भारतीय व्यंजन असल में कितने भारतीय हैं?

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- Author, यशस्विनी संपतकुमार
- पदनाम, बीबीसी ट्रेवल
मैं मुंबई की एक संकरी-सी रसोई में थी और मिट्टी के बर्तनों में प्राचीन भारतीय व्यंजन तैयार होता देख रही थी.
पत्ते, लकड़ी और धातु के बर्तन रसोई में बिखरे हुए थे. भोजन में सिर्फ़ उन्हीं खाद्य सामग्रियों का इस्तेमाल हो रहा था जो इस उपमहाद्वीप की अपनी हैं.
यानी उनमें मिर्च (जो मेक्सिको से आया है) का तीखापन नहीं था और आलू (जो दक्षिण अमरीका से आयातित है) का स्टार्च भी नहीं था.
भोजन पका रहे रसोइयों में से एक कस्तूरीरंगन रामानुजन ने बताया कि वे पत्तागोभी, फूलगोभी, मटर या गाजर का इस्तेमाल नहीं करते.
सीमित सामग्रियों के बावजूद वे मेरे परिवार के लिए शानदार दावत तैयार कर रहे थे, जिसमें चावल, मुलगटानी जैसा सात्रमुडु, प्रोटीन से भरा कुज़ाम्बु शोरबा और कई तरह सब्जियां और स्नैक्स शामिल थे.

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श्राद्ध का भोजन
यह श्राद्ध का भोजन था जिसे दक्षिण भारत के हिंदू परिवारों में परिवार के करीबी सदस्यों की बरसी पर खाया जाता है. मेरे लिए यह मेरे ससुर की बरसी थी.
मान्यता है कि यह दावत परिवार के पुरखों तक पहुंचती है, लेकिन अनजाने में इसने इस क्षेत्र के पाककला इतिहास की याद ताज़ा कर दी.
यह भोजन पूरी तरह उन सामग्रियों से तैयार किया जा रहा था जो इस उपमहाद्वीप में कम से कम एक हज़ार साल से मौजूद हैं.
टमाटर से बनने वाली मसालेदार कढ़ी और नान के लिए मशहूर इस देश में कई प्रसिद्ध खाद्य सामग्रियां असल में इस देश की हैं ही नहीं. टमाटर पुर्तगाली लेकर आए थे और नान मध्य एशिया से आया.
आलू, टमाटर, फूलगोभी, गाजर और मटर अब भारतीय रसोईघरों में आम हैं, लेकिन ये सब इस उपमहाद्वीप में सदियों से नहीं हैं.
18वीं सदी के अंत में डच यूरोपीय लोगों को खिलाने के लिए आलू लेकर भारत आए थे.

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आलू आज हर भारतीय रसोई में मिलता है. इसे उबालकर, भूनकर, तलकर और भरकर कई तरीके से खाया जाता है.
भारतीय पाककला के दिवंगत इतिहासकार के टी अचय मानते थे कि मिर्च संभवतः मेक्सिको से भारत आया था. इसे पुर्तगाली यात्री वास्को डि गामा भारत लाए थे.
काली मिर्च की खेती के लिए बहुत ज़्यादा बारिश चाहिए, मगर (लाल) मिर्च को देश में कहीं भी उगाया जा सकता था और यह तीखे मसाले की कमी भी पूरी करता था.

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टमाटर देसी या विदेशी?
भारतीय टेलीविजन शो "द करीज़ ऑफ़ इंडिया" की प्रोड्यूसर रुचि श्रीवास्तव के मुताबिक सभी भारतीय व्यंजनों ने टमाटर को अपना लिया है.
टमाटर का पौधा दक्षिण अमरीका से दक्षिणी यूरोप होता हुआ इंग्लैंड पहुंचा था. 16वीं शताब्दी से इसे अंग्रेज भारत लाए थे.
श्रीवास्तव का कहना है कि रेस्तरां और होटलों ने पिछले 100 साल में लाल कढ़ी सॉस को 'भारतीय' कहकर लोकप्रिय बनाया है.
"यह लोगों के जायके को बदल रहा है. जो लोग भारतीय व्यंजनों के बारे में बहुत नहीं जानते, उनके लिए प्याज और टमाटर से बनने वाली ग्रेवी क्लासिक है."
श्राद्ध संस्कार के बाद खाए जाने वाले भोजन भारतीय उपमहाद्वीप की स्वदेशी जैव विविधता को दिखाते हैं. इसमें कच्चे आम, कच्चे केले, ग्वारफली, सेम, शकरकंद, केले के तने, अरबी और हड़जोड़ को शामिल किया जाता है.
इन खाद्य सामग्रियों को काली मिर्च, जीरा और नमक के साथ पकाया जाता है. मूंग दाल से प्रोटीन की कमी पूरी होती है.

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परिवार का आयोजन
पूरे दक्षिण भारत में श्राद्ध में केवल परिवार के लोग शामिल होते हैं. भोजन से पहले प्रार्थना और कर्मकांड होते हैं.
परिवार के लिए यह साल का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है, जिसके कर्मकांड परिवार के मुखिया या सबसे बड़े पुरुष सदस्य निभाते हैं.
मुंबई के एक वरिष्ठ हिंदू पुजारी पझवेरी चक्रवर्ती राघवन कहते हैं, "पारंपरिक समझ यह है कि जब परिवार के सदस्य गुजर जाते हैं तो वे पितृ देवता बन जाते हैं."
"माना जाता है कि धरती पर पूरा एक साल पितृ देवता के लिए एक दिन के बराबर होता है. इसलिए वार्षिक श्राद्ध उनके लिए दैनिक भोजन है."
कुछ व्यंजन, जैसे तले हुए केले, सात्रमुडु या कुज़ाम्बु अक्सर घर में बनाए जाते हैं. जो लोग ख़र्च उठा सकते हैं वे पेशेवर रसोइयों की सेवा लेते हैं.
श्राद्ध भोजन तैयार करने वाले रसोइए अक्सर प्रशिक्षण में कई साल बिताते हैं. वे परिवार के पूर्वजों के जीवित होने के समय मिलने वाले स्थानीय अनाजों, सब्जियों और फलों के हिसाब से मेन्यू भी तैयार करते हैं.
मिसाल के लिए, यदि परिवार की जड़ें पूर्वी तट पर स्थित टोंडिमंडलम में है तो भिंडी बनाई जाती है, क्योंकि भिंडी उस क्षेत्र में उगाई जाती है.

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बदल गया खान-पान
रसोइयों को फुर्ती से काम करते हुए देखकर मैंने महसूस किया कि नये व्यंजनों के बीच इन पुराने भारतीय व्यंजनों को पहचानना कठिन हो सकता है.
विदेशी आक्रमणकारी और व्यापारी आए और चले गए, लेकिन उन्होंने पिछले 1000 सालों में भारतीय खान-पान को बदल दिया.
देश भर के कई घरों में स्थानीय सामग्रियों से पुराने व्यंजन बनाए जाते हैं. जैसे दक्षिण भारतीय खाने में चावल के साथ रसम.
यह पतला सूप जीरा, काली मिर्च और धनिये से तैयार किया जाता है, जिसमें मसालेदार तले हुए आलू भी मिले हो सकते हैं.
श्राद्ध भोजन के लिए रामानजुम पांच अलग-अलग सब्जियों से व्यंजन बनाने में व्यस्त थे. स्थानीय मंडी से कच्चे केले, शकरकंद, अरबी, ग्वारफली और करेले खरीदे गए थे.
उन्होंने इन सब्जियों में सरसों, जीरा, करी पत्ता और चना मिलाया और तिल के तेल में पकाया.
रामानुजम पंच भक्षणम तैयार कर रहे थे. तले हुए ये स्नैक्स उन केले के पत्तों पर सजाए जाते हैं, जिन पर भोजन परोसा जाता है.
गुड़, नारियल, काले तिल और गेहूं के मोटे पिसे आटे से मिठाइयां बनाई गईं. कुछ अन्य स्नैक्स नमकीन और मसालेदार थे जो बेसन और काली मिर्च से बने थे.
श्राद्ध भोजन का मुख्य आकर्षण थी- तिरुकन्नामुडु, जो दूध, दाल और गुड़ से बनने वाली मिठाई है.

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शुद्ध भारतीय जायका
श्राद्ध में चूंकि बाहरी लोग हिस्सा नहीं लेते, इसलिए सैलानियों के लिए इसे देखना या चखना आसान नहीं है.
लेकिन कुछ व्यंजन पूरे दक्षिण भारत में मिलते हैं, जैसे अधिरसम.
यह भारतीय शैली का डोनट है जो बाहर से कुरकुरा और अंदर से मुलायम और मीठा होता है.
चावल और सफेद दाल के बेसन से बना कुरकुरा नमकीन तेनकुझल भी अक्सर नाश्ते की दुकानों पर उपलब्ध रहता है.
कई घरों, मंदिरों और पारंपरिक दक्षिण भारतीय रेस्तरां में भी कुछ व्यंजन मिलते हैं, जिनको श्राद्ध भोजन में परोसा जाता है.
श्रीवास्तव का कहना है कि श्राद्ध जैसे अनुष्ठान शुद्ध भारतीय व्यंजनों को बचाए रखने में मदद कर रहे हैं. वह कहती हैं, "भोजन की परंपराएं सिर्फ़ घर में ही संरक्षित हो सकती हैं."

रेस्तरां में वह बात नहीं
भारतीय भोजन परोसने वाले रेस्तरां का खाना शायद ही कभी घर के खाने से मिलता-जुलता हो.
भारतीय घरों की रसोई में पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे व्यंजन सुरक्षित हैं. नई सामग्रियों के साथ भी वहां पुराने मसालों का संतुलन बना रहता है.
चूंकि श्राद्ध दूसरे धार्मिक कार्यक्रमों के मुक़ाबले छोटे होते हैं और परिवार तक सीमित रहते हैं, इसलिए बड़े पारिवारिक समारोहों की तुलना में इसने खानपान की परंपराओं को ज़्यादा प्रभावी ढंग से संजोकर रखा है.
राघवन कहते हैं, "शादी सामाजिक समारोह होता है. वहां आपको महानगरीय भोजन बनाना पड़ता है. खाने को अलग-अलग तरह के मेहमानों के लिए जायकेदार बनाना पड़ता है. श्राद्ध निजी होते हैं. वहां हम परंपरा से बंधे रह सकते हैं."
रामानुजम एक सहयोगी के साथ मिलकर काम कर रहे थे. उन्होंने गुड़ को चावल के आटे में मिलाया और गूंथ लिया.
केले के पत्ते पर फैलाकर उनको छोटे-छोटे डिस्क का आकार दिया और फिर सावधानी से उनको तल लिया. तलने पर वे अधिरसम डोनट बन गए.
रामानुजम ने उनको बांस की टोकरी में रख लिया, जहां पहले से भी चार तरह के भक्षणम रखे हुए थे.

खान-पान की संस्कृति का संरक्षण
राघवन कहते हैं, "पारंपरिक रूप से श्राद्ध भोजन लकड़ी की आग पर पकाया जाता है. खाना पीतल या चांदी के बर्तन में बनता है. आजकल स्टील के बर्तनों का प्रयोग आम हो गया है. लकड़ी के चूल्हे की जगह गैस स्टोव आसान है."
रसोइयों ने चावल और काले चने के गूंथे हुए आटे को पीतल की दो बेलनाकार इकाइयों के बीच डाला और तले हुए तेनकुझल को आकार देने लगे.
करेला मूंग दाल के साथ एक मिट्टी के बर्तन में पक रहा था. एक दूसरे चूल्हे पर अरबी के टुकड़ों को तेल में तला जा रहा था.
ये सारे भोजन भारतीय पाक विविधता का एक छोटा सा हिस्सा भर हैं. दो हजार साल पुराने ग्रंथ, जैसे भारतीय औषधि कोष चरक-संहिता में विभिन्न प्रकार के तेलों, फलों, स्थानीय अनाजों, सब्जियों और पशु उत्पादों का वर्णन है. उनमें से कई उत्पाद आज भी इस देश में उपयोग में आते हैं.
कर्मकांड पूरा होने के बाद रसोइयों ने सभी लोगों के सामने केले के पत्तों पर चावल और मूंग दाल परोसा. फिर एक-एक करके सारे व्यंजन परोसे.
मैंने अपने पत्ते पर इन व्यंजनों की विविधता देखी और अपनी समृद्ध संस्कृति के प्रति मन ही मन आभार जताया. मुझे पता है कि इन रसोइयों की पीढ़ियां ही वास्तव में भारत के पाक इतिहास को संजो रही हैं.
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