इस विषय के अंतर्गत रखें मार्च 2010

मोरा गोरा रंग लइ ले!

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|शुक्रवार, 19 मार्च 2010, 10:49

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मुंबई में रहने वाले हिंदी भाषी उत्तर भारतीय इन दिनों राहत की सांस ले रहे हैं क्योंकि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के 'देश भक्त' अभियान का निशाना वो नहीं बल्कि बॉलीवुड में काम करने वाले विदेशी कलाकार बन रहे हैं.

बॉलीवुड में लगभग एक हज़ार विदेशी जूनियर कलाकार काम करते हैं. जिनमें से अधिकतर गोरी नस्ल की यूरोपीय लड़कियां होती हैं.

पिछले हफ़्ते राज ठाकरे के अभियान की शुरुआत हुई फ़िल्म क्रूकेड के सेट पर. इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन भी हैं और 136 विदेशी जूनियर अभिनेत्रियाँ और डांसर काम रही हैं.

एमएनएस के कार्यकर्ता सेट पर गए और विदेशी कलाकारों से भारत में क़ानूनी तौर पर काम करने के दस्तावेज़ दिखने की मांग की. पार्टी का दावा है कि ये विदेशी जूनियर आर्टिस्ट स्थानीय लोगों की नौकरियां छीन रहे हैं इस लिए इन्हें बॉलीवुड में काम करने की इजाज़त नहीं होगी.

हमेशा की तरह इस बार भी बॉलीवुड खामोश है. किसी ने एमएनएस से यह पूछने की हिम्मत नहीं की कि वो पुलिस की भूमिका क्यों निभा रहे हैं. शायद इसलिए की कोई एमएनएस से झगडा मोल लेने की हिम्मत नहीं करता.

बॉलीवुड के लोगों को याद है वो दिन जब करण जौहर ने राज ठाकरे के घर जाकर हाथ जोड़े थे क्योंकि फ़िल्म 'वेक अप सिड' में उन्होंने मुंबई की जगह बॉम्बे का शब्द इस्तेमाल करने की 'गुस्ताख़ी' की थी

हाँ कुछ लोगों ने दबी आवाज़ में इसपर अपनी नाराज़गी ज़रूर जताई. उनका कहना था कि अगर विदेशी कालकारों को काम करने से रोका गया तो फ़िल्म निर्माताओं को विदेश जाकर शूट करना पड़ेगा जिस से फ़िल्म की लागत बढ़ जाएगी.

वैसे मुझे राज ठाकरे से एतराज़ इस बात पर नहीं है कि वो विदेशी कलाकारों के ख़िलाफ़ हैं. मुझे उनके एतराज़ करने के अंदाज़ पर एतराज़ है. उन्हें कानून का रखवाला बनने के बजाए सरकार से इस पर एतराज़ करना चाहिए था.

यह सही है कि हर रोज़ गोरे विदेशी पर्यटक सैंकड़ों की संख्या में गानों के सीक्वेंस में काम करते हैं और दिन भर नाच गाने की शूटिंग के बाद पांच सौ रुपए मुआवज़ा लेकर अपनी राह चल लेते हैं.

वो टूरिस्ट वीज़ा पर आते हैं इसलिए क़ानूनी तौर पर पैसे नहीं कमा सकते. दूसरी तरफ़ अगर भारतीय जूनियर कलाकारों को काम दिया जाए तो वो पांच सौ रुपए स्थानीय लोगों को जाएंगे.

बॉलीवुड में ग्लैमर बहुत ज़रूरी है और यह गोरी लड़कियां फ़िल्म को ग्लैमर देती हैं.

बॉलीवुड के फ़िल्मकारों को एक आम भारतीय की कमज़ोरी यानी गोरी चमड़ी, का खूब अंदाज़ा है जिसका वो भरपूर फ़ायदा उठाते हैं. अगर हम आप गोरी चमड़ी की कमजोरी से ऊपर उठ जाएँ तो बॉलीवुड में यह विदेशी अपने टैलेंट के बल पर ही काम पाएँगे गोरी चमड़ी के आधार पर नहीं.

माया की माया अपरंपार!

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|मंगलवार, 16 मार्च 2010, 11:31

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माया की माया वहीं जानें...

वैसे कांशीराम भी मायावती का सही आकलन कर पाए थे तभी तो अपनी वसीयत में, बक़ौल बहन जी, यह कह गए कि गली, नुक्कड़, चौबारों पर मायावती की प्रतिमाएँ लगें.

मायावती कहती हैं कि कौन सा क़ानून जीवित लोगों की मूर्तियाँ लगाने की मनाही करता है.

सच तो है....और कौन सा क़ानून इस बात की मनाही करता है कि अपना (या अपने मार्गदर्शक का) जन्मदिन धूमधाम से न मनाया जाए.

आम करदाता को तो ख़ुश होना चाहिए कि कम से कम नज़र तो आ रहा है कि उसकी मेहनत की कमाई कहाँ जा रही है.

अन्य नेता तो इस पैसे को हज़म कर जाते हैं और डकार भी नहीं लेते.

मायवती की बुराइयाँ ढूँढने वाले ज़रा उनकी अच्छाइयों पर तो नज़र डालें.

हज़ार रुपये के नोटों की माला पहन कर उन्होंने संदेश दिया है कि बाग़ से फूलों को मत नोंचों.

उन्हें खिला रहने दो माला में मत पिरोओ. नोटों से काम चलाओ.

पर्यावरण की इतनी चिंता है और किसी को.

कॉंग्रेस ने महारैली को सर्कस कहा.

बताइए ऐसा कोई सर्कस देखा है जहाँ टिकट न लेना पड़े.

तो जनता अगर बिना पैसा ख़र्च किए यह सर्कस देख कर अपन मनोरंजन कर रही है तो विपक्ष के पेट में क्यों दर्द हो रहा है.

मायावती जी, बहन जी, आप यूँही फूलें फलें....नहीं शायद मुहावरा बदलना पड़ेगा....आप यूँही नोटों के हार पहनती रहें...

हम क्यों दुखी हैं...यह एक हज़ार रुपये हमारी जेब में थोड़े ही आने वाले थे...हमने तो एक हज़ार का नोट छू कर भी नहीं देखा है.

भैया, अपने सौ-सौ के नोटों को संभालो और ख़ुश रहो.

अच्छी-ख़ासी टीम का यूँ बिखरना....

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|गुरुवार, 11 मार्च 2010, 11:08

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पाकिस्तान क्रिकेट में जो भी हो रहा है, उसे आप बवाल कहें, खलबली कहें या फिर सनसनी, एक क्रिकेट प्रेमी होने के नाते मुझे बहुत अफ़सोस है.

अफ़सोस इसलिए नहीं कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के कुछ नामी-गिरामी चेहरे पर पाबंदी लगाई गई है. बल्कि इसलिए क्योंकि क्रिकेट के शीर्ष पर पहुँचने का दम रखने वाली इस टीम का क्या हाल हो गया है.

एक समय घातक तेज़ गेंदबाज़ी और मैदान पर आक्रामकता का दंभ एशियाई देशों में नहीं दिखता था. ये वो दौर था जब मैदान पर घायल होने वाले एशियाई खिलाड़ियों की सूची काफ़ी लंबी थी.

लेकिन घायल शेरों की भाँति मैदान पर उतर कर पलटवार पहले पाकिस्तान ने दिखाया और एक समय ऐसा भी आया जब भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को देश के विभाजन के दंश ने सबसे ज़्यादा दुखी किया. सब यही सोचते थे काश! कपिल और इमरान साथ गेंदबाज़ी करते, काश, गावस्कर और ज़हीर अब्बास साथ बैटिंग करते.

लेकिन विश्व कप जीतने वाली इस टीम को जैसे किसी की नज़र लग गई. ये तो सच है कि पाकिस्तान टीम में कुछ न कुछ हमेशा होता रहा है. लेकिन अब तो ऐसा नियमित होने लगा है. कभी मैच फ़िक्सिंग, कभी गेंद से छेड़छाड़ तो कभी मादक दवाओं के सेवन का मामला.

अपनी ज़मीन पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच न करा पाने के कारण पहले से ही ख़स्ताहाल पाकिस्तान क्रिकेट को लगने वाले झटके अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के लिए दुखद है.

कितना अच्छा होता यदि शोएब की गोलंदाज़ी, यूसुफ़ की संयमित बल्लेबाज़ी तो अफ़रीदी के धमाकेदार शॉट्स का संगम हमें नियमित रूप से देखने को मिलता.

हम प्रशासकों को दोष दें, चयनकर्ताओं को, या फिर खिलाड़ियों को....एक अच्छी टीम का इस तरह बिखरना क्रिकेट का नुक़सान है.

शायद किसी अबला की लॉटरी खुले...

रेणु अगालरेणु अगाल|सोमवार, 08 मार्च 2010, 10:29

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परकटी महिलाएं देश पर राज करेंगी. सोचिए कितनी बड़ी विपदा आज इस पुरुष प्रधान देश के सामने आ खड़ी हुई है. आप ये मत सोचिए कि महिला आरक्षण पर पुरुषों को अपनी गद्दी खिसकने की चिंता है, वो तो देश हित की सोच अवसाद ग्रस्त हो रहे है.

बताइए क्या कलियुग आ जाएगा. पत्नी मंत्री बनेगी और पति क्या रह जाएगा. समाज का खाका बदल जाएगा. भई तुलसीदास भी कह गए है ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी- ये सब ताड़न के अधिकारी. फिर भी देखिए ये सब क्या होने जा रहा है.

कई साल महिला आरक्षण विधेयक के विरोध के नायाब तरीकों--बिल की प्रतियाँ फाड़ना जैसे साहसिक क़दमों के बावजूद अगर ये हो ही रहा है तो अब पुरुषों ने ठान ली है कि उसे इस सारे खेल में अपने फ़ायदे के बारे में सोचना है.

पंचायत में कई प्रधान पतियों की चल निकली है तो अब सांसद पति बन कुर्सी के ख्वाब क्यों न देखे जाए. ये सब वैसे भी देश को बचाने के लिए कर रहे है, खुद के लिए थोड़े ही. विपदा की घड़ी में ही, सही नेतृत्व के गुण नज़र आने लगते हैं. तो भारत में भी इस विपदा की घड़ी में सक्षम लोगों की जमात काम में जुट गई है.

कुछ इस तर्क का सहारा ले रहे है कि इसमें हाइ सोसाइटी की औरतों का फायदा होगा, बेचारी आम औरत इस रेस से बाहर हो जाएगी. इसलिए वो उनकी आवाज़ बन कर इस का विरोध कर रहे है.

ऐसी सोच वालो से मेरा सवाल सीधा सा ये है-- ज़रा ये बताइए कि कौन से पिछड़े, ग़रीब पुरुष बिना आरक्षण के आगे बढ़ पाए?

अब ऐसा ही महिलाओं के साथ होगा. नेताओं की पत्नियां, बहनें, रिश्तेदार, ऊंचे घरानों की बहू-बेटियां संसद में पहुंचेंगी. पर इन सब के बीच एक-आध अबला की भी शायद लॉटरी खुल जाए. ऐसा होगा ही और उसके बाद तो जो हवा चलेगी, वो सभी को छुएगी - क्या परकटी और क्या सीधी साधी.

तो समझदारो, हवा को पहचानों, हवा के रुख को जानो और महिला आरक्षण को अपनी मुहिम में तबदील कर वाह वाही लूटो. कर के देखो...देश का वाकई भला हो जाएगा. और देश की आधी आबादी भी आप को सिर आंखों पर रखेगी.

आपका नहीं तो देश का, समाज का इससे फ़ायदा होगा. फिर आप अपने बारे में कब सोचते है.. आप तो देश के बारे में ही सोचते है ना..

सिर्फ़ बातों से नहीं होगा...

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|बुधवार, 03 मार्च 2010, 03:19

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भारत में किसी भी खेल के साथ जनता के समर्थन की विडंबना है कि जिस खेल में भारत का प्रदर्शन अच्छा रहता है उसे ही लोगों का समर्थन मिलता है.

अब अगर प्रदर्शन अच्छा होगा तभी लोग वो खेल देखेंगे, लोग खेल देखेंगे तो उस खेल में पैसा लगेगा, पैसा लगेगा तो खिलाड़ियों के भाव बढ़ेंगे, खेलों की सुविधाएँ बढ़ेंगी.

इसके बाद प्रदर्शन और अच्छा होगा, और लोग खेल देखेंगे, और पैसा आएगा.

एक अजीब सा दुष्चक्र है ये जिसमें भारतीय खेल पड़ा हुआ है और शायद उसी का शिकार हुआ है हॉकी भी.

मगर हॉकी किसी एक खिलाड़ी के बेहतर प्रदर्शन की बदौलत सुधर नहीं सकती, टीम गेम है इसलिए पूरी टीम को एकजुट होकर खेलना पड़ेगा तभी सबको उसका फ़ायदा होगा.

इस प्रक्रिया में भारत ने जब विश्व कप में पाकिस्तान को 4-1 से हराया तो अचानक हॉकी का गुणगान शुरू हो गया मगर अगले ही मैच में भारत को ऑस्ट्रेलिया से 5-2 से हार मिली.

ये स्कोर सुनकर लगेगा जैसे ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने भारत की ख़ूब दुर्गत की होगी मगर ऐसा था नहीं.

दोनों हाफ़ के पहले कुछ मिनटों को छोड़ दें तो भारत ने भी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को काफ़ी परेशान किया, अंतर ये था कि भारतीय उनकी गति और क्षमता की बराबरी नहीं कर सके.

इसके अलावा शुरुआती मिनटों में ही गोल हो जाने से टीम के मनोबल पर भी असर पड़ा.

अब ज़रूरत इस बात की है कि ऐसे मौक़े पर सिर्फ़ स्कोर लाइन देखकर टीम का समर्थन न छोड़ दिया जाए.

किसी समय शीर्ष पर रही भारतीय हॉकी गर्त से उबरने के लिए संघर्ष कर रही है और उसी प्रक्रिया में रैंकिंग में 12 नंबर की इस टीम ने दूसरे नंबर की टीम ऑस्ट्रेलिया के सामने बहादुरी से प्रदर्शन किया.

लोगों की मौजूदगी स्टेडियम में इस बार उतनी नहीं थी जितनी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मैच में थी मगर लोगों ने काफ़ी ज़ोर-शोर से टीम का साथ तो दिया.

भारतीय टीम को अभी पूल में ही तीन मैच और खेलने हैं.

अगर उसका प्रदर्शन अच्छा रहा तो संभव है कि वो पूल की पहली दो टीमों में भी आ जाए पर अगर वो पहली दो में नहीं आ पाती तब भी लोग उतनी ही उत्सुकता से भारतीय हॉकी टीम का समर्थन करते रहेंगे या विश्व कप ख़त्म होने के बाद टीम और खिलाड़ी भुला दिए जाएँगे.

विश्व कप का आयोजन जब भारत को दिया गया था तो कहा गया कि इससे भारत में हॉकी में नई जान फूँकने में मदद मिलेगी मगर जिस अफ़रा-तफ़री में ये आयोजन हो रहा है और जिस तरह अंतिम कुछ दिनों में हॉकी के बजाय सिर्फ़ सुरक्षा का ही मसला सुनाई देता रहा मुझे नहीं लगता कि आयोजन का मूल उद्देश्य पूरा हो पाया है.

विश्व कप के मुख्य प्रायोजक ने वीरेंदर सहवाग, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और प्रियंका चोपड़ा को हॉकी का समर्थन करते दिखाया.

राज्यवर्धन भारत-ऑस्ट्रेलिया मैच में दिखे भी मगर ये हस्तियाँ भारत के कितने मैचों में टीम का उत्साह बढ़ाने पहुँच पाएँगी, देखते जाइए.

कुछ अन्य प्रमुख लोग भी ट्विटर या दूसरे ज़रियों से टीम का हौसला बढ़ाने वाले बयान तो दे रहे हैं मगर क्या वो स्टेडियम तक पहुँचने की भी पहल करेंगे.

गड्ढे से निकलने की कोशिश में भारतीय हॉकी आधे रास्ते तो पहुँची दिखती है और ज़रूरत इस बात की है कि बाक़ी आधे रास्ते में अगर उसका हाथ फिसलने भी लगे तो जनता के समर्थन के रूप में हाथ बढ़ाया जाए.

भारत के मैचों के दौरान मेजर ध्यान चंद राष्ट्रीय स्टेडियम की जो भी गूँज बाहर तक सुनाई देती है वो और भी दूर तक सुनाई देगी तभी भारत में हॉकी का कल्याण संभव है.

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