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इस जीत के मायने

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|सोमवार, 27 फरवरी 2012, 07:44 IST

भारत ने चिली की चार साल पुरानी यादों को धूमिल करते हुए फ्राँस को 8-1 से हरा कर लंदन ओलंपिक के लिए अपना टिकट सुरक्षित कर लिया है.

आठ बार के ओलंपिक चैंपियन के लिए यह उपलब्धि मामूली लग सकती है लेकिन यह जीत भारत में हॉकी के खेल के लिए एक संजीवनी ले कर आई है.

इस जीत के महत्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जैसे ही पच्चीस हज़ार दर्शकों से खचाखच भरे ध्यानचंद स्टेडियम में अंतिम सीटी बजी भारत के महानतम जीवित हॉकी खिलाड़ी 88 वर्षीय बलबीर सिंह की आँखों से आँसू बह निकले.

वीआईपी इनक्लोज़र में बैठे दूसरे हॉकी के बड़े खिलाड़ी रुंधे गले से इस तरह गले मिल रहे थे मानों भारत ने ओलंपिक पदक जीत लिया हो. सबसे खुश करने वाली बात थी कि भारत ने आक्रामक हॉकी खेल कर यह जीत दर्ज की है.

विपक्षी खिलाड़ियों का स्तर भले ही विश्व स्तर का न हो लेकिन अर्से बाद भारतीय फ़ॉरवर्ड्स ने लहरों में हमले कर 70 के दशक की उस फ़ॉरवर्ड लाइन की याद दिला दी जिसमें अशोक कुमार, गोविंदा, फ़िलिप्स और हरचरण सिंह खेला करते थे.

संदीप सिंह ने पेनल्टी कॉर्नर से 16 गोल कर यह बता दिया कि सुरजीत सिंह के बाद भारत को सही मायनों में पहला विश्व स्तर का पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ मिल गया है.

पूरे टूर्नामेंट के दौरान जिस तरह से उप कप्तान सरदारा सिंह मैदान में चारों तरफ़ दिखाई देते थे, 1975 की विश्व विजेता भारतीय टीम के कप्तान अजीतपाल सिंह की याद ताज़ा हो आई. पहली बार ऑस्ट्रेलियाई कोच माइकल नॉब्स ने भारतीय खिलाड़ियों को यह अहसास दिलाया कि वह भी अच्छा खेल सकते हैं.

पहले अक्सर देखा गया है कि बढ़त लेने के बाद भारतीय टीम सुस्त पड़ जाती थी. अनेकों बार विपक्षी टीमों ने आखिरी मिनटों में भारत के ख़िलाफ़ या तो मैच बराबर किया है या जीत दर्ज की है. लगता है कि नॉब्स ने खिलाड़ियों को घुट्टी पिला दी थी कि आधुनिक हॉकी में चार गोल के अंतर को ही सुरक्षित माना जा सकता है.

इस भारतीय टीम का दूसरा सबसे बड़ा गुण है इसकी फिटनेस. नॉब्स ने रोलिंग सब्स्टीट्यूशन का शानदार इस्तेमाल कर किसी खिलाड़ी को एक बार में चार मिनट से ज़्यादा खेलने ही नहीं दिया. नतीजा यह रहा कि जब वह मैदान पर उतरते थे तो बिल्कुल तरोताज़ा रहते थे.

भारतीय हॉकी की असली परीक्षा तो अब शुरू होगी. लंदन ओलंपिक में उनका मुकाबला इससे कहीं तगड़ी टीमों से होगा. लंदन ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई करना एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है लेकिन भारत में हॉकी की असली वापसी तभी होगी जब लंदन ओलंपिक में भारतीय टीम विक्ट्री पोडियम पर नज़र आएगी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 10:28 IST, 27 फरवरी 2012 Brij Kishor Singh:

    ये वाकई खुशी की बात है और मैं पहली बार भारतीय टीम को ओलंपिक खेलते हुए देखूंगा. अगर हमारी टीम मेडल जीतती है तो ये और खुशी की बात होगी.

  • 2. 12:24 IST, 27 फरवरी 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    ये किसी विशेष हर्षोल्लास की बात नहीं है. भारत की मानसिकता अभी बदली नहीं है. अच्छा अवश्य लगा कि चलो कुछ बेहतर किया गया. मैं ये इसलिए कह सकता हूं कि दर्शक और भारत की राजनीति क्रिकेटर्स को ताज पहनाती रहेगी और हॉकी या अन्य खेलों की अवहेलना होती रहेगी.

  • 3. 12:39 IST, 27 फरवरी 2012 नवल जोशी:

    रेहान जी, पहले तो आपका शुक्रिया कि हॉकी पर अपने जज्बाजों का इजहार लगभग उसी लय में किया जैसे कि कल भारतीय हॉकी टीम मैदान पर खेल रही थी. किसी भी खेल में सर्वश्रेष्ठ तो कोई एक ही टीम या व्यक्ति होगा इसमें पहला नम्बर न आने का क्षोभ भी नहीं होना चाहिए. आजकल खेल के साथ एक विशेष बात जोड़ दी जाती है और वो है जीतने की जिद. जीतने का जज्बा या जीतने का जुनून तो ठीक है लेकिन जीतने की जिद ठीक नहीं हैं. हॉकी में कल को यदि हमारी टीम ओलम्पिक का स्वर्ण पदक नहीं भी जीत पाई तो भी कोई बुरी बात नहीं है बशर्ते कि इसी समर्पण, जोश, कुशलता और आपसी सहयोग भाव से खेलते रहें. आखिर हम दर्शक मैदान में इन्हीं गुणों का साक्षात्कार करने ही तो जाते हैं. हारने से डर नहीं लगता है, डर लगता है गुटबाजी, आपसी कलह, अकर्मण्यता, पक्षपात, कुप्रबन्धन और नौकरशाही जैसे दुर्गुणों से. ओलम्पिक चैम्पियन या विश्वविजेता तो कोई एक ही होगा हम ऐसा कर सकें तो सोने पे सुहागा, लेकिन ऐसा न भी हो पाए तो कोई बात नहीं, हॉकी बची रहनी चाहिए जिसकी झलक कल देखने को मिली है.

  • 4. 18:33 IST, 27 फरवरी 2012 himmat singh bhati:

    रेहान साहब, आपने मौजूदा हॉकी खिलाड़ियों के साथ उन पुराने खिलाड़ियों की खेल की तुलना बहुत ही सुंदर की. क्रिकेट के दीवानों को क्रिकेट से आगे कुछ भी दिखाई नहीं देता, जबकि हॉकी भारत का खेल रहा है जिसे लोग भुलाते जा रहे हैं. ऐसे में ओलंपिक में क्वालिफाई करने को कम बड़ी कामयाबी नहीं माना जा सकता है.

  • 5. 19:13 IST, 27 फरवरी 2012 Nikhil Kumar:

    रेहान जी, ये जीत जो नसीब हुई है, कमजोर टीम पर हुई है. ओलंपिक में तो दिग्गजों के खिलाफ मुकाबला होगा. तब पता चलेगा कि अपनी टीम में कितना दमखम है. खैर, भारतीय होने के नाते पूरी टीम को बधाई और आगे की कुशल कामना.

  • 6. 17:35 IST, 28 फरवरी 2012 suresh kumar pandey:

    भारतीय टीम को केवल लंदन ओलंपिक में प्रवेश करने भर से नहीं होगा क्योंकि भारत जैसे और भी देश हैं जो लंदन ओलंपिक में प्रवेश किया है.भारत को दूसरे से बेहतर खेल कर इसमे जीत हासिल करनी होगी.

  • 7. 08:33 IST, 01 मार्च 2012 Ravi:

    रेहानजी हॉकी पर ब्लॉग लिखने के लिए धन्यवाद.
    एक समय था जब हॉकी टीम की काफी आलोचना होती थी लेकिन अब केवल क्रिकेट की भी आलोचना की जा रही है.

  • 8. 19:49 IST, 07 मार्च 2012 Bharvender Singh Rathore:

    रेहान जी. मैं आपकी खेल की रिपोर्ट्स को पिछले दस साल से सुन और पढ़ रहा हूं. आपका आकलन सही है कि ओलंपिक में इससे भी तगड़ी टीमों से हमारा मुकाबला होगा. पर क्या भारत में क्रिकेट की तरह हॉकी में भी प्रतिभाओं की खोज की जाएगी. जिस दिन हमारे यहां हॉकी में भी ग्रामीण प्रतिभाओं को तराशा जाना शुरू हो जाएगा उस दिन से शायद भारत में वापस हॉकी वही पुरान दिन शुरू हो जाएंगे.

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