को ज़ब्त कर ले.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
मिस्टर वर्मा, यह कोई बात हुई जो आपने भी शायद भंग की तरंग में उटपटांग लिख दिया. इस देश में दूध से धुले लोगों को कहाँ से लाएंगे. भोली-भाली जनता तंग होकर और उम्मीद लगाकर लोगों को सत्ता पर बिठाती है. लोग गद्दारी कर के अपना वादा भूल जाएँ तो क्या किया जाए.
अच्छा ब्लॉग लिखा है.
होलियाना चुनाव पर ब्लॉग भी होलियाना है. बधाई.
वाह विनोद जी, मज़ा आ गया. आपने तो अपनी लेखनी को फागुन की मस्ती में इस तरह डुबोया की लेख पढ़कर ही भंग की तरंग छा गई . मुझे पूरा विश्वास है कि अगर चुनाव हारने वाले भी इसे पढेंगे तो मुस्कुराए बिना नहीं रह पाएंगे. अंतिम पंक्तियों में चुनाव आयोग से विद्वानों की अपेछाएं वाकई बौरा देती हैं.
जनता को जानना शायद इतना आसान नहीं है विनोद जी.
विनोद वर्मा जी आपने बहुत अच्छी समीक्षा की, लेकिन मैं कहूँगा कि जनता ने भंग के तरंग में नहीं पूरे होशोहवास में और हमें लगता है कि बहुत सही फैसला दिया है. मसलन उत्तराखंड में 32-31 यानि दोनों नापसंद, उप्र में समाजवादी पार्टी को बहुमत यानि कांग्रेस और बीजेपी जैसी सांप्रदायिक और महाभ्रष्ट पार्टियों को सजा, पंजाब में महाराजा नहीं जनता का नेता चाहिए, गोवा में एक भ्रष्ट से तंग आकर दूसरे भ्रष्ट को चुन लिया.
मायावती अपने काम करने के तरीके की वजह से चुनाव हारी हैं.
काफी अच्छा ब्लॉग लिखा है आपने. हर बार की तरह इस बार भी मैं तो आपके ब्लॉग का फैन हो गया हूँ.
बहुत अच्छा लिखा है आपने.
बढ़िया पोस्ट. चुनावी नतीजों का विश्लेषण सब अपने-अपने तरीके से करते हैं. कोई भ्रष्ट्राचार पर प्रहार करता है तो कोई और कुछ कहता है. आपका विश्लेषण अलहदा और मजेदार है.
विनोद जी चुनाव अच्छी तरह संपन्न हो गए ये बहुत अच्छी बात है. उम्मीद है कि चुनी गई नई सरकारें अच्छा काम करेंगी.
ब्लॉग लिखने वाले ने सही लिखा है. मैं भी चुनाव परिणाम से आश्चर्यचकित हूं. लेकिन इन चुनावों से कुछ अच्छे संकेत भी मिले हैं. पहला कि दिग्विजय, सलमान खुर्शीद और रीता बहुगुणा जोशी जैसे राजनेताओं की सीख मिली है कि चुनाव के वक्त बेतुकी बातें करने से वोट नहीं मिलते और दूसरा ये कि गांधी परिवार का करिश्मा अब खत्म हो गया है. उन्हें अब बहुत मेहनत करनी होगी.
इतना तो तय हो गया है कि राजनीतिज्ञों ने जम कर भांग छानी थी. सोचा कि आरक्षण का पकौड़ा खूब बिकेगा और जातिवाद का भांग धतूरा खूब चलेगा. महारानी और युवराज ठीक वक्त पर बीन बजाने निकले लेकिन सब बेकार.
जो नेता सत्ता में चला जाता है वो भी पांच साल तक भंग पीकर सो जाता है. अगर जनता भी पी ले तो कोई गलत बात नहीं. बहुत अच्छा लेख है.
लगता है बीबीसी के पत्रकार भी पक्षपात करने लगे हैं वरना कांग्रेस प्रेम और भाजपा विरोध का ऐसा लेख नहीं लिखते. श्रीमान विनोद वर्मा जी अपने आँख पर से कांग्रेसी चश्मा उतारिए और जनता के बीच जाकर उनके मन को समझने का प्रयास कीजिए.
जनता नहीं व्यवस्था दोषी है.
अच्छा पोस्ट होली पर.
हाँ, आप लोगों ने अपनी तरफ से पूरी तरह कोशिश की थी कांग्रेस के लिए. जब आपकी इच्छा पूरी नहीं हुई तो ये कहना वाजिब ही है कि जनता ने भंग खा कर वोट दिया.
विनोद जी, बेहतरीन लेख के लिए धन्यवाद.
मैं उत्तराखंड के चुनाव परिणाम पर अपनी नजरें गड़ाए हुए था. उत्तराखंड के लोग खंडूरी जी की काफी इज्जत करते हैं और उन्हें भावी मुख्यमंत्री देखना चाहते थे. जैसे ही खंडूरी जी हारे, एक मिनट के बाद ही मीडिया में बीजेपी के हाईकमान का बयान आया कि सीएम कोश्यारी जी होंगे. (उस समय बीजेपी कांग्रेस से आगे चल रही थी) उसके ठीक 15 मिनट बाद बीसी खंडूरी का बयान आया कि मैं वही कहूंगा जो पार्टी हाईकमान कहेंगे. ऐसा लग रहा था जैसे ये पहले से तय हो रखा हो. मैं तो यही कहूंगा विनोद जी कि मतदाता भंग के नशे में नहीं थे बल्कि नेताओं को भंग के नशे से उतारा गया है.
कबिरा इस संसार में भांति-भांति के लोग.
बिल्कुल सही कहा आपने विनोदजी
आपने बिल्कुल सही लिखा, ये भंग की तरंग ही थी जिसने सब उल्टा-पुल्टा कर दिया.