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जाड़ों की नर्म धूप, और...

अपूर्व कृष्णअपूर्व कृष्ण|गुरुवार, 23 फरवरी 2012, 05:05 IST

जाड़े में ख़ूब ठंड लगती है, मगर उसका लोगों को इंतज़ार भी होता है.

जब ट्रंक-आलमारी से नेफ़्थेलीन की गोलियों से गंधाए रंग-बिरंगे स्वेटर-जैकेट-टोपी-मफ़लर निकलते हैं, जब शादी के ज़माने में सिलवाए सूट-कोट के दिन फिरते हैं.

जब सूरज के ठीक सिर के नीचे क्रिकेट खेलने का सुख लिया जाता है, रात को बैडमिंटन के कोर्ट सजते हैं, आलू-छिमी-टमाटर की तरकारी और गाजर के हलवे का भोग किया जाता है.

और जाड़ों की नर्म धूप और...आंगन में ना सही, छत या बरामदे पर लेटकर....इस गाने वाली अनुभूति तो अपनी जगह है ही.

लेकिन इस जाड़े का एक दूसरा चेहरा भी है जो सुहाना नहीं डरावना है. इसने इस साल यूरोप में कोई साढ़े छह सौ लोगों की बलि ले ली.

रूस, यूक्रेन, पोलैंड, चेक गणराज्य, बुल्गारिया, एस्टोनिया, लातविया, सर्बिया, क्रोएशिया, मॉन्टेनीग्रो, स्लोवेनिया - इन देशों में जाड़ा मौतें लेकर आया.

मगर मरनेवाले कौन थे? अधिकतर ग़रीब और बेघर-बेसहारा लोग. पता नहीं उनकी मौत का बड़ा ज़िम्मेदार कौन है - जाड़ा, या ग़रीबी?

पश्चिमी देश, यूरोप, अमरीका - ये अमीर हैं, और पुराने अमीर हैं. मगर ग़रीबी यहाँ भी बसती है, और अक्सर दिखती भी है, बशर्ते देखनेवाला देखना चाहे.

लंदन में रनिवास बकिंघम पैलेस और प्रधानमंत्री आवास 10 डाउनिंग के निकट, चमकते-दमकते पर्यटक स्थल ट्रैफ़ेल्गर स्क्वायर के पास, तमाम रंगीनी और रौनक के बीच कहीं दिखाई दे जाएँगे - ग़रीब-होमलेस-बेघर.

कहीं चुपचाप, ठिठुरते, कोई मैग्ज़ीन बेचते खड़े हुए, या कहीं सड़क किनारे, किसी दूकान के पास, किसी कोने में गत्तों के विछौने पर कंबल में लिपटे सोते हुए.

ऐसे बेघरों की सहायता करनेवाले एक चर्चे के पास, एक बोर्ड पर लिखा है, कई होमलेस लोग सारे-सारे दिन एक भी शब्द नहीं बोलते, कोई उनसे बात नहीं करता, बहुतों को डिप्रेशन या दूसरी मानसिक बीमारियाँ हो जाती हैं, बहुतेरे हार जाते हैं, आत्महत्या की कोशिश करते हैं.

वहीं एक बेघर का अनुभव लिखा है - "पहला दिन, जब मुझे सड़क पर सोना था, मैं बहुत झिझक रहा था, मैं सड़क पर बैठा, गत्ते बिछाए, फिर अपने बैग से पानी-कप-चादर-चप्पल जैसे सामान निकालना शुरू किया, डरते-डरते, कि कहीं लोग मेरा वो सामान देख ना लें...थोड़ी देर बाद मैंने देखा, इसकी चिन्ता की कोई ज़रूरत ही नहीं - लोग हम जैसों की ओर देखते ही नहीं."

पिछले दिनों एक पत्रिका में एक युवा टीटीई ने एक घटना के बारे में बताया - एक बार मुझे ट्रेन पर एक बूढ़ी महिला मिली, बेटिकट. मैंने उसे 360 रूपए का फ़ाइन लगाया. उसने बिना कुछ बोले दे दिया. बाद में देखा, वो एक कोने में बैठी रो रही है. मैं उसके पास गया. वो पहले डर गई. फिर बाद में सहज हुई और बताया कि वो दाई का काम करती है, नर्सिंग की पढ़ाई कर रही अपनी बेटी से मिलने जा रही है जिसने पैसे माँगे हैं. उसके पास केवल 500 रूपए थे, जिसमें से 360 उसने मुझे दे दिए थे. मैं परेशान हो गया. मैंने उसे पैसे लौटाने चाहे, मगर उसने मना कर दिया. बोली - "ठीक है बेटा. तुम्हारे मन में दया है. मुझे तो तुम जैसे लोगों से दो अच्छे बोल की भी उम्मीद नहीं रहती."

बेघर-लाचार हर तरफ़ हैं, हर मौसम में - जाड़ा हो, या गर्मी. आँखें धोखा दे देती हैं, उन्हें देखने के लिए दिल चाहिए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 07:19 IST, 23 फरवरी 2012 anjani:

    अपूर्व जी, लेख अच्छा लगा. आपके ब्लॉग से एक बात निकल कर आई कि गरीबी सभी जगह है और सब गरीब की एक जैसी मजबूरी है. लेकिन मैं इसके लिए एक हद तक मीडिया को दोष देना चाहूंगा क्योंकि आप भारत की गरीबी को तो दिखाते हैं लेकिन पश्चिम की गरीबी को नहीं.

  • 2. 08:57 IST, 23 फरवरी 2012 NEEL SATLOV:

    आपका ब्लॉग एक अच्छे विषय को लेकर लिखा गया है. गलदश्रु बहाए बिना आपने बेघर लोगों के प्रति जो सहानुभूति पैदा कराई है वो आपका उपहार समझ संजो रहा हूँ . बधाई, साधुवाद और धन्यवाद.

  • 3. 09:43 IST, 23 फरवरी 2012 Lalit KUMAR:

    अपूर्व कृष्ण जी, आपके ब्लॉग लिखने का कारण क्या है? इस साल जाड़ा अधिक पड़ना या अमीर देशों के कुछ ग़रीबों का मरना? अभिव्यक्ति के अपने तरीके की वजह से, हो सकता है कि मैं आपको एक हृदयहीन व्यक्ति लगूँ, लेकिन तल्ख़ सच्चाई ये है क़ि जितने इस साल यूरोप में जाड़े से मरे हैं उससे कहीं ज़्यादा यहाँ हर साल, जाड़ा, गर्मी, बाढ़, सूखा, भूख आदि से मर जाते हैं और उनके ही साथ धीरे-धीरे मर जाती है आपकी हमारी संवेदना. दुख इसी बात का है कि भारतीयों या यूँ कहें कि दक्षिण एशियाइयों का मरना एक नगण्य घटना होती है. लेकिन भाई साहब, किसी की भी जान, जान होती है, चाहे वो एक भारतीय की हो, फ्रेंच की हो, ब्रितानी की हो या पूरे विश्व पर दादागिरी दिखाने वाले अमरीकियों की हो.

    सादर

  • 4. 10:09 IST, 23 फरवरी 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    अपूर्व जी ब्लॉग पढ़ कर लगता है कि आपकी आत्मा अभी जीवित है. गरीब घरों से निकले पत्रकार भी एक स्तर के बाद गरीबों को भूल जाते हैं. विश्वास कीजिए जब आप मुंबई के अंग्रेजी अखबारों के पन्ने पलटेंगे तो पता चलेगा कि पत्रकार लोगों को सिर्फ नग्न और अर्धनग्न स्टार और वीआईपी लोग ही दिखाई देते हैं. ये अभिजात्य मीडियाकर्मी केवल मालदार लोगों के पीछे भागते हैं, इनको और कुछ नजर नहीं आता.

  • 5. 10:20 IST, 23 फरवरी 2012 Pato :

    अपूर्व कृष्ण जी आपने वाकई बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा है. सच है मजबूर और बेसहारा लोग हर जगह हैं उन्हें देखनेवाली आंखें चाहिए. पर लोगों की आंखें तो पश्चिमी देशों के चमक-दमक तक ही सीमित रहती हैं, उससे आगे बढ़ने की जरूरत ही न हो जैसे. ऐसी पारदर्शिता के लिए साधुवाद.

  • 6. 13:49 IST, 23 फरवरी 2012 ABHISHEK TRIPATHI:

    बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा है आपने.

  • 7. 16:52 IST, 23 फरवरी 2012 नवल जोशी:

    अपूर्व जी मौसम के बहाने समाज की विद्रूपता को आपने जिस सफाई के बहस का मुद्दा बनाया है उसके लिए आपका आभार। लेकिन मुझे लगता है कि जाड़े के दो चेहरे हैं अथवा नहीं यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन हमारे बहुत से चेहरे हैं इसे इनकार नहीं किया जा सकता है, इस तरह की समाजिक विद्रूपताओं का जिक्र करते समय हमारे सामने जो लोग होते हैं हम अक्सर अपने को इनसे अलग करके चर्चा करते हैं जैसा कि आपने कहा भी है कि एक बेघर ने लिखा है कि लोग हमारी ओर देखते ही नहीं यह बात अंतरआत्मा से निकली जान पड़ती है जिस तरह हम इन समस्याओं पर चर्चा करते भी हैं वह तरीका ही गलत है ऐसा लगता है कि हम दूसरों पर कोई टिप्पणी कर रहे हैं जिस समाज में हम रहते हैं वह इतना निकृष्ट होता जा रहा है इस नजरिए से बात नहीं की जाती है, ऐसा महसूस होता है कि किसी वर्ग की ये समस्यायें हैं. हम दृष्टा जैसी स्थिति में रहकर बात करते हैं.लेकिन हमारी यही स्थिति तब नहीं होती है जबकि हम किसी का बडा मकान देखते है.या किसी की चमकदार कार पर हमारी नजर पड़ती है तब हम केवल दृष्टाभाव से टिप्पणी नहीं करते बल्कि पूरे मन-प्राण से वैसा ही मकान, कार या दूसरी चीजें हासिल करने के लिए मैदान में उतर भी पड़ते हैं। कम-से-कम हूक तो हर किसी के दिल में उठती ही है कि काश ये मकान या कार जैसी चीज मेरे पास भी होती लेकिन जब हमारा समाज इतनी कुरूपता के साथ घिसट रहा है तब हम सिर्फ जिक्र ही कर पाते हैं वह भी कभी-कभार! इस अहसास को हम जी नहीं पाते उस तरह जैसे कि कार या मकान को देखकर हमारा अस्तित्व ही डोलने लगता है. यही हमारे चेहरे का रंग है. मुझे लगता है कि मौसमों के कितने ही चेहरे हों ये दुख नहीं दे सकते है दुख हम ही अपनों को देते हैं या हमारे अपने हमें दुख देते हैं. मौसमों को जिम्मेदार ठहराना गलत ही होगा. हमारे सोचने और समझने के नजरिए में भी दोष है जब भी कहीं मौसम की मार से कोई इस तरह मरता या कलपता है,गरीबी के कारण इनसान भूखों मरता है,सामान्य सी बीमारी का इलाज नहीं करवा पाता है या दूसरे प्रकार की समस्याओं से घिर जाता है तो हम इस स्थिति को उस आदमी की समस्या या समाज अथवा राजनीतिक व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराकर अपने मन को हल्का कर लेते हैं, लेकिन यह तरीका शायद ठीक नहीं है, एक भी आदमी यदि भूखा है या मानव जनित किसी भी समस्या से त्रस्त है तो हम इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं. ऐसी समस्याएँ इस कारण नहीं हैं कि इनके कोई अज्ञात कारण है बल्कि इसका कारण यह है कि हमने अपने दायित्वों का निर्वाह नहीं किया है. किसी भी शासन व्यवस्था में इतना दम नहीं है कि लोग तड़पते हुए दम तोड़ दें और उसे कोई फ़र्क भी न पड़े. शासन व्यवस्थायें जानती हैं कि लोग मरते रहें लेकिन समाज में यह सवाल पूछने की हिम्मत नहीं है कि सामाजिक ,राजनीतिक,आर्थिक सांस्कृतिक व दूसरे प्रकार की व्यवस्थाओं के होते हुए यह सब क्यों दिखाई पड रहा है?

  • 8. 20:22 IST, 23 फरवरी 2012 योगेश दुबे:

    अपूर्व जी, अच्छे ब्लॉग के लिए धन्यवाद. आपने निर्धन लोगों की अच्छी तस्वीर उकेरी है. ये मानवता के लिए अभिशाप है. हम किसी को अमीर तो नहीं बना सकते, मगर हम प्रयास ज़रूर कर सकते है.

  • 9. 21:39 IST, 23 फरवरी 2012 प्रांशु:

    अपूर्व जी, आपका लेख पढ़कर अच्छा लगा, और दुःख भी हुआ. मैं इंग्लैंड में रहता हूँ और एक बड़ी कंपनी में काम करता हूँ. एक दिन मेरा एक सहकर्मी मुझसे मुंबई के बिहारी लोगों और ग़रीबों की बात करने लगा. मैंने उससे पूछा कि क्या तुम्हें कभी अपने शहर में ग़रीब और भिखारी नहीं देखे, वो बोला, देखे हैं पर उतने नहीं जितने वहाँ हैं. मैंने कहा कि वहाँ की जनसंख्या तुम्हारी जनसंख्या से 20 गुना ज़्यादा है तो ज़्यादा तो होंगे ही और वहाँ पहले ऐसा नहीं था, जब बाहर के लोग आकर हमारा सब लूट कर ले गए तब से ऐसा हुआ. मैंने उसे बताया कि आज भी भारत सोने का सबसे बड़ा ख़रीदार है. ग़रीबी हर जगह है पर उसको हटाता कोई नहीं. सब नेता वादे करते हैं पर करता कुछ नहीं. अगर हमारे भ्रष्ट नेता अपना सारा काला धन वापस लाकर देश के ही बैंकों जमा कर दें और उससे मिलनेवाले ब्याज़ को दान कर दें तो उससे काफ़ी फ़र्क पड़ जाएगा. मैं अपनी हैसियत के हिसाब से हर महीने कुछ ना कुछ दान करता हूँ, अगर सब ऐसा करें तो काफ़ी लोगों का भला हो जाएगा.

  • 10. 19:05 IST, 24 फरवरी 2012 अरविन्द यादव:

    इस ब्लॉग से आपने क्या कहना चाहा है समझ में नहीं आया. यूरोप में बहुत से बेघर लोग एकदम स्वस्थ और जवान हैं, अगर मेहनत करें तो आराम से एक औसत जीवन जी सकते हैं. पर नहीं, काम नहीं करना चाहते. पूर्वी और पश्चिमी यूरोप मे संसाधन एक जैसे हैं फिर क्या कारण है कि पश्चिमी यूरोप अमीर है. उन्होंने मेहनत से और अपने दिमाग के इस्तेमाल से अपना समाज बनाया है. बेघर लोग दया या सहानुभूति के नहीं मेहनत करने के हक़दार हैं. वैसे भी इमोशनल टाइप के लेख भारत में लोगों का ध्यान खींचने का सबसे आसान, सस्ता औऱ पुराना तरीक़ा है, पर ये किसी को महान लेखक नहीं बनाता. इसलिए कुछ अच्छा लिखिए. धन्यवाद.

  • 11. 09:21 IST, 25 फरवरी 2012 KAILASH GAIRI:

    अपूर्व जी आपकी लिखने की शैली बहुत अच्छी है. शब्दों को बहुत गहराई से बांधा है आपने. लेकिन जो बात आप पर्दे के पीछे से कहना चाहते हैं वो जरा पच नहीं रही. कृपया कटाक्ष करने से पहले आप खुद ये देख लें कि आपने कभी सर्दियों में बीबीसी के एसी कमरे से बाहर आकर ओस से गीली चादर से लिपटे फुटपाथ पर सोते किसी बेघर को एक कंबल तक दी है. अगर आपने ऐसा नहीं किया है तो आपको इस प्रकार का लेख नहीं लिखना चाहिए.

  • 12. 11:36 IST, 25 फरवरी 2012 नदीम अख्तर:

    ब्लॉग बहुत अच्छा लगा। बेहद मानवीय तरीके से संवेदनाओं को समेटती बातें।
    कुछ टिप्पणीकारों की बातें पढ़कर लगा कि भारत में फ्रस्ट्रेशन के शिकार लोग दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। ऐसे फ्रस्टुओं के लिए एक ही वाक्य है- गेट वेल सून।

  • 13. 18:34 IST, 26 फरवरी 2012 suresh kumar pandey :

    आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा.

  • 14. 23:24 IST, 26 फरवरी 2012 subodh pandey:

    बहुत सुंदर अपूर्व जी, ऐसा लेख लिखने के लिए बधाई.

  • 15. 14:11 IST, 29 फरवरी 2012 Gopal Agrawalanubha:

    हम लोगों को गरीबों के लिए काम करना चाहिए.अमीर लोगों इसमें और भूमिका निभानी चाहिए.सरकारों को गरीबों का ध्यान रखना चाहिए.

  • 16. 09:39 IST, 01 मार्च 2012 surjeet singh:

    बहुत बढ़िया ब्लॉग है.

  • 17. 23:06 IST, 04 मार्च 2012 डा ० उत्सक कुमार चतुर्वेदी, क्लीवलैंड:

    वैदिक काल के "सर्वे भवन्ति सुखिनः" से आजतक दुनिया से ग़रीबी मिटाने की कोशिश होती रही है और होती रहेगी. यदि असमानता को ही गरीबी कहें तो यह बढ़ती ही जा रही है.वास्तव में गरीबी आर्थिक असमानता ही है जिसे मिटाने के लिए दुनिया से अमीरी ख़त्म करना होगा. गरीबी अपने आप मिट जाएगी.गाँधी के वाक्य: "इस दुनिया में सबकी ज़रुरत भर का तो है लेकिन एक भी आदमी की लालच भर का नहीं है" अंततः सत्य हैं और रहेगा.

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