गधों की ज़रूरत है
उत्तर प्रदेश का चुनाव संपन्न हुआ. खूब सारे पत्रकार गए थे इस हिट पिच्चर को देखने. मैं भी गया था. सबको अच्छी लगी. हमको भी.
उत्तर प्रदेश की पिच्चर में सब अच्छा था. सबने अपना अपना काम किया. मायावती ने, राहुल ने, उनकी बहन प्रियंका ने, मुलायम सिंह ने और उनके बेटे अखिलेश यादव ने.
रामलाल, शामलाल, भूरेलाल, हीरालाल, अलीम, सलीम, कलीम जैसे मतदाताओं ने भी अपना काम किया. बस नहीं किया तो पत्रकारों ने. मैंने चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के सही गलत होने की बात नहीं कर रहा. मैं चुनाव बाद के काम की बात कर रहा हूँ.
जब से अखिलेश यादव जीते हैं तब से चारों तरफ उनका ऐसा गुणगान हो रहा है कि बाप रे बाप. वो इतने कमाल के हैं वो उतने कमाल के हैं.
वो इतने किलोमीटर चले वो उतने किलोमीटर दौड़े उन्होंने इतने किलोमीटर साईकल चलाई. अरे भैया यह भी तो बताओ कि वो कितने हज़ार का जूता पहन कर दौड़े, उनकी फायरफॉक्स कंपनी की बनी बहुत कीमती विदेशी सायकल कितने की है. वो कितने लाख रूपये के फ़ोन रखते हैं.
अखिलेश ना जीतते और राहुल चमकते तो उनका चरण चांपन देह दाबन शुरू हो जाता. मायावती जीततीं तो माया चारित मानस का अखंड पाठ होने लगता.
अरे भाई अखिलेश यादव पर , उनकी पत्नी डिम्पल पर और उनके सौतेले भाई प्रतीक पर सीबीआई के आय से अधिक संपत्ति के मुकदमों कि क्या कैसे क्यों गत हुई. कोई तो याद करो. याद करो कि उन पर आरोप लगाने वाले की क्या दशा हुई थी.
मीडिया और नेता के बीच तो सांप नेवले का रिश्ता होना चाहिए, खंबे और कुत्ते का रिश्ता होना चाहिए दूध और नीबू का रिश्ता होना चाहिए.
पर यहाँ तो गाय बछड़े का रिश्ता हो गया है खूब प्यार से चाट रहे हैं एक दूसरे को देख कर आखें भर आईं मेरी तो.
चारो तरफ देखता हूँ तो मीडिया में अरबी घोड़ों भरे दिखते हैं. सबके आँखों के अगल बगल परदे लगे हैं सब केवल सीधे देखते हैं और दुलाकी चाल चलते हैं. राणा कि पुतली मुड़ी नहीं कि चेतक झट से फिर जाता था.
कहाँ गए वो गधे जो चारों तरफ देखें, कहीं भी चल दें, वक़्त बे-वक़्त दुलत्ती झाड़ें और डंडा पड़ने पर जोर जोर से रेंकें भी.
कोई तो लाओ इन गधों को.

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अरे भाई मीडिया अपना ही काम कर रही है. मायावती की हार के बाद मीडिया ने ही उनके पाँच साल में अरबपति बनने की स्टोरी दी है. अखिलेश की भी यही हालत होगी, मगर 2017 में. और एक बात, मुलायम या अखिलेश के सामने खड़े होकर आप भी – चरण चापन, देह दाबन – ही करने लगेंगे.
वाह अविनाश भाई क्या ख़ूब लिखा है, काश मीडिया स्वतंत्र रिपोर्टिंग करता.
बार-बार पढ़कर भी ये समझ में नहीं आया कि आप गधा किसे बता रहे हैं. मुझे तो नेताओं के साथ पत्रकार भी गधों से कम नज़र नहीं आते जो रात-दिन नेताओं के झूठे कसीदे पढ़ते रहते हैं.
वाह, एक बहुत अच्छा ब्लॉग.इस प्रकार की रिपोर्टिंग की अपेक्षा केवल बीबीसी से ही कर सकते हैं.
अरसे बाद इतना बढ़िया आलेख पढ़ा है। बधाई के पात्र हैं आप। बीबीसी के अन्य लेखकों को इस मिज़ाज और तेवर को समझना चाहिए। ये है जनता की राय से उपजा निष्पक्ष आलेख। धन्यवाद अविनाश।
अविनाश जी, बहुत बार आपका नजरिया समझ में नहीं आता है और जब आता है तो वाकई छा जाता है,कुछ कहने को बाकी रह ही नहीं जाता है।जिस दिन सपा का बहुमत निश्चित हो गया था उसी दिन बीबीसी पर ही अखिलेश यादव के व्यक्तित्व के बारे में जो रिपार्ट प्रसारित की गयी थी, मेरी नजर में वह सिर्फ महिमागान ही था लेकिन सब कुछ के लिए हमारा सहमत होना कोई पैमाना हो भी नहीं सकता। इसलिए इस रिपोर्ट को जबरन गटकना पडा, आज थोडा राहत मिली जब बीबीसी पर ही दूसरे नजरिए से यह ब्लॉग लगा है। हम लोग विजेताओं के सामने सिर झुकाने के आदि हैं, सिर क्या झुकाते हैं बिल्कुल दण्डवत् ही हो जाते हैं और कोई सही व्यक्ति संघर्ष में पराजित हो जाए तो उससे मुँह फेरने में हम समय भी नहीं लगाते हैं।हमें गलत-सही से अधिक सरोकार नहीं है विजेता और पराजित के आधार पर हम अपना नजरिया तय करते हैं। आज यदि कोई इस या उस पार्टी का समर्थन करता है तो उसे पूरी जिम्मेदारी भी लेनी ही चाहिए।विजेताओं का ऑख मूँद कर महिमागान करने से बेहतर है कि हम सच कहें। हकीकत तो आज यही है कि किसी भी राजनीतिक दल को सही कहने से पहले हजार बार सोचना पडेगा और अंत में इस बारे में चुप रहना ही बेहतर होगा।
मुझे आप पर फ़ख्र है.
बाकी सब ठीक है बस वर्तनी और व्याकरण का ध्यान रखें.
बहुत अच्छा लिखा है अविनाश.
अविनाश जी बहुत बढ़िया लिखा है. इस तरह के लेख की उम्मीद आप से ही की जा सकती है. अखिलेश की वाहवाही में मीडिया बिछी जा रही है. आखिर हो भी क्यूं न राजनीति में नए-नए नेताजी जो पधारे हैं. पांच साल गुजरने दीजिए उनकी भी वही गत होगी जो हर नेता की होती है. तब यही मीडिया उनकी भी बाल की खाल निकालेगी.
वाह ! अविनाश जी सबकी हिम्मत नहीं होगी 'आपके' गधे तलाशने की, थोड़े दिनों बाद ये गधे फिर आ जायेंगे क्योंकि जिन गधों के आसपास वो घोड़े बनकर टहल रहे हैं, उनके असली गुणों पर ये आयेंगे तब ये रेंकना भी शुरू करेंगे. अविनाश जी आपके गधे हो सकता है नए हों इसीलिए 'घोड़ों का भ्रम' पाले हैं जैसे ही पुराने गधे इन्हें नज़र आयेंगे तो ये भी दुलत्ती पर भी उतर आयेंगे.
मीडिया कितनी भी तारीफ करे, जनता को सबकी असलियत पता है. ये महंगे जूते, महंगी साइकिल, मोबाइल सब पता है. पर आज राजनीति में कोई ऐसा नहीं अभी जो इन सबसे परे हो. जनता पांच साल इनकी नाच-नचौवल देखती है फिर अगले चुनाव में चाल-ढाल देखकर जो सही लगता है वो करते हैं. रही मीडिया तो ये तो टीआरपी का खेल है. इनकी भी असलियत हमें पता हो गई है.
वैसे आजकल मीडिया की सुनता कौन है. पता नहीं क्यों लोगों में ये धारणा बनती जा रही है कि मीडिया जो भी कह रही है उसमें आधे से अधिक गलत कह रही है.
बहुत अच्छा लेख है. ऐसी ही पत्रकारिता की वजह से मैं बीबीसी को पसंद करता हूं.
वाह अविनाश जी, बहुत दिनों बाद कुछ अच्छा और सही पढ़ने को मिला. धन्यवाद.
अरे मीडिया का नेताओं के साथ कुत्ते और खंभे का रिश्ता समझ में नहीं आया. वैसे अच्छा लिखा है.
ये सच है कि उगते सूरज को सभी नमस्कार करते हैं.मीडिया भी हमारी तरह नेताजी को सलाम करता है.
वाहा ! अविनाश जी सबकी हिम्मत नहीं होगी 'आपके' गधे तलाशने की, थोड़े दिनों बाद ये गधे फिर आ जायेंगे क्योंकि जिन गधों के आस-पास वो घोड़े बनकर टहल रहे हैं,उनके असली गुणों पर ये आयेंगे तब ये रेंकना भी शुरू करेंगे. अविनाश जी आपके गधे हो सकता है नए हों इसी लिए 'घोड़ों का भ्रम'पाले है जैसे ही पुराने गधे इन्हें नज़र आयेंगे तो ये भी दुलत्ती पर भी उतर आयेंगे. अब देखना है वह समय कब आता है.
'आय से अधिक' का मामला अभी इधर रुकेगा और पहाड़ों पर सहारा भी लेना है इसलिए उधर भी ठंडा रहेगा 'जाँच एजेंसियां' भी आराम करेंगी और ओ भी 'समर्थन' करके सुकून महसूस करेंगी, जिन गधों की आज पूंछ नहीं हो रही है और वो दुलत्ती भी मारने की हालत में नहीं हैं, क्योंकि "गुंडाराज" जप में उनके छाले पड़ गए हैं.
दूध और नींबू वाला रिश्ता और अरबी घोड़े उनपर 'टप्पियाँ' ये सब मुहावरे उपमाओं से आपने अपने 'ब्लॉग' का पेट भरने में आपकी कामयाबी उन नेताओं की कामयाबी से कत्तई कम नहीं है,आपकी उबकाई आपके ब्लॉग में जबरदस्त तरीके से बह रही है. पता नहीं आपने एक एक 'गधे/घोड़े'के बारे में ठीक से जानते हैं कि नहीं 'मैं कईयों को जानता हूँ' उनके सोहादेपन को 'मुह मारने की आदत को' भैया ये मंत्री जी हैं और माननीय भी पर ये कितने अमाननीय हैं और संतरी से बदतर भी पर ये सत्ता है और सत्ता की चकाचौंध भी.
अविनाश भाई आपने बहुत अच्छा लिखा है.
मैंने सुना है कि वाराणसी के घोड़ों को सूखी घास खिलाने के लिए राज़ी करने के लिए टांगेवाले उनकी आँख पर हरी पन्नी बाँध देते हैं ताकि उन्हें सूखी घास भी ताज़ी और हरी दिखे. अपने घोड़ों ने फ़ास्टट्रैक का चश्मा लगा लिया है.
अखिलेश यादव नीतिश कुमार वाला मीडिया मैनेजमेंट लागू करेंगे जिसकी चर्चा जज काटजू साहब ने प्रेस क्लब की मीटिंग मे की थी। कानून व्यवस्था यूपी व बिहार में सुधारना इतना आसान नहीं है जितना मीडिया मैनेजमेंट। इसलिए तैय्यार रहिये अबकी बार समाजवादी पार्टी की कोई करतूत कोई नहीं जान पाएगा और सिर्फ़ अच्छी खबरें मुख्यमंत्री के बारे में मीडिया लिखेगा। शुरुआत हो चुकी है आगे देखिए होता है क्या इब्तदाए इश्क है....
लिखा तो अच्छा है पर बीबीसी भी तो मीडिया है और बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि बीबीसी भी जीते हुए का गुणगान करने में पीछे नहीं है. और कोई नहीं तो कम-से-कम बीबीसी ही उठा दे अखिलेश पर आय से अधिक संपत्ति का मुक़दमा. बीबीसी ही बता दे सोनिया की दौलत की चर्चा सही है या ग़लत. बीबीसी ही बता दे माया की माया की सीमा क्या है. पर नहीं बीबीसी तो कोई ख़तरा मोल लेना ही नहीं चाहता और बस दूसरों पर उंगली उठाने वाले लेख लिखता रहेगा. बीबीसी 2002 के दंगों के दस साल की रिपोर्टिंग में भी बहुत निष्पक्ष नहीं था. अगर किसी ने इसके विरोध में टिप्पणी लिखा तो उसे छापा नहीं गया और अब राजनीतिक रिपोर्टिंग में भी – कहीं कोई मुझे कुछ ना कह दे – वाली नीति पर चल रहा है. अब मेरा कमेंट भी सेंसर कर दिया जाएगा या छापा ही नहीं जाएगा, यही है बीबीसी?
बहुत जबरदस्त लेख..
आपने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बखूबी इस्तेमाल किया है.
हाँ आपने सही लिखा है, लेकिन ऐसा तो होता है, वो कहते हैं ना कि पब्लिक की याददाश्त बहुत कमज़ोर होती है, आजकल अखिलेश जाप चल रहा है, सभी चाटुकारिता में लगे हुए हैं, लेकिन इसमें दोष मीडिया का भी उतना ही है. मीडिया भी तो आजकल भूखा शेर बना बैठा है, पेड न्यूज़ का जमाना है अविनाश जी. जैसी माया वैसी न्यूज़. शब्द पत्रकारों के पर भाव नेताजी का.
बहुत बढ़िया अविनाश जी.
अविनाश जी, इन मीडिया वालों का काम तो टीआरपी बटोरना है.
वाह बीबीसी. आप नहीं होतीं तो ये दुनिया आज 90 प्रतिशत पागल होती. आप ऐसे ही लगे रहो.
आप जब भी लिखते हैं तो मेरी भावनाओं को स्वर मिल जाता है. बहुत अच्छा लेख अविनाश दत्त.
बहुत अच्छा अविनाश जी, मुझे उम्मीद है कि बीबीसी और आपके सहकर्मियों में राजनीति और राजनेताओं का असल चेहरा सामने रखने का साहस होगा. मेरी शुभकामनाएँ.
नकारात्मक टिप्पणियाँ हमेशा ही कौतूहल पैदा करती हैं. अगर सब किसी की तारीफ़ करें और कोई एक बुराई करे तो लोग उसकी सुनते हैं. ज़रूरत है अपना नज़रिया बदलने की. कोई कहता है कि आधी भारी है और कोई कहता है आधी ख़ाली है.
बहुत सच्चा ब्लॉग है, बिल्कुल सही लिखा है. मीडिया अब नेताओं और कॉर्पोरेट जगत की तरह काम करता है. उसको भी अखिलेश से कुछ उम्मीदें हैं, अपना चैनल चलाना है ना.
प्रिय अविनाश जी, इतनी भी उत्तेजना में ब्लॉग लिखना हज़म नहीं होता. आप मानिए मेरी बात, भगवान हैं, सबको उसकी औकात समय पर बता देते हैं.
आपने अच्छा लिखा है, आपके विचार अच्छे हैं लेकिन आप भी डरे हुए मालूम पड़ते हैं. प्रत्यक्ष रूप से अखिलेश की आलोचना से बचना चाहते हैं, पता नही क्यूँ?
सच कहने का दम दिखाया है आपने, मगर आज ज़रूरत कहने की नहीं करने की है.
बुद्धीजीवी सबसे अधिक कायर होता है, आपातकाल को याद कीजिए. कितने बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग जेल गए थे. और पत्रकारों को भी बुद्धिजीवी कहा जाता है. अब पत्रकारिता आंदोलन नहीं कारोबार है और कारोबार में दलाली चलती ही है.
अविनाश जी, आप भी न..क्या या लिख बैठते हो। आपको पता है कि लखनऊ के गोमतीनगर/इंदिरानगर/अलीगंज आदि इलाकों में हजार वर्ग फुट के प्लॉट का रेट लगभग 30 लाख रुपए हैं। अगर थोड़े से चरण चुंबन या देह दाबन से पूजनीय अखिलेश जी पत्रकारों को कुछ प्लॉट आबंटित कर दें तो क्या हर्ज़ है तो बेचारे गरीब पत्रकारों का भला हो जाएगा। आदर्श पत्रकारिता के प्रतीक कहे जाने वाले कई महानुभाव/महानुभावनाएं 2जी एवं 3जी घोटाले में अपना कमाल दिखा चुके हैं।
सही लिखा है अविनाश जी – हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना – मीडिया की हमेशा यही भूमिका होनी चाहिए कि वह किसी भी घटना या व्यक्ति के सभी पहलुओं को उजागर करे, वरना मीडिया का अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा. वह चारण कवि के समान हो जाएगी. आपने अच्छा ब्लॉग लिखा है, आपसे यही उम्मीद है.
अविनाश जी, वैश्वीकरण, भौगोलीकरण और मुक्त बाज़ार के चलन ने दुनिया को बदल कर रख दिया है. भारत में राजनीति ने व्यावसायिक रूप ले लिया है, मीडिया का भी व्यावसायीकरण हो गया है. मीडिया मालिकों के तार सीधे सत्ता पक्ष में पहुँच रखनेवालों से जुड़े हुए हैं.
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को जो जीत मिली है वो अखिलेश की बजाय मायावती की सरकार के खिलाफ था. पर मीडिया ने अखिलेश को इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जैसे वे स्वयं ईश्वर के अवतार हों.
बहुत अच्छा लिखा है आपने. पसंद आया.
सच में कहां गए वो गधे. लगता है राजनेताओं के साथ मिलबांच कर खाते-खाते उनकी तरह संवेदनहीन हो गए हैं.
बहुत अच्छा लिखा है आपने. बहुत-बहुत धन्यवाद अविनाश जी. देश को सचमुच जरूरत है आप जैसे पत्रकारों की.
मुझे आपका लेख बहुत पसंद आया.
बहुत अच्छा लगा अविनाश जी.
बहुत अच्छा लेख है.
बहुत बढ़िया अविनाश लेकिन सबका अपना विचार होता है और आपको पता है कि इंडिया क्या है.
उगते सूरज को सभी सलाम करते हैं.
अविनाश जी बहुत बढ़िया लिखा है. इस तरह के लेख की उम्मीद आप से ही की जा सकती है.मुझे आपका लेख बहुत पसंद आया.
बहुत अच्छा.
बहुत बढ़िया अविनाश जी. दुनिया में गधे और घोड़े दोनों कम हो रहे हैं.