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जिसने मलेर कोटला का नमक खाया, बार बार आया
- Author, सलमा हुसैन
- पदनाम, फ़ूड विशेषज्ञ, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारत में कई ऐसे छोटे शहर हैं जिनके बारे में आपने शायद न कभी सुना होगा और न ही पढ़ा होगा.
ये शहर अपने ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के कारण प्रतिष्ठा रखते थे, लेकिन अब गुमनामी के अंधेरों ने उनका रंग फीका कर दिया है और उनके महत्व को कम कर दिया है.
मलेर कोटला उनमें से एक है जो ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के साथ अपने ज़ायक़ों के लिए आज भी पंजाब के विभिन्न शहरों से अच्छे भोजन के शौक़ीन लोगों को आकर्षित करता है.
कहते हैं कि मलेर कोटला की पुरानी नवाबी बावर्चियों की नस्ल आज भी पुराने नुस्खों की मदद से लज़ीज खाना बनाती है.
किसी ज़माने में मलेर कोटला को नवाबों की सरपरस्ती हासिल थी, आज वही हवेली और जगमगाता शीशमहल सरकारी मिल्कियत बन चुका है और सत्तारूढ़ नवाबों का परिवार अपनी क़ब्रों में सो रहा है.
इतिहास के जानकारों का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान का बादशाह बहलोल लोदी (1451-1489) पश्चिमी भारत के अधिकांश इलाक़ों पर शासन कर रहा था और वह दिल्ली के तख़्त का सपना देख रहा था.
जब दिल्ली का रुख़ किया तो रेत के भयंकर तूफान में घिर गया.
उसे घनघोर अंधेरे में दूर रोशनी की किरण नज़र आई. जब क़रीब पहुंचा तो देखा कि शेख़ सदरुद्दीन अपनी झोंपड़ी में इबादत कर रहे हैं.
बादशाह ने अभिवादन करने के बाद अपने अभियान का उल्लेख किया और उनसे अपनी क़ामयाबी की दुआ मांगी.
दिल्ली के तख़्त पर ताजपोशी के बाद उसने शेख सदरुद्दीन को मलेर कोटला का सारा क्षेत्र बतौर जागीर प्रदान करते हुए नवाब के ख़िताब से सम्मानित किया.
साल 1657 में बाईज़ीद ख़ान ने मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब को शेर के हमले से बचाया और इनाम में मलेर और कोटला की धरती पर किले के निर्माण की इजाज़त हासिल कर ली और क़िला के पूरा होने के बाद दोनों गांव के नाम जोड़कर मलेर कोटला नाम रख दिया.
शाही दरबार से नवाब का ख़िताब हासिल किया और यूं मलेर कोटला में नवाबी दौर शुरू हुआ.
सन 1809 में मलेर कोटला अंग्रेज़ों के पास आया और अब वह भारत के राज्य पंजाब का एक शहर है.
भाईचारे और एकता के अलम्बरदार नवाबों ने मलेर कोटला पर अपनी गहरी छाप छोड़ी और आज भी यह हिंदू मुस्लिम एकता की बेहतरीन मिसाल है.
1947 में जब भारत के अधिकांश हिस्से सांप्रदायिक दंगे की चपेट में थे, तब मलेर कोटला में साम्प्रदायिक सौहार्द्र बना रहा.
जानकारों का कहना है कि जब सरहिंद के राज्यपाल वज़ीर ख़ान ने गुरु गोबिंद सिंह के दो छोटे लड़कों को ज़िंदा दीवार में चुनवा देने का आदेश दिया तो मलेर कोटला के नवाब शेर मुहम्मद ख़ान ने इसे ग़ैर इस्लामी करार देते हुए शाही दरबार छोड़ दिया.
जब गुरु गोबिंद सिंह को उनके इस क़दम की ख़बर पहुंची तो उन्होंने नवाब का आभार व्यक्त किया और उन्हें कृपाण और प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया और कहा कि हमेशा के लिए नवाब का इलाक़ा फलता- फूलता रहेगा.
आज मलेर कोटला मौसमी सब्ज़ियों की खेती का स्रोत है और यहां की ज़मीन हरी-भरी है.
मलेर कोटला की अधिकांश आबादी मुसलमानों की है और नवाबी दौर के पारंपरिक खाने थोड़े फेरबदल के साथ वहाँ के बाज़ारों में आज भी मिलते हैं.
जिसने एक बार मलेर कोटला का नमक खाया, बार-बार लौटकर यहीं आया.
मकई की रोटी और सरसों का साग पंजाब की ख़ास पहचान है, लेकिन पंजाब का यह छोटा शहर मुर्गे और गोश्त के उम्दा पकवानों के लिए विशेष रूप से मशहूर है.
दही और मसालों से लिपटा मुर्गे दहकती भट्ठियों में पकाए जाते हैं और उसकी सोंधी ख़ुशबू शौक़ीन ग्राहकों के सब्र का इम्तिहान लेती है.
कहीं मांस पक रहा है तो कहीं नानबाई गर्मा-गर्म रोटी निकाल रहा है, साथ ही हलवाई दूध कढ़ाही चढ़ाए आवाज़ लगा रहा है.
केसर और खजूर के शीरे में पकाया जाने वाला यह दूध यहाँ की ख़ास सौगात है.
(सलमा हुसैन खान-पान की शौक़ीन और खानों की इतिहासकार हैं.)
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