इस विषय के अंतर्गत रखें नवम्बर 2010

पत्रकारिता का नया पैमाना

विनोद वर्माविनोद वर्मा|रविवार, 28 नवम्बर 2010, 12:49

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'डिड नीरा कॉल यू?' यानी 'क्या नीरा ने आपको फ़ोन किया था?'

अगर आप पत्रकार हैं तो यह सवाल आपसे पूछा जा चुका होगा. सीधे नहीं, तो थोड़ा घुमा फिराकर. आँख मिलाकर नहीं, तो नज़रें बचाकर. और अगर आप पत्रकार नहीं हैं तो आप अपने किसी पत्रकार मित्र से यह सवाल पूछ चुके होंगे. या सोच रहे होंगे कि यह सवाल उनसे किस तरह से पूछें.

यह ऐसा सवाल है, जो लोकतंत्र के चौथे खंभे के चारों ओर पोस्टरों की तरह चिपका दिया गया है. खंभा इन पोस्टरों के पीछे छिप गया है. एकबारगी लगता है कि पूरा खंभा ही इन पोस्टरों से बना है. हर पोस्टर पर लिखा है, 'डिड नीरा कॉल यू?'

नीरा यानी नीरा राडिया, जो देश के बड़े से बड़े उद्योगपतियों और 'बड़े' से 'ब़डे' पत्रकारों से सहजता से बात करती हैं. उद्योगपतियों को बताती हैं कि उनका काम वे किस तरह साध रही हैं,

पत्रकारों को बताती हैं कि क्या लिखना है क्या नहीं लिखना है. वे यह नहीं छिपाती कि क्या लिखने से कैसा असर होगा. किसे मंत्री बनाने में फ़ायदा है और यह भी कि फलाँ को मंत्री बनाने के लिए ढेकाँ से बात कर लो तो अच्छा है. वे अपने काम में ईमानदार और बहुत हद तक पारदर्शी दिखती हैं.

ऐसा प्रतीत होता है कि नीरा की ख़ासियत यह है कि उन्हें कोई ना नहीं कहता. बड़े पत्रकार उनकी सलाह से लिख देते हैं और कुछ बड़े पत्रकार मंत्री बनाने न बनाने की जुगत जुड़ाते हैं.

पिछले कुछ महीनों में फ़ोन पर हुई उनकी बातचीत के कई टेप सार्वजनिक हुए हैं. इस बातचीत का विवरण जानने के बाद हर कोई पत्रकारों से पूछ रहा है, 'डिड नीरा कॉल यू?'

अब कोई पत्रकार इस सवाल से बच नहीं सकता.

सवाल पूछने वाला चाहे कितना भी क़रीबी क्यों न हो, इस सवाल को मासूमियत के साथ नहीं पूछता. उसका चेहरा भावविहीन नहीं होता. एक तरह की उत्सुकता होती है. और पत्रकार के पास इस बात का कोई विकल्प नहीं है कि वह जवाब न दे.

अब पत्रकारों के सामने संकट यह है कि वह जवाब क्या दे.

अगर वह कहता है कि 'ना' तो एकाएक वह अपने मित्रों और परिचितों की नज़र में गिर जाता है. अच्छे पत्रकार से एकाएक वह टुच्चा सा पत्रकार हो जाता है.

अगर नीरा उसे फ़ोन नहीं करती तो उसकी हैसियत ही क्या है? वह तो किसी काम का नहीं है. अनेक लोगों को ऐसा लगता है कि वह सरकार में किसी को मंत्री नहीं बना सकता, किसी को लाइसेंस नहीं दिलवा सकता, किसी के लिए सरकार की नीतियाँ नहीं बदलवा सकता. कुल मिलाकर वह नाकारा है.

लेकिन यदि वह 'हाँ' कहता है तो एकाएक मित्र और परिचित उसे पत्रकार मानने से इनकार कर सकते हैं. जो इतने बड़े काम करवा सकता है, केंद्र में किसी को मंत्री बनवा सकता है, दो बड़े औद्योगिक घरानों की लड़ाई को बढ़ा सकता है या सुलझा सकता है, तो वह पत्रकार कहाँ रह गया. अगर वह सत्तारूढ़ गठबंधन के सबसे बड़े दल और एक सहयोगी दल के बीच बातचीत का माध्यम है, तो सत्ता के गलियारे में उसकी हैसियत पत्रकार से कहीं ज़्यादा है.

इस 'ज़्यादा हैसियत' का नाम न पूछें तो बेहतर है क्योंकि हिंदी भाषी लोगों के मन में जो संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण उभरते हैं, उसे लिखने में संकोच हो रहा है.

जिन पत्रकारों ने भूतकाल में किसी मित्र-परिचित का कोई काम यह कहकर टाल दिया था कि 'भाई, यह काम अपने बूते का नहीं, हमें तो सिर्फ़ पत्रकारिता आती है', वे अब फ़ोन करके ताने मार रहे हैं. वे कह रहे हैं कि ठीक ऐसी ही पत्रकारिता का सुझाव तो उनका भी था.

जो कम परिचित हैं वो एक बार फिर पूछ रहे हैं, 'आप तो भाई साहब पत्रकार हैं ना?' और फिर बेवजह मुस्कुरा रहे हैं.

अख़बार और मीडिया संस्थानों के मालिक ज़रुर मन ही मन सोच रहे होंगे कि अगली बार किसी को मोटी तनख़्वाह देकर भर्ती करना हो, तो पहले ही पूछ लिया जाए, 'डिड नीरा कॉल यू?' अगर कोई इनकार करे तो उसे भर्ती करने का कोई फ़ायदा नहीं.

नीरा की कॉल इन दिनों पत्रकारिता का पैमाना हो गई है. शायद पत्रकारों की औक़ात का पैमाना!

दिलचस्प यह है कि जैसे बुखार नापने के लिए थर्मामीटर चाहिए होता है उस तरह से पत्रकारों की औक़ात नापने के लिए बस एक सवाल काफ़ी है, 'डिड नीरा कॉल यू?'

जवाब में पत्रकार जो भी कहेगा, वज़न मशीन से निकलने वाली टिकट की तरह फट से उसकी औक़ात का कच्चा चिट्ठा प्रकाशित हो जाएगा.

सुना है कि एक पत्रकार को अपनी औक़ात को लेकर बड़ी चिंता सताने लगी है. उन्होंने अपने पत्रकार मित्र से कहा है कि वे किसी तरह नीरा राडिया से उनकी बात फ़ोन पर करवा दें. उनका वादा है कि इसके बाद फ़ोन टैप करने से लेकर उसकी सीडी बाँटने आदि का काम वे ख़ुद कर लेंगे. खर्चा-वर्चा भी वे देख लेंगे.

और जिन पत्रकार महोदय से यह अनुरोध किया गया है वे सोच रहे हैं कि क्यों न वे पहले ख़ुद अपना जुगाड़ बिठा लें?

बेईमानों के बीच ईमानदार

विनोद वर्माविनोद वर्मा|बुधवार, 17 नवम्बर 2010, 13:26

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मैं एक प्रशासनिक अधिकारी को जानता हूँ जिनकी ईमानदारी की लोग मिसालें देते हैं.

वे एक राज्य के मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव थे लेकिन लोकल ट्रेन की यात्रा करके कार्यालय पहुँचते थे. वे मानते थे कि उन्हें पेट्रोल का भत्ता इतना नहीं मिलता जिससे कि वे कार्यालय से अपने घर तक की यात्रा रोज़ अपनी सरकारी कार से कर सकें.

वे ब्रैंडेड कपड़े ख़रीदने की बजाय बाज़ार से सादा कपड़ा ख़रीदकर अपनी कमीज़ें और पैंट सिलवाते थे.

जिन दिनों वे मुख्यमंत्री के सचिव रहे उन दिनों सरकार पर घपले-घोटालों के बहुत आरोप लगे. उनके मंत्रियों पर घोटालों के आरोप लगे. लोकायुक्त की जाँच भी हुई. कई अधिकारियों पर उंगलियाँ उठीं.विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त भी हुई. कहते हैं कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अच्छा चंदा भी पहुँचता रहा.

लेकिन वे ईमानदार बने रहे. मेरी जानकारी में वे अब भी उतने ही ईमानदार हैं.

उनकी इच्छा नहीं रही होगी लेकिन वे बेईमानी के हर फ़ैसले में मुख्यमंत्री के साथ ज़रुर खड़े थे. भले ही उन्होंने इसकी भनक किसी को लगने नहीं दी लेकिन उनके हर काले-पीले कारनामों की छींटे उनके कपड़ों पर भी आए होंगे.

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सत्यनिष्ठा और ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहता. अगर कोई चाहे भी तो नहीं उठा सकता क्योंकि वे सच में ऐसे हैं. वे सीधे और सरल भी हैं.

राजीव गांधी के कार्यकाल को इतिहास का पन्ना मान लें और ओक्तावियो क्वात्रोची को उसी पन्ने की इबारत मान लें तो सोनिया गांधी पर भी कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं हैं. कम से कम राजीव गांधी के जाने के बाद वे त्याग करती हुई ही दिखी हैं. एक दशक तक राजनीति से दूर रहने से लेकर प्रधानमंत्री का पद स्वीकार न करने तक.

लेकिन इन दोनों नेताओं की टीम के सदस्य कौन हैं? दूरसंचार वाले ए राजा, राष्ट्रमंडल खेलों वाले सुरेश कलमाड़ी और आदर्श हाउसिंग सोसायटी वाले अशोक चव्हाण.

अटल बिहारी वाजपेयी की गिनती हमेशा बेहद ईमानदार नेताओं में होती रही है. लेकिन उनके प्रधानमंत्री रहते तहलका कांड हुआ, कारगिल में मारे गए जवानों के लिए ख़रीदे गए ताबूत तक में घोटाले का शोर मचा और पेट्रोल पंप के आवंटन में ढेरों सफ़ाइयाँ देनी पड़ीं. यहाँ तक के उनके मुंहबोले रिश्तेदारों पर भी उंगलियाँ उठीं.

ऐसे ईमानदार राजनीतिज्ञ कम ही सही, लेकिन हैं. लेकिन वो किसी न किसी दबाव में अपने आसपास की बेईमानी को या तो झेल रहे हैं या फिर नज़र अंदाज़ कर रहे हैं.

ऐसे अफ़सर भी बहुत से होंगे जो ख़ुद ईमानदार हैं लेकिन बेईमानी के बहुत से फ़ैसलों पर या तो उनके हस्ताक्षर होते हैं या फिर उनकी मूक गवाही होती है.

यह सवाल ज़हन में बार-बार उठता है कि इस ईमानदारी का क्या करें? अपराधी न होना अच्छी बात है लेकिन समाज के अधिकांश लोग अपराधी नहीं हैं. लेकिन ऐसे लोग कम हैं जिनके पास हस्तक्षेप का अवसर है लेकिन वे हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं. जो लोग अपराध के गवाह हैं उन्हें भी क्या निरपराध माना जाना चाहिए? क्या वे निर्दोष हैं?

एक तर्क हो सकता है कि बेईमानों के बीच ईमानदार बचे लोगों की तारीफ़ की जानी चाहिए. लेकिन यह नहीं समझ में नहीं आता कि बेईमान लोगों के साथ काम कर रहे ईमानदार लोगों की तारीफ़ क्यों की जानी चाहिए? बेईमानी को अनदेखा करने के लिए या उसके साथ खड़ा होने के लिए दंड क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?

कालिख़ के बीच झक्क सफ़ेद कपड़े पहनकर घूमते रहने की अपनी शर्तें होती हैं. और कितने दिनों तक लोग इन शर्तों के बारे में नहीं पूछेगें?

सफल आयोजन से जुड़ी टीस

पोस्ट के विषय:

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|रविवार, 14 नवम्बर 2010, 00:39

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ग्वांगजो ने जितने बेहतरीन ढंग से उदघाटन समारोह आयोजित किया उसने एक बार फिर दिखा दिया कि अगर समय से और योजनाबद्ध तरीक़े से काम हो तो मुश्किल कुछ भी नहीं.

इसमें कोई शक़ नहीं कि चीन के पास 1990 के बीजिंग एशियाड और 2008 के ओलंपिक आयोजित करने का अनुभव है मगर जिस ख़ूबसूरती से चीन ने ग्वांगजो को ये आयोजन देकर इस शहर का विकास किया वो देखने लायक़ है.

भारत ने राष्ट्रमंडल खेल आयोजित किए दिल्ली में और वो भी उसके पहले से ही विकसित क्षेत्रों में. भारतीय ओलंपिक संघ के अधिकारी अब 2019 के एशियाड का आयोजन हासिल करने की कोशिश में लगे हैं मगर एक बार फिर मेज़बानी दिल्ली को ही मिलेगी.

इधर ग्वांगजो ने एशियाड के आयोजन के तहत शहर के उस हिस्से को विकसित किया जो कभी पूरी तरह बंजर था. 2012 के ओलंपिक के लिए लंदन भी पूर्वी हिस्से को विकसित कर रहा है.

भारत में भी आयोजकों को अब दिल्ली से बाहर निकलकर सोचना चाहिए.

एशियाड के इस आयोजन को देखकर जो दूसरी बात ध्यान में आती है वो ये कि समय से अगर तैयारियाँ पूरी कर ली जाएँ तो लोगों में उत्साह पैदा करने की कोशिश की जा सकती है.

आयोजकों ने स्टेडियम समय से तैयार कर दिए और अन्य सुविधाएँ भी तैयार कर दीं इसके बाद शहर को एशियाडमय करने की कोशिश हुई.

राष्ट्रमंडल खेलों में तो जब भारतीय एथलीट्स का प्रदर्शन बेहतर हुआ तब कहीं जाकर लोगों का उत्साह जगा था मगर चीन में तो पहले से ही लोग उत्साहित हैं कि एक बार फिर दुनिया की नज़रें उनके शहर पर लगी हैं.

सुरेश कलमाड़ी भारतीय दल के साथ ग्वांगजो में हैं और जब मैंने पहले दिन उनसे इस आयोजन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा था कि अच्छा दिख रहा है और अभी तो आए हैं देखते हैं आगे.

ऐसा लगा मानो एकतरफ़ ओलंपिक संघ के अध्यक्ष होने के नाते आयोजन की तारीफ़ करना उनकी मजबूरी है तो दूसरी ओर भारत की जितनी आलोचना हुई उसे देखते हुए वे चाह रहे हों कि यहाँ की भी कुछ ख़ामियाँ सामने आएँ.

यहाँ का आयोजन देखने के बाद तुलनात्मक रूप से मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं कि जितने दिन खेल हुए उन दिनों भारत ने काफ़ी अच्छे ढंग से खेलों का आयोजन किया, दुनिया के बेहतरीन खेल स्टेडियमों को चुनौती देने वाले स्टेडियम भी बने मगर यही सब अगर समय रहते कर लिया गया होता तो समय रहते लोगों में भी खेलों के प्रति उत्साह जगाया जा सकता था.

ये टीस शायद हर भारतीय के मन में दुनिया में कहीं भी हो रहे सफल खेल आयोजन के बाद उठेगी ही.

ओबामा देने नहीं लेने आए हैं !

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|रविवार, 07 नवम्बर 2010, 19:52

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अभी तक भारत आए अमरीका के छह राष्ट्रपतियों में से किसी ने अपनी यात्रा की शुरुआत मुंबई से नहीं की है. हालांकि ओबामा ये दिखाना चाहते हैं कि उनकी यात्रा का मक़सद मुंबई हमलों के शिकार लोगों को श्रद्धांजलि देना है, लेकिन वो वास्तव में मंदी से जूझ रहे अमरीका वासियों के लिए रोज़गार खोजने आए हैं.

अमरीका की बेरोज़गारी दर नौ फ़ीसदी के आसपास मँडरा रही है, जबकि भारत की विकास दर इस समय लगभग यही आँकड़ा छू रही है. सुनने में ये बात आश्चर्यजनक लग सकती है कि हाल में अमरीका में भारत के निवेश की वजह से 65 हज़ार नौकरियाँ या तो बनीं हैं या बचाई गई हैं. फ़िक्की और अर्नेस्ट एंड यंग की संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि संयुक्त अरब अमीरात के बाद भारत का अमरीका में निवेश सबसे तेज़ गति से बढ़ रहा है और ये निवेश ज़्यादातर दवाओं और सूचना प्रोद्योगिकी के क्षेत्रों में हुआ है. मंदी से घिरा अमरीका उच्च तकनीक के निर्यात में छूट देकर नाटकीय रूप से भारत के निवेश को बढ़ाना चाहता है ख़ासकर रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र में.

सवाल ये उठता है कि इसके बदले में क्या अमरीका कुछ देने की स्थिति में है? ओबामा दिवाली के मौक़े पर भारत आए ज़रूर हैं लेकिन उनसे ये उम्मीद मत रखिए कि वो आप के लिए दिवाली के उपहार भी साथ लेकर आएँ. उदाहरण के लिए ये उम्मीद पालना कि अमरीका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के भारत के दावे का समर्थन करेगा, फ़िज़ूल होगा.

ओबामा ज़्यादा से ज़्यादा वीटो रहित सुरक्षा परिषद सदस्यता के लिए कोशिश करने का आश्वासन भर दे सकते हैं. भारत को इन लुभावने आश्वासनों से बचना चाहिए. ओबामा आतंकवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ ज़रूर उठाएँगे लेकिन अपने कारणों और अपनी गरज़ की वजह से. इसके बाद अगर आप उम्मीद करें कि वो पाकिस्तान को हथियार ख़रीदने के लिए दो अरब डॉलर के पैकेज पर पुनर्विचार करें तो आप बहुत बड़े मुग़ालते में हैं. अमरीका भारत से चाहता तो बहुत है लेकिन बदले में ख़ास ज़्यादा दे नहीं सकता.

शायद यही वजह है कि मनमोहन सिंह बराक ओबामा से वो कहने की स्थिति में नहीं हैं जो उन्होंने उनके पूर्ववर्ती से कहा था कि 'सारा भारत आपको प्यार करता है' !

अब भी हिलती है पूँछ

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 02 नवम्बर 2010, 15:02

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डार्विन ने मानव विकास के बारे में कहा था कि पहले मानव की भी पूँछ होती थी लेकिन लंबे समय तक इस्तेमाल न होने की वजह से वह धीरे-धीरे ग़ायब हो गई.

वैज्ञानिक मानते हैं कि रीढ़ के आख़िर में पूँछ का अस्तित्व अब भी बचा हुआ है. वे ऐसा कहते हैं तो प्रमाण के साथ ही कहते होंगे क्योंकि विज्ञान बिना प्रमाण के कुछ नहीं मानता.

तो अगर पूँछ है तो वह गाहे-बगाहे हिलती भी होगी. अगर आप पूँछ को हिलता हुआ देखने की इच्छा रखते हों तो ऐसा अब संभव नहीं है. लेकिन कई बार ज़बान हिलती है तो इसके संकेत मिलते हैं कि पूँछ हिल रही है.

वैसे तो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे. प्रोफ़ेसर के सामने कुछ छात्र ऐसी बातें कहते हैं जिससे दूसरे छात्रों का पता चल जाता है कि भीतर छिप गई पूँछ हिल रही होगी. बॉस से कुछ लोग जब 'ज़रुरी बात पर चर्चा' कर रहे होते हैं तो दफ़्तर के बाक़ी लोग महसूस करते हैं कि पूँछ हिल रही है. इश्क में पड़े लोग तो जाने अनजाने कितनी ही बार ऐसा करते हैं.

लेकिन व्यापक तौर पर इसका पता अक्सर राजनीतिक बयानों से चलता है.

कांग्रेसियों को इसमें विशेष महारत हासिल है. नीतीश कुमार ने कहा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री बनकर शासन-प्रशासन को समझना चाहिए. तो कांग्रेस से जवाब आया, "जब अटल बिहारी वाजपेयी मुख्यमंत्री बने बिना प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो राहुल गांधी क्यों नहीं?"

जो लोग अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी राजनीति को जानते हैं वो समझ गए कि पूँछ हिल रही है.

इससे पहले बिहार में ही कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कहा था, "जेपी (जयप्रकाश नारायण) और राहुल गांधी में समानता है."

कांग्रेस का बड़ा तबका जानता और मानता है कि 70 के दशक में कांग्रेस का सबसे बड़ा दुश्मन कोई था तो वे जेपी ही थे. लेकिन बिहार में किसी से तुलना करनी हो तो जेपी से बड़ा व्यक्तित्व भी नहीं मिलता. इसलिए पूँछ हिली तो ज़बान से जेपी से तुलना ही निकली.

इससे पहले एक सज्जन 'इंदिरा इज़ इंडिया' कह चुके थे. कहते हैं कि वह 'मास्टर स्ट्रोक' था. पता नहीं क्यों वैज्ञानिकों ने जाँचा परखा नहीं लेकिन उस समय पूँछ हिलने का पुख़्ता प्रमाण मिल सकता था.

वैसे ऐसा नहीं है कि पूँछ हिलाने पर कांग्रेसियों का एकाधिकार है. भारतीय जनता पार्टी भी अक्सर इसके प्रमाण देती रहती है.

किसी नाज़ुक क्षण में एक भाजपाई सज्जन का दिल द्रवित हुआ तो उन्होंने कहा, "लालकृष्ण आडवाणी लौह पुरुष हैं, वल्लभ भाई पटेल की तरह."

समाजवादियों ने भी अपने एक दिवंगत नेता को 'छोटे लोहिया' कहना शुरु कर दिया था.

'जब तक सूरज चाँद रहेगा फलाँ जी का नाम रहेगा' वाला नारा जब लगता है तो सामूहिक रुप से पूँछ हिलती हैं.

आप कह सकते हैं कि सबकी अपनी-अपनी पूँछ है, जिसे जब मर्ज़ी हो, हिलाए. लेकिन संकट तब खड़ा होता है जब पूँछ को अनदेखा करके लोग नारों को सही मानने लगते हैं.

इतिहास गवाह है कि इंदिरा जी ने अपने को इंडिया मानने की ग़लती की तो वर्तमान में प्रमाण मौजूद हैं कि आडवाणी जी ख़ुद को लौह पुरुष ही मान बैठे. अब नज़र राहुल जी पर है वे भी अगर हिलती हुई पूँछें न देख सके तो पता नहीं जेपी हो जाएँगे या अटल. या कि वे इंतज़ार करेंगे कि कोई कहे, "राहुल ही राष्ट्र है."

वैसे तो ज्ञानी लोग कहते हैं कि विकास का क्रम कभी उल्टी दिशा में नहीं चलता इसलिए कोई ख़तरा नहीं है.

लेकिन उपयोग न होने से पूँछ ग़ायब हो सकती है तो अतिरिक्त उपयोग से अगर किसी दिन फिर बढ़नी शुरु हो गई तो?

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