पत्रकारिता का नया पैमाना
'डिड नीरा कॉल यू?' यानी 'क्या नीरा ने आपको फ़ोन किया था?'
अगर आप पत्रकार हैं तो यह सवाल आपसे पूछा जा चुका होगा. सीधे नहीं, तो थोड़ा घुमा फिराकर. आँख मिलाकर नहीं, तो नज़रें बचाकर. और अगर आप पत्रकार नहीं हैं तो आप अपने किसी पत्रकार मित्र से यह सवाल पूछ चुके होंगे. या सोच रहे होंगे कि यह सवाल उनसे किस तरह से पूछें.
यह ऐसा सवाल है, जो लोकतंत्र के चौथे खंभे के चारों ओर पोस्टरों की तरह चिपका दिया गया है. खंभा इन पोस्टरों के पीछे छिप गया है. एकबारगी लगता है कि पूरा खंभा ही इन पोस्टरों से बना है. हर पोस्टर पर लिखा है, 'डिड नीरा कॉल यू?'
नीरा यानी नीरा राडिया, जो देश के बड़े से बड़े उद्योगपतियों और 'बड़े' से 'ब़डे' पत्रकारों से सहजता से बात करती हैं. उद्योगपतियों को बताती हैं कि उनका काम वे किस तरह साध रही हैं,
पत्रकारों को बताती हैं कि क्या लिखना है क्या नहीं लिखना है. वे यह नहीं छिपाती कि क्या लिखने से कैसा असर होगा. किसे मंत्री बनाने में फ़ायदा है और यह भी कि फलाँ को मंत्री बनाने के लिए ढेकाँ से बात कर लो तो अच्छा है. वे अपने काम में ईमानदार और बहुत हद तक पारदर्शी दिखती हैं.
ऐसा प्रतीत होता है कि नीरा की ख़ासियत यह है कि उन्हें कोई ना नहीं कहता. बड़े पत्रकार उनकी सलाह से लिख देते हैं और कुछ बड़े पत्रकार मंत्री बनाने न बनाने की जुगत जुड़ाते हैं.
पिछले कुछ महीनों में फ़ोन पर हुई उनकी बातचीत के कई टेप सार्वजनिक हुए हैं. इस बातचीत का विवरण जानने के बाद हर कोई पत्रकारों से पूछ रहा है, 'डिड नीरा कॉल यू?'
अब कोई पत्रकार इस सवाल से बच नहीं सकता.
सवाल पूछने वाला चाहे कितना भी क़रीबी क्यों न हो, इस सवाल को मासूमियत के साथ नहीं पूछता. उसका चेहरा भावविहीन नहीं होता. एक तरह की उत्सुकता होती है. और पत्रकार के पास इस बात का कोई विकल्प नहीं है कि वह जवाब न दे.
अब पत्रकारों के सामने संकट यह है कि वह जवाब क्या दे.
अगर वह कहता है कि 'ना' तो एकाएक वह अपने मित्रों और परिचितों की नज़र में गिर जाता है. अच्छे पत्रकार से एकाएक वह टुच्चा सा पत्रकार हो जाता है.
अगर नीरा उसे फ़ोन नहीं करती तो उसकी हैसियत ही क्या है? वह तो किसी काम का नहीं है. अनेक लोगों को ऐसा लगता है कि वह सरकार में किसी को मंत्री नहीं बना सकता, किसी को लाइसेंस नहीं दिलवा सकता, किसी के लिए सरकार की नीतियाँ नहीं बदलवा सकता. कुल मिलाकर वह नाकारा है.
लेकिन यदि वह 'हाँ' कहता है तो एकाएक मित्र और परिचित उसे पत्रकार मानने से इनकार कर सकते हैं. जो इतने बड़े काम करवा सकता है, केंद्र में किसी को मंत्री बनवा सकता है, दो बड़े औद्योगिक घरानों की लड़ाई को बढ़ा सकता है या सुलझा सकता है, तो वह पत्रकार कहाँ रह गया. अगर वह सत्तारूढ़ गठबंधन के सबसे बड़े दल और एक सहयोगी दल के बीच बातचीत का माध्यम है, तो सत्ता के गलियारे में उसकी हैसियत पत्रकार से कहीं ज़्यादा है.
इस 'ज़्यादा हैसियत' का नाम न पूछें तो बेहतर है क्योंकि हिंदी भाषी लोगों के मन में जो संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण उभरते हैं, उसे लिखने में संकोच हो रहा है.
जिन पत्रकारों ने भूतकाल में किसी मित्र-परिचित का कोई काम यह कहकर टाल दिया था कि 'भाई, यह काम अपने बूते का नहीं, हमें तो सिर्फ़ पत्रकारिता आती है', वे अब फ़ोन करके ताने मार रहे हैं. वे कह रहे हैं कि ठीक ऐसी ही पत्रकारिता का सुझाव तो उनका भी था.
जो कम परिचित हैं वो एक बार फिर पूछ रहे हैं, 'आप तो भाई साहब पत्रकार हैं ना?' और फिर बेवजह मुस्कुरा रहे हैं.
अख़बार और मीडिया संस्थानों के मालिक ज़रुर मन ही मन सोच रहे होंगे कि अगली बार किसी को मोटी तनख़्वाह देकर भर्ती करना हो, तो पहले ही पूछ लिया जाए, 'डिड नीरा कॉल यू?' अगर कोई इनकार करे तो उसे भर्ती करने का कोई फ़ायदा नहीं.
नीरा की कॉल इन दिनों पत्रकारिता का पैमाना हो गई है. शायद पत्रकारों की औक़ात का पैमाना!
दिलचस्प यह है कि जैसे बुखार नापने के लिए थर्मामीटर चाहिए होता है उस तरह से पत्रकारों की औक़ात नापने के लिए बस एक सवाल काफ़ी है, 'डिड नीरा कॉल यू?'
जवाब में पत्रकार जो भी कहेगा, वज़न मशीन से निकलने वाली टिकट की तरह फट से उसकी औक़ात का कच्चा चिट्ठा प्रकाशित हो जाएगा.
सुना है कि एक पत्रकार को अपनी औक़ात को लेकर बड़ी चिंता सताने लगी है. उन्होंने अपने पत्रकार मित्र से कहा है कि वे किसी तरह नीरा राडिया से उनकी बात फ़ोन पर करवा दें. उनका वादा है कि इसके बाद फ़ोन टैप करने से लेकर उसकी सीडी बाँटने आदि का काम वे ख़ुद कर लेंगे. खर्चा-वर्चा भी वे देख लेंगे.
और जिन पत्रकार महोदय से यह अनुरोध किया गया है वे सोच रहे हैं कि क्यों न वे पहले ख़ुद अपना जुगाड़ बिठा लें?


