कहां के लोग दुनिया में सबसे ज़्यादा लेटलतीफ़ होते हैं

ब्राज़ील

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    • Author, लूसी ब्रायसन
    • पदनाम, बीबीसी ट्रेवल

बचपन से ही हम सब को वक़्त की पाबंदी का सबक़ सिखाया जाता है. किसी को जो टाइम दो उसे पूरा करो. काम समय पर पूरा करो.

कहीं जाना-आना हो तो वक़्त पर पहुंचो. कोई देर से आता-जाता है तो हम सब को खीझ होती है. ट्रेन देर हो या फ्लाइट इंतज़ार करने पर ग़ुस्सा आता है.

पर, एक देश ऐसा भी है, जहां टाइम पर पहुंचना असभ्यता माना जाता है! आप को पार्टी में बुलाया जाए और आप वक़्त पर पहुंच जाएं, तो हो सकता है कि मेज़बान ही तैयार न मिले.

इस देश का नाम है ब्राज़ील. ब्राज़ील, पूरे लैटिन अमरीका में इकलौता ऐसा देश है, जहां पुर्तगाली ज़बान बोली जाती है. यहां वक़्त को लेकर जो सोच है, वो बाक़ी दुनिया के बरक्स हैरान करने वाली है.

जब मैं ब्राज़ील के शहर रियो डे जेनेरियो में रहने के लिए पहुंची, तो, एक बार कुछ दोस्तों ने मुझे पार्टी पर बुलाया.

आज भी मुझे वो वाक़या याद आता है, तो ख़ुद पर खीझ उठती हूं. मुझे मैनचेस्टर से आकर रियो में रहते हुए तीन महीने बीत चुके थे. एक शनिवार को मुझे 'चुरास्को' यानी एक बार्बेक्यू पार्टी में बुलाया गया. ऐसी दावतें वहां पर उन दोस्तों के साथ होती हैं, जो हाल ही में बने हैं.

आदत के मुताबिक़ मैं दिए गए वक़्त पर अपनी मेज़बान के घर पर पहुंच गई. उसने हड़बड़ाते हुए दरवाज़ा खोला, तो, मैंने देखा कि वो बाथरोब में थी. यानी वो तो अभी नहा ही रही थी, जब मैंने उसके घर पर दस्तक दी. उसकी हालत देखकर एकबारगी तो मुझे लगा कि मैं ग़लत घर में पहुंच गई हूं.

रियो के लोग सबसे लेट

उसने मुझे घर के मेहमानख़ाने में बैठाया, जहां पर अभी भी पार्टी के लिए ख़रीदा गया सामान बेतरतीब पड़ा हुआ था.

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मेरी मेज़बान ने मुझे बहलाने के लिए टीवी चला दिया. मुझे कुछ ख़ास बनाना तो आता नहीं था. इसलिए मेरा मदद का प्रस्ताव भी बेकार ही था.

मुझे क़रीब दो घंटे, बाक़ी लोगों के इंतज़ार में गुज़ारने पड़े. इस दौरान मेरी मेज़बान दोस्त ने ख़ुद को पार्टी के लिए तैयार करने के साथ-साथ दावत का सामान भी तैयार किया.

यूं तो पूरा का पूरा ब्राज़ील ही लेटलतीफ़ है. मगर, उनमें भी रियो के लोग सबसे ज़्यादा लेट होते हैं.

दक्षिणी ब्राज़ील की टेक्नोलॉजिकल फ़ेडरल यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली डॉक्टर ज़ैक्लीन बोन डोनाडा कहती हैं कि, "किसी भी पार्टी में समय पर पहुंचना पूरे ब्राज़ील में बुरा माना जाता है."

"रियो में तो ख़ास तौर से इसे सामाजिक परंपरा के ख़िलाफ़ माना जाता है. जल्दी पहुंचना ठीक उसी तरह है जैसे आप किसी पार्टी में बिना बुलाए पहुंच जाएं."

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ब्राज़ील के लोगों का मोटो है, 'लाइफ़ इज़ ए बीच', यानी ज़िंदगी एक ठहराव है. इस सोच में तब और इज़ाफ़ा हो जाता है, जब आप रोज़मर्रा की ज़िंदगी ट्रैफिक जाम से जूझते हुए बिताते हैं.

नतीजा ये कि रियो के लोग न तो ख़ुद वक़्त के पाबंद होते हैं, न ही वो दूसरों का टाइम पर पहुंचना अच्छा मानते हैं. इसीलिए मेज़बान भी अगर लेटलतीफ़ है, तो उसे इसकी इजाज़त है.

मूल रूप से ब्रिटेन की रहने वाली फियोना रॉय अब ब्राज़ील में अनुवादक का काम करती हैं.

टाइम पर पहुंचना क्या होता है

फियोना कहती हैं कि, "यहां का अनलिखा नियम ये है कि मेज़बान तब तक इंतज़ार करते हैं जब पार्टी शुरू होने का वक़्त तय होता है. इसके बाद वो नहाना शुरू करते हैं."

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लेटलतीफ़ी तो पुर्तगाली भाषा के शब्दों में भी झलकता है. वहां ज़्यादा वक़्त लगने या देर होने से जुड़े शब्द तो हैं. लेकिन, टाइम पर पहुंचने का शब्द ही नहीं है.

ऐसे में जो लोग किसी जगह वक़्त से पहुंच जाते हैं, तो उन्हें 'होरा इंग्लिसिया' यानी अंग्रेज़ों की तरह वक़्त का पाबंद कहा जाता है.

अगर आप को ब्राज़ील में कोई कहे कि मैं जल्द ही आ रहा हूं, तो उसकी बात पर झांसा बिल्कुल मत खाएं. रियो के लोग बस यूं ही कह रहे होते हैं को पहुंचने वाले हैं. हो सकता है उस वक़्त वो घर में नहाने जा रहे हो!

डॉक्टर जैक़्लीन डोनाडा कहती हैं कि यूं तो पूरा ब्राज़ील ही लेट-लतीफ़ है, मगर रियो के लोग तो इस मामले में कुछ ख़ास ही हैं. वो बताती हैं कि उनका एक बॉस कई बार ये कहता था कि वो ट्रैफ़िक में फंस गया है, और जल्द ही पहुंचेगा. लेकिन, उस वक़्त भी उसके घर में होने की आवाज़ आती रहती थी.

ब्राज़ील के लोगों की ये लेटलतीफ़ी कोई नई बात नहीं. पीटर फ्लेमिंग ने 1933 में ही अपनी किताब में लिखा था कि कोई जल्दबाज़ है, तो ब्राज़ील में उसका बुरा हाल हो जाएगा.

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पीटर फ्लेमिंग ने अपनी किताब में लिखा था कि, "ब्राज़ील में देर होना एक वातावरण है. आप उसी में रहते हैं, उससे पीछा नहीं छुड़ा सकते. इस लेटलतीफ़ी का आप कुछ नहीं कर सकते. ब्राज़ील के लोगों को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उनकी एक ऐसी आदत है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती. कोई और देश ऐसा दावा नहीं कर सकता."

रियो की रहने वाली सिमोन फोंसेका मैरेक अब जर्मनी में रहती हैं. वो कहती हैं कि जर्मनी के लोगों की वक़्त की पाबंदी से उन्हें परेशानी होती है. अपनी पहली ही मीटिंग में जब वो टाइम पर पहुंचीं, तो देखा कि बाक़ी सभी लोग मौजूद थे और मीटिंग के शुरू होने के वक़्त का इंतज़ार कर रहे थे.

जैसा कि पीटर फ्लेमिंग ने अपनी किताब में लिखा कि रियो के लोगों की लेटलतीफ़ी पर गुस्सा होना बेकार है. क्योंकि इससे आप का ही नुक़सान होगा. रियो की जीवनशैली ही आरामतलबी वाली है.

फोंसेका मैरेक कहती हैं कि, "हमें लगता है कि हम इसलिए लेट होते हैं क्योंकि हम हमेशा अच्छी उम्मीदें पालते हैं. हम ये सोचते हैं कि तमाम काम कर के भी हम सही वक़्त पर पहुंच सकते हैं. और अगर नहीं कर पाते, तो वो भी चलता है."

हालांकि रियो के लोग भी इस लेटलतीफ़ी की एक सीमा रेखा तय किए हुए हैं. आप के ऊपर टाइम पर पहुंचने का दबाव नहीं होता. लेकिन, इसका ये मतलब नहीं कि आप कितनी भी देर से पहुंचें. फियोना रॉय कहती हैं कि एक बार मैं एक पार्टी में इतनी देर से पहुंची कि बार बंद होने वाला था. इतनी देरी करना भी ठीक नहीं है.

फोंसेका मैरेक कहती हैं कि रियो के लोग कारोबारी मीटिंग में समय पर पहुंचने की कोशिश करते हैं. लेकिन, कई बार ऐसी बैठकों में भी आधे घंटे तक की देरी को बर्दाश्त कर लिया जाता है.

ब्राज़ील के लोगों की लेटलतीफ़ी को मैंने भी बहुत जल्द अपना लिया था. बाद के दिनों में तो मैं इतनी अभ्यस्त हो गई थी कि कई बार तो मै ख़ुद अपनी दी हुई पार्टियों में सबसे देर से पहुंचने लगी थी. तब मेरे दोस्त मुझे चिढ़ाते थे कि ये तो पक्की ब्राज़ीलियन यानी 'विरोऊ ब्रासीलिएरा' बन गई है.

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(नोटः ये बीबीसी ट्रेवल की मूल कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है.)

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी ट्रेवल पर उपलब्ध है.)

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