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बारात का ऐसा हश्र?

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 15 दिसम्बर 2010, 11:31 IST

पिछले दिनों एक शादी के सिलसिले में बिहार जाना हुआ. दूर के रिश्तेदार हैं. बड़ा आग्रह था तो मैंने भी सोचा मिथिलांचल की शादी देखी जाए. मिथिलांचल में बारातियों की ख़ातिरदारी के बारे में काफ़ी कुछ सुन रखा था.

मैंने भी पूरी तैयारी की. सूट सिलवाया, जूते खरीदे. पूरे रास्ते सोचता रहा कि कैसी आवभगत होगी वगैरह वगैरह. पहुँचे तो स्वागत हुआ सामान्य रुप से.

नाश्ता मिला. उसके बाद शादी की रस्में शुरु हुईं और बारात में मुझ जैसे लोग चुपचाप इंतज़ार करने लगे बेहतरीन भोजन का. समय बीतता गया और घड़ी की सुइयों के साथ ही पेट की आंतों ने क्रांति शुरु कर दी.

आखिरकार साढ़े ग्यारह बजे मैंने पूछ ही लिया कि भाई खाना कब मिलेगा? कुछ बुज़ुर्ग लोगों ने आंखों-आंखों में इशारा भी किया कि ऐसे नहीं पूछते. ख़ैर मैं दिल्ली वाला होने के नाते थोड़ा तो बेशर्म हो सकता था. कहा गया बस पाँच मिनट में सब तैयार हो जाएगा.

उनके पाँच मिनट क़रीब ढाई घंटे के बाद हुए. रात के दो बजे खाने के लिए बुलाया गया. ठंड के मौसम में रात, रात ही होती है. खाने पर बैठे तो प्लेटें आई जिसमें पूरियाँ, दो सब्ज़ियाँ, सलाद, पापड़ और चटनी थी. और दो प्लेटों में कुछ और सब्ज़ियाँ. पूरी तोड़ने की कोशिश की तो समझ में आया कि पूरियाँ फ्रिज़ से निकाली गई हैं. वही हाल पूरे भोजन का था. खाना ठंडा था. एक सब्ज़ी से बदबू भी आ रही थी.

मरता क्या न करता. सलाद खाने की ही कोशिश की. बीच बीच में बासी पूरियाँ दोबारा तल कर आती रहीं और पूछा जाता रहा, "पूरियाँ चाहिए?" क्या कहता? बोल भी नहीं पाया कि खाना बहुत ख़राब है. बाराती जो ठहरे. कमोबेश सारे बाराती भूखे पेट वापस लौटे.

कारण समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ. लड़की के परिवार वाले अच्छे घर के हैं. सम्मानित लोग हैं फिर भी मेहमानों के साथ ऐसा व्यवहार? यह अद्बुत अनुभव लेकर मैं अपने गाँव लौट आया.

दिल्ली वापस लौटने के क्रम में गाँव से स्टेशन के लिए गाड़ी किराए पर ली. मन में बारात वाली बात ही थी. अपनी पत्नी से यही बातें कर रहा था तो ड्राइवर ने कहा, "अरे सर आप क्या बात कर रहे हैं आजकल यहाँ शादियों में यही होता है."

इससे पहले कि मैं कारण पूछता, उसने ख़ुद ही बताना शुरु कर दिया, "सर मैं कल ही एक बारात से लौटा हूं. खाने में मटन बनाया गया था लेकिन उसमें नमक और मिर्च इतना डाल दिया गया कि खाना दूभर था. बारातियों ने तो खा लिया लेकिन ड्राइवरों ने लड़की वालों से पूछ ही लिया कि भई आपने इतना मंहगा भोजन बनाया फिर इसमें इतना नमक क्यों डाल दिया है? खाना परोसनेवालों का जवाब था, दस लाख रुपए लीजिएगा तो ऐसा ही खाना खाना पड़ेगा."

मेरे ड्राइवर ने क़िस्सा जारी रखा, "हम ड्राइवरों ने पूछा कि आप लड़की वालों ने दहेज दिया, लड़के वालों ने लिया तो इसमें बारात का क्या क़सूर? तो लड़की वाले बोले, जब दहेज पूरा नहीं हो रहा था तो आप ही गांव वाले थे जो कह रहे थे कि लड़के को आने नहीं देंगे शादी के लिए. अब बोलिए. लड़के की शादी हो रही है. आप यही खाइए. लड़की के बिना बारात वापस ले जाने की बात करेंगे तो मार खाइएगा."

ड्राइवर की बात सुनी तो समझ में आया कि माजरा क्या है. समझ में आया कि आजकल बिहार में बहुत से लोग बारात में शामिल होने से कतराते क्यों हैं.

ग़लती किसकी कहें? लड़की वाले मजबूरी में दहेज देते हैं तो अपनी नाराज़गी किस पर निकालें? लड़के और लड़के के घर वालों पर तो नहीं निकाल सकते. बीच में फँसते हैं बाराती जिनके साथ की जाती है बदतमीज़ी. लेकिन बात बारातियों की या मेहमानों की बेइज़्ज़ती की नहीं है. बात एक सामाजिक समस्या की है जो अब एक अनोखा रुप ले रही है.

शायद वो दिन आए जब लोग बारात जाने से पहले ये कहें कि अगर दहेज लिया है तो हम बारात में नहीं आ सकेंगे.

मैंने डाक्टरों, इंजीनियरों और सरकारी अधिकारियों को दहेज लेते और देते देखा है. तर्क ये रहता है कि सामाजिक दबाव है, शादी का खर्च कौन देगा इत्यादि.

एक अलग तरह का सामाजिक दबाव बनता दिख रहा है लेकिन वो अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है. बाराती किसी शादी का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं जो शादी को सामाजिक प्रामाणिकता देते हैं. अगर वो पीछे हटें तो दबाव बनता है.

मैंने तो तय कर लिया है. अब किसी की भी शादी में बारात जाने से पहले ये ज़रुर पूछूंगा, "भाई दहेज लिया है तो बता दो. मैं नहीं आऊंगा. और अगर जाना ही पड़े तो कम से कम घर से खाना खाकर बारात में जाऊंगा."

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:41 IST, 15 दिसम्बर 2010 BHEEM SINGH:

    सुशील जी बिहारी होकर बिहार पर कीचड़ न फेंकें. आपने ये क्या विषय चुना है. यदि प्रधानमंत्री रिश्वतख़ोरों को बचा सकते है तो बेचारा आम आदमी भी तो वही रास्ता अपनाएगा. इसमें क्या ख़ास बात है.आपने तो सुना ही होगा जैसा राजा वैसी प्रजा.

  • 2. 13:49 IST, 15 दिसम्बर 2010 Ajeet S Sachan:

    मेरा मानना है कि अब इस समस्या पर कुछ भी कहना बेकार है क्योंकि इसे अब समाजिक मान्यता मिल चुकी है.अब लड़के वालों को अपने लड़के को बेचने का काम किसी और तरीके़ से करना चाहिए ताकि शादी और बरात जैसी चीज़ें ढ़ग से हो सकें.

  • 3. 14:10 IST, 15 दिसम्बर 2010 Saagar:

    सुशील जी कभी आपको मौका मिले तो आप ज्ञान चतुर्वेदी की "बारामासी" भी पढ़िए. इसमें आपको बाराती के स्वागत और दहेज का जीवंत चित्रण मिलेगा.

  • 4. 14:13 IST, 15 दिसम्बर 2010 Ghalib Ayaz:

    वाह सुशील भाई. आपने अपना अनुभव हमारे साथ बांटा. दहेज एक कोढ़ की तरह समाज को चाटता जा रहा है और हम सब बेबस हो कर तमाशा देख रहें हैं. हमारे समाज में ये देखकर दुख होता है की दहेज लेने वालों से ज़्यादा दहेज देने वाले हो गये है.मैं बिहार का ही रहने वाला हूँ और मैंने हाल ही में देखा कि एक लड़के की शादी तय हुई. दो लाख रुपए उस की क़ीमत लगाई गई. "नकद भुगतान" से पहले ढ़ाई लाख देने वाले आ गये और बात पक्की हो गई.इसका मतलब तो ये हुआ न कि नैतिकता का भी पतन हो रहा है .

  • 5. 14:29 IST, 15 दिसम्बर 2010 Ravi Yadav:

    सुशील जी मज़ा आ गया. हाल ही मैं मुझे अपने एक रिश्तेदार की शादी में यही सहना पड़ा. लेकिन इस बात को आपने इतने बेहतर तरीके से समझाकर समस्या का विवरण दिया है ऐसा मैं कभी सोच भी नहीं सकता था. आपका लेख बहुत ही व्यंगात्मक था. अति उत्तम पत्रकारिता का एक और बेहतरीन रंग.

  • 6. 14:44 IST, 15 दिसम्बर 2010 braj kishore singh:

    सुशीलजी, मैं बिहार में रहता हूँ और अक्सर बारात में जाता रहता हूँ इसलिए इस तरह के व्यवहार से अपना तो बराबर ही पाला पड़ता रहता है. इस तरह की घटना के लिए सिर्फ़ दहेज ही ज़िम्मेदार हो कोई ज़रुरी नहीं है. अभी हाल ही में मैं एक ऎसी शादी में शामिल हुआ जिसमें दहेज नहीं लिया गया था फिर भी भोजन का प्रबंध अच्छा नहीं था.

  • 7. 15:22 IST, 15 दिसम्बर 2010 Mahendra Singh:

    आपने बहुत अच्छा लिखा है और आपको सच भी पता चल गया कि क्यों आपको इतना ख़राब खाना मिला था. वो दिन चले गए जब 'अतिथि देवो भव' होता था.

  • 8. 15:41 IST, 15 दिसम्बर 2010 Pranshu:

    सुशील भाई इस बात की कोई गांरटी नहीं है कि दहेज न मिलने पर भी भारतीयों को खाना मिल जाए. मेरा अनुभव कहता है कि इन लोगों की नियत पर निर्भर करता है. मेरी शादी बिना किसी दहेज के हुई थी और दोनों परिवार अपने इलाके के प्रतिष्ठित परिवार हैं. उसके बाद भी 30 लोगों की बारात को भी खाना नहीं मिला. बारात तो छोड़ो मुझे खाना नहीं मिला. अब आप इस पर क्या कहेंगे. जितना लड़की वालों ने ख़र्च किया था उससे कहीं ज़्यादा हमनें स्वागत समारोह में ख़र्च किया. ऐसा भी नहीं था कि वो लोग ग़रीब थे. उसके बाद भी ऐसा हुआ. इस पर आप क्या कहेंगे नियत में ख़राबी या कुप्रबंधन.

  • 9. 18:20 IST, 15 दिसम्बर 2010 यूसुफ अली अजीमुदीन खाँ (भीँचरी):

    हमारे देश में दहेज प्रथा बढती जा रही है. सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है,यही कारण है कि लोग बेटी को जन्म से पहले कोख में ही नष्ट कर देना चाहते हैं. पिछले कुछ ही महीनों में राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में पन्द्रह लावारिस नवजात लड़कियाँ जिन्दा व मुर्दा मिलीं. प्रशासन को सचेत होना चाहिए, दहेज लेने और देने वालों को कङी सजा देनी चाहिए.

  • 10. 23:02 IST, 15 दिसम्बर 2010 meenal:

    हो सकता है उन्होंने खाने में ज़हर भी मिला रखा हो. धिक्कार है ऐसे लोगों पर जो दहेज लेते हैं.

  • 11. 23:22 IST, 15 दिसम्बर 2010 राज भाटिया:

    झा जी मुझे तो यह तरीका बहुत अच्छा लगा, मैने शादी बिना दहेज के की हे, मेरे दो बेटे हे दोनो की शादी भी बिना दहेज के होगी, लेकिन यह आप ने जो तरीका बताया इस से लोग शायद दहेज से परहेज करने लगेंगे. बिहार से ही एक अच्छी शुरुआत हो. कुछ कठिनाई तो होगी लोगो को लेकिन एक बुराई समाज से हट जायेगी. काश ऎसा पूरे भारत में हो. धन्यवाद.

  • 12. 23:46 IST, 15 दिसम्बर 2010 सत्य प्रकाश :

    इसमें माता पिता की ज्यादा भूमिका है.

  • 13. 10:12 IST, 16 दिसम्बर 2010 dkmahto:

    आश्चर्य है आपको यह बात आज पता चल रही है. भाई, यह कहानी तो बरसों पुरानी है.

  • 14. 12:00 IST, 16 दिसम्बर 2010 ZIA JAFRI:

    सुशील जी, बारातों में अव्यवस्था कोई नई बात नहीं है. आप मिथिलांचल की शादी का मुक़ाबला दिल्ली की शादी से नहीं कर सकते हैं. जहाँ बारात घर होते हैं, खाना बनाने और खिलाने का काम प्रशिक्षित लोग करते हैं. प्लेटें गिन कर उठाते हैं और उनका उसी हिसाब से भुगतान होता है. जबकि छोटे शहरों में यह सब काम घर के लोग करते हैं जहाँ उनका इस प्रकार का कोई अनुभव नहीं होता. इस सब बातों का दहेज से कोई संबंध नहीं है. कोई जानबूझ कर किसी का अनादर नहीं करता. यह सब प्रबंधन की समस्या है.

  • 15. 12:24 IST, 16 दिसम्बर 2010 रणवीर कुमार:

    मेरी शादी भी हुई... मैं दहेज का घोर विरोधी हूँ अतः मैंने तय किया था कि कोर्ट में शादी हो। परन्तु दोनों पक्षों के परिवारजनों ने ज़ोर दिया कि शादी परम्परागत रूप से ही होनी चाहिए, जो हुआ भी। शादी में ज़ोर-शोर से बाराती नाचते-झूमते पहुँचे... उनका भव्य स्वागत हुआ और भोजन का अति-उत्तम प्रबन्ध था... सुशील जी, आपसे मैं पूर्णतया सहमत हूँ। मैं तो कहता हूँ कि गाँव के लोग व रिश्तेदार ही यह दवाब बना सकते हैं कि भाई दहेज न लिया जाए अन्यथा हम नहीं आएँगे। इस कोढ़ को समाज से निकालना हम आमजनों की ही ज़िम्मेदारी है। आख़िरकार लाभ तो हमें ही मिलेगा और स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकेगा। यह सुनने में सैद्धान्तिक अधिक व प्रायोगिक कम लगे, पर आशा करता हूँ कि एक दिन ऐसा आएगा।

  • 16. 13:56 IST, 16 दिसम्बर 2010 prithvi:

    आपने सही बात कही है, समाज सच में बदल रहा है.
    एक बात और कहाँ चाहूँगा की पहले खाना घराती यानी लड़की के घर वाले या गाँव के लोग बनाते थे और बड़े चाव से बनाते और खिलाते थे ताकि पूरे गाँव का नाम हो. बुफे सिस्टम ने सत्यानाश कर दिया है उस परम्परा का ..

  • 17. 14:20 IST, 16 दिसम्बर 2010 subodh choudhary:

    आपकी बातें बहुत हद तक अच्छी लगीं. आजकल तो दहेज नहीं लेने वालों की संख्या अपवाद ही है. फिर भी हर शादी में बारात के साथ बदसुलूकी नहीं की जाती. कहीं-कहीं बदले की भावना या कुप्रबंधन की वजह से ऐसा होता है. यह सोचना कि जिसने दहेज लिया है उसकी शादी में हम बारात में नहीं जाएँगे, बिलकुल सही है. मेरे गाँव में मेरे एक चाचाजी ऐसा ही करते हैं. दहेज की समस्या को हटाने के लिए एक कारगर उपाय यह भी हो सकता है.

  • 18. 18:08 IST, 16 दिसम्बर 2010 Javed - Yemen:

    सुशील जी, दहेज के लिए भारतीयों का स्वागत तो आपको नागवार गुज़रा लेकिन जो लोग दहेज इच्छा से नहीं लेते हैं फिर भी उनको लड़की वालों के नख़रे उठाने पड़ते हैं. उनके बारे में क्या कहिएगा? जिन बेचारों के ख़िलाफ़ दहेज क़ानून की धारा 498 का दुरुपयोग होता है उनके बारे में क्या कहिएगा? कितने ही ऐसे भुक्तभोगी परिवार हैं. रिश्वत लेना और देना दोनों अपराध हैं. दहेज भी एक प्रकार का भ्रष्टाचार है. यहाँ पर भी दोनों ही अपराधी हैं. आपको एक वक़्त ठीक से खाना नहीं मिला तो इतना आक्रोश, जो भुक्तभोगी हैं उनके बारे में भी कभी लिखिएगा.


  • 19. 19:07 IST, 16 दिसम्बर 2010 anand:

    सुशील जी नमस्कार, आप का लेख पड़कर बहुत अच्छा लगा.
    अब आप से उम्मीद है कि नई सरकार की तरह आप का भी काम केवल बिहार के विकास में हो.
    आप बीबीसी की जर्नालिस्ट टीम के मेम्बर हैं , आप कृपया कर के बिहार के साथ होने वाले भेद भाव को मुख्य पेज पे प्रकाशित करें. आप भी यह जानते है, बिहार को स्पेशल राज्य का दर्जा मिलना चहिये ताकि वोह महाराष्ट्र जैसे राज्य के साथ मुकबला कर सके
    आज बिहार हर फ़ील्ड में पिछड़ा हुआ है. आप अपना समय, एक बिहारी होने के वास्ते बिहार की भलाई में लगाएँ न कि उसके कमियों को उजाकर करें.

  • 20. 20:49 IST, 16 दिसम्बर 2010 Saptarshi:

    बहुत सही कहा आपने. अब हर व्यक्ति को ऐसा ही करना चाहिए. अगर शादी में दहेज लिया गया तो उस बारात में जाना ही नहीं चाहिए.

  • 21. 21:58 IST, 16 दिसम्बर 2010 sourabha suman:

    सुशील जी, आपको ऐसी परिस्थिति में लड़की वालों से कह देना चाहिए था कि पूड़ी वग़ैरह खाने से डॉक्टर ने मना किया है, इसलिए अगर आप दही चूड़े का प्रबंध करा दें तो अति उत्तम होगा.

  • 22. 22:34 IST, 16 दिसम्बर 2010 Raghav:

    देखिये झा जी कोई सामाजिक दबाव ओबाव नहीं बन रहा है न बन सकता है. जब लड़की को देख के लड़के वाले छोड़ दें तो बड़े बुरे है, पर जब लड़की वाले लड़के को देख के छोड़ दें तो कोई बात नहीं. ठीक? जब बेरोजगार लड़के की शादी के लिए दहेज न भी मांगे तो भी कोई शादी नहीं करना चाहता पर जब वही लड़का कलक्टर हो जाए और दहेज मांगे तो बड़ी बुरी बात है. है की नहीं? अरे नारीवाद का चश्मा उतार कर समाज को देखिये सब पता चल जायेगा.

  • 23. 03:30 IST, 17 दिसम्बर 2010 अमलेन्दु :

    मुझे समझ नहीं आया की इस लेख का विषय क्या है. क्या आप बारातियों के साथ हो रही बदसुलूकी से नाखुश हैं या फिर शानदार भोजन के ना मिलने से? दहेज प्रथा के खिलाफ आप बोल रहे हैं ये तो ठीक से जान नहीं पडता. खैर, जो भी हो शादी में दहेज और होने वाले अत्यधिक खर्चे दोनों से मैं सहमति नहीं रखता. लड़की वाले चाहे जैसा भी स्वागत कर लें आप जैसे बाराती नाक ही सिकोड़ते रहेंगे. जैसे शादी में वर वधु को बधाई देने न आये हों बल्कि मुफ्त की दावत उड़ाने. मैं तो सभी से यही विनती करूँगा की न तो दहेज लीजिए और न ही लड़की वालों पर अति भव्य स्वागत करने का दबाव बनाइये. यदि शादी की शुरुआत ही दबाव और परेशानियों से होगी तो फिर क्या मजा है? मजा तो तब है जब दोनों पक्षों को ये लगे की अब वो एक दूसरे के हो कर साझी समझ रखते हैं.

  • 24. 10:55 IST, 17 दिसम्बर 2010 sunneil:

    दहेज व्यवस्था पर यह अच्छी टिप्पणी है लेकिन आपने खाने की जो बात कही है उसे मैं सही नहीं मानता क्योंकि मैं भी कई बारातों में गया हूँ.

  • 25. 11:44 IST, 17 दिसम्बर 2010 Rajesh Kumar:

    इस बारे में तो यही कहा जा सकता है कि जैसी करनी वैसी भरनी.

  • 26. 16:14 IST, 17 दिसम्बर 2010 Samir:

    सुशील भाई बिहार हमेशा बिहार ही रहेगा और बिहारियों की सोच भी नहीं बदलेगी.

  • 27. 18:07 IST, 17 दिसम्बर 2010 Satya:

    मजबूरी में दहेज देना...क्या वधू पक्ष को इतना मजबूर होना चाहिए. क्यों नहीं कन्याओं को शिक्षित कर उनमें विश्वास पैदा किया जाए.

  • 28. 20:16 IST, 17 दिसम्बर 2010 Prajesh Prajapati:

    ऐसा सब जगह नहीं होता है. या तो बरातें आपने देखी नहीं या आपकी किस्मत खबराब रही. यह आपकी अनुभवहीनता है.

  • 29. 12:22 IST, 20 दिसम्बर 2010 Ranjit:

    समस्या सिर्फ दहेज की वजह से पैदा नहीं हुई है. दरअसल यह समाज में तेज़ी से घर करते व्यक्तिवाद का परिणाम है. लोग अब लड़का देखते हैं, बराती से उन्हें क्या मतलब. शादी हो गई, बस्स! दहेज तो पुरानी समस्या है लेकिन बरातियों के अपमान का यह तरीका नया है. यह व्यक्तिवाद और बाजारवाद की निशानी है.

  • 30. 16:15 IST, 03 जनवरी 2011 bam shankar:

    सुशील जी अपने तो इसे एक खबर बना दिया है. बिहार में आज दहेज लेना और देना एक स्वाभिमान की बात हो गई है. अगर किसी को सरकारी नौकरी मिल जाए तो लड़की वालों का तांता लग जाता है. लड़के वालों से पहले लड़की वाले खुद ही कह देते हैं मैं इतने पैसे दूंगा. आप उन लड़कियों के बारे में भी लिखें जिनमें इस बात को लेकर हीनभावना पैदा हो जाती है. मुझे लगता है कि आज लड़की वाले भी दहेज प्रथा के लिए उतने ही दोषी हैं जितना हम लड़के वालों को मानते हैं.


  • 31. 20:48 IST, 14 जनवरी 2011 अरुण कुमार पांडेय, बोमडिला,अरुणाचल प्�:

    सुशील जी आपकी टिप्पणी बेबाक और मूल पर चोट करती है. दहेज का दानव सामाजिक सांस्कृतिक संरचना को निगल रहा है. समस्या का समाधान भी आपने सुझाया है, बारात जाने के पहले यह सुनिश्चित कर लें कि दहेज लिया गया या नहीं.

  • 32. 05:09 IST, 25 जनवरी 2011 Harish Joshi:

    मेरे विचार में वधू के माता-पिता को दहेज देने के बाद वर को अपने यहाँ रख लेना चाहिए. उन्होंने उसे ख़रीदने का दाम दिया है तो उससे अपने यहाँ काम कराएँ.

  • 33. 00:00 IST, 30 जनवरी 2011 हैदर अली सलीमापुर छपरा:

    अरे भाई आपने बिलकुल सही लिखा है. आजकल ऐसी बातें बहुत हो रही हैं. ऐसा खुद मेरे साथ भी हुआ है. बात है 27DEC 2010 की मैं भी एक बरात में गया था. गाँव था राजापट्टी और सर्दी का मौसम. वह भी कड़ाके की सर्दी. हम गये तो साधारण नाश्ता मिला. यहाँ तक तो ठीक था लेकिन जब निकाह की बारी आई तो दहेज की बकाया रकम के बारे में बहस होने लगी. बहस तो लड़के वाले और लड़की वाले के बीच हो रही थी लेकिन बेचारे बराती सर्दी से ठिठुर रहे थे. आख़िरकार बहस खत्म हुई. तबतक तरीख़ बदल चुकी थी. फिर हमने खाना खाया जो कि बर्फ़ की तरह ठंडा हो चुका था. इनसब के पीछे कारण बना दहेज.

  • 34. 22:55 IST, 30 जनवरी 2011 suman (bhopal):

    सुशील जी, आप तरह के पत्रकार इस तरह की बातें करते हैं तो अच्छा नहीं लगता, आप मिथिलांचल में बारातियों के स्वागत के बारे में कुछ नहीं जानते. कभी दरभंगा, मधुबनी आदि में शादियों में आइए. यदि एक जगह आपको परेशानी का सामना करना पड़ा तो आप पूरे मिथिला समाज को इस तरह से बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. एक बिहारी होने के नाते आप कम से कम इस तरह की बातें न करें तो अच्छा है.

  • 35. 00:38 IST, 28 अक्तूबर 2011 prince:

    आपकी सोच बहुत अच्छी है.

  • 36. 13:23 IST, 28 अक्तूबर 2011 Amit Anurag:

    ये समस्या सिर्फ़ बिहार की नहीं है. ये समस्या तो हमारे समाज की है जिस समाज में हम और आप जी रहे हैं.

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