इस विषय के अंतर्गत रखें फरवरी 2011

जेपीसी: किस के लिए राहत, किस के लिए आफ़त?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|मंगलवार, 22 फरवरी 2011, 17:23

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यह हफ़्ता भारत के लोगों के लिए तीन बड़े फ़ैसले ले कर आया. हालाँकि इन तीनों मामलों का आपस में कोई संबंध नहीं है लेकिन पहले दो में एक बात समान है.

यानी कुछ को राहत और कुछ अन्य के लिए आफ़त.

मुंबई हमलों के दोषी पाए गए अजमल क़साब की मौत की सज़ा बरक़रार रही तो दो अन्य अभियुक्तों फ़हीम अंसारी और सबाउद्दीन शेख़ को अदालत ने दोषमुक्त क़रार दिया.

गोधरा मामले में अदालत ने 31 लोगों को दोषी माना और अन्य 63 को बरी किया.

ये फ़ैसले कुछ लोगों के लिए आँसू ले कर आए तो कुछ के लिए मुस्कान.

अब तीसरा बड़ा फ़ैसला-प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का 2जी स्पैक्ट्रम मामले की जाँच के लिए जेपीसी का गठन.

संयुक्त जाँच समिति के गठन के इस फ़ैसले का कुछ हलक़ों में स्वागत किया गया तो कुछ ने उदासीनता बरती.

वामदलों का कहना है, इसमें प्रधानमंत्री को धन्यवाद देने वाली कौन सी बात है. यह तो बहुत पहले हो जाना चाहिए था.

इस फ़ैसले का एक सकारात्मक पहलू यह है कि संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलेगी और बजट सत्र में व्यवधान नहीं पड़ेगा.

विपक्ष को संतोष है कि जेपीसी अपना काम करेगी और समय आने पर दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.

अब यह तो समय ही बताएगा कि फ़ैसला आने के बाद कितनी आँखों में आँसू होंगे और कितने होठों पर मुस्कान.

क्या मेज़बानों की किस्मत चमकेगी!

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|मंगलवार, 15 फरवरी 2011, 13:55

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अभी तक दुनिया का कोई भी ऐसा देश नहीं है जिसमे अपनी ज़मीन पर क्रिकेट का विश्व कप जीता हो.लेकिन शायद इस बार ऐसा हो जाए.हर जगह इस बात की चर्चा है कि चूँकि यह सचिन का आख़िरी विश्न कप है इसलिए भारतीय टीम के खिलाड़ियों को यह कप जीत कर उन्हें तोहफ़े में देना चाहिए.

मेरा मानना इसके ठीक विपरीत है. उल्टे सचिन को यह कप जीत कर भारतवासियों को 'पार्टिंग गिफ़्ट' के तौर पर दे देना चाहिए.

वीरेंदर सहवाग इस समय शायद दुनिया के सबसे ख़तरनाक बल्लेबाज़ हैं. उनकी दिली इच्छा है कि वह पूरे पचास ओवर तक खेलें. अगर ऐसा हो पाता है तो भारत के लिए सोने पर सुहागा होगा.

क्रिकेट पंडित यह कहते नहीं थकते कि इस बार का विश्व कप सबसे अच्छी फ़ील्डिंग करने वाली टीम को मिलेगा.

1975 का विश्व कप याद कीजिए.....विव रिचर्ड्स ने चैपल बंधुओं को रन आउट कर ऑस्ट्रेलिया की रीढ़ ही तोड़ दी थी.

विराट कोहली,युवराज सिंह और सुरेश रैना पर दारोमदार होगा कि वह कितनी चुस्ती से रन आउट करते हैं और 'हॉफ़ चांस' को कैच में बदलते हैं.

मुश्किल समय में भी अपना 'कूल' बनाए रखने के लिए मशहूर धोनी को आज दुनिया के सबसे चतुर कप्तानों में माना जाता है.लेकिन मैं धोनी को अच्छी कप्तानी के साथ साथ अच्छा खेलते हुए भी देखना चाहूँगा.

ऐसा न हो कि वह माइक ब्रियरली बन जाएं जिन्हें सिर्फ़ अच्छी कप्तानी के बल पर ही टीम में जगह मिलती थी.

जब धोनी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में आए थे तो उन्होंने पॉवर हिटिंग से अपनी पहचान बनाई थी.आज उनकी बैटिंग से वह चीज़ नदारत है.

आज के धोनी पुश और डेफ़्लेक्शन से अपने ज़्यादातर रन बनाते हैं.

अगर भारत को यह कप जीतना है तो धोनी को अपनी पुरानी लय में एक बार फिर आना होगा.

ज़हीर ख़ाँ और मुनाफ़ पटेल अच्छी गेंदबाज़ी कर रहे हैं.ज़रूरत है उन्हें चोट से बचने की.

भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर के बल्लेबाज़ों के लिए लेग स्पिन हमेशा से एक अनबूझ पहेली रही है.ऐसे में पीयूष चावला तुरुप का इक्का साबित हो सकते हैं.

ऑस्ट्रेलिया के साथ अभ्यास मैच में उन्होंने यह दिखाया भी है.

फ़ेवरेट का तमग़ा भी अगर भारत अपने ऊपर न लगाए तो बेहतर होगा.

अभी तक सिर्फ़ दो बार ही फ़ेवरेट टीमें जीती हैं....वेस्ट इंडीज़ और ऑस्ट्रेलिया!

फ़ेवरेट होना आपके तनाव को बढ़ा देता है जब कि विश्व कप जीतने के लिए ये ज़रूरी है कि अच्छा खेलने के साथ साथ आप खेल का मज़ा भी लें.

अपने-अपने तहरीर चौक

विनोद वर्माविनोद वर्मा|सोमवार, 07 फरवरी 2011, 15:15

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मिस्र का तहरीर चौक अपने नाम को सार्थक करने जा रहा है. तहरीर यानी आज़ादी.

जिस दिन होस्नी मुबारक़ अपनी गद्दी छोड़ेंगे, जनक्रांति के इतिहास में एक और अध्याय जुड़ जाएगा. जैसा कि ट्यूनिशिया में जुड़ चुका है और यमन में इसकी सुगबुगाहट दिख रही है.

काहिरा के इस तहरीर चौक ने सबक सिखाया है कि लोकतंत्र सिर्फ़ पाँच साल के पाँच साल वोट देने भर का नाम नहीं है. इसने एक आस जगाई है कि सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए राजनीतिक दलों की ओर तकते रहना ही एकमात्र रास्ता नहीं है.

मिस्र की जनता ने दुनिया के हर जागरुक नागरिक के मन में यह सवाल ज़रुर पैदा किया होगा कि हमारा तहरीर चौक कहाँ है.

अगर लोकतंत्र सचमुच लोकतंत्र है तो हर गाँव में, हर जनपद में, हर शहर में, हर ज़िला मुख्यालय में, हर राज्य की राजधानी में और फिर देश की राजधानी में एक तहरीर चौक होना चाहिए. अगर लोकतंत्र सच में जागृत है तो हर नागरिक को अपने तहरीर चौक तक आने का मौक़ा मिलना चाहिए और सरकारों में इन लोगों की बातें सुनने का माद्दा होना चाहिए.

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य में पंचायत के स्तर पर 'राइट टू रिकॉल' यानी किसी चुने हुए जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार भी जनता को मिला हुआ है. दोनों ही प्रदेशों में जनता समय-समय पर इसका प्रयोग भी कर रही है.

कितना अच्छा होगा यदि विधानसभाओं में और संसद में चुने गए प्रतिनिधियों के लिए भी इसी तरह के प्रावधान कर दिए जाएँ. यक़ीन मानिए कि न सांसद ये प्रावधान लागू होने देंगे और न राज्य विधानसभाओं के सदस्य.

लेकिन भारत जैसे देश में तो तहरीर चौक का होना भी संकट का हल नहीं दिखता.

आपातकाल के बाद देश में तहरीर चौक जैसा ही माहौल था. चुनाव के ज़रिए जनता ने एक तानाशाह सरकार को उखाड़ फेंका. लेकिन जो विकल्प मिला उसने क्या किया? वह तो पाँच साल का कार्यकाल तक पूरा नहीं कर सकी.

बोफ़ोर्स घाटाले से भ्रष्टाचार विरोधी जो मुहीम शुरु हुई उसने एक सरकार का दम तो उखाड़ दिया लेकिन सत्ता में आकर उन तमाम नारों का दम भी उखड़ गया.

पिछले दो दशकों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से हर राजनीतिक दल को सत्ता में रहने या सत्ता को प्रभावित करने का मौक़ा मिला है. अलग-अलग राज्यों में भी सरकारों में जनता उन्हें देख रही है. लेकिन कोई ऐसा दल नहीं है जो आस जगाता हो.

जो भाजपा दिल्ली में कांग्रेस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाती है उसी पार्टी का मुख्यमंत्री कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा दिखाई देता है. दलितों की बहुजन समाज पार्टी का चेहरा भी जनता के सामने है और वामपंथी दलों की कलई भी जनता के सामने खुल गई दिखती है.

अगर राज्यों की राजधानी के लोग अपना तहरीर चौक पा भी जाएँगे और दिल्ली में जनता आकर अपना तहरीर चौक ढूँढ़ भी लेगी तो वह उस चौराहे पर आकर क्या मांगेगी?

पाँच साला चुनावों में जब वोट डालने का मौक़ा आता है तो यह संकट बना रहता है कि साँपनाथ को चुनें या नागनाथ को?

ऐसे में अगर जनता भ्रष्ट, ग़रीब विरोधी और असंवेदनशील सरकारों को उखाड़ फेंकने का सोचे भी तो उसके पास सत्ता में बिठाने के लिए जो विकल्प हैं वे उतने ही घूसखोर, बाज़ार समर्थक और निष्ठुर दिखाई देते हैं.

यह कहना भी मुश्किल है कि सरकारें तहरीर चौक को बर्दाश्त कर सकेंगीं.

ये ठीक है कि 'जलियाँ वाला बाग़' फिर न होगा और भारत में 'थ्येनआनमन चौक' की पुनरावृत्ति भी संभव नहीं है लेकिन हमारी सरकारें आंदोलनों को जिस तरह कुचलती हैं वह बहुत लोकतांत्रिक नहीं है.

दिल्ली के बोट क्लब ने कई ऐतिहासिक रैलियाँ देखी हैं और वह अनगिनत प्रदर्शनों का गवाह है. एक समय वह हमारा अपना तहरीर चौक था. क्या आपने कभी सोचा कि वहाँ ऐसे लोकतांत्रिक प्रदर्शनों पर क्यों रोक लगाई गई और क्यों विरोध प्रदर्शनों को जंतरमंतर और संसद मार्ग की तंग सड़कों तक समेट दिया गया?

बहरहाल, हमें अपना तहरीर चौक मिले न मिले, जब किसी की भी सार्वजनिक रुप से फ़ज़ीहत होगी तो हम कह तो सकेंगे कि 'फलाँ का तहरीर चौक पर होस्नी मुबारक हो गया'. ठीक वैसे ही जैसे दलाली के लिए बोफ़ोर्स एक वैकल्पिक शब्द हो गया है और जब भी कोई घपला करता है तो अक्सर लोग कहते हैं कि 'उसने बोफ़ोर्स कर दिया'.

क्या सब्र का पैमाना छलक रहा है?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|मंगलवार, 01 फरवरी 2011, 17:26

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छत्तीसगढ़ में अपह्रत पाँच पुलिसकर्मियों के परिजनों ने ख़ुद जंगल में जा कर उन्हें तलाश करने का बीड़ा उठाया.

आरुषि के पिता राजेश तलवार पर भरे अदालत परिसर में एक युवक ने हमला कर उन्हें लहूलुहान कर दिया.

इसी युवक ने कुछ समय पूर्व रुचिका गिरहोत्रा मामले में अभियुक्त एसपी राठौर पर भी हमला किया था.

कुछ समय पहले नागपुर में महिलाओं ने बलात्कार के दोषी युवक पर ताबड़तोड़ हमला कर उसे जान से मार दिया.

दिल्ली में चोरी करते पकड़े गए एक व्यक्ति पर भीड़ ने हमला किया और उसे इतना पीटा कि वह मरते-मरते बचा.

इन सब मामलों में एक ही बात समान है और वह यह कि लोगों ने क़ानून अपने हाथ में लिया या फिर यह कि उनका क़ानून और सुरक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहा.

सवाल यह नहीं है कि इन लोगों की कार्रवाई जायज़ थी या नाजायज़.

सवाल यह भी नहीं है कि जिन लोगों पर हमला हुआ या जिन्हें निशाना बनाया गया वे दोषी थे या निर्दोष.

सवाल यह है कि लोगों में यह भावना क्यों पैदा हो रही है कि इंसाफ़ नहीं हो पाएगा और वे सज़ावार को ख़ुद सज़ा देने की पहल करें.

सवाल यह भी है कि लोगों का धैर्य क्यों चुकता जा रहा है.

क्या लंबी अदालती कार्रवाई की वजह से? क्या उनकी सहायता के लिए तैनात पुलिस की लापरवाही की वजह से? या फिर इस वजह से कि उनके सब्र का बाँध टूट चुका है और उन्हें आशा की कोई किरण नज़र ही नहीं आ रही है.

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