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माया की माया अपरंपार!

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|मंगलवार, 16 मार्च 2010, 11:31 IST

माया की माया वहीं जानें...

वैसे कांशीराम भी मायावती का सही आकलन कर पाए थे तभी तो अपनी वसीयत में, बक़ौल बहन जी, यह कह गए कि गली, नुक्कड़, चौबारों पर मायावती की प्रतिमाएँ लगें.

मायावती कहती हैं कि कौन सा क़ानून जीवित लोगों की मूर्तियाँ लगाने की मनाही करता है.

सच तो है....और कौन सा क़ानून इस बात की मनाही करता है कि अपना (या अपने मार्गदर्शक का) जन्मदिन धूमधाम से न मनाया जाए.

आम करदाता को तो ख़ुश होना चाहिए कि कम से कम नज़र तो आ रहा है कि उसकी मेहनत की कमाई कहाँ जा रही है.

अन्य नेता तो इस पैसे को हज़म कर जाते हैं और डकार भी नहीं लेते.

मायवती की बुराइयाँ ढूँढने वाले ज़रा उनकी अच्छाइयों पर तो नज़र डालें.

हज़ार रुपये के नोटों की माला पहन कर उन्होंने संदेश दिया है कि बाग़ से फूलों को मत नोंचों.

उन्हें खिला रहने दो माला में मत पिरोओ. नोटों से काम चलाओ.

पर्यावरण की इतनी चिंता है और किसी को.

कॉंग्रेस ने महारैली को सर्कस कहा.

बताइए ऐसा कोई सर्कस देखा है जहाँ टिकट न लेना पड़े.

तो जनता अगर बिना पैसा ख़र्च किए यह सर्कस देख कर अपन मनोरंजन कर रही है तो विपक्ष के पेट में क्यों दर्द हो रहा है.

मायावती जी, बहन जी, आप यूँही फूलें फलें....नहीं शायद मुहावरा बदलना पड़ेगा....आप यूँही नोटों के हार पहनती रहें...

हम क्यों दुखी हैं...यह एक हज़ार रुपये हमारी जेब में थोड़े ही आने वाले थे...हमने तो एक हज़ार का नोट छू कर भी नहीं देखा है.

भैया, अपने सौ-सौ के नोटों को संभालो और ख़ुश रहो.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:02 IST, 16 मार्च 2010 Ankit :

    ये सब भारतीय राजनीती की "माया"जाल है..!!!! जिसको भेदने में विपक्ष अब तक नाकाम ही रहा है..और जनता मनोरंजन ले रही है ...

  • 2. 12:20 IST, 16 मार्च 2010 Saagar:

    बेहतरीन व्यंग्य... ज़रुरी था... लेकिन इनके खाल इतने मोटे हो चुके हैं कि ये नहीं सुधरेंगे... कुछ कहेंगे तो दलित-दलित करके चिल्लाने लगेंगे... इन्होने रास्ता खोज लिया है, अपने जीवन निर्वाह का... एक हमलोग हैं... अभी तक पता नहीं चला क्या करना है... कम से कम बेशर्मी होती तो आज इनके जैसे कुछ तो बन पाते...

    सारे नेताओं को पता है कुछ नहीं होने वाला. सबसे होशियार यही हैं...

    नेता जी कहीं के बहाने महोहर श्याम जोशी जी ने पहले ही कह दिया था " इन सिटी डू एव्रिथिन्गा, बट कीप इन हार्ट, कोसलपुर किंगा"

    "पायथन की जोब्लेस.... "

    हाँ, अगली बार यह आपको और बेहतर तरीके से चिढ़ायेंगे ... याद रखियेगा...

  • 3. 12:51 IST, 16 मार्च 2010 Amit Prabhakar:

    आपका नज़रिया क्षण भर के लिए अलग पर निराशावादी लगा. जब आप कुछ ना कर पा रहे हों तो स्थिति से खुश होकर रहना ही अच्छा है. साहिर साहब की वो नज़्म याद आ गई -
    तआर्रुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,
    ताल्लुक बोझ बन जाएं तो उसको तोड़ना अच्छा ।
    वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,
    उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ।

  • 4. 12:57 IST, 16 मार्च 2010 Bhim Kumar Singh:

    मायावती जैसे दलित नेताओं के इस तरह के कारनामों से यही जाहिर होता है कि वे मूल रूप से कुंठित हैं। मायावती जैसे नेता यह दिखाना चाहते हैं कि एक जमाना था जब सवर्णों ने इस तरह की दौलतफरोशी करके दलितों की छाती पर मूंग दला था, अब देखो गंगा उल्टी दिशा में बहने लगी है और हम उनसे कहीं आगे निकल गए हैं। दरअसल भारतीय लोकतंत्र की यह कमजोरी रही है कि यहां के राजनेता शातिर एवं निर्लज्ज हैं और जनता मूर्ख।

  • 5. 14:23 IST, 16 मार्च 2010 GAUTAM SACHDEV, NOIDA:

    सलमा जैदी जी आपके इस आलेख में आक्रोश की भीनी भीनी खुशबू मिल रही है. आखिर आप भी तो आम आदमी की हैसियत से शायद ये सब कह रही हैं.
    वैसे इस माया की “ माया ” अगम अपार है जिसे समझ पाना एक अबुझ पहेली की तरह दिखती है.
    “ हम आह भी भरते है तो हो जाते हैं बदनाम
    वो कत्ल भी करते तो चर्चा नहीं होती ”
    मायावी माया शायद इसे चरितार्थ करती दिख रही हैं.

  • 6. 15:01 IST, 16 मार्च 2010 Bhavesh:

    ग़नीमत है रिज़र्व बैंक ने देश में अभी पचास हज़ार का नोट नहीं जारी किया है. क्या भारतीय मुद्रा के साथ इस तरह का खिलवाड़ आपराधिक श्रेणी में नहीं आता? बस दलितों के नाम पर पूरे देश की इज्जत ही लूट लो.

  • 7. 17:05 IST, 16 मार्च 2010 shailendra kumar:

    काफ़ी दुख होता है यह सब देख कर. करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है और कोई कुछ नहीं कर सकता. प्रतापगढ़ भगदड़ में मरने वालों के लिए यूपी सरकार के पास पैसे नहीं हैं मगर मूर्ति बनवाने और उनकी सुरक्षा के लिए नया पुलिस बल बनाने के लिए और हर महीने 13 करोड़ रुपये वेतन देने के लिए पैसे हैं. इन रैलियों के लिए भीड़ जुटाने के नाम पर ग़रीब लोगों को चंद पैसों में ख़रीदा जाता है. कब बंद होगा यह सब.

  • 8. 17:57 IST, 16 मार्च 2010 Amit:

    लोग इसलिए मर रहे हैं क्योंकि उनके पास इलाज और दवाई के पैसे नहीं हैं. ऐसी स्थिति में राजनीतिज्ञों का इस तरह धन का भोंडा प्रदर्शन शर्मनाक है. मेरा मन यह सब देख कर रोता है लेकिन मुझे समझ में नहीं आता कि क्या करूँ.

  • 9. 19:26 IST, 16 मार्च 2010 narinder singh:

    सलमा जी, आपने बिल्कुल ठीक लिखा है. अगर यह भारत की प्रधानमंत्री बन गईं तो भूल जाओ भारत या इंडिया को हो सकता है कि इस देश का नाम अंबेडकरिस्तान या मायापुरी या हाथीपुर हो जाए.

  • 10. 20:28 IST, 16 मार्च 2010 praveen:

    माया मेम साहब के गले से लिपटे हज़ार रूपए के अशंख नोट पर छपे बापू के उतने ही तस्वीर, बापू के रामराज्य का कितना घटिया प्रतिबिब था. दलितों को हरिजन से अलंकृत करने वाले बापू ने क्या कभी ऐसा सोचा होगा की समाज के हासिए से उठकर इनका(दलितों) एक प्रितिनिधि अपने धन बल के बल पर अपनी उन्नति का प्रदर्शन करेगा जबकि वास्तव में बापू के जीवन काल से लेकर आज तक दलितों के स्थिति में मामूली बदलाव ही हुआ है, मायावती जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर. गाँवों में रहने वाले दलितों की मासिक आय कुछ हज़ार-दो हज़ार के बीच ही है. यहाँ तक नरेगा में भले ही रिकॉर्ड में इनके नाम आते हैं लेकिन कमाता कोई और है, दलितों के नाम पर आई अब तक राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं ने न जाने कितने अधिकारी और नेता टाइप लोगों का बिकास झटके में कर डाला लेकिन गाँव का दलित अब भी केवल रैलियों में बैठकर इस उम्मीद के साथ ताली बजाते हुए राजनितिक ड्रामा देखता है कि शायद इस बार छालवा नहीं है.

  • 11. 20:55 IST, 16 मार्च 2010 firoz:

    नेताओं के बारे में कोई शिकायत न किजीए. हम अपना चेहरा छुपा कर अपने पड़ोसी देश को गाली देते हैं कि वहाँ अच्छी राजनीतिक व्यवस्था नहीं है. हमें अपने पड़ोसी देशों चीन, पाकिस्तान, थाईलैंड और अरब के देशों पर आरोप लगाने से पहले यह सोचना चाहिए कि हमें योग्य नेताओं का एक समूह भी नहीं मिला, यह हमारे देश के लिए बड़े शर्म की बात है. मुझे तब बड़ी शर्म आती है जब मैं किसी अफ़्रीकी से कहते हैं उनके यहाँ तानाशाह शासन करते हैं लेकिन हमपर उनसे भी ख़राब लोग शासन करते हैं.

  • 12. 21:05 IST, 16 मार्च 2010 Dr Durgaprasad Agrawal:

    बहुत सही कहा है सलमा जी आपने. हम लोगों ने तो हर बात में बुराई ढूंढ़ने की जैसे क़सम ही खा रखी है. अब अगर बहन जी को उनके प्रशंसक माला पहनाते हैं तो भला हमारे पेट में दर्द क्यों हो रहा है? आखिर उन्होंने फूल तो नहीं तोड़े? फूल तोड़ कर माला बनाते तो 'फूल तोड़ना मना है' इस निर्देश का उल्लंघन करने के अपराधी भी होते. मुझे तो लगता है कि बहन मायावती को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके इस महान योगदान के लिए और सम्मानित किया जाना चाहिए. कहीं ऐसा तो नहीं है सलमा जी, कि लोग उनकी 'लोकप्रियता' से जल-भुन कर आलोचना पर इस तरह की छिछली और ओछी आलोचना-हरक़त पर उतर आए हैं? आप पता लगवाइये न! और पता लग जाए तो हम पाठकों को बताना मत भूलिएगा.

  • 13. 21:53 IST, 16 मार्च 2010 himmat singh bhati:

    सलमा जी, मायावती को राजनीति में लाने वाले कांशीराम भी मायावती की माया को नहीं समझ पाए. इस कारण कांशीराम जी को उनके अंतिम समय में कैद में रखा गया और उनके घरवालों से भी नहीं मिलने दिया. यह तो कांशीराम जी कि आत्मा ही जानती है कि उन्होंने अपनी वसीयत अपनी मर्जी से लिखी या दबाव में. लेकिन अब यह नहीं लगता कि कांशीराम जी के सपनों को मायावती पूरा करेंगी. वे यह जानती हैं कि जिस तरह मुमताज़ की याद में शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया था, उनके पीछे कोई ऐसा करने वाला नहीं है. इसलिए वे सत्ता का हर लुत्फ़ उठा रही हैं. वे अपनी मनमर्जी कर रही हैं. क्योंकि सभी नेता ईमानदार नहीं हैं. नहीं तो वे जनता से वसूला गया टैक्स का पैसा इस तरह बरबाद करने का साहस नहीं करतीं. पर सब समय का फेर हैं, घमंड तो राजा रावण का भी नहीं रहा.

  • 14. 22:40 IST, 16 मार्च 2010 Krishna Agnihotri:

    यह सब बहुक शर्मनाक है. लेकिन नेता लोगों की भावनाएँ नहीं समझ सकते हैं.

  • 15. 22:56 IST, 16 मार्च 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमा जी, बहुत शानदार लिखा है आपने और सच भी. लेकिन कांग्रेस किस मुँह से सर्कस बता रही है. हकीकत यह है कि कांग्रेस ने पूरे देश को सर्कस बना रखा है और ख़ुद रिंग मास्टर बनकर ग़रीबों को नचा रही है. मायावती ने कोई ग़लत काम नहीं किया है. जैसा देश वाली, वैसा भेष वाली बात है, जनता को बेवकूफ पूरे देश के नेता बना रहे हैं.

  • 16. 23:09 IST, 16 मार्च 2010 Ram Ray:

    मैं नहीं समझता कि इस बहस को कोई पढ़ता होगा. पैसों की माला पहनने को कौन रोक सकता है. भारत में एक-दूसरे की अवैध गतिविधयां सुनना अच्छा माना जाता है. हम महान है, हम किसी को रुपयों की माला पहने से नहीं रोक सकते हैं क्योंकि संविधान में यह कही नहीं लिखा है कि ऐसा नहीं करना है. क्योंकि संविधान बनाने वालों ने यह कभी नहीं सोचा था कि माया जैसा कोई व्यक्ति अपनी ताकत दिखाने के लिए रुपयों की माला पहनेगा. माया और उत्तर प्रदेश के लोगों का भगवान भला करे.

  • 17. 23:23 IST, 16 मार्च 2010 manoj:

    अगर जनता ही मूर्ख है तो माया को क्या दोष देना.

  • 18. 23:26 IST, 16 मार्च 2010 इब्राहीम क्म्भर:

    लगता यह है कि आपका मायावती से पुराना बैर है, भड़ास निकालना तो कोई आप से सीखे. ये तो अब रिनाज खाली भारत में नहीं हमारे पाकिसतान में भी आम बात है.

  • 19. 00:10 IST, 17 मार्च 2010 Ganesh Joish:

    आखिर धन का ऐसा मजाक जिसे दो जून की रोटी नसीब नहीं होती है. इन पैसों को देखकर उसके दिल में क्या गुजर रही होगी. इसे सोचने की फुरसत इन नेताओं को कब होगी?

  • 20. 03:18 IST, 17 मार्च 2010 Ram:

    सलमा ज़ैदी जी, मैं आपका लेख पसंद करता हूँ. मायावती ने अगर कोई ग़लत काम नहीं किया है तो उन्हें अपना जन्मदिन मनाने का अधिकार है. जबकि नैतिक रूप से उनका जन्मदिन मनाना विवाद का विषय हो सकता है.

  • 21. 03:24 IST, 17 मार्च 2010 suresh kumar:

    उत्तर प्रदेश में ऐसा मुख्यमंत्री अभी तक कोई नहीं हुआ.

  • 22. 08:51 IST, 17 मार्च 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB :

    सलमा जी, बड़ा ही सटीक कटाक्ष लिखा है. माया को माया मिले कर-कर लंबे हाथ. लेकिन बहन जी ने जो किया इससे औरों को इतनी तकलीफ क्यों? यह गुनाह किस राजनीतिक दल ने नहीं किया? कौन से दल हैं जो दूध के धुले हैं? अफ़सोस इस बात का है कि मनुष्य अपने कारनामों का बोझ सिर पर लादकर और दूसरों के गुनाहों का बोझ पीठ पर डालकर हमेशा ही झुककर चलता आया है. फिर चाहे बात चाहें राजनीति की हो या किसी वर्ग विशेष की. माया बहनजी, बहुत अच्छा होता अगर इतना करोड़ों रुपया सही मायानों में गरीबों के आशियाने बनवाने , 10-20 हज़ार गरीब बेटियों के समूह विवाह या सही मायनों में ज़रूरतमंद लोगों को इस दिन रोज़गार आदि कार्यों में खर्च होता तो माननीय कांशीराम जी को असली श्रदांजली होती. ऐसे शक्ति प्रदर्शन से क्या फ़ायदा? मेरे ख्याल से इस तरह से आंशिक और स्थानीय चकाचौंध से ग़रीब के दिल जलने के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता और भविष्य में राजनितिक दलों को जातिगत दंश फैलाने का ज़रिया हासिल होता है. हो सकता है आज जो लोग प्रदेशीय राजधानी के चौराहों पर झूमते नजर आए सत्ता बदलने पर वही बदले की राजनीती का शिकार हों? नेता तो आते जाते हैं पर जनता तो वही रहती है. इसलिए हमारे जिम्मेदार नेताओं को अपनी जनता का भिविष्य भी सुरक्षित और उज्ज्वल बनाने के बारे में सोचना चाहिए. यह बहुत ग़लत प्रथा है कि राजनेता अपना वर्तमान सुरखित रखने के लिए भोली-भाली जनता का भविष्य चौपट कर देते हैं. जनता के पास न जाने इतना समय कहाँ से है कि आए दिन सैंकड़ों मील दूर रैलियों, धरनों, प्रदर्शनों में मुँह उठाकर चल देते हैं? कुछ तो हमें भी सोचना चाहिए?

  • 23. 09:25 IST, 17 मार्च 2010 Satyasheel Gautam:

    बहुत बढ़िया लिखा है लेकिन इसमें भेदभाव की बू आती है. ऐसा लेख सभी नेताओं के बारे में लिखा जाना चाहिए. सुरेश कुमार जी, उत्तर प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी जैसे भी मुख्यमंत्री हुए हैं. जो अस्सी की उम्र में भी रासलीला रचाते हैं.

  • 24. 12:15 IST, 17 मार्च 2010 brajkiduniya.blogspot.com:

    मायावती ने जो कुछ भी किया उसने भारतीय लोकतंत्र को निश्चित रूप से पूरी दुनिया के समक्ष शर्मिंदा किया है.लेकिन किसी भी अन्य दल को इस पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है क्योंकि कोई भी दल दूध का धोया नहीं है.हम्माम में सभी नंगे हैं. जो बाक़ी लोग छिप कर करते हैं माया ने वही काम खुलेआम किया.राजनीति अब मिशन नहीं है बल्कि प्रोफेशन है. लोग-बाग अब राजनीति में सिर्फ धन कमाने के लिए आते हैं. ऐसे में अगर इस तरह की घटनाएँ होती हैं तो आश्चर्य कैसा?

  • 25. 14:37 IST, 17 मार्च 2010 Afsar Abbas Rizvi "Anjum":

    वाह-वाह सलमा ज़ैदी साहिबा आपका लेख पसंद आया. काफ़ी सटीक व्यंग्य किया है. लेकिन सबके लिए जनता भी ज़िम्मेदार है. बहन मायावती ग़रीबों के ख़ून-पसीने की कमाई इस तरह से उड़ी रही हैं. अभी कुछ रोज़ पहले ही मायावती ने मंदिर हादसे में मारे लोगों के लिए पैसे नहीं होने की बात कही थी. लेकिन रैलियों के लिए इतना धना कहां से आ रहा है., मूर्तियों के लिए भी पैसा कहा से आ रहा है?

  • 26. 15:35 IST, 17 मार्च 2010 Mohammad Athar khan Faizabad Bharat:

    मायावती जी की माला को देखकर लगा रहा है कि हमारा प्रदेश मालामाल है. बड़ी ख़ुशी की बात है कि उन्होंने नोटों की माला को दिखाया है ना कि दूसरे नेताओं की तरह छुपा रही हैं. दूसरे नेता भी पैसा (जनता का) पानी की तरह बहाते हैं फिर हंगामा क्यों है बरपा?

  • 27. 16:57 IST, 17 मार्च 2010 ahmad:

    ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जनता सिर्फ़ वोट डालने, टैक्स जमा करने, देशभक्ति के गीत गाने और ड्रामा देखने के लिए रह गई है. पैसा कहाँ से आया और कहाँ गया, जनता को क्या मतलब है? जनता सिर्फ़ नियम-क़ानून का पालन करती है. बिजली, पानी, सड़क के लिए क़िस्मत ज़िम्मेदार है. नेता तो बस रैली करें.


  • 28. 17:33 IST, 17 मार्च 2010 Mukesh Sakarwal:

    अब देखने वाली बात यह है कि वह या उनकी पार्टी इस पैसे का दलितों के लिए कैसे इस्तेमाल करती है.

  • 29. 18:14 IST, 17 मार्च 2010 Amit Kumar Gangsara:

    आरक्षण, जातिवाद ये सब बहाने हैं असली निशाना तो पैसा कमाना है. अगर कोई मायावती का विरोध करे तो वह मनुवादी कहलाता है. उसे दलित विरोधी कहा जाता है. मेरा तो मानना है कि मायावती को ज़िंदगी भर के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर देना चाहिए.

  • 30. 19:12 IST, 17 मार्च 2010 rohit:

    एक समय नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज के लिए चंदा लिया था, लोगों ने उन्हें पैसे और अपने वजन के बराबर तक गहने दिए थे क्योंकि यह एक अच्छा कारण और अच्छे नेता के लिए था. लेकिन जब मैंने मायावती का वीडियो देखा तो निश्चित रूप से यह परेशान करने वाला था. अब मुझे लगता है कि लोगों को जाग जाना चाहिए और उन्हें नेताओं को बताना चाहिए उनका काम क्या है. इस मामले में मीडिया की प्रशंसा करनी चाहिए की उसने अपना काम ईमानदारी से किया.

  • 31. 19:47 IST, 17 मार्च 2010 anand mishra:

    हाथी जंगल में ही रहे तो ही अच्छा है. नहीं तो पहले से ही अविकसित राज्य उत्तर प्रदेश का भविष्य अंधकारमय होना तय है. मुझे समझ नहीं आता उत्तर प्रदेश की जनता को हाथी से इतना लगाव क्यों है?

  • 32. 21:11 IST, 17 मार्च 2010 subbiah:

    किसी ने सच ही कहा था, आम आदमी नेताओं के करोड़ों के खेल से चिंतित नहीं होते.वे तो सिर्फ़ दूसरे आम आदमी से जलते हैं और फिक्र है उनके उत्थान की.

  • 33. 12:04 IST, 18 मार्च 2010 Ratnesh Dwivedi:

    सलमा जी मैंने आज पहली बार आपका व्यंग्य लेखन देखा. आप ने उस कला का सही प्रदर्शन किया है जिसका आपको इतने वर्ष बीबीसी में रहने के बाद अनुभव हुआ.

  • 34. 15:13 IST, 18 मार्च 2010 Shishu:

    झूठ बोलना पाप है, अब नेता जी ने समझाया
    पैसा पैसा चिल्लाते क्यूँ, है पैसा ही केवल माया
    है पैसा ही केवल माया मुझे पैसे की माला पहनाओ
    अगर नहीं है घर में रोटी तो पीजा-बर्गर तुम खाओ
    'शिशु' कहें आजकल माला भी तो पैसे से आता
    रूपये डाल गले में जो माला के पैसे को बचाता

  • 35. 22:24 IST, 18 मार्च 2010 sunil kumar:

    काशी की माया, कहीं धूप कहीं छाया.

  • 36. 23:08 IST, 18 मार्च 2010 himanshu:

    क्षमा करें, बहुत खराब ब्लॉग लिखा है आपने. आप पहले तय कर लें कि यह व्यंग्य है, कटाक्ष है, हास्य है.

  • 37. 01:57 IST, 19 मार्च 2010 jai :

    सही कहा आपने.

  • 38. 14:15 IST, 19 मार्च 2010 skarya:

    ऐसा लगता है जैसे कि साफ छवि वाले मीडिया से भी अब पक्षपात की बू निकलने लगी है, जिससे उसके पत्रकारों को सवर्ण या दबंग नेताओं द्वारा सभाओं में तलवार या गदा जैसे घातक अस्त्र लहराने,स्वर्ण मुकुट धारण करने और सभाओं की व्यवस्था पर हुए भारी-भरकम खर्चों पर कोई आपत्ति तक नहीं होती लेकिन वे एक दलित समाज की एक महिला की प्रगति तथा उसके करोड़ों अनुयायियों द्वारा मिलकर दी जा रही एक-एक रूपये की भेंट और अपनी उपस्थिति को दर्ज कराने पर कुछेक के पेट में व्यंग-ब्लॉग पीड़ा तक उठने लगी है.

  • 39. 16:01 IST, 19 मार्च 2010 skarya:

    सलमा जी,आप ही बताएं कि -भारत में- प्रतिमाओं,रुपयों की मालाओं और चन्दा बसूलने की परम्परा किसने शुरू की? क्या वह निष्पक्ष थी? क्या दलित महिलाओं और सवर्ण महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में भारी अंतर नहीं है? क्या यहाँ की महँगी, दोषपूर्ण और दोहरी शिक्षा प्रणाली/नीति के कारण गरीब और वंचित वर्गों के लाखों प्रतिभावान बच्चे शिक्षा-उच्च शिक्षा से वंचित नहीं रह जाते/रखे जाते रहे हैं?क्या भारत के विकास में इन गरीबों का खून पसीना समाहित नहीं है? क्या आज मीडिया दलित नेतृत्व व सवर्ण नेतृत्व के संगठन व शौर्य व प्रतिभा पर दोहरे मानदंड प्रस्तुत नहीं कर रहा है? क्या मायावती के लिए करोड़ो अनुयायी तन-मन-धन न्योंछावर करने को तैयार नहीं हैं?

  • 40. 17:21 IST, 19 मार्च 2010 skarya:

    सलमा जी, आपके ब्लॉग में भी अब पक्षपात की बू निकलने लगी है.

  • 41. 22:01 IST, 19 मार्च 2010 rahim:

    आपने सही कहा... माया को मालूम है वह जो कर रही हैं. वह ग़लत है पर सुर्ख़ियों में रहने की राजनीति में सब चलता है... क्योंकि मीडिया और ख़ास तौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास मसाला आ जाता है.

  • 42. 04:32 IST, 21 मार्च 2010 rajiv :

    ये भारत है और यहां कुछ भी हो सकता है.

  • 43. 21:29 IST, 21 मार्च 2010 Jai Prakash Pathak:

    आम नागरिक के स्थान पर करदाता की चर्चा पत्रकार किया करते हैं. भारत के सभी लोग करदाता हैं चाहे प्रत्येक्ष रूप से या परोक्ष रूप से.

  • 44. 23:37 IST, 22 मार्च 2010 ssp:

    देश के लाखों मंदिरों में अरबों रुपए का चढ़ावा रोज़ाना होता है. और यह कहाँ जाता है किसी को कुछ पता नहीं चलता. और उसके लिए कभी टैक्स भी नहीं लिया जाता है. क्या मंदिरों की आय पर टैक्स नहीं लगना चाहिए? सबसे बड़ी बात वहाँ पैसा चढ़ाया ही क्यूं जाता है. और वह भी उन पत्थर की मूर्तियों पर जो काल्पनिक हैं. मायाजी तो जीती जागती देवी हैं, जिन्होंने ग़रीबों को नया जीवन दिया है, जो अपने ही देश में उपेक्षित थे. देश के सारे मंदिरों को बदलकर स्कूल, अस्पताल और लोगों के ज़रूरी स्थान बना देना चाहिए. मंदिरों की कोई ज़रूरत नहीं है. जो एक ज़रिया है पैसा कमाने का. हमें अच्छे कर्म करने चाहिए जो कि देश हित में हों. मायावती जी वह सब कर रही हैं जो देश के लिए ज़रूरी है. हम विकसित देश तभी बन पाएंगे जब देश का हर नागरिक समान होगा और सभी शिक्षित होंगे. सब को बराबर का हक़ होगा. कोई ऊँच नीच ना हो.

  • 45. 22:07 IST, 23 मार्च 2010 ssp:

    आज हम जगह-जगह मंदिर का निर्माण कर रहे हैं और लाखों मंदिर पहले से बने हुए है. जिन पर अराबों रुपया खर्च हुआ है और हो रहा है. क्या वह पैसा ग़रीबों का नही होता है. क्या ज़रूरत है मंदिर बनाने की जो सिर्फ़ एक ज़रिया है पैसा कमाने का कुछ ख़ास लोगों के लिए. उसमे जो भी पैसा आता है वह भी लाखों अराबों रुपए उस पैसे का क्या होता है. मंदिर बनाने के बजाए हम स्कूल, अस्पताल, डिग्री कॉलेज और भी इंसानों के लिए ज़रूरी चीज़े क्यों नही बनाते हैं. हम जाती-धर्म का बंधन क्यों नहीं तोड़ रहे हैं. हम मानव और हमारा धर्म मानवता क्यों नहीं है. अमिताभ का मंदिर बन सकता है तो मायावती जी का क्यों नहीं. मूर्तियाँ तो शाहरुख़ खा़न, सलमान, सचिन और न जाने किसकी लगी हुई हैं और सब जिवित हैं. ऐसे में मयावती जी की क्यों नहीं लग सकती. आज कल हाथी चुनाव चिन्ह को लेकर लोग जनहित याचिका दायर कर रहे हैं. साइकिल और हाथ के खिलाफ क्यों नहीं कर रहे हैं. हाथ लेकर सब घूमते हैं, सबके हाथ काटे जाने चाहिए. सब साइकिल चलाते है उस पर बैन लगाना चाहिए. क्योंकि वह सब चुनाव चिन्ह का ग़लत प्रचार कर रहे हैं. मंदिरों के बाहर और बड़े-बड़े धार्मिक आयोजनों में हाथी को स्वागत के रूप में पेश किया जाता है. आंबेडकर स्मारक में भी हाथियों का प्रयोग स्वागत के रूप में किया गया है जिसमें हाथियों की सूड़ ऊपर की ओर है जबकि चुनाव चिन्ह में नीचे की ओर है. इतने जल्दी सबको चुनाव चिन्ह सताने लगा है. व कुमार जी कुछ आप भी लिखिए माया जी के खिलाफ़ तो बहुत लिखते हैं. वे जो भी कर रही हैं वह दिख तो रहा है. यहाँ इतने भ्रष्ट लोग हैं जिन्होनों देश को लूटा है और लूट रहे हैं. उनके पास अराबों की संपत्ति है कभी उन पर भी नज़र डालिए. मायावती जी वह सब कर रही हैं जो देश के लिए ज़रूरी है. हम विकसित देश तभी बन पाएँगे जब देश का हर नागरिक समान होगा.

  • 46. 23:46 IST, 23 मार्च 2010 padmakar.tripathi, new delhi:

    आपके शब्द बड़े दमदार हैं. वैसे तो माला फूलों की ही शोभा देती है लेकिन लोग हैं कि जूतों से लेकर नोटों तक की माला पहना देते हैं. किसको कौन सी माला मिलती है यह तो मुक़द्दर की बात है. सुमित्रानंदन पंत की 'पुष्प की अभिलाषा' में फूल माली से कहता है 'मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश नवाने जिस पथ जाएँ वीर अनेक'. लेकिन माला जब नोटों की हो तो बात बदल जाती है. अब माला की अभिलाषा है कि 'मुझे तोड़ लेना मालकिन उस पथ पर देना तुम फेंक, स्विस बैंक में जमा कराने जिस पथ जाएँ वीर अनेक'.

  • 47. 19:52 IST, 24 मार्च 2010 Seema Prakash:

    मायावती का खुले जलसे में नोटों की माला पहनना उन राजनीतिक दलों के मुँह पर तमाचा है जो विभिन्न स्वार्थों से चोरी-छिपे पैसे लेते हैं और जनता के बीच बगुलाभगत बनने का नाटक करते हैं.

  • 48. 00:26 IST, 25 मार्च 2010 satish jindal:

    माला के रूप में पहनाना भारतीय करेंसी का अपमान है.

  • 49. 18:01 IST, 27 मार्च 2010 Nikhil Srivastava:

    समझ नहीं आ रहा है कि इस सोच को कैसे आकर दूँ. काफी कुछ कहने का मन है, हमेशा की तरह आज भी कई सवाल हैं. अपने प्रदेश की मुख्यमंत्री बहन कुमारी मायावती जी का राज देख दंग हूँ और व्यथित भी. इनके राज में रातों-रात व्यवस्था बदल जाती है. किसी को कानोंकान खबर नहीं लगती. अभी का ही उदाहरण लीजिए करोड़ों रुपए की माला पहनकर हवा में उड़ गईं बहन जी. मीडिया खूब चिल्लाई, पूरे चौबीस घंटे आलोचना होती रही, दूसरी ओर प्रेस बिकी हुई सी लगी. राजधानी के ज्यादातर हिंदी भाषी अख़बारों ने जो जयकारा लगाया कि अगले दो साल के लिए विज्ञापन की चिंता ही खत्म हो गई. किसी ने तीन पन्ने तो किसी ने चार, समझ नहीं आया कि ऐसी कौन सी रैली थी कि पूरा अख़बार ही मायावी हो गया. कुछ ने तो नीले रंग की हेडिंग भी लगा दी. सबने एक छोटा सा बॉक्स दिया जो अख़बार राजनीति को जगह नहीं देते, वे भी गंगा स्नान करने से नहीं चूकते. एक मुख्यमंत्री इतना ताक़तवर है कि सब बेबस हो गए हैं. ये सोचकर बहुत दुःख होता है. पत्रकारिता के सिद्धांत, सामाजिक जिम्मेदारी और सारे मूल्य खोखले से लगने लगते हैं.

  • 50. 23:15 IST, 29 मार्च 2010 v.k.verma:

    हकीकत तो यह है कि मायावती के मंत्रियों ने उनके जन्मदिन पर जनता से लूटे गए पैसे की माला बनाकर उन्हें भेंट किया है.क्योंकि जनता से यह पैसा लूटने के लिए आज़ादी उन्हें मायावती से ही मिली है.यह एक तरह का हफ़्ता था जिसे सार्वजनिक रूप से दिया गया.

  • 51. 05:18 IST, 15 अप्रैल 2010 kajal:

    ऐसा कोई क़ानून ज़रूर बनना चाहिए जिससे ये नेता अपने हद से बाहर न जाएँ.

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