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नाउम्मीदी के बीच उम्मीद की एक किरण

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|बुधवार, 29 फरवरी 2012, 17:14 IST

जब जूते ख़रीदने के भी पैसे न हों और कोई हाशिम ख़ान स्क्वॉश के मैदान पर झंडे गाड़ दे और फिर अगले 52 वर्षों तक उनका परिवार यह झंडा न गिरने दे.

जब करोड़ो महिलाएँ अभी केवल सपने में ही विमान उड़ाने का जोखिम कर सकें और कोई शुक्रिया ख़ानम विमान उड़ाने लगे और वह भी आज से 53 वर्ष पहले.

जब 80 प्रतिशत महिलाएँ पुरुष की अनुमति के बिना घर से बाहर न निकल सकें और कोई मिनरा सलीम अन्टार्क्टिका पर क़दम रख दे. जब 95 प्रतिशत बलात्कार से प्रभावित महिलाएँ और उनके परिजन चादर में मुँह छिपाए छिपाए घूमें और कोई मुख़्ताराँ माई सर उठा कर खड़ी हो जाए.

जब जिम्नेज़ीअम जाने के लिए बस का पूरा किराया भी न हो और कोई नसीम हमीद ऐशिया की तेज़ गति से भागने वाली लड़की का ख़िताब ले जाए.

जब देश के 38 प्रतिशत बच्चे पहली कक्षा भी पूरी किए बिना स्कूल से ड्रॉप आउट हो जाएँ और कोई अली मुईन नवाज़िश एक ही साल में 21 विषयों में ए-लेवल पास करने का विश्व रिकॉर्ड बना दे.

जहाँ विज्ञान के प्रयोगशालाओं में एक तकनीशियन के भी लाले पड़े हों वहां कोई बूढ़ा अब्दुल सलाम भौतिक विज्ञान में नोबेल पुरस्कार उड़ा ले जाए.

जहाँ नेत्रहीनों के लिए न शिक्षा की गारंटी हो और न ही रोज़गार की ....वहाँ के नेत्रहीन की क्रिकेट टीम एक नहीं दो विश्व कप जीत जाए.

जहाँ के पहाड़ी लोग विदेशी पर्वतारोहियों की मदद कर घर का चूल्हा जलने पर ख़ुश हो जाएं और उनमें से कोई नज़ीर साबिर और फिर कोई हसन सदपारा माउंट ऐवरेस्ट को सर कर ले.

जहाँ नृत्य की शिक्षा को लूज़ करेक्टर की पहली सीढ़ी बताया जाए, साढ़े सात सौ सिनेमाघर पोने दो सौ में सिकुड़ जाएँ, फिल्मी स्टूडियो गोदाम बन जाएँ.

जहाँ रोना सामान्य बात बन जाए और हंसना ख़तरे से ख़ाली न हो.

ऐसे माहौल में कोई शरमीन ओबैद चिनॉए बसंत के मौसम में सेविग फेस के साथ छम से ऑस्कर के मंच पर आ जाए तो अच्छा क्यूँ न लगे?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:42 IST, 29 फरवरी 2012 Saptarshi:

    ज्यादा अच्छा न लगे तो ही अच्छा है. भारत में इस तरह की उम्मीद की किरण अकसर आती रहती है बावजूद इसके यहां नामउम्मीद अपने चरम पर है.

  • 2. 19:42 IST, 29 फरवरी 2012 Pawan Kumar:

    सुभान अल्लाह वुसतुल्लाह ख़ान साहब आप जब आते हैं तो दिल जीत लेते हैं..

  • 3. 19:56 IST, 29 फरवरी 2012 furkan ahmad:

    ये सहाब अल्ला की मेहरबानी है.

  • 4. 21:03 IST, 29 फरवरी 2012 Naval Joshi:

    वुसतुल्लाह खान साहब आपने शरमीन ऑबेद चिनॉय जो कि पाकिस्तानी में महिला फिल्मकार हैं उनके आस्कर जीतने पर खुशी का इजहार किया है,वाकई यह खुशी की बात है लेकिन केवल इसलिए नहीं कि वे ऑस्कर जीत पायी है. इसलिए भी कि लगभग रुढ़ीवादी बोलबाले वाले समाज की एक महिला की हिम्मत की चर्चा अब गैर की महफिल में होने लगी है. एशियाई लोगों के प्रति पश्चिम का रुख कुछ हिचक वाला रहता है ,इसके बावजूद एक महिला वह भी आज के पाकिस्तान में जहाँ रुढ़ियों और मुल्लाओं से ही नहीं निबटना पडता है बल्कि अन्दरूनी हालात बहुत ही खतरनाक हैं .

  • 5. 21:19 IST, 29 फरवरी 2012 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    खान साहब बहुत शानदार पहलू पर समझाया है.

  • 6. 22:16 IST, 29 फरवरी 2012 Kapil Batra:

    काफी लंबे समय के बाद बढ़िया ब्लॉग पढ़ा.

  • 7. 22:45 IST, 29 फरवरी 2012 vimal:

    बहुत उमदा उदाहरण दिया सर आपने.आप का ब्लॉग पढ़ने के बाद मन खुश हो गया.

  • 8. 23:10 IST, 29 फरवरी 2012 Anwar Ali:

    ये सब कमाल का है.साथ ही आपके बयान करने का तरीका भी कुछ कम नहीं है.पूरी जानकारी के लिए शुक्रिया.

  • 9. 03:14 IST, 01 मार्च 2012 Pradeep Shukla:

    बहुत खुब.आपने एक पत्रकार के साथ-साथ एक पाकिस्तानी नागरिक का किरदार बखुभी निभाया है.

  • 10. 04:25 IST, 01 मार्च 2012 Umesh Yadav:

    बहुत खुब.मुबारक हो.पाकिस्तान में कुछ गिनी चुनी अंतरराष्ट्रीय हस्तियां है वहां के बाशिदों में ज़रुर एक प्रकार का एहसास पैदा करेंगी और आगे बढ़ने के लिए उम्मीद की एक नई रोशनी की तरह काम करेगी.

  • 11. 10:01 IST, 01 मार्च 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    बाकी सब रिकॉर्ड एक तरफ लेकिन वुसतुल्लाह का ब्लॉग लेखन एक बड़ी उपलब्धि कह सकता हूँ.फिर भी मैं ये कहना चाहुंगा कि ज्यादा उत्सुक होने की जरुरत नहीं है क्योंकि आम जन की मानसिकता को अभी बदलने में 100 साल से ज्यादा का समय लगेगा.

  • 12. 11:08 IST, 01 मार्च 2012 नवल जोशी:

    वुसतुल्लाह खान साहब, पाकिस्तान की एक महिला फिल्मकार ऑस्कर में मंच पर सम्मानित की गई तो आपने कहा कि फिर अच्छा क्यों न लगे? लेकिन वाकई अच्छा तब होता जब हम इस प्रकार के लोगों का सहयोग भी करते, चढ़ते सूरज को तो कोई भी सलाम कर लेता है फिर खुशी जाहिर करने में अपना जाता ही क्या है?आज यदि हम शरमीन ऑबेद चिनॉय की उपलब्धि पर खुशी न भी हो तो उन्हें कोई फर्क नहीं पडता है. हम उनका सम्मान तब ही व्यक्त कर रहे हैं जबकि दूसरे उन्हें सम्मनित कर चुके हैं हमारे देश में भी ऐसा ही होता रहा है जब कोई विदेशी संस्था हमारे किसी नागरिक को सम्मानित करती है तो हमारा नजरिया भी उस व्यक्ति के प्रति बदल जाता है । वास्तव में कहा जाए तो हमारे पास इस तरह खुशी जाहिर करने की पात्रता ही नहीं है, हम भी दुनिया के सुर में सुर ही मिला रहे हैं.

  • 13. 13:23 IST, 01 मार्च 2012 bhumika rai:

    जहां एक लंबे समय से पाकिस्तान सिर्फ गमों और बुरी यादों के लिए जाना जा रहा है वहां आपका ये लेख उन्हें एक सकारात्मक सोच देने लायक है.

  • 14. 15:34 IST, 01 मार्च 2012 JITENDRA JEE, CHAKFATMA , BHAGALPUR:

    वुसतुल्लाह जी काफी सच कहा आपने. हमारे राजनेता देश की ज्यादातर समस्याओं के लिए जिम्मेवार हैं क्योंकि वो सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, आदि का उपयोग हीं नहीं करते यदि वे लोग इनका उपयोग कर रहे होते तो शायद हमारे देश की ज्यादातर समस्यायें खुद व खुद समाप्त हो जाती.

  • 15. 11:32 IST, 03 मार्च 2012 Sudhir Saini:

    बहुत अच्छा लिखा आपने वुसतुल्लाहजी आपने.ईश्वर करे पाकिस्तान और हिदुस्तान में लोग औरतों के अधिकार और हक के लिए जागरुक हो और धर्म से ऊपर इंसानियत को समझे.

  • 16. 14:35 IST, 05 मार्च 2012 E.A.Khan, Jamshedpur:

    "वो सुबह कभी तो आएगी" - किसी हुन्दुस्तानी फिल्म का यह गाना पाकिस्तान द्वारा अर्जित ऑस्कर अवॉर्ड के लिए गाने की पंक्ति है. हम हिन्दुस्तानी खुश हैं कि पाकिस्तान में रुढ़िवादी परम्परा का पैमाना भर चुका है. काश कि यह सद् बुद्धि इसी तरह कायम रहे और पाकिस्तान भी आधुनिकता के पटल पर एक अग्रणी देश बन कर उभरे. खान साहब आपको इस ब्लॉग के लिए कोटि कोटि धन्यवाद

  • 17. 22:57 IST, 05 मार्च 2012 निशांत बिसेन:

    बहुत अच्छा लिखा है.

  • 18. 12:06 IST, 07 मार्च 2012 Chander Tolani:

    आपके लिखने का अंदाज बहुत बढ़िया है. ऐसे ही लिखते रहिए.

  • 19. 13:39 IST, 07 मार्च 2012 MOHAMMAD KHURSHID ALAM, Uphara, Bihar:

    ऑस्कर के बहाने दी गई अन्य जानकारियां प्रेरक हैं. आपने अच्छा लिखा है.

  • 20. 02:19 IST, 21 मार्च 2012 UMESH YADAVA:

    बात तो सभी कहते हैं पर आपका अंदाजे बयां लाज़वाब है. शुक्रिया

  • 21. 16:55 IST, 27 मार्च 2012 ज़ुबैर अली ख़ान:

    वुसत साहब आप मुबारकबाद के क़ाबिल हैं. इसके साथ ही दुनिया को यह समझना चाहिए कि परेशानी और अभावों में रहने वाले ही दुनिया में नाम रोशन करते हैं और वह भी पाकिस्तान जैसे मुल्क में जिसके बारे में सिर्फ गलत ही सुना जाता है.

  • 22. 23:46 IST, 06 अप्रैल 2012 सूबे सिंह सुजान:

    साहब आपने सवाल उठाया है अच्छा है, लेकिन आजकल इधर एक ऐसी हवा चल चुकी है कि जिसे मीडिया कह दे उसको सिर पर उठा लो, बाक़ी हक़ वाला चाहे रोता भी रहे. ये ख़तरनाक हालात हैं जिनसे निपटना ज़रूरी है.

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