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क्या पकवानों का बादशाह है ओशी? क्या है इसका भारत से संबंध?
हिंदुस्तान की मेहमान नवाज़ी के क़िस्से दुनिया भर में मशहूर हैं. हमारे यहां मेहमान को भगवान का रूप माना जाता है.
उसकी ख़ातिर का ख़ास ख़्याल रखा जाता है. खाना इसमें अहम भूमिका निभाता है. परिवार के साथ खाना खाना हमारी परंपरा रही है. हालांकि आज छोटे परिवार का ज़माना है.
फिर भी कोशिश होती है कि परिवार में जितने भी लोग हैं वो सब मिलकर खाना खाएं. माना जाता है इससे एक दूसरे के लिए लगाव और प्यार बढ़ता है. खाने के दौरान बहुत से मुद्दों पर चर्चाएं होती हैं. सबको अपनी बात कहने का मौक़ा मिलता है.
कुछ इसी तरह की संस्कृति मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान में भी देखने को मिलती है. यहां अक्सर आपको लोगों के झुंड नज़र आ जाएंगे, जो एक दूसरे के साथ बातें करते हंसी मज़ाक़ करते देखे जा सकते हैं.
यहां के लोग मेहमान नवाज़ी में किसी तरह की कसर बाक़ी नहीं रखते. पहली ही मुलाक़ात में आपको इनके साथ अपनेपन का एहसास होने लगता है.
खानों का बादशाह
ताजिकिस्तान का एक ख़ास पारंपरिक पकवान है ओशी पलव. कहा जाता है यहां के लोगों को एक-दूसरे के नज़दीक लाने में इस पकवान का अहम रोल है. ये डिश चावल, गोश्त और कई तरह की सब्ज़ियां मिलाकर तैयार की जाती है.
इसे धीमी आंच पर ताजिकिस्तान के पारंपरिक मसालों से तैयार किया जाता है. ताजिक संस्कृति में इसका ख़ासा महत्व है. यहां का कोई भी त्यौहार, जश्न या ख़ुशी का मौक़ा इसके बिना अधूरा है. ताजिक लोग इसे सभी खानों का बादशाह कहते हैं.
ताजिकिस्तान में चावल को पवित्र माना जाता है. यहां के एक रिसर्च स्कॉलर दिलशाद राहिमी के मुताबिक़ ताजिक लोग चावल को हज़रत मोहम्मद के दांत मानते हैं.
चूंकि ओशी पलव एक पवित्र खाना है. लिहाज़ा इसे आम तौर पर सामूहिक भोज के लिए तैयार किया जाता है. एक बार में क़रीब सौ लोगों के लिए इसे तैयार किया जाता है. जो बावर्ची इसे पकाने में माहिर होते हैं, वो अकेले ही पांच सौ लोगों के लिए ओशी तैयार कर सकते हैं.
कैसे बनाते हैं ओशी?
ओशी को पकाने में कई घंटे का समय लगता है. इसमें चावल, गोश्त, सब्ज़ी सभी बराबर मात्रा में डाला जाता है. मिसाल के लिए एक किलो चावल में एक किलो गोश्त और एक किलो गाजर डाली जाती है. मसाले भी इसी अनुपात में डाले जाते हैं.
सबसे पहले पतीले में तेल गर्म करके गाजर, प्याज़ और लहसुन को भूना जाता है. उसके बाद पानी डालकर उबालते हैं. सब्ज़ियां उबल जाने पर उसमें चावल डालकर धीमी आंच पर पकाया जाता है.
जो लोग साहिब-ए-हैसियत हैं, वो हफ़्ते में दो बार भी इसे घर पर पका लेते हैं और दोस्तों के साथ इसका मज़ा लेते हैं. कई मर्तबा लोग घर पर मिलकर ओशी का मज़ा लेते हैं और दूसरे खानों का ज़ायक़ा लेने बाहर रेस्त्रां चले जाते हैं.
कहते हैं कि ओशी का ज़ायक़ा लेने के लिए अगर मेहमानों को आधी रात तक इंतज़ार करना पड़ता है, तो वो करते हैं.
ओशी से दोस्ती तक
कहने वाले तो यहां तक कहते हैं अगर किसी की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाना होता है, तो यहां के लोग उसे ओशी की दावत देते हैं. अगर किसी को अपने रिश्ते में आई कड़वाहट दूर करनी होती है तो भी एक दूसरे को ओशी खिलाकर मेल-मिलाप करते हैं.
लिहाज़ा कहा जा सकता है कि ओशी दूरियां मिटाने में एक अहम रोल अदा करती है.
मशहूर है कि साल 1995 में ताजिकिस्तान का गृह युद्ध ख़त्म कराने में ओशी ने अहम रोल निभाया था. युद्ध करने वाले गुट एक साथ बैठे. खाने में ओशी पलव परोसा गया. उसे खाते हुए ही तमाम मुद्दों पर बात हुई और दो साल की मीटिंग के बाद मसला हल हो गया.
ओशी खाने का तरीक़ा भी पारंपरिक है. इसे एक बड़ी प्लेट में सब लोग मिलकर हाथ से खाते हैं. चम्मच का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाता है.
भारत से है संबंध
आपको जानकर हैरानी होगी कि ताजिकिस्तान के इस अहम खाने का संबंध भारत से है. दो सौ साल पुराने संस्कृत पाठों में पुलाव शब्द का ज़िक्र मिलता है. ये पकवान चावल और गोश्त से तैयार किया जाता था.
10वीं शताब्दी में फ़ारसी के विद्वान इब्ने सिना ने सबसे पहले इसके पकाने का तरीक़ा लिखा था. आज इसी से मिलते जुलते बहुत से पकवान लगभग पूरे एशिया में पकाए जाते हैं.
ख़ुद ताजिकिस्तान में ही ओशी की क़रीब दो सौ क़िस्में हैं. हर किस्म में मसालों और सब्ज़ियों में थोड़ा फेर बदल किया जाता है. लेकिन पारंपरिक ओशी चावल, गाजर, गोश्त, प्याज़ और लहसुन से ही तैयार होता है.
सांस्कृतिक विरासत का दर्जा
2016 में ताजिकिस्तान के ओशी पकवान को यूनेस्को ने सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया था.
दूसरों के साथ खाना बांटकर खाना भी ताजिक लोगों की संस्कृति का हिस्सा है. लिहाज़ा जब भी सामूहिक भोज का आयोजन होता है वो एक हिस्सा ग़रीबों और यतीमों में ज़रूर बांटते हैं.
इन्हीं ख़ूबियों के चलते इसे ताजिकिस्तान में पकवानों का बादशाह कहा जाता है.
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