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चीन के वो कारख़ाने जो अफ्रीका में मछलियों को पाउडर में बदल रहे हैं
- Author, इयान उर्बिना
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
अफ्ऱीकी महाद्वीप के सबसे छोटे देश गाम्बिया के दक्षिणी इलाक़े में बसा है गुंजूर. उत्तरी अटलांटिक महासागर तट पर बसे इस शहर की आबादी है महज़ 15 हज़ार. इस शहर में समुद्र तट से पांच मिनट की दूरी पर बोलोंग फेन्यो है.
साल 2008 में गुंजूर के लोगों ने इस वाइल्डलाइफ़ रिज़र्व को बनाया था ताकि 790 एकड़ के समुद्री तट, मैंग्रोव, दलदली भूमि, सवाना और अंडाकार लैगून को संरक्षित किया जा सके. यह लैगून आधा मील लंबा और कुछ ग़ज़ चौड़ा है.
तमाम तरह के प्रवासी पक्षियों और डॉल्फिन से भरे इस लैगून में घड़ियाल और कैलिथ्रिक्स प्रजाति के बंदर भी पाए जाते हैं. जैव विविधता से भरपूर यह नायाब लैगून यहां की पारिस्थितिकी के स्वास्थ्य से जुड़ा है.
पक्षियों में दिलचस्पी रखने वालों के अलावा सैकड़ों पर्यटक हर साल यहां घूमने आते हैं. लेकिन 22 मई 2017 की सुबह यहां के लोगों ने पाया कि लैगून का पानी रातों-रात मलिन लाल रंग में बदल गया है. पानी में मरी हुई मछलियां तैर रही हैं.
यहां के कुछ लोग लैगून से पानी भर कर अहमद मनजांग को दे आए. मनजांग गुंजूर में ही पले-बढ़े हैं और अब सऊदी अरब में रहते हैं. वहां वह सीनियर माइक्रोबायोलिस्ट के तौर पर काम करते हैं.
ख़तरनाक स्तर के प्रदूषण का स्रोत
जिस वक्त गुंजूर में यह सब हो रहा था, उस दौरान वह अपने परिवार वालों से मिलने घर आए हुए थे. मनजांग ने यह सैंपल जर्मनी में एक लेबोरेट्री को भेज दिया. नतीजे चौंकाने वाले थे. पानी में आर्सेनिक की मात्रा दोगुनी थी. सुरक्षित मात्रा से चालीस गुना फॉस्फेट और नाइट्रेट था.
अगले वसंत को उन्होंने गाम्बिया के पर्यावरण मंत्री को हालात की गंभीरता से आगाह करते हुए पत्र लिखा. उन्होंने लिखा कि लैगून की मौत एक भयानक आपदा है.
मनजांग के मुताबिक लैगून में इस खतरनाक स्तर के प्रदूषण का सिर्फ एक ही स्रोत है और वह है गोल्डन लीड नाम की एक चीनी फिश प्रोसेसिंग प्लांट से डंप हो रहा कचरा.
यह प्लांट इस रिज़र्व के किनारे पर चलता है. इस शिकायत पर गाम्बिया के पर्यावरण अधिकारियों ने प्लांट पर 25 हज़ार डॉलर यानी (18 हज़ार पाउंड) का जुर्माना ठोंक दिया.
हालांकि मनजांग के हिसाब से ये जुर्माना बेहद मामूली था. जुर्माने की यह रकम इतनी छोटी थी कि इस पर कोई भी पर्यावरणवादी को आपत्ति करता. गोल्डन लीड चीन के आर्थिक और भू-राजनैतिक एजेंडे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का प्रतीक है.
तेज़ी से बढ़ रही है फ़िश मील की मांग
चीन सरकार अपनी इस नीति के तहत अफ्ऱीकी देशों को क़र्ज़ के तौर पर आर्थिक मदद देती है. चीनी कंपनियां बड़ी तेज़ी से गोल्डन लीड और इसकी जैसी कई फ़ैक्ट्रियां बना रही हैं ताकि दुनिया भर में बेतहाशा बढ़ती जा रही फ़िश मील की मांग पूरी की जा सके.
ये फ़िश मील मछलियों से बनाया हुआ चारा है जो मछलियों को ही खिलाने के काम आता है. मछलियों का चूरा बना कर या पका कर तैयार किया जाने वाला यह गोल्डन चारा अमेरिका, यूरोप और एशिया में भेजा जाता है.
फ़िश मील तेज़ी से बढ़ती फ़िश फ़ार्मिंग इंडस्ट्री में प्रोटीन सप्लीमेंट के तौर पर इस्तेमाल होता है. पश्चिमी अफ्ऱीका फ़िश मील के सबसे तेज़ी से उभरते उत्पादकों में से एक है.
मौरितानिया, सेनेगल, गिनी बिसाऊ और गाम्बिया जैसे देशों के तटीय इलाकों में मछलियों की प्रोसेसिंग के 50 से अधिक संयंत्र चल रहे हैं. इनमें रात-दिन फ़िश मील का उत्पादन हो रहा है. इन संयंत्रों की मछलियों की खपत क्षमता बहुत अधिक है.
स्थानीय लोगों की आजीविका के लिए ख़तरा
गाम्बिया का एक प्लांट अकेले साल भर में 7500 टन मछलियों का फ़िश मील बना डालता है. यहां ज्यादातर सिल्वर कलर की दस इंच लंबी बोंगा मछलियों से फ़िश मील तैयार किया जाता है.
इन इलाकों में जाल या छोटी मोटर लगी नावों से मछलियां पकड़ने वाले मछुआरों के काम करने के तरीके को यहां हो रहे बड़े पैमाने पर एक्वाकल्चर (मछली पालन) ने बदल दिया है. यहां पर अब मछलियां पकड़ने वाली सैकड़ों वैध और अवैध फिशिंग बोट्स तैरती मिल जाएंगी.
बड़े पैमाने पर मछलियां पकड़ने की इस होड़ से इस इलाके में मछलियां बड़ी तेज़ी से कम हो रही हैं. और इससे स्थानीय लोगों की जीविका को ख़तरा पैदा हो गया है. बहरहाल, जुर्माना लगाए जाने के बाद गोल्डन लीड ने लैगून में प्लांट का ज़हरीला कचरा फेंकना बंद कर दिया.
इसके बाद पास के सार्वजनिक इलाके के अंदर से गंदा पानी निकालने की एक पाइप लगा दी गई. स्थानीय लोगों का कहना है कि अब इससे निकलने वाला पानी सीधे समुद्र में गिर रहा है.
हारमोन और एंटीबायोटिक्स से भरी मछलियां
मार्च, 2018 में फावड़े-कुदाल से लैस सैकड़ों स्थानीय दुकानदारों, युवाओं और मछुआरों ने जमा होकर इस पाइप को खोद डाला था. लेकिन दो महीनों के बाद ही सरकार की अनुमति से यह पाइप फिर वहीं डाल दी गई.
प्लांट के डायरेक्टर जोज हुआंग ने सार्वजनिक तौर कहा था कि वह सभी नियमों का पालन कर रहे हैं. इसने समुद्र में केमिकल नहीं बहाया है. हुआंग का कहना है कि इस प्लांट से शहर को फायदा हुआ है.
गोल्डन लीड ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि इसने यहां स्कूल बनाने के लिए फ़ंड दिया है. इसके साथ ही रमज़ान समारोहों के लिए दान भी दिया है. मनजांग कहते हैं इन बातों का कोई मतलब नहीं है.
चीनी यहां से बोंगा मछलियों का निर्यात करते हैं ताकि वहां की तेलापिया मछलियों को चारा मिल सके. फिर वही तेलापिया मछलियां हमें ज़्यादा क़ीमतों पर बेची जाती हैं. ये मछलियां हारमोन और एंटीबायोटिक्स से भरी होती हैं. यह हमारी विडंबना में और इज़ाफ़ा करती हैं.
सी-फ़ूड का सबसे बड़ा उत्पादक बनता जा रहा है चीन
वह कहते हैं कि अमूमन तिलापिया मछलियां शाकाहारी होती हैं और शैवाल और समुद्री पौधे खाती हैं. लेकिन इन मछलियों को फ़िश मील खाना सिखाया जाता है. साल 1960 के बाद से दुनिया भर में सी-फ़ूड की खपत दोगुनी हो गई है.
एक्वाकल्चर इंडस्ट्री 160 अरब डॉलर (116 पाउंड) की हो चुकी है. यह दुनिया की आधी मछलियों की खपत कर लेती है. अमेरिका अपनी सी-फ़ूड ज़रूरत का 90 फीसदी आयात करता है. इस आयात का एक बड़ा हिस्सा चीन से होता है.
चीन मछलियों और सी-फ़ूड का सबसे बड़ा उत्पादक देश है. लेकिन मछलियों की खेती की सबसे बड़ी चुनौती उनके लिए चारा की व्यवस्था करना है. इसलिए दुनिया भर में पकड़ी जाने वाली एक चौथाई मछलियों का फ़िश मील बना दिया जाता है.
मछलियों का यह चारा गाम्बिया के समुद्र तटीय इलाकों में लगाए जाने वाले संयंत्रों में तैयार होता है. लेकिन इसकी त्रासद विडंबनाएं हैं. सी-फ़ूड इंडस्ट्री प्रकट तौर पर तो समुद्री इलाकों में पर्यावरणीय गिरावट को रोकने की कोशिशों में लगी हुई हैं.
गाम्बिया के नेताओं को घटती मछलियों की चिंता नहीं
गाम्बिया जैसे देशों के संयंत्रों में बनने वाला मछलियों का यह चारा चीन और नॉर्वे जैसे देशों में पहुंचता है, जहां इसका इस्तेमाल मछलियों की खेती में होता है. फिर यहां से मछलियां यूरोपीय और अमेरिकी देशों की खपत के लिए भेजी जाती हैं.
लेकिन इससे गाम्बिया के लोग अपनी जीविका के लिए जिन मछलियों पर निर्भर हैं, वे ख़त्म होती जा रही हैं. गाम्बिया में राजनीतिक नेतृत्व को अपने घटती मछलियों और जल संसाधन की खास चिंता नहीं है.
वहां के मछली पालन और जल संसाधन मंत्री ने हाल में कहा कि यहां का मछली पालन उद्योग खूब फल-फूल रहा है. अब यहां मछली पकड़ने वाले बड़े व्यावसायिक नाव और फ़िश मील प्लांट रोज़गार देने वाले सबसे बड़े नियोक्ता हैं.
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी
जब मंत्री से घटते जल संसाधनों और मछलियों की शिकायत की गई तो उन्होंने कहा कि गाम्बिया में अभी इतनी मछलियां हैं गोल्डन लीड जैसे दो और प्लांट चल सकते हैं.
लेकिन जैसे-जैसे मछलियों का भंडार कम होता जा रहा है धनी देशों ने अपनी समुद्री इलाकों की निगरानी बढ़ा दी है. तटीय इलाकों में गश्त बढ़ाई गई है.
चोरी-छिपे मछलियां पकड़ने पर भारी जुर्माना लगाया जा रहा है और समुद्र में अवैध गतिविधियों का पता लगाने के लिए सैटेलाइट की मदद ली जा रही है. लेकिन गाम्बिया जैसे कई ग़रीब देशों के पास राजनीतिक इच्छाशक्ति, तकनीकी दक्षता और वित्तीय क्षमताओं की कमी है.
इससे ये अपने तटीय इलाकों पर अपना दावा उतनी मज़बूती से नहीं ठोक पाते. फिर भी फ़िशरीज़ एजेंसियां, सी शेफ़र्ड जैसे समुद्री संरक्षण समूह से मिलकर गाम्बियाई समुद्री क्षेत्र में गैरकानूनी ढंग से मछली पकड़ने वाली छोटी-बड़ी नावों को कब्ज़े में लेने की कोशिश करती हैं.
गाम्बिया की अर्थव्यवस्था को फ़ायदा या नुक़सान?
कानूनी और गैरकानूनी ढंग से मछली पकड़ने वाले बड़ी नावों में कुछ चीनी नावें भी होती हैं. मिसाल के तौर पर गाम्बियाई गश्ती दल की ओर से पकड़ी गई 134 फीट लंबी इलेक्ट्रिक ट्रॉलर लु लाओ युआन यू 010 चीनी कंपनी क्विंगदाओ तेंगफेंग ओशियन फ़िशरीज़ की निकली.
यह यहां गैरकानूनी ढंग से मछली पकड़ कर गाम्बिया की तीनों फ़िश मील संयंत्रों को सप्लाई करती थी. इन नावों में पकड़ी गई मछलियों को छांटने और उन्हें संरक्षित करने का माहौल निहायत ही असुरक्षित होता है.
इनमें अधिकतर स्थानीय लोग काम करते हैं, जो पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों और सामानों के गंदे माहौल में काम करते हैं. नियमों का पालन न करने वाली नावों और जहाज़ों को पकड़ा जाता है और इसमें मौजूद लोगों को गिरफ्तार किया जाता है.
इन्हें कई सप्ताह तक मछली नहीं पकड़ने दिया जाता और 5 हज़ार से लेकर 50 हज़ार डॉलर ( 3627 से लेकर 36,270 पाउंड) तक जुर्माना लगाया जाता है.
'गोल्डन लीड ने ज़िंदगी बरबाद कर दी'
गोल्डन लीड के गुफानुमा, धूल से भरे गर्म और अंधेरे संयंत्रों में बड़ी मशीनों से रात-दिन फ़िशमील का उत्पादन और इसकी पैकिंग होती रहती है. मछलियों को पीस कर पाउडर बनाया जाता है और फिर इसे 50-50 किलो की बोरियों में भरा जाता है.
इस प्लांट में बोरियां फर्श से ऊंची छत तक सटी दिखती हैं. एक शिपिंग कंटेनर में ऐसी 400 बोरियां भरी जाती हैं. यहां के कामगार एक दिन ऐसी 20 से 40 कंटेनर भरते हैं.
गोल्डन लीड के प्लांट से कुछ दूरी पर खड़े ट्रीहाउस लॉज के 57 वर्षीय मालिक दोदा जैक जबांग कहते हैं कि उन्होंने यहां दो साल तक बड़े अच्छे तरीके से काम किया. लेकिन गोल्डन लीड ने उनकी ज़िंदगी बरबाद कर दी.
इसके फ़िशमील प्लांट से निकलने वाली दुर्गंध से यहां आने वाले पर्यटक बिल्कुल घट गए. बुकिंग बंद हो गई. दुर्गंध इतनी खराब होती थी कि ग्राहकों को भोजन समाप्त करने से पहले ही उठना पड़ता है.
वह कहते हैं कि गोल्डन लीड ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाने से ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. हमें ऐसे रोजगार की जरूरत नहीं थी. उन्होंने हमें गधों और बंदरों में तब्दील कर दिया है.
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