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जब अजगर पकड़ने के लिए अमरीकियों ने मांगी मदद
- Author, यशस्विनी संपतकुमार
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
सांप को देखकर सिहरन अपने आप उठ जाती है. उसकी फुफकार डरावनी लगती है. उसका रेंगना रोंगटे खड़े कर देता है.
मगर, हिंदुस्तान में एक जनजाति ऐसी भी है, जो ज़हरीले सांपों से खेलती आई है. किंग कोबरा हो या ज़हरीला करैत सांप, उसे पकड़ना और ज़हर निकालना इस जनजाति के लोगों के लिए बाएं हाथ का खेल है.
वैसे, किसी कोबरा नाग को देखना बहुत डरावना मंज़र होता है. मुझे ये बात आज से कुछ साल पहले तक नहीं पता थी. कई साल पहले जब मैं दक्षिण भारत के सूखे और झाड़-झंखाड़ से भरे इलाक़े से गुज़र रही थी, तो किसी ने मुझे इशारा करके काला नाग दिखाया था. उस वक़्त मैं एसी कार में शीशा बंद करके बैठी थी, तो मुझे उतना डर नहीं लगा.
लेकिन, अब जब कि मैं कोबरा से केवल तीन मीटर की दूरी पर खड़ी हूं और हमारे बीच में ईंट की छोटी सी दीवार भर है, तो पूरा माहौल बेहद डरावना लग रहा है. फुफकारते और डसने के लिए बेक़रार नागराज को देखकर मुझे सिहरन होने लगी.
वहीं, राजेंद्रन को इस बात से ज़रा भी डर नहीं लगा. वो भारत के सबसे ज़हरीले सांपों में से एक इस नाग को पकड़ने में बड़े आराम से लग गए.
अपना काम करते हुए राजेंद्रन ने बताया, "हम पेड़ों की छंटाई कर रहे हैं. इससे जो शोर हो रहा है, उससे सांप परेशान हैं."
राजेंद्रन इस बेहद ज़हरीले सांप को बिना किसी ख़ास मशक्कत के पकड़ लेते हैं. इस दौरान न तो वो दस्ताने पहनते हैं और न ही सुरक्षा के लिए कोई और चीज़. उनके बदन पर बस एक सूती कमीज़ और एक लुंगी है.
सांपों का ज़हर निकालने के लिए सहकारी समिति
मैं जिस इलाक़े में हूं उसका नाम है वडानेम्मेली. ये तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के बाहरी हिस्से में समुद्र के किनारे बसा एक छोटा सा गांव है. राजेंद्रन यहीं रहते हैं. उनका ताल्लुक़ इरुला क़बीले से है. इरुला जनजाति के लोग तमिलनाडु के उत्तरी-पूर्वी तटीय इलाक़े में रहते हैं.
इरुला जनजाति को सांपों के बारे में उनके सदियों पुराने तजुर्बे की वजह से ख़ास माना जाता है. वो भारत की स्वास्थ्य सेवा में एक अहम रोल निभाते हैं. मगर इरुला जनजाति की इस ख़ूबी के बारे में बहुत कम ही लोगों को पता है.
राजेंद्रन कहते हैं, "बहुत से लोग सांप से डरते हैं. लेकिन हमें ये समझना होगा कि सांप सिर्फ़ अपनी जान की हिफ़ाज़त चाहता है. अगर सांप को देखकर हम दौड़-भाग करेंगे, तो उसे अपने लिए ख़तरा महसूस होता है. फिर वो हमें काट सकता है. अगर सांप दिखे, तो आप शांत अपनी जगह पर खड़े रहें. थोड़ी देर में सांप ख़ुद-ब-ख़ुद रेंगकर वहां से हट जाएगा."
हम जहां पर राजेंद्रन से बात कर रहे थे, वो इरुला स्नेक कैचर्स इंडस्ट्रियल को-ऑपरेटिव सोसाइटी का दफ़्तर है. ये सहकारी समिति 1978 में वडानेम्मेली में बनी थी. ये सांपों को पकड़ कर उनका ज़हर निकालने का काम करती है.
भारत में हर साल क़रीब 50 हज़ार लोग सांप के काटने से मर जाते हैं. सांप के काटे का एक ही इलाज है कि इसके ज़हर वाला एंटी वेनम इंजेक्शन लगाया जाए. भारत में छह कंपनियां ये दवा बेचती हैं. वो हर साल क़रीब 15 लाख एंटी वेनम सीरम बनाती हैं. इनमें से ज़्यादातर को इरुला जनजाति के निकाले सांप के ज़हर से तैयार किया जाता है.
सहकारी समिति का दफ़्तर एक झोपड़ी जैसे ठिकाने में है. यहां पर सांपों को मिट्टी के मटकों में क़ैद करके रखा जाता है. ज़हर निकालने के बाद उन्हें दोबारा जंगल में छोड़ दिया जाता है.
राजेंद्रन ने हमें एक मटकी से कन्नाडि विरियन यानी रसेल्स वाइपर सांप निकालकर दिखाया. रसेल वाइपर को भारत में पाए जाने वाले सांपों में सबसे आक्रामक और ज़हरीला माना जाता है.
कन्निअम्मा का नागराज से गहरा नाता
राजेंद्रन ने बताया कि इस वक़्त उनकी सोसाइटी में ज़्यादा सांप नहीं हैं. उन्होंने हमें दिखाया कि समिति के दफ़्तर में मिट्टी के मटके ख़ाली रखे हुए थे. हर मटकी में आधा रेत भरकर आधे हिस्से में सांपों को रखा जाता है. एक मटकी में दो सांप रखे जाते हैं. फिर उनका मुंह जालीदार कपड़े से बंद कर दिया जाता है. ताकि मटके में हवा जाती रहे और सांप का दम न घुटे.
राजेंद्रन ने कहा, "सोसाइटी के पास 800 सांप रखने का लाइसेंस है. हम एक सांप को 21 दिन तक रखते हैं. इस दौरान हम चार बार उनका ज़हर निकालते हैं. बाद में उनकी चमड़ी पर एक निशान बनाकर उन्हें जंगल में छोड़ दिया जाता है. इससे जिन सांपों का ज़हर निकाला जा चुका होता है, उनके दोबारा पकड़े जाने की गुंजाइश कम हो जाती है. सांप के तीन-चार बार केंचुल छोड़ने पर वो निशान भी मिट जाता है."
सांपों के बारे में राजेंद्र को ये समझ विरासत में मिली है. उन्होंने बचपन से ही बहुत सारा वक़्त जंगलों में सांपों का पीछा करते हुए, उन्हें पकड़ते हुए बिताया है. दस साल का होने से पहले ही वो अपने क़बीले के बुज़ुर्गों को सैकड़ों ज़हरीले सांप पकड़ते देख चुके थे.
इरुला क़बीले के लोग बेहद ख़ामोशी से काम करते हैं. वो इकट्ठे जंगल में जाते हैं, तो भी शांत रहते हैं. उन्हें बचपन से ही सांपों की हरकतों और आवाज़ों के बारे में पता होता है. उन्हें पता होता है कि किस निशान का पीछा करना है और किसे छोड़ देना है. हालांकि, वो ऐसा किस आधार पर करते हैं, वो ये नहीं बता पाते.
इरुला क़बीले की उत्पत्ति और सांपों से इस समुदाय के ताल्लुक़ से जुड़े कई ऐसे राज़ हैं, जिन पर से पर्दा नहीं उठा है. लेकिन उनकी पौराणिक कहानियों और परंपराओं में हम स्थानीय मुख्य धारा की संस्कृति का मेल देखते हैं.
उनकी प्रमुख देवी हैं, कुमारी कन्निअम्मा. कन्निअम्मा का नागराज से गहरा नाता है. समुदाय के तमाम रिवाजों में से एक ये भी है कि क़बीले का पुजारी आत्मा आने की बात कहकर सांपों की तरह फुफकारता और झूमता है.
बीसवीं सदी के एक बड़े दौर में इरुला क़बीले के लोग सांपों को मारकर उनकी खाल बेच कर कमाई करते थे. हालांकि, अपनी देवी के सम्मान में वो सांपों का मांस नहीं खाते थे. सांप की एक खाल के बदले में उन्हें 10 से 50 रुपए तक मिल जाते थे, जो पश्चिमी देशों के फ़ैशन कारोबार में बहुत मांग में थी. 1972 में भारत सरकार ने वन्य जीव संरक्षण क़ानून बनाकर सांपों का शिकार ग़ैर-क़ानूनी बना दिया.
इरुला समुदाय के बीच 50 साल से ज़्यादा वक़्त गुज़ारने वाले रोमुलस व्हिटेकर, सांपों के स्पेशलिस्ट हैं. वो कहते हैं कि वन्य जीव संरक्षण क़ानून बनने के बाद इरुला समुदाय की हालत बहुत ख़राब हो गई. उनके खाने के लाले पड़ गए. वो सांपों को पकड़ने और खाल उतारने के सिवा कोई और काम जानते ही नहीं थे.
व्हिटेकर कहते हैं कि इस क़ानून के बनने से इरुला समुदाय के लोग भूखों मरने लगे थे.
1978 में सांप पकड़ने की सहकारी समिति बनने से हालात में सुधार आया. हालांकि, इस सहकारी समिति में समुदाय की केवल एक फ़ीसद आबादी ही जुड़ी है. इरुला समुदाय की कुल आबादी एक लाख 90 हज़ार से थोड़ी ज़्यादा है. लेकिन को-ऑपरेटिव सोसाइटी बनने से फ़ायदा ये हुआ कि उनके पेशे को क़ानून की रज़ामंदी मिल गई. इससे पहले तो स्थानीय प्रशासन उन्हें अवैध शिकारी मानकर शक करता था. वो इलाक़े के लोगों के बुरे बर्ताव के भी शिकार होते थे.
इरुला क़बीले की सदस्य सुशीला उस भेदभाव के बारे में बताती हैं. वो कहती हैं, "जब हम गांवों में जाते थे, तो हमें बुरा-भला कहा जाता था. हम से अच्छा सुलूक नहीं होता था. जब हम पैसे उधार लेते थे, तो हम से धोखाधड़ी भी होती थी."
अमरीका से मदद मांगने आए लोग
ज़्यादातर इरुला अनपढ़ थे. उन्हें इलाक़े की चावल मिलों में काम मिल गया. सुशीला बताती हैं कि उनके समुदाय के लोग इतने हुनरमंद थे कि बिना एक भी दाना तोड़े वो धान से छिलके को अलग कर देते थे.
लेकिन, ये इरुला का सांपों को पकड़ने का हुनर था, जिसकी वजह से उन्हें सात समंदर पार अमरीका से बुलावा आया. फ्लोरिडा फिश ऐंड वाइल्डलाइफ़ कंज़रवेशन ने एक चुनौती से निपटने के लिए इरुला समुदाय की मदद ली थी.
अमरीका के एवरग्लेड नेशनल पार्क के प्रशासन ने इलाक़े में अजगरों के आतंक से बचने के लिए इरुला समुदाय के लोगों से गुहार लगाई. एवरग्लेड में बर्मा की नस्ल वाले अजगर, संरक्षित प्रजाति के जीवों को निगल जा रहे थे. उन्हें पकड़ने में शिकारी और ट्रेनिंग पाए कुत्ते भी नाकाम रहे थे.
तब एवरग्लेड प्रशासन ने इरुला समुदाय के लोगों से मदद मांगी. सहकारी समिति ने मासी और वाडीवेल नाम के दो लोगों को अमरीका भेजा ताकि वो अजगरों के आतंक से छुटकारा दिला सकें.
दो महीने के अंदर ही दोनों ने 34 अजगर पकड़ लिए. ये काम शिकारी कुत्ते तक नहीं कर पाए थे. मगर इरुला समुदाय के मासी और वाडीवेल के लिए ये बाएं हाथ का खेल था.
फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के जो वासिलेविस्की कहते हैं, "इरुला हमारे लिए वरदान साबित हुए. उन्होंने कई विलुप्त होती नस्लों को बचाने में मदद की."
आज की तारीख़ में इरुला क़बीले पर तरक़्क़ी का बोझ बढ़ता जा रहा है. राजेंद्रन अपने इर्द-गिर्द तेज़ी से पांव पसारते शहर को देखकर डरे हुए हैं. उन्हें लगता है कि वदानेम्मेली गांव के आस-पास बढ़ते कारोबारी ठिकानों से जंगलों का सफ़ाया हो जाएगा. इससे सांपों की आबादी भी दूर चली जाएगी.
उनके गांव के आस-पास कई रिजॉर्ट और वीकेंड होम खुल गए हैं.
इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि उन्हीं सांपों के ज़हर से एंटी वेनम सीरम बनना चाहिए, जो पालतू हों. यानी जंगल से सांप पकड़ कर ज़हर निकालने का इरुला समुदाय का हुनर ही आज ख़तरे में है. इसकी वजह ये है कि इसका बाज़ार सिकुड़ता जा रहा है. क्योंकि इरुला क़बीले के लोग तो जंगलों से ही सांप पकड़ने के महारथी हैं.
वैसे, मासी वाडीवेल और राजेंद्रन, अपने क़बीले में सांप पकड़ने वाली शायद आख़िरी पीढ़ी हैं, नई पीढ़ी के इरुला समाज की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं. उनके लिए सांपों में दिलचस्पी बनाए रखना संभव नहीं रहा. रुमुलस व्हिटेकर हैरानी से बताते हैं कि बहुत से इरुला बच्चे तो सांप को देखकर डर भी जाते हैं.
अच्छी बात ये है कि अभी भी इरुला क़बीले के ज़्यादातर लोग सांपों को पकड़ने के हुनर के क़ायल हैं. सुशीला कहती हैं, "सांपों के साथ हमारे काम ने ही बुरे वक़्त में हमारा साथ दिया था. हमने अपने बुज़ुर्गों से जो हुनर सीखा है वो ख़त्म नहीं होना चाहिए."
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)
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