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लैंप पोस्ट के नीचे दीनबंधु निराला

राजेश जोशीराजेश जोशी|शुक्रवार, 03 दिसम्बर 2010, 13:53 IST

मैं आज तक किसी महापुरुष से नहीं मिला हूँ लेकिन कई महापुरुषों की कहानियाँ पढ़ी हैं कि कैसे अभावों में उनका जीवन बीता और कैसे लैंपपोस्ट के नीचे बैठकर रात रात को उन्होंने पढ़ाई पूरी की.

deenbandu nirala, a student

दीनबंधु निराला कोई महापुरुष नहीं है. अलबत्ता उसका नाम दो महापुरुषों के नाम से बना है - महात्मा गाँधी के सहयोगी दीनबंधु एण्ड्रूज़ और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला. वो एक 18 वर्ष का किशोर है जिसे आप किसी शाम पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान के बीचोंबीच लगे ऊँचे लैपपोस्ट के नीचे गणित के सवालों से जूझते देख सकते हैं.

वहाँ सेना या सुरक्षा बलों में भर्ती होने की तैयारी कर रहे कुछ नौजवान कसरत करने आते हैं.

चने मुरमुरे बेचने वाला एक कमज़ोर वृद्ध ग्राहकों का इंतज़ार करते करते थक कर वहीं धरती पर बैठ गया था. कुछ बेरोज़गार नौजवान निरुद्देश्य टहल रहे थे. मैदान के चारों ओर सड़कों से मोटर, कार, ट्रक और टैम्पो के हॉर्न की आवाज़ें आ रही थीं. रह रह कर एक बारात में छोड़े गए पटाख़ों की आवाज़ें भी आसमान में गूँज जाती थीं.

इतने शोर शराबे के बीच लैंपपोस्ट के नीचे बने चबूतरे पर दीनबंधु निराला अपनी किताबों पर झुका हुआ गणित के मुश्किल सवाल सुलझाने में लगा था.

मैं उसके बिलकुल पास जाकर बैठ गया और इंतज़ार करता रहा कि किसी तरह बात शुरू हो. लेकिन उसने नज़र उठाकर मेरी ओर नहीं देखा.

शोर के बीच भी वो एक स्वनिर्मित सन्नाटे में समाधिस्थ था !

मैंने देखा गणित के समीकरण उसकी कलम से निकल निकल कर कॉपी पर बिछते जा रहे थे, जिन्हें मैं नहीं समझ पाया. समीकरण सिद्ध होने के बाद लिखा गया अँग्रेज़ी का सिर्फ़ एक शब्द - प्रूव्ड यानी सिद्ध हुआ - मुझे समझ में आया.

आख़िर मैंने ही बातचीत की शुरुआत की.

"क्या बनना चाहते हो?"

"मैं मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहता हूँ और अगर ख़ुदा भी आ जाए तो मुझे वो रोक नहीं सकता".

"कहाँ रहते हो?

"यहाँ से तीन सौ किलोमीटर दूर सुपोल ज़िले के एक गाँव में."

"पिछले साल कितने नंबर आए थे?"

"पिछले साल पाँच सौ में से 385 नंबर आए थे. आइएससी (यानी बारहवीं) का इम्तिहान इस साल देने की तैयारी कर रहा हूँ."

उसक आवाज़ में न तो ग़ुरूर का पुट था और न ही किशोर सुलभ कच्चा हौसला. उसके बयान में आश्वस्ति का भाव था और ठोस आत्मविश्वास था.

वो सिर्फ़ परीक्षा की तैयारी के लिए पटना आया है और अपने कुछ दोस्तों के साथ रहता है. बदले में वो उनके लिए खाना बना देता है और इस बात के लिए वो अपने दोस्तों का बार बार शुक्र अदा करता है.

बातचीत में काफ़ी वक़्त गुज़र गया था. अँधेरा कुछ और गहरा हो गया था. निराला ने अपने बस्ते में किताबें समेटीं और लैंपपोस्ट से दूर अँधेरे में आगे बढ़ गया. उसे अभी बहुत लंबा सफ़र तय करना था.

मैं चाहता हूँ कि दीनबंधु निराला मैकेनिकल इंजीनियर न बने.

मैं जानता हूँ कि वो कोई और बड़ा सपना देखने और उसे हासिल करने की कुव्वत रखता है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:23 IST, 03 दिसम्बर 2010 Kapil Batra:

    राजेश जी, एक आम आदमी, पर बहुत ही ख़ास जीवट वाले व्यक्ति के बारे में लिखने के लिए शुक्रिया. अगर दीनबंधु से संपर्क का पता दे सकें तो आप उसके सपनों को पूरा करने का माध्यम बन सकते हैं. मेरा ईमेल का पता आप तक पहुँच ही गया है.

  • 2. 15:54 IST, 03 दिसम्बर 2010 Dhananjay Nath:

    राजेश जी, संघर्ष ही जीवन है को चरितार्थ करते कितने दीनबंधु हमारे समाज में हैं और अपनी मेहनत और जुनून से बहुत कुछ पा लेते हैं. इस ब्लॉग के माध्यम से हमारे समाज का जीवंत चेहरा प्रशंसनीय है. एक ह्रदयस्पर्शी और गंभीर ब्लॉग के लिए धन्यवाद.

  • 3. 18:34 IST, 03 दिसम्बर 2010 Yogesh Mishra:

    राजेश जी, ऐसा आपको सिर्फ़ भारत में मिल सकता है. अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए शुक्रिया. आशा है आप लिखते रहेंगे.

  • 4. 19:17 IST, 03 दिसम्बर 2010 rohit wadhwa:

    काफ़ी अच्छा लगा. शायद यह कई और लोगों को मेहनत करने की सोच दे.

  • 5. 19:38 IST, 03 दिसम्बर 2010 ब्रजकिशोर सिंह :

    दीनबंधु निराला. नाम से भी निराला और काम से भी. लोग साधारण से ही तो असाधारण होते हैं. यह नन्हा निराला भी अभी इसी प्रक्रिया में है. जहाँ मीडिया पर आम आदमी की उपस्थिति दिनों दिन कम होती जा रही है राजेशजी का प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है.

  • 6. 20:14 IST, 03 दिसम्बर 2010 himmat singh bhati:

    ये सही है कि दीनबंधु निराला कोई महापुरुष नहीं है इसलिए तो लैंपपोस्ट के नीचे पढ़ रहा है. इस महंगाई के ज़माने में वह महंगी शिक्षा कैसे हासिल कर पाएगा यह सवाल मेरे मन में उठता है. ऐसी सपने बहुत से लोग देखते हैं लेकिन घर की माली हालत के चलते वो रास्ते में ही हाँफ़ जाते हैं. कई लोग गोल्ड मैडल भी पा सकते हैं लेकिन इंटरव्यू में पैसे न दे पाने के कारण पद पाने से वंचित रह जाते हैं.

  • 7. 20:52 IST, 03 दिसम्बर 2010 Viswanath Jaiswal:

    ये आम आदमी की सच्ची कहानी है जिसमें एक ग़लत दिशा में जाते हुए व्यक्ति की सोच बदलने का माद्दा है.

  • 8. 21:12 IST, 03 दिसम्बर 2010 Saptarshi:

    इस दुनिया में निराला जैसे लोग कम हैं लेकिन उससे भी कम हैं कपिल बत्रा जैसे. आपको साधुवाद कपिल बत्रा साहब.

  • 9. 22:55 IST, 03 दिसम्बर 2010 Naran gojia, rajkou-guj.:

    भारत का भविष्य अंधकार से निकलता है. उन पर भारत को नाज़ है. मेरी शुभकामनाएँ उनके साथ हैं.

  • 10. 23:00 IST, 03 दिसम्बर 2010 बाबूलाल गढ़वाल मिडिया छात्र भारतीय व�:

    दीनबंधु जैसे हीरो की इस देश में कोई कमी नहीं है बस कमी है तो सही अवसरों की, जिसकी तलाश में कितने ही दीनबंधु लाख कठिनाइयों के बावजूद हर वक्त एक अवसर की आशा में अपने जूनून को पूरा करने में लगे रहते हैं और अवसर मिलते ही वो हीरे अपनी चमक दिखाने से कभी नहीं चूकते. हमारी समाज की इस दुखती रग पर हाथ रखने के लिए राजेश जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

  • 11. 23:14 IST, 03 दिसम्बर 2010 kuldeep srivastava:

    राजेश जी पहले तो आपका शुक्रिया ऐसी ममस्पर्शी और सच्ची दास्तान को अपने ब्लॉग में जगह देने के लिए. शायद ऐसे ही निराला और राजेन्द्र प्रसाद एक दिन लैंपपोस्ट की रोशनी से उठकर दुनिया के फलक पर छा जाते हैं. लेकिन धन्यवाद उस लैंपपोस्ट का भी जो तमाम सरकारी अव्यवस्थाओं (मतलब आप समझ सकते हैं) के बावजूद भी एक पथ प्रदर्शक की तरह बार-बार जलते बुझते हुए दृढ़निश्चयी निराला की राह आसान कर रहा है.

  • 12. 00:01 IST, 04 दिसम्बर 2010 Chandan, Fairfax USA:

    राजेश जी, बहुत अच्छा ब्लॉग. हमारे देश में बहुत से लोग हैं जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद बहुत मेहनत कर रहे हैं. मुझे यक़ीन है कि एक दिन वे क़ामयाब होंगे. याद रहे कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने भाषण में कहा है कि अमरीकियों को भारत और चीन के लोगों से मुक़ाबला करना होगा. वे ज़रुर इसी तरह के लोगों का ज़िक्र कर रहे होंगे. दीनबंधु निराला और उन जैसे लोगों को शुभकामनाएँ.

  • 13. 10:16 IST, 04 दिसम्बर 2010 उमेश यादव:

    बिलकुल यथार्थ और जीवंत लेख है राजेश जी. इस लेख के लिए धन्यवाद.

  • 14. 10:55 IST, 04 दिसम्बर 2010 Anonymous:

    राजेश जी क्या आप मुझे दीनबंधु का पता दे सकते हैं? मेरे पास गणित की कुछ बहुत अच्छी किताबें हैं जो वे चाहेंगे कि उन्हें मिल जाएँ. मैं कॉलेज के समय की अपनी इंजीनियरिंग की किताबें भी उन्हें भिजवा सकता हूँ. और इसके लिए मुझे किसी तरह धन्यवाद ज्ञापन भी नहीं चाहिए.

  • 15. 11:14 IST, 04 दिसम्बर 2010 ZIA JAFRI:

    राजेश जी, दीनबंधु जैसे लोगों के लिए मैकेनिकल इंजीनियरिंग सिर्फ़ एक पड़ाव है जिसको हासिल करने के बाद ये लोग दूसरे लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं. इनको किसी के मार्गदर्शन की ज़रुरत नहीं होती ये अपनी ऊँचाइयाँ स्वयं पा लेंगे. दीनबंधु को हमारी हार्दिक शुभकामनाएँ.

  • 16. 11:18 IST, 04 दिसम्बर 2010 संदीप द्विवेदी :

    दीनबंधु अपने मक़सद में ज़रूर कामयाब होगा.

  • 17. 14:07 IST, 04 दिसम्बर 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    राजेश जी, कृपया मेरा एक पैग़ाम दीनबंधु तक पहुँचा दें कि ये दावा न करें कि ख़ुदा भी उसे अपने मक़सद मैं रोक नहीं सकता है. दिमाग़, शरीर सब कुछ इंसान से नहीं ख़ुदा से ही मिलता है. अगर उसने आप को सच में ही ये कहा तो बेहतर होगा वो भगवान से माफ़ी माँगे. भगवान (ख़ुदा) और इंसान मैं बहुत फ़र्क़ है. इस शानदार खोज के लिए धन्यवाद.

  • 18. 16:15 IST, 04 दिसम्बर 2010 Pawan kumar maddhesiya:

    बीबीसी की यही विशेषता उसे भीड़ से अलग करती है. आप ने एक आम इंसान को आपने महत्व दिया ये बहुत ही अच्छा और प्रेरणादाई लगा.

  • 19. 16:19 IST, 04 दिसम्बर 2010 Gaurav:

    बहुत बहुत अच्छा लेख था. मन भर आया और गदगद भी हो गया.

  • 20. 16:36 IST, 04 दिसम्बर 2010 Ravi Ranjan Kumar, Jamui, Bihar, USA:

    राजेश जी, इस प्रतिभा को सामने लाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. मेरी ओर से ये पंक्तियाँ:

    लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

    नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
    चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है.
    मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
    चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है.
    आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

    डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
    जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है.
    मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
    बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.
    मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

    असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
    क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.
    जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
    संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.
    कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती

  • 21. 21:44 IST, 04 दिसम्बर 2010 Arun Sagar, Sasaram:

    धन्यवाद राजेश जी. ऐसे लेख लिखने के लिए.

  • 22. 00:18 IST, 05 दिसम्बर 2010 मनीष कुमार:

    निराला और राजेश जी, दोनों में किसकी प्रशंसा करूँ इसी दुविधा में फंसा हूँ मैं. एक वो है जो ख़ुद मंज़िल को ललकार रह है और दूसरा जो उस जैसे हज़ारों को प्रेरणा दे रह है.
    अति उत्तम राजेश भाई.

  • 23. 08:47 IST, 05 दिसम्बर 2010 Arun Sathi:

    मैं भी यही चाहता हूँ की निराला के इस हौसले को और ऊँची पंख लगे. प्रेरक... बधाई..

  • 24. 11:44 IST, 05 दिसम्बर 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    धूल सने बेशक़ीमती हीरे हमारे देश की हर गली में बिखरे पड़े हैं कोई सुध लेने वाला नहीं है! बी. बी .सी . की इन प्रतिभाओं को दुनिया के सामने लाने की शुरुआत एक सराहनीय क़दम है! ऐसे ही लोगों में अब्राहम लिंकन जैसी हस्तियों की छवि उभरती दिखाई देती है! वास्तविकता भी यही है कि अगर कुछ कर गुज़रने की इछाश्क्ति से लबरेज़ इरादे हों तो मुश्किल से मुश्किल मंसूबों को अंजाम देना आसान होता है. ऐसे लोगों के बुलंद हौसलों को सलाम!

  • 25. 12:29 IST, 05 दिसम्बर 2010 aniruddh dwivedi:

    बी.बी.सी. से सिर्फ़ समाचार ही नहीं मिलता है, जीवन को बेहतर तरीक़े से जीने की प्रेरणा भी मिलती है, भले ही वह दीनबंधु निराला के रूप में मिले. बहुत-बहुत शुक्रिया.

  • 26. 17:26 IST, 05 दिसम्बर 2010 अनुराग :

    प्रेरणादायक लेख है।

  • 27. 17:56 IST, 05 दिसम्बर 2010 संजय पटेल:

    राजेश भाई आपने एक गुदड़ी के लाल को लाइम लाइट में लाकर बड़े पुण्य का काम किया है.साधुवाद.

  • 28. 20:51 IST, 05 दिसम्बर 2010 nishar:

    राजेश जी, इस लेख के लिए आपको धन्यवाद. भारतीय गलियों में निराला जैसे बहुत से लड़के मिल जाएँगे जो अपने उत्साह,मेहनत और आत्मविश्वास से अपनी क़िस्मत को बदलने का माद्दा रखते है. ज़रूरत है बस उनको सही रास्ता दिखने की.

  • 29. 20:42 IST, 06 दिसम्बर 2010 dkmahto:

    घड़ियाली आंसू

  • 30. 21:23 IST, 06 दिसम्बर 2010 मुकल सरल:

    "मैं चाहता हूँ कि दीनबंधु निराला मैकेनिकल इंजीनियर न बने. मैं जानता हूँ कि वो कोई और बड़ा सपना देखने और उसे हासिल करने की कुव्वत रखता है"
    बहुत खूब...इसे कहते हैं पंचलाइन..पत्रकारिता...बड़ी सोच..बड़े सरोकार..बधाई भी, शुक्रिया भी.

  • 31. 19:46 IST, 08 दिसम्बर 2010 hartali singh:

    मैं बीबीसी का शुक्रिया करना चाहता हूँ. इसी माध्यम से हम नौजवानो को कुछ तो सीख मिली.

  • 32. 19:46 IST, 09 दिसम्बर 2010 Shashi Kumar , Rohini Sec-25 , Delhi:

    आज सब लोग आईआईटी और कॉम्पीटीशन के नाम पर लूटने पर लगे हैं तो यह एक सटीक उदाहरण है जो स्वाध्याय, ख़ुद पर विश्वास, कठिन परिश्रम करने पर बल देता है. बहुत ही उपयोगी प्रसंग है. राजेश जी को बहुत धन्यवाद.

  • 33. 10:53 IST, 18 दिसम्बर 2010 shahzad azmi:

    राजेश जी, इस ब्लॉग के लिए बहुत बहुत बधाई. आपकी आवाज़ सुनता रहा हूँ अब तक अब ब्लॉग भी पढ़ने को मिलेगा.

  • 34. 12:43 IST, 25 दिसम्बर 2010 shalu:

    यह एक बेहतरीन ब्लॉग है. इससे प्रेरणा मिलती है कि किस तरह से अभावों के बीच प्रतिभाएं पैदा लेती है. राजेश जी का शुक्रिया.

  • 35. 14:08 IST, 27 दिसम्बर 2010 Mukund Mishra:

    एक ऐसा देश जहाँ नेता और अभिनेता के छींकने को खबर बनाया जाता हो, एक आम आदमी की जीवटता को पेश करने के लिए आपका शुक्रिया .

  • 36. 17:58 IST, 27 दिसम्बर 2010 virencdra:

    बढ़ीया लेख के लिए साधुवाद

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