इस विषय के अंतर्गत रखें दिसम्बर 2010

देश और द्रोह का सवाल

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 28 दिसम्बर 2010, 16:25

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केंद्र में सत्तारूढ़ दल का नेतृत्व कर रही कांग्रेस और प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के अलावा लगभग सारा देश छत्तीसगढ़ की एक अदालत के इस फ़ैसले पर चकित है कि बिनायक सेन को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सज़ा भुगतनी होगी.

भाजपा के लिए इस फ़ैसले को सही ठहराने के लिए इतना पर्याप्त है कि यह सज़ा उनकी पार्टी की सरकार के जनसुरक्षा क़ानून के तहत सुनाई गई है.


कांग्रेस को शायद यह लगता होगा कि इस फ़ैसले की आलोचना से वह अपने गृहमंत्री पी चिदंबरम के ख़िलाफ़ खड़ी दिखेगी तो कथित तौर पर नक्सलियों या माओवादियों के ख़िलाफ़ आरपार की लड़ाई लड़ रहे हैं.

बिनायक सेन पर ख़ुद नक्सली या माओवादी होने का आरोप नहीं है. कथित तौर पर उनकी मदद करने का आरोप है.

इससे पहले दिल्ली की एक अदालत ने सुपरिचित लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरूंधति राय और कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज करवाया है.

यह कौन सा देश है जिसके ख़िलाफ़ द्रोह के लिए अदालतों को बिनायक सेन दोषी दिखाई दे रहे हैं और अरूंधति राय कटघरे में खड़ी की जा रही हैं.

क्या यह वही देश है जहाँ दूरसंचार मंत्री पर 1.76 लाख करोड़ के घोटाले का आरोप है और इस घोटाले पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सर्वोच्च न्यायालय को सवाल उठाना पड़ा है? जहाँ एक छोटे से राज्य के मुख्यमंत्री पर चंद महीनों के कार्यकाल के दौरान चार हज़ार करोड़ के घपले का आरोप है जहाँ एक और छोटे राज्य की सरकार के ख़िलाफ़ अदालत ने फ़ैसला दिया है कि उन्होंने एक लाख रुपए की एक कंपनी को कई सौ करोड़ रुपए की कंपनी बनने में सहायता दी?

या जहाँ एक राज्य की मुख्य सचिव रहीं अधिकारी को ज़मीनों के घोटाले के लिए सज़ा सुनाई जा रही और कई आईएएस अधिकारियों के यहाँ छापे में करोड़ों की संपत्ति का पता चल रहा है?

क्या यह वही देश है जहाँ एक कॉर्पोरेट दलाल की फ़ोन पर हुई बातचीत बताती है कि वह कॉर्पोरेट कंपनियों की पसंद के व्यक्ति को एक ख़ास मंत्रालय में बिठाने का इंतज़ाम कर सकती है और इसके लिए नामधारी पत्रकारों से अपनी पसंद की बातें कहलवा और लिखवा सकती है.

या यह उसे देश के ख़िलाफ़ द्रोह है जहाँ नकली दवा का कारोबार धड़ल्ले से हो रहा है, जहाँ सिंथेटिक दूध और खोवा बनाया जा रहा है? या उस देश के ख़िलाफ़ जहाँ केद्रीय गृहसचिव को यह बयान देना पड़ रहा है कि देश में पुलिस का एक सिपाही भी बिना घूस दिन भर्ती नहीं होता?

खेलों के आयोजन के लिए निकाले गए जनता के टैक्स के पैसों में सैकड़ों करोड़ों रुपयों का घोटाला करके और आयोजन से पहले की अफ़रातफ़री से कम से कम 54 देशों के बीच देश की फ़ज़ीहत करवाने वाले क्या देश का हित कर रहे थे?

ऐसे अनगिनत सवाल हैं लेकिन मूलभूत सवाल यह है कि देश क्या है?

लोकतंत्र में देश लोक यानी यहाँ रह रहे लोगों से मिलकर बनता है या केंद्र और दिल्ली सहित 28 राज्यों में शासन कर रही सरकारों को देश मान लिया जाए?

क्या इन सरकारों की ग़लत नीतियों की सार्वजनिक चर्चा और उनके ख़िलाफ़ लोगों को जागरूक बनाना भी देश के ख़िलाफ़ द्रोह माना जाना चाहिए?

नक्सली या माओवादियों की हिंसा का समर्थन किसी भी सूरत में नहीं किया जा सकता. उसका समर्थन पीयूसीएल भी नहीं करता, बिनायक सेन जिसके उपाध्यक्ष हैं. उस हिंसा का समर्थन अरूंधति राय भी नहीं करतीं जिन्हें देश की सरकारें नक्सली समर्थक घोषित कर चुकी हैं. हिंसा का समर्थन अब कश्मीर के अलगाववादी नेता भी नहीं करते, जिनके साथ खड़े होने के लिए अरूंधति कटघरे में हैं.

देश की राजनीतिक नाकारापन से देश का एक बड़ा हिस्सा अभी भी बिजली, पानी, शिक्षा और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है और ज़्यादातर उन्हीं इलाक़ों में नक्सली सक्रिय हैं. आज़ादी के छह दशकों के बाद भी अगर आबादी के एक बड़े हिस्से को मूलभूत सुविधाएँ नहीं मिल पाईं हैं तो इस दौरान वहाँ शासन कर रहे राजनीतिक दल क्या देश हित कर रहे थे?

अन्याय और शोषण के विरोध का समर्थन करने वाले लोगों की संख्या अच्छी ख़ासी है. वे प्रकारांतर से नक्सलियों के साथ खड़े हुए दिख सकते हैं. कश्मीर के लोगों की राय सुनने के हिमायती भी कम नहीं हैं और वे देश के विभाजन के समर्थन के रुप में देखे जा सकते हैं.

क्या ऐसे सब लोगों को अब देशद्रोही घोषित हो जाने के लिए तैयार होना चाहिए?

कड़वी व्यवस्था का दंश

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|शनिवार, 18 दिसम्बर 2010, 09:58

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सुना था, पढ़ा था, लेकिन देखा और सोचा नहीं था. आप सोचेंगे मैं क्या पहेलियाँ बुझा रहा हूँ. लेकिन बात ही कुछ ऐसी है.

बहुत पहले कैफ़ी आज़मी ने एक नज़्म लिखी थी...

हुई है अबकी ख़ुदा जाने कैसी चकबंदी
कि मेरी लाश किसी और की मज़ार में है.....

सोचता हूँ वर्षों पहले लिखी इस नज़्म में व्यवस्था पर प्रहार कितना जायज़ था. व्यवस्था को गरियाते-गरियाते वर्षों बीत गए. लोकतंत्र की दुहाई देते-देते दम निकल गया.

लेकिन ऐसी व्यवस्था कड़वे नीम की तरह न सिर्फ़ क़ायम है बल्कि क़दम-क़दम पर लोगों की खटिया खड़ी करने पर उतारू भी है.

पिछले दिनों राष्ट्रमंडल खेल भारत में आयोजित हुए. कई विवाद हुए और विवाद चल भी रहे हैं. चलते रहेंगे. लेकिन मेरे साथ जो हुआ, वो कई मायनों में अनोखा है.

हुआ यों कि राष्ट्रमंडल खेलों की करवेज के लिए हमें तो मीडिया पास मिलने थे, उससे पहले हमारा पुलिस वेरिफ़िकेशन होना था.

पुलिस वेरिफ़िकेशन का क्या हुआ, हमें पता नहीं चला. लेकिन हमें हमारा पास ज़रूर मिल गया. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हमने कवरेज में हिस्सा भी लिया.

बातें पुरानी हो गई, दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों की अच्छी-बुराई पर बहस भी थोड़ी थम सी गई. लेकिन मुझे सदमा सा उस समय लगा, जब राष्ट्रमंडल खेल समाप्त होने के दो महीने बाद पुलिस की टीम मेरे बिहार स्थित घर पर पहुँच गई.

माँ का फ़ोन आया- बेटा तुम्हारे बारे में पूछताछ करने पुलिस आई है. मैं थोड़ा घबराया. सोचा ऐसा क्या हो गया कि पुलिस घर पहुँच गई.

बाद में पता चला राष्ट्रमंडल खेलों के मीडिया पास जारी होने से पहले की प्रक्रिया अब पूरी हो रही है. पुलिस हमारे वेरिफ़िकेशन के लिए वहाँ पहुँची थी. वो भी उस समय जब राष्ट्रमंडल खेल ख़त्म हुए दो महीने हो चुके हैं.

पुलिसवालों ने मेरे माँ-बाबूजी से मेरे बारे में सवाल किया....तस्वीरें मिलाई और चलते बने.

मैं सही व्यक्ति तो हूँ, मेरे ख़िलाफ़ कोई गंभीर मामला तो नहीं, कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं- ये सब जानकारी पुलिस उस समय हासिल कर रही है, जब मैं मीडिया पास की बदौलत राष्ट्रमंडल खेल गाँव, स्टेडियम से लेकर सुरक्षा के लिहाज से कई संवेदनशील क्षेत्रों में जा चुका था.

अब मेरे लिखने के लिए कुछ बचा नहीं है. आप ही सोचिए और फिर सोचिए कि दिन-प्रतिदिन, हर मिनट-सेकेंड व्यवस्था को गाली देने वाले कहाँ ग़लत हैं.

बारात का ऐसा हश्र?

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 15 दिसम्बर 2010, 11:31

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पिछले दिनों एक शादी के सिलसिले में बिहार जाना हुआ. दूर के रिश्तेदार हैं. बड़ा आग्रह था तो मैंने भी सोचा मिथिलांचल की शादी देखी जाए. मिथिलांचल में बारातियों की ख़ातिरदारी के बारे में काफ़ी कुछ सुन रखा था.

मैंने भी पूरी तैयारी की. सूट सिलवाया, जूते खरीदे. पूरे रास्ते सोचता रहा कि कैसी आवभगत होगी वगैरह वगैरह. पहुँचे तो स्वागत हुआ सामान्य रुप से.

नाश्ता मिला. उसके बाद शादी की रस्में शुरु हुईं और बारात में मुझ जैसे लोग चुपचाप इंतज़ार करने लगे बेहतरीन भोजन का. समय बीतता गया और घड़ी की सुइयों के साथ ही पेट की आंतों ने क्रांति शुरु कर दी.

आखिरकार साढ़े ग्यारह बजे मैंने पूछ ही लिया कि भाई खाना कब मिलेगा? कुछ बुज़ुर्ग लोगों ने आंखों-आंखों में इशारा भी किया कि ऐसे नहीं पूछते. ख़ैर मैं दिल्ली वाला होने के नाते थोड़ा तो बेशर्म हो सकता था. कहा गया बस पाँच मिनट में सब तैयार हो जाएगा.

उनके पाँच मिनट क़रीब ढाई घंटे के बाद हुए. रात के दो बजे खाने के लिए बुलाया गया. ठंड के मौसम में रात, रात ही होती है. खाने पर बैठे तो प्लेटें आई जिसमें पूरियाँ, दो सब्ज़ियाँ, सलाद, पापड़ और चटनी थी. और दो प्लेटों में कुछ और सब्ज़ियाँ. पूरी तोड़ने की कोशिश की तो समझ में आया कि पूरियाँ फ्रिज़ से निकाली गई हैं. वही हाल पूरे भोजन का था. खाना ठंडा था. एक सब्ज़ी से बदबू भी आ रही थी.

मरता क्या न करता. सलाद खाने की ही कोशिश की. बीच बीच में बासी पूरियाँ दोबारा तल कर आती रहीं और पूछा जाता रहा, "पूरियाँ चाहिए?" क्या कहता? बोल भी नहीं पाया कि खाना बहुत ख़राब है. बाराती जो ठहरे. कमोबेश सारे बाराती भूखे पेट वापस लौटे.

कारण समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ. लड़की के परिवार वाले अच्छे घर के हैं. सम्मानित लोग हैं फिर भी मेहमानों के साथ ऐसा व्यवहार? यह अद्बुत अनुभव लेकर मैं अपने गाँव लौट आया.

दिल्ली वापस लौटने के क्रम में गाँव से स्टेशन के लिए गाड़ी किराए पर ली. मन में बारात वाली बात ही थी. अपनी पत्नी से यही बातें कर रहा था तो ड्राइवर ने कहा, "अरे सर आप क्या बात कर रहे हैं आजकल यहाँ शादियों में यही होता है."

इससे पहले कि मैं कारण पूछता, उसने ख़ुद ही बताना शुरु कर दिया, "सर मैं कल ही एक बारात से लौटा हूं. खाने में मटन बनाया गया था लेकिन उसमें नमक और मिर्च इतना डाल दिया गया कि खाना दूभर था. बारातियों ने तो खा लिया लेकिन ड्राइवरों ने लड़की वालों से पूछ ही लिया कि भई आपने इतना मंहगा भोजन बनाया फिर इसमें इतना नमक क्यों डाल दिया है? खाना परोसनेवालों का जवाब था, दस लाख रुपए लीजिएगा तो ऐसा ही खाना खाना पड़ेगा."

मेरे ड्राइवर ने क़िस्सा जारी रखा, "हम ड्राइवरों ने पूछा कि आप लड़की वालों ने दहेज दिया, लड़के वालों ने लिया तो इसमें बारात का क्या क़सूर? तो लड़की वाले बोले, जब दहेज पूरा नहीं हो रहा था तो आप ही गांव वाले थे जो कह रहे थे कि लड़के को आने नहीं देंगे शादी के लिए. अब बोलिए. लड़के की शादी हो रही है. आप यही खाइए. लड़की के बिना बारात वापस ले जाने की बात करेंगे तो मार खाइएगा."

ड्राइवर की बात सुनी तो समझ में आया कि माजरा क्या है. समझ में आया कि आजकल बिहार में बहुत से लोग बारात में शामिल होने से कतराते क्यों हैं.

ग़लती किसकी कहें? लड़की वाले मजबूरी में दहेज देते हैं तो अपनी नाराज़गी किस पर निकालें? लड़के और लड़के के घर वालों पर तो नहीं निकाल सकते. बीच में फँसते हैं बाराती जिनके साथ की जाती है बदतमीज़ी. लेकिन बात बारातियों की या मेहमानों की बेइज़्ज़ती की नहीं है. बात एक सामाजिक समस्या की है जो अब एक अनोखा रुप ले रही है.

शायद वो दिन आए जब लोग बारात जाने से पहले ये कहें कि अगर दहेज लिया है तो हम बारात में नहीं आ सकेंगे.

मैंने डाक्टरों, इंजीनियरों और सरकारी अधिकारियों को दहेज लेते और देते देखा है. तर्क ये रहता है कि सामाजिक दबाव है, शादी का खर्च कौन देगा इत्यादि.

एक अलग तरह का सामाजिक दबाव बनता दिख रहा है लेकिन वो अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है. बाराती किसी शादी का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं जो शादी को सामाजिक प्रामाणिकता देते हैं. अगर वो पीछे हटें तो दबाव बनता है.

मैंने तो तय कर लिया है. अब किसी की भी शादी में बारात जाने से पहले ये ज़रुर पूछूंगा, "भाई दहेज लिया है तो बता दो. मैं नहीं आऊंगा. और अगर जाना ही पड़े तो कम से कम घर से खाना खाकर बारात में जाऊंगा."

मानवाधिकार मानवों के या अमानवों के भी?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|शुक्रवार, 10 दिसम्बर 2010, 11:11

टिप्पणियाँ (25)

भारत में मानवाधिकारों पर अकसर बहस चलती है. ह्यूमैन राइट्स वॉच और ऐमनेस्टी इंटरनेशनल समय-समय पर रिपोर्टें जारी कर मानवाधिकारों के हनन के मामले प्रकाश में लाते हैं.

कहीं मानवाधिकारों का पूरी तरह पालन हो रहा हो, ऐसी रिपोर्ट तो मेरी नज़र में कभी नहीं आई. ख़ैर, वह अलग बात है...

दस दिसंबर, 1950. अब से साठ साल पहले का वह दिन जब संयुक्त राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र अमल में आया.

इसके अनुसार हर मानव बिना रंगभेद, जातिभेद, राष्ट्रीयता भेद के बराबर है और उसके बराबरी के अधिकार हैं.

इसीको आधार बना कर मानवाधिकार कार्यकर्ता जेलों में बंद उन क़ैदियों के मानवाधिकारों की बात करते हैं जो अपने किए, और कई बार कुछ न किए, की सज़ा भुगत रहे हैं.

मैं कुछ समय पहले एक रेडियो सिरीज़ के संबंध में मध्यप्रदेश की एक जेल के बंदियों से मिली. वहाँ बंद विचाराधीन क़ैदियों की तादाद इतनी है कि बंदी चार-चार घंटे की शिफ़्ट में सोते हैं.

किसी को गहरी नींद से जगा कर खड़े होने पर बाध्य करना कितना पीड़ादायक है यह कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है.

यह निश्चित तौर पर मानवाधिकारों का हनन है.

मुक़दमे की सुनवाई या फ़ैसला होने से पहले किसी को दोषी मान कर उसके साथ दुर्व्यवहार या तथाकथित थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट निश्चित तौर पर मानवाधिकारों का हनन है.

लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता जब सैकड़ों निर्दोषों को गोलियों से भून देने वाले या बम से उड़ा देने वाले चरमपंथियों, या बलात्कारियों या फिर निर्मम हत्या के दोषियों के मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं तो कुछ लोग उसे तर्कसंगत नहीं मानते.

क़ानून की नज़र में सब बराबर हैं. यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमैनराइट्स भी सब पर बराबरी से लागू होता है.

लेकिन मानवाधिकार के नाम पर सुविधाओं की मांग, जघन्य अपराध के दोषियों की हिमायत कितनी न्यायोचित है यह एक सोचने वाली बात है.

शायद संयुक्त राष्ट्र को अब साठ साल बाद मानवाधिकार घोषणापत्र पर फिर एक नज़र डालने की ज़रूरत है क्योंकि मानवाधिकार मानवों के होते हैं...पर कुछ लोग अमानव भी बन जाते हैं...

बिहार, बिहारी और बिजली

सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 07 दिसम्बर 2010, 14:44

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चुनाव के बाद भी बिहार शांत नहीं लगता है....सुबह सुबह दतुअन के साथ लोग इस बहस में लगे दिखते हैं कि किसने किसको क्यों और कैसे वोट दिया है और अब आगे क्या किया जाना चाहिए.

हाल शाम का भी कुछ ऐसा ही है.सड़क बन गई अब बिजली की बारी है. लालू से लोग नाउम्मीद हो चुके हैं तभी उम्मीदों का बोझ नीतीश जी पर बढ़ गया है.

नीतीश विकास पुरुष नहीं हैं लेकिन पाँच साल बाद लोग यह कहने में गर्व महसूस कर रहे हैं कि वो बिहार से हैं.

दरभंगा का उदाहरण दूंगा क्योंकि मैं वहां कुछ दिन रहा. एक बुजुर्ग रिटायर्ड शिक्षक का कहना था..पहले हम कहते थे ज़िला दरभंगा..आधा भूखा बाकी नंगा..लेकिन अब ऐसा नहीं कहते हैं. ज़िले में सड़क बनी है. थोड़े थोड़े समय के लिए बिजली भी रहती है.

बिजली से याद आया. मेरे गांव में और गांव के आसपास हर शाम तीन घंटे जेनरेटर से बिजली दी जाती है. व्यवस्था सही है. महीने भर एक बल्ब के पचास रुपए. इसी में मोबाईल चार्ज कर लीजिए..मैंने लैपटॉप भी चार्ज किया. गांव के 95 प्रतिशत घरों में यह वैकल्पिक व्यवस्था है.

यह जेनरेटर छोटी जात और बड़ी जात का भेद नहीं करता

कोई पैसे के लिए मना नहीं करता क्योंकि सब चाहते हैं उनके बच्चे पढ़ें और पढ़ने के लिए लाइट ज़रुरी है.

शायद अगले कुछ वर्षों में नीतीश बिजली पर काम करें और बिजली आने लगे..यह सोच एक स्थानीय पत्रकार को बताई तो वो बोला...ऐसा ज़रुरी नहीं है...

मैंने पूछा क्यों, तो बोले...साठ के दशक में मुंगेर में एक कंपनी हुआ करती थी ढनढनिया...जो निजी स्तर पर कोयले से बिजली पैदा करती थी और घर घर बिजली पहुंचाती थी.

सत्तर के दशक में बिहार सरकार ने इस व्यवस्था को बंद कर दिया और बिजली का कारोबार अपने हाथ में ले लिया. जहां ढनढनिया कंपनी के दौर में बिजली हाथों हाथ मिलती थी वहीं बिहार सरकार के राज में बिजली मिलनी बंद हो गई.

ये नई बात थी मेरे लिए लेकिन एक कड़वी सच्चाई भी. गांव में लोग जेनरेटर की बिजली देने वाले को पैसा देते हैं लेकिन सरकारी बिजली ( जो दिन में दो चार घंटे रहती है) का बिल शायद ही कोई भरता है.

उम्मीदों का बोझ अगर राज्य सरकार पर है तो बदलने की शुरुआत बिहार की जनता को भी करनी होगी. लोगों ने सड़क को लेकर दबाव बनाया. अब शायद बिजली की बारी है और इसके लिए जनता के दबाव मात्र से काम नहीं चलेगा. जनता को खुद बदलना होगा क्योंकि सड़क के पैसे नहीं लगते..बिजली के पैसे लगते हैं.

लैंप पोस्ट के नीचे दीनबंधु निराला

राजेश जोशीराजेश जोशी|शुक्रवार, 03 दिसम्बर 2010, 13:53

टिप्पणियाँ (36)

मैं आज तक किसी महापुरुष से नहीं मिला हूँ लेकिन कई महापुरुषों की कहानियाँ पढ़ी हैं कि कैसे अभावों में उनका जीवन बीता और कैसे लैंपपोस्ट के नीचे बैठकर रात रात को उन्होंने पढ़ाई पूरी की.

deenbandu nirala, a student

दीनबंधु निराला कोई महापुरुष नहीं है. अलबत्ता उसका नाम दो महापुरुषों के नाम से बना है - महात्मा गाँधी के सहयोगी दीनबंधु एण्ड्रूज़ और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला. वो एक 18 वर्ष का किशोर है जिसे आप किसी शाम पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान के बीचोंबीच लगे ऊँचे लैपपोस्ट के नीचे गणित के सवालों से जूझते देख सकते हैं.

वहाँ सेना या सुरक्षा बलों में भर्ती होने की तैयारी कर रहे कुछ नौजवान कसरत करने आते हैं.

चने मुरमुरे बेचने वाला एक कमज़ोर वृद्ध ग्राहकों का इंतज़ार करते करते थक कर वहीं धरती पर बैठ गया था. कुछ बेरोज़गार नौजवान निरुद्देश्य टहल रहे थे. मैदान के चारों ओर सड़कों से मोटर, कार, ट्रक और टैम्पो के हॉर्न की आवाज़ें आ रही थीं. रह रह कर एक बारात में छोड़े गए पटाख़ों की आवाज़ें भी आसमान में गूँज जाती थीं.

इतने शोर शराबे के बीच लैंपपोस्ट के नीचे बने चबूतरे पर दीनबंधु निराला अपनी किताबों पर झुका हुआ गणित के मुश्किल सवाल सुलझाने में लगा था.

मैं उसके बिलकुल पास जाकर बैठ गया और इंतज़ार करता रहा कि किसी तरह बात शुरू हो. लेकिन उसने नज़र उठाकर मेरी ओर नहीं देखा.

शोर के बीच भी वो एक स्वनिर्मित सन्नाटे में समाधिस्थ था !

मैंने देखा गणित के समीकरण उसकी कलम से निकल निकल कर कॉपी पर बिछते जा रहे थे, जिन्हें मैं नहीं समझ पाया. समीकरण सिद्ध होने के बाद लिखा गया अँग्रेज़ी का सिर्फ़ एक शब्द - प्रूव्ड यानी सिद्ध हुआ - मुझे समझ में आया.

आख़िर मैंने ही बातचीत की शुरुआत की.

"क्या बनना चाहते हो?"

"मैं मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहता हूँ और अगर ख़ुदा भी आ जाए तो मुझे वो रोक नहीं सकता".

"कहाँ रहते हो?

"यहाँ से तीन सौ किलोमीटर दूर सुपोल ज़िले के एक गाँव में."

"पिछले साल कितने नंबर आए थे?"

"पिछले साल पाँच सौ में से 385 नंबर आए थे. आइएससी (यानी बारहवीं) का इम्तिहान इस साल देने की तैयारी कर रहा हूँ."

उसक आवाज़ में न तो ग़ुरूर का पुट था और न ही किशोर सुलभ कच्चा हौसला. उसके बयान में आश्वस्ति का भाव था और ठोस आत्मविश्वास था.

वो सिर्फ़ परीक्षा की तैयारी के लिए पटना आया है और अपने कुछ दोस्तों के साथ रहता है. बदले में वो उनके लिए खाना बना देता है और इस बात के लिए वो अपने दोस्तों का बार बार शुक्र अदा करता है.

बातचीत में काफ़ी वक़्त गुज़र गया था. अँधेरा कुछ और गहरा हो गया था. निराला ने अपने बस्ते में किताबें समेटीं और लैंपपोस्ट से दूर अँधेरे में आगे बढ़ गया. उसे अभी बहुत लंबा सफ़र तय करना था.

मैं चाहता हूँ कि दीनबंधु निराला मैकेनिकल इंजीनियर न बने.

मैं जानता हूँ कि वो कोई और बड़ा सपना देखने और उसे हासिल करने की कुव्वत रखता है.

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