बिहार, बिहारी और बिजली
चुनाव के बाद भी बिहार शांत नहीं लगता है....सुबह सुबह दतुअन के साथ लोग इस बहस में लगे दिखते हैं कि किसने किसको क्यों और कैसे वोट दिया है और अब आगे क्या किया जाना चाहिए.
हाल शाम का भी कुछ ऐसा ही है.सड़क बन गई अब बिजली की बारी है. लालू से लोग नाउम्मीद हो चुके हैं तभी उम्मीदों का बोझ नीतीश जी पर बढ़ गया है.
नीतीश विकास पुरुष नहीं हैं लेकिन पाँच साल बाद लोग यह कहने में गर्व महसूस कर रहे हैं कि वो बिहार से हैं.
दरभंगा का उदाहरण दूंगा क्योंकि मैं वहां कुछ दिन रहा. एक बुजुर्ग रिटायर्ड शिक्षक का कहना था..पहले हम कहते थे ज़िला दरभंगा..आधा भूखा बाकी नंगा..लेकिन अब ऐसा नहीं कहते हैं. ज़िले में सड़क बनी है. थोड़े थोड़े समय के लिए बिजली भी रहती है.
बिजली से याद आया. मेरे गांव में और गांव के आसपास हर शाम तीन घंटे जेनरेटर से बिजली दी जाती है. व्यवस्था सही है. महीने भर एक बल्ब के पचास रुपए. इसी में मोबाईल चार्ज कर लीजिए..मैंने लैपटॉप भी चार्ज किया. गांव के 95 प्रतिशत घरों में यह वैकल्पिक व्यवस्था है.
यह जेनरेटर छोटी जात और बड़ी जात का भेद नहीं करता
कोई पैसे के लिए मना नहीं करता क्योंकि सब चाहते हैं उनके बच्चे पढ़ें और पढ़ने के लिए लाइट ज़रुरी है.
शायद अगले कुछ वर्षों में नीतीश बिजली पर काम करें और बिजली आने लगे..यह सोच एक स्थानीय पत्रकार को बताई तो वो बोला...ऐसा ज़रुरी नहीं है...
मैंने पूछा क्यों, तो बोले...साठ के दशक में मुंगेर में एक कंपनी हुआ करती थी ढनढनिया...जो निजी स्तर पर कोयले से बिजली पैदा करती थी और घर घर बिजली पहुंचाती थी.
सत्तर के दशक में बिहार सरकार ने इस व्यवस्था को बंद कर दिया और बिजली का कारोबार अपने हाथ में ले लिया. जहां ढनढनिया कंपनी के दौर में बिजली हाथों हाथ मिलती थी वहीं बिहार सरकार के राज में बिजली मिलनी बंद हो गई.
ये नई बात थी मेरे लिए लेकिन एक कड़वी सच्चाई भी. गांव में लोग जेनरेटर की बिजली देने वाले को पैसा देते हैं लेकिन सरकारी बिजली ( जो दिन में दो चार घंटे रहती है) का बिल शायद ही कोई भरता है.
उम्मीदों का बोझ अगर राज्य सरकार पर है तो बदलने की शुरुआत बिहार की जनता को भी करनी होगी. लोगों ने सड़क को लेकर दबाव बनाया. अब शायद बिजली की बारी है और इसके लिए जनता के दबाव मात्र से काम नहीं चलेगा. जनता को खुद बदलना होगा क्योंकि सड़क के पैसे नहीं लगते..बिजली के पैसे लगते हैं.

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सुशील जी, बहुत बढ़िया चित्रण है बिहार और बिजली का. निस्संदेह बिहार के लोगों को बदलना होगा तभी कुछ ठोस परिणाम सामने आ सकते हैं. बदलाव हो रहा है, थोड़ा वक़्त लगेगा. लोगों को बिजली भी मिलेगी और लोग बिजली का बिल भी चुकाएँगे.
ऐसा लगता है कि बीबीसी भी बिहार के लिए ख़ूब समय देता है. बिहार, बिहारी, बिजली और साथ में बीबीसी. इस लेख से ऐसा लगता है कि सुशील जी आप भी बिहार के रहने वाले हैं. क्या हो गया है बीबीसी को जो कांग्रेस, बिहार और क्रिकेट पर ही अपना अधिक समय दे रहा है. हिंदुस्तान में अधिकतर राज्यों में बिजली की समस्या है उसका ज़िक्र तक बीबीसी पर नहीं.
जब इंसान को बिजली इतनी मिलने लगेगी कि वो अपना काम पूरी तरह से कर सके तो वो बिल ज़रुर देगा. मैं बिहार से हूं और मुझे मालूम है कि जिस हिसाब की बिजली अभी वहां रहती है उसके लिए बिल देना अपना नुकसान ही करना है.
निश्चित रूप से बिहार बदल रहा है लेकिन इस प्रक्रिया को तेज़ करने की ज़रुरत है.
अच्छा ब्लॉग है. लेकिन जैसा कि आपने समस्या के बारे में लिखा है मुश्किल यह है कि लोग बिजली का बिल नहीं जमा कराते. तो लोगों को बदलने से पहले क़ानून और व्यवस्था को बदलना होगा. अगर क़ानून लागू कराने में भ्रष्टाचार न हो तो लोगों को बिल जमा कराने के लिए बाध्य किया जा सकता है. अगर प्राइवेट जेनेरेटर से बिजली बनाई जा सकती है तो सरकार भी कर सकती है. हालाँकि यह एक आशाजनक बात है कि बिहार में कुछ अच्छे बदलाव देखने में आ रहे हैं.
मैं यह देख कर बहुत ख़ुश हुआ कि कोई ज़मीनी सच्चाई लिख रहा है. बिहार की कई समस्याएँ हैं और मैं आशान्वित हूँ कि वे एक के बाद एक सुलझा ली जाएँगी. मैं एक बात को लेकर चिंतित हूँ. कई जगह लोगों को अपने बच्चों की शिक्षा की चिंता नहीं है. इससे तो एक पूरी पीढ़ी बरबाद हो जाएगी. नीतीश जी, आपको जीत के लिए बधाई. अब शिक्षा पर पूरा ध्यान दें,
अंतिम पंक्तियों में एकदम सटीक बात कही है. बिहार तो बदलने की राह पर है (काफी कुछ बदल भी गया है), अब बदलने की बारी बिहारियों की है.
मैं लगभग 20 साल का हूँ और जब से मैंने होश संभाला है तब से तब से बिजली का दर्शन भी नहीं हुआ था. लेकिन अब हमारे गाँव में बिजली आ गई है. ज़्यादा तो नहीं कुछ 10 घंटे तो रह ही जाती है. इसी से पता चलता है कि हम कहाँ से कहाँ आ गए.
कहते हैं जहाँ धुआँ उठता है वहीं आग भी लगती है. बिजली की बात हो रही है तो बिजली आएगी और लोग भी बिल जमा करेंगे.
मैं आपकी बात से सहमत हूँ. हमलोग तो उम्मीद करते हैं कि सड़क की तरह बिहार में बिजली भी हर गाँव और मोहल्लों में बढ़िया रहे. बिजली के बिल की बात भी आपने सही कही. गाँव में चार घंटे के लिए लोग सौ जेनेरेटर वालों के देते हैं लेकिन बिजली बिल का कोई भुगतान नहीं करना चाहता. बिहार की जनता को यह बात समझनी चाहिए.
आज बिहार के लोग दिल से नीतीश जी का साथ देंगे तो बिहार ताजमहल को भी पीछे छोड़ देगा, मेरा मतलब है कि लोग बिहार के विकास को देखने अधिक आएँगे. मेरा लोगों से कहना है कि ईमानदारी से सरकारी को करने में सहयोग दें.
आपने एक दम सच कहा है सुशील जी बिहार बदल रहा है. लेकिन अब बिहारियों को बदलना होगा.
बिहार की जनता जाग गई है.
आज़ादी को साठ साल से ज़्यादा हो गए लेकिन बिहार की राजधानी में अब भी 25 घंटे बिजली नहीं है. बिहार ने स्वयं को पाँच साल पहले उस शासन से अलग कर लिया जो ब्रितानी राज की तर्ज़ पर था. सब कुछ अच्छी गति से चल रहा है लेकिन इतने कम समय में सब कुछ सर्वोत्तम होने की आशा नहीं की जा सकती है. हमें समझना होगा कि किसी भी सरकार को पावर जेनेरेटिंग यूनिट लगाने के लिए कितना ख़र्च करना होगा. यह सब होगा लेकिन यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि रातोंरात हो जाएगा.
बिजली कोई समस्या नहीं है. समस्या मुफ़्त की बिजली की है. जब से फ़ोन पर से सरकारी नियंत्रण हटा फ़ोन बिहार में ही नहीं पूरे देश में सब तक पहुँच गया. कोई स्वयं से क़ानून नहीं मानता. वह लागू कराया जाता है. जब क़ानून कड़े होंगे और उन पर कार्रवाई होगी सब अपने आप ठीक हो जाएगा. बिजली को भी निजी क्षेत्र में देना चाहिए. स्पर्द्धा होगी और मोबाइल फ़ोन की तरह अपने आप सारी समस्या हल हो जाएगी. जहाँ गुणवत्ता चयन का आधार होगा.
जो लोग बिजली का बिल जमा नहीं करते हैं उनकी बिजली दूसरे महीने काट देनी होगी. मैं बिहार से हूँ लेकिन अभी आँध्र प्रदेश में रहता हूँ. मैंने देखा कि यहाँ पर बिजली का बिल जमा करने के लिए विभाग से घोषणा होती है लाउडस्पीकर पर. अगर बिल जमा नहीं हुआ तो लाइन कट. यही रास्ता बचा है बिहार में. बिजली का उत्पादन तो बढ़ाना ही होगा लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि आप बिजली का बिल नहीं करने वालों के ख़िलाफ़ कठोर क़दम उठाएँ.
यह सही है कि बिहार प्रगति के रास्ते पर है और यह एक लंबा रास्ता है. लेकिन विकास के साथ अच्छा-बुरा दोनों ही होता है. बिजली बहुत ज़रूरी है लेकिन वह अन्य चीज़ों की क़ीमत पर नहीं होनी चाहिए जो मानवता के लिए ज़रूरी हैं. जैसे, पर्यावरण, पानी और वन आदि.
झा महाशय ! आपकी टिप्पणी बिलकुल ही तर्कसंगत है ! इसमें कोई संदेह नहीं है कि बिहार की हालत अगर पहले दयनीय थी और आज थोड़ी अच्छी है तो उसका श्रेय केवल बिहार वासियों को जाता है ! इस लिए अब अगर इस तरह की सरकार को बिहार में बनाये रखना है तो सबसे पहले हम बिहारियों को इसके अनुकूल बदलना होगा !!!
बहुत अच्छा लगा. या यूँ कहें कि हम बिहार के अपने घर में बैठे नज़ारा देख रहे हों. धन्यवाद सुशील.
आपने बिलकुल सही लिखा है कि बिहार की जनता ने सड़क के लिए दवाब बनाया और परिणाम सामने है... अभी बिहार को सबसे जयादा जरुरत बिजली की है. हम आशा करते हैं की हमारी यह मांग भी नयी सरकार पूरा करेगी.
अति उत्तम विश्लेषण है आपका सुशील जी. आप के विचार से मैं बिलकुल सहमत हूँ. और गौर करने की बात ये है कि, बिजली संयत्र शुरू करने मैं पांच साल से ज्यादा का समय लगता है. अगर लोग धैर्य से काम नहीं लेंगे तो दिक्कतें होंगी..
सुशीलजी मेरे गृह प्रखंड राघोपुर की भी यही स्थिति है. जनता बिजली का उपयोग करती है लेकिन बिल नहीं भरती. फिर सरकार बिजली दे तो कैसे और इसके लिए कहाँ से पैसा लाए. बीएसएनएल में स्थिति जरूर उलटी है जहाँ फोन कटवा लेने पर भी बिल आता रहता है. कई बार विद्युत बोर्ड भी कनेक्शन कटवा लेने पर भी बिल भेजता रहता है. कुल मिलाकर स्थिति अंधेर नगरी चौपट राजा वाली है.
सुशील जी, बहुत ही अच्छा ब्लॉग है. मैं स्वयं मुंगेर का रहने वाला हूँ और इसके बारे में बुज़ुर्गों से सुना था. बिजली जैसे क्षेत्र का निजीकरण होना आवश्यक हो गया है. तभी बिहार की जनता का कल्याण हो सकता है. और अगर भ्रष्टाचार हुआ भी तो वह सकारात्मक भ्रष्टाचार होगा. जैसाकि हम अमरीका जैसे देशों में देखते हैं, 'विकास के लिए भ्रष्टाचार'. अति उत्तम लेख.
लेकिन एक कड़वी सच्चाई भी. गांव में लोग जेनरेटर की बिजली देने वाले को पैसा देते हैं लेकिन सरकारी बिजली ( जो दिन में दो चार घंटे रहती है) का बिल शायद ही कोई भरता है.
चंद लाइनों में सबकुछ कहना अच्छा लगता है कि बीबीसी हिन्दी में आज भी ऐसे जर्नलिस्ट बचे हैं। आपने बिहार और बिहारी समाज का जीवंत चित्रण किया है। ये सच है कि बिहार में बिजली लाना नितीश कुमार के लिए आसान नहीं होगा। बिजली के खंभे, तार और बिजलीघर, सबकुछ लालू के राज में बाहुबली खा गए हैं। गुम हुए तारों, टूट चुके खंभों और बरबाद हो चुके बिजलीघरों से बिजली आने में समय तो लगेगा ही।
सुशील जी, आपके ब्लॉग के लिए धन्यवाद. हममें बहुत बदलाव आया है लेकिन और अधिक बदलाव की ज़रूरत है.
बिजली ज़रूर आएगी. नीतीश जी बिजली के लिए काम कर रहे हैं. इसमें समय लगता है. सबको पता है. यह एक महीने का काम नहीं है.
हरेक एक शाइनिंग बिहार की बात कर रहा है लेकिन पूरे भारत को शाइन करना चाहिए क्योंकि हर भारतीय विकास चाहता है. बिहार को ऐसा होना चाहिए कि वहाँ से बाहर रह रहा हर बिहारी, चाहे वह भारत के किसी अन्य राज्य में हो या विदेश में, वापस बिहार लौटने के बारे में सोचे.
यह समय है कि बिजली में सुधार किया जाए. उद्योगों को चलाने का यह सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है. अब जबकि पेट्रोल और डीज़ल के मूल्यों में वृद्धि हो रही है, बिजली और सौर्य ऊर्जा इस्तेमाल करने की ज़रूरत है. इसके अलावा पर्यावरण को साफ़-सुथरा रखना भी ज़रूरी है.
बिजली की जो आपूर्ति है वह तो अपनी जगह है लेकिन उसकी चोरी का एक अलग चैप्टर है. बिजली की आंख मिचौली और सरकार की लापरवाही के चलते कुछ उपभोक्ताओं द्वारा चोरी के अलग अलग हथकंडे अपनाना अपने में एक अलग इतिहास है. बिजली रुपी हमाम में सब नंगे हैं. नीचे वाला कमाता है और उपर वाले खाते हैं. यही है समस्या का लब्बो-लुबाब.
हाँ, मैं नीतीश कुमार के काम से संतुष्ट हूँ. वह बिहार में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. लेकिन हम कुछ क्षेत्रों में उनसे और अधिक अपेक्षा रखते हैं...
अपराध कम हो.
बिजली बढ़े.
रोज़गार के अवसर पैदा हों ताकि लोगों का बिहार से बाहर जाना बंद हो.
अच्छा आलेख है. और वो टिप्पणी दिल को छू गई कि जनरेटर से उत्पादित बिजली का बिल सभी खुशी से देते हैं पर सरकार की बिजली का बिल शायद ही कोई देता है. हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी और सरकार को अपनी कार्य प्रणाली. तभी जाकर सुधार संभव है. आपसे अनुरोध है कि लिखते रहिए ऐसे मुद्दों पर. कुछ तो मन को शांति तो मिलती है कि कोई है जो ऐसी सोच रखता है. कौन कहता है कि आसमान में सुराख़ नहीं हो सकता. एक पत्थर तबीयत से उछालो यारों!