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मानवाधिकार मानवों के या अमानवों के भी?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|शुक्रवार, 10 दिसम्बर 2010, 11:11 IST

भारत में मानवाधिकारों पर अकसर बहस चलती है. ह्यूमैन राइट्स वॉच और ऐमनेस्टी इंटरनेशनल समय-समय पर रिपोर्टें जारी कर मानवाधिकारों के हनन के मामले प्रकाश में लाते हैं.

कहीं मानवाधिकारों का पूरी तरह पालन हो रहा हो, ऐसी रिपोर्ट तो मेरी नज़र में कभी नहीं आई. ख़ैर, वह अलग बात है...

दस दिसंबर, 1950. अब से साठ साल पहले का वह दिन जब संयुक्त राष्ट्र का अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र अमल में आया.

इसके अनुसार हर मानव बिना रंगभेद, जातिभेद, राष्ट्रीयता भेद के बराबर है और उसके बराबरी के अधिकार हैं.

इसीको आधार बना कर मानवाधिकार कार्यकर्ता जेलों में बंद उन क़ैदियों के मानवाधिकारों की बात करते हैं जो अपने किए, और कई बार कुछ न किए, की सज़ा भुगत रहे हैं.

मैं कुछ समय पहले एक रेडियो सिरीज़ के संबंध में मध्यप्रदेश की एक जेल के बंदियों से मिली. वहाँ बंद विचाराधीन क़ैदियों की तादाद इतनी है कि बंदी चार-चार घंटे की शिफ़्ट में सोते हैं.

किसी को गहरी नींद से जगा कर खड़े होने पर बाध्य करना कितना पीड़ादायक है यह कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है.

यह निश्चित तौर पर मानवाधिकारों का हनन है.

मुक़दमे की सुनवाई या फ़ैसला होने से पहले किसी को दोषी मान कर उसके साथ दुर्व्यवहार या तथाकथित थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट निश्चित तौर पर मानवाधिकारों का हनन है.

लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता जब सैकड़ों निर्दोषों को गोलियों से भून देने वाले या बम से उड़ा देने वाले चरमपंथियों, या बलात्कारियों या फिर निर्मम हत्या के दोषियों के मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं तो कुछ लोग उसे तर्कसंगत नहीं मानते.

क़ानून की नज़र में सब बराबर हैं. यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमैनराइट्स भी सब पर बराबरी से लागू होता है.

लेकिन मानवाधिकार के नाम पर सुविधाओं की मांग, जघन्य अपराध के दोषियों की हिमायत कितनी न्यायोचित है यह एक सोचने वाली बात है.

शायद संयुक्त राष्ट्र को अब साठ साल बाद मानवाधिकार घोषणापत्र पर फिर एक नज़र डालने की ज़रूरत है क्योंकि मानवाधिकार मानवों के होते हैं...पर कुछ लोग अमानव भी बन जाते हैं...

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:17 IST, 10 दिसम्बर 2010 Dr.Chandrakumar Jain :

    संक्षिप्त, किन्तु सारगर्भित लेख. इस पर विचार अपरिहार्य समझता हूँ.
    मानव अधिकार को निजी मिल्कियत समझने की भूल या अतार्किक व मनगढ़ंत व्याख्या की दिशा में एकबारगी झोंक देने की प्रवृत्ति पर लगाम कसना निहायत जरूरी है.
    आपने इसके सहज और सार्थक संकेत दिए हैं.

  • 2. 13:38 IST, 10 दिसम्बर 2010 vimal kishor singh:

    10 दिसंबर यानी मानवाधिकार दिवस. मानवाधिकारों को लेकर अक्सर विवाद बना रहता है. ये समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि क्या वाकई में मानवाधिकारों की सार्थकता है. अबू ग़रीब जेल जैसे कांड जब सुनने में आते हैं तो मानवाधिकारों की बात करना सही प्रतीत होता है. जेल में कैदियों के साथ जिस तरह का अमानवीय व्यवहार किया जाता है या किसी भी वजह से मनुष्य के हितों की अनदेखी होती है तो यक़ीनन उसे सही नहीं ठहराया जा सकता. ऐसे में मानव अधिकारों की बात करना सही लगता है, लेकिन वहीं दूसरी ओर जब मानवाधिकारों की दुहाई देकर अफ़ज़ल गुरु जैसे आतंकवादियों को माफ करने की बात कही जाती है तो मानवाधिकार जैसी बातें निरर्थक लगती हैं. विरोधाभास तो है ही लेकिन कहीं न कहीं मानव का हित साधना ही परम उद्देश्य है.

  • 3. 15:23 IST, 10 दिसम्बर 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    बहुत समय के बाद सलमा जी आपका लेख आया. शानदार और सही बात लिख कर आपने श्रोताओं को समझाने का प्रयास किया है. लेकिन कौनसे मानवाधिकारों की बात हो रही है. इससे तो जानवरों के अधिकार बेहतर हैं. क्या किसी सच को लिखना गुनाह है जो आज जूलियन असांज जेल में हैं और सब अमरीका के आगे मूक दर्शक बन कर बैठे हुए हैं. शानदार लेख के लिए धन्यवाद.

  • 4. 18:41 IST, 10 दिसम्बर 2010 braj kishore singh:

    आज के समय में मानव और दानव में कोई फर्क नहीं रह गया है. दुर्भाग्य की बात तो यह है कि मानवों के अधिकारों को तो कोई देखनेवाला नहीं है और बार-बार दानवों के अधिकारों के लिए आंदोलन खड़े किए जाते हैं और हंगामा किया जाता है.

  • 5. 21:11 IST, 10 दिसम्बर 2010 Rajeev Ranjan:

    सलमाजी इस मुद्दे को उठाने के लिए कोटिश धन्यवाद, पर इस पर विस्तार से प्रकाश डाला होता तो बेहतर होता.

  • 6. 12:25 IST, 11 दिसम्बर 2010 himmat singh bhati:

    सलमाजी आपने कहा है कि मानवाधिकार किसके तो मैं कहना चाहता हूँ कि ये मौक़ा किसी को श्रद्धांजलि देने और इस दिवस को मनाने की औपचारिकता भर बनकर रह गया है. मानवाधिकारों के लिए कोई मंत्री या कौन सा मंत्रालय ज़िम्मेदार है, इसका किसी को पता तक नहीं है.

  • 7. 12:56 IST, 11 दिसम्बर 2010 Ebad Ali Khan :

    मैडम आप की सोच मानव अधिकार की धारणा के विपरीत है. हम सभ्य समाज की कल्पना करते हैं जहाँ जंगल का कानून नहीं चलता. मध्यपूर्व में चोर का हाथ काटना आज किसी भी दृष्टि से सराहनीय नहीं माना जाता चाहे इस व्यवस्था के अलमबरदार इसकी कितनी हिमायत करते रहें. जघन्य से जघन्य जुर्म करने वाले अपराधी को सुधार कर इन्सान बनाना एक सभ्य समाज की आदर्श सोच है. ऐसे में यह सोचना कि किसी जघन्य अपराधी के साथ जेल में कोई रियायत नहीं होनी चाहिए, उचित नहीं लगता. आप को शायद पता होगा क़ि जघन्य अपराध करने वाले जेल में हीरो बन कर जीते हैं. दूसरे कैदी उनके आगे पीछे घूमते हैं. पहले जेल की व्यवस्था ठीक करने की तरफ लोगों का ध्यान जाना चाहिए. न्याय व्यवस्था को सुचारू बनाने पर जोर देना चाहिए जिससे कि मुकदमों का निपटारा जल्द से जल्द हो. ऐसा होने पर अपराधी को तो अपने किए का फल मिल ही जाएगा. हमारी न्याय व्यवस्था में फँसी देने तक का प्रावधान है लेकिन ऐसी सज़ा सुनाने में लोगों का हाथ क्यों कांपता है. जेल में अपराधियों की दादागिरी पर तभी रोक लगेगी जब व्यवस्था ठीक होगी.

  • 8. 13:17 IST, 11 दिसम्बर 2010 ZIA JAFRI:

    सलमाजी आपकी बात एकदम सही है मानवाधिकार उनके होने चाहिए जो सही में इसके हक़दार हैं न कि उनके लिए जो मानवता को शर्मसार करते हैं. मानवाधिकार संगठनों को अच्छी तरह से पता होता है कि जिनकी वो आवाज़ उठा रहे हैं, उनकी वास्तविकता क्या है और अगर कोई किसी ग़लत व्यक्ति की बात करता है तो उस संगठन की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है.

  • 9. 13:25 IST, 11 दिसम्बर 2010 dkmahto:

    तुलसीदासजी सही कह गए हैं कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं.

  • 10. 14:20 IST, 11 दिसम्बर 2010 NK Thakur:

    देश में नक्सल आतंक के कारण लाखों लोगो के मानवाधिकार समाप्त हो गए है उनकी जिंदगी हर पल ख़तरे में है. ये भी एक गंभीर और विचारणीय विषय है.

  • 11. 15:21 IST, 11 दिसम्बर 2010 abhinav yadav:

    मुझे आपका ब्लाग अच्छा लगा और मैं उसकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ.

  • 12. 22:19 IST, 11 दिसम्बर 2010 डॉ.लाल रत्नाकर:

    सलाम जी पहले तो आप को बधाई की आपने एक ज्वलंत और सदियों के ऐसे चुभते हुए घाव को सहलाने की जहमत की है जिससे जैसे 'एक पीड़ित प्राणी के घाव पर मक्खियाँ भिन-भिना रही हों'. वैसे ही दुनिया के उस हर समाज में वह जो सामर्थ्यवान है सदा से अपने 'कर्म' या 'दुष्कर्म' के निकम्मेपन से 'अनेक प्रकार के आघात करता/कराता आया है, उसकी सारी ऊर्जा उसके दुष्कर्मों की सूची को लंबा करने में इस्तेमाल होती आई है. बेहतर और मानवाधिकारों की चिंता करने वाले कमोबेश उसके इन्ही पहलुओं पर उलझ कर रह जाते है.
    समग्र रूप से इससे निजात का रास्ता क्या हो इसको ब्लॉग में सुझाया गया होता तो शायद कुछ अलग हो सकता. वैसे तो आपने अंतरराष्ट्रीय पहलुओं की परिधि में झांकने की जो कोशिश की है वो प्रसांगिक हो सकती है. पर हिंदी अथवा भारत के संदर्भ में 'मानवाधिकारों' की चर्चा से जो पीड़ा उत्पन्न होती है, शायद उनकी तरफ आपका इशारा है! पुनः आपको साधुवाद, पर कभी फुर्सत मिले तो इनके उपचार के लिए मीडिया क्या सोचता है, जरुर बताइएगा. इंतजार रहेगा.

  • 13. 02:03 IST, 12 दिसम्बर 2010 Prashant:

    मैं आपकी बातों से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ. जेल में बंद कैदी के मानवाधिकारों की हमें क्यों चिंता करनी चाहिए? उन्हें वहाँ क्यों पाँच सितारा सुविधाएँ मिलनी चाहिए?

  • 14. 06:46 IST, 12 दिसम्बर 2010 amit batra srikaranpur:

    मानवाधिकारों मानवों के होने चाहिए, जो मानव नहीं हैं, उनके काहे के अधिकार. दूसरों के अधिकारों के हनन करने वाले खुद के अधिकारों की बात कैसे कर सकते हैं. लेकिन आजकल ये ही हो रहा है. हज़ारों की जान लेने वालों को सज़ा देने के समय उनके मानवाधिकारों को उनकी ढाल बना दिया जाता है.

  • 15. 14:08 IST, 12 दिसम्बर 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB :

    सच्चाई हमेशा कड़वी होती है और सच दुनिया के सामने रखने के लिए सलमा जी बधाई हो! अक्सर हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और वाली कहावत चरित्रार्थ होती दिखाई देती है. क्योंकि जो लोग मानवाधिकारों की वकालत करते है वे ही लोग दुनिया के सामने दोयम समाज का सृजन करने के अपराधी हैं?

  • 16. 14:18 IST, 12 दिसम्बर 2010 Naran gojia -rajkot, guj.:

    अधिकार और फर्ज का संबंध समझे बिना ये लोग विरोध करते हैं. मानव के लिए जीवन में अधिकार महत्वपूर्ण है, पर जो फर्ज का पालन न करे उसको अधिकार कैसा. जो दूसरों के अधिकार की नहीं सोचते उनका कोई अधिकार नहीं होता.

  • 17. 07:24 IST, 13 दिसम्बर 2010 ranjit kumar :

    सलमाजी आपने जेलों में बंद क़ैदियों के मानवाधिकारों की बात तो उठाई लेकिन आश्चर्य इस बात का हुआ कि आपके आलेख में उनके मानवाधिकारों की बात कैसे छूट गई जिनके पास बिछाने के लिए फुटपाथ है और ओढ़ने के लिए सिर्फ़ खुला आकाश है. इस देश में सिर्फ़ उन लोगों के मानवाधिकारों की बात की जाती है जो दूसरों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं. क्या उनके मानवाधिकारों की बात नहीं होनी चाहिए जो उनके जुल्मों का शिकार होते हैं?

  • 18. 10:10 IST, 13 दिसम्बर 2010 Shafiqur Rahman khan yusufzai:

    चाह कर भी रत्ती भर भी आपसे सहमत नहीं हो सकता. मानव और अमानव महज़ दो शब्द नहीं हैं बल्कि अमानव शब्द का कोई मतलब नहीं है! अमानव (दानव हिंदी का एक शब्द) जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में नहीं है. ये शब्द दुश्मनों के लिए गढ़ा राजनैतिक शब्द है और जहाँ राजनीति या रणनीति की बात होगी वहां पक्ष और विपक्ष दोनों होंगे. हाँ जानवर है और उसके भी अपने अधिकार हैं. बलात्कारी, आतंकवादी (जिसे आपने अतिवादी कहा है) भी समान तौर से मानवाधिकार के अधिकारी हैं और राज्य का काम है इसको सुनिश्चित करना. अगर राज्य हर किसी के साथ वैसे ही बर्ताव करे जैसे उसने किया है तो राज्य और उस व्यक्ति में कोई अंतर नहीं रह जाएगा और राज्य नैतिक तौर पर दंड देने का अधिकार खो देगा. वैसे भी मानवाधिकार लोकतांत्रिक विचार है जहाँ सभी पक्ष और विपक्ष की चेतना को फलने का मौका दिया जाना सुनिश्चित किया जाता है. दूसरी बात हर मानव (अपराधी बलात्कारी, आतंकवादी) को समाज के भीतर पैदा किया जाता है. वो समाज से ही निकले हुए लोग हैं, उन्होंने जो भी सीखा है उसके किए अपराधों में समाज बराबरी का भागीदार है. बचपन से उनका प्रशिक्षण उन्हें रास्ता दिखता है और वो रास्ता कैसा भी हो सकता है.
    मुझे ताज्जुब होता है कि जितनी समग्रता से दुनिया 20 वी सदी में सोच सकती थी 21 वी सदी में हम उतने ही संकीर्ण हो गए हैं.

  • 19. 12:32 IST, 14 दिसम्बर 2010 guddu:

    जहाँ मानवता ही नहीं हो वहाँ मानवता का अधिकार कहाँ से पैदा होगा. यही दुनिया की सच्चाई है.

  • 20. 17:24 IST, 14 दिसम्बर 2010 vivek kumar pandey:

    सलमा जी, आप कैसी भूल कर रही हैं. मानवाधिकार पर अंतरराष्ट्रीय घोषणा पत्र बिलकु दुरूस्त है. सबके मानवाधिकार होते हैं वो मानव हो या दानव. अपराधी को भी सजा इज्जत से मिलनी चाहिए.

  • 21. 18:39 IST, 15 दिसम्बर 2010 mukesh kumar from ranchi:

    जहां दानवता ने मानवता को सर्वत्र मसल रखा हो,वहाँ अधिकार को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है सलमा जी.

  • 22. 11:44 IST, 16 दिसम्बर 2010 Charanjiv Singh:

    बहुत अच्छा लेख है. लिखते रहिए...

  • 23. 20:11 IST, 22 दिसम्बर 2010 बालकिशन अटले:

    बिलकुल सही लिखा है मैँ आपकी बात से सहमत हूँ.

  • 24. 17:20 IST, 28 दिसम्बर 2010 om:

    सलमा जी, बहुत अच्छा लगा यह ब्लॉग पढ़ कर. मैं आपका ध्यान एक और बात की ओर दिलाना चाहूँगा. दहेज निवारण क़ानून 498ए. इस क़ानून के तहत बहुत सारे लोगों को बिना किसी जाँच के गिरफ़्तार किया जाता है जबकि हिंदुस्तान में बहुत सारे मामले ऐसे हैं जो बिलकुल झूठे और ब्लैकमेलिंग के लिए किए जाते हैं. मानवाधिकार आयोग को इस के तहत गिरफ़्तार लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए और भारत सरकार से आग्रह करना चाहिए कि इसमें सुधार करें.

  • 25. 09:43 IST, 12 फरवरी 2011 Rajesh Singh:

    अंजाम देखा आपने होस्नी मुबारक का
    था मिस्र का भी वही जो है हाल भारत का

    परजीवियों के राज का तख्ता पलट कर दो
    जन में नई क्रांति का जोश अब भर दो

    उठो, आओ हिम्मत करो क्रांति का परचम धरो
    मत भूलो यह सरोकार अच्छा है मानवाधिकार.

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