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क्या बिहार के लोग नहीं खा पाएंगे आंध्र प्रदेश की मछलियां?
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार में स्वास्थ्य विभाग की एक जांच ने मछली खाने के शौक़ीनों के मन में डर और बेचने वालों के मन में तनाव पैदा कर दिया है.
दरअसल स्वास्थ्य विभाग की ओर से जांच के लिए भेजे गए मछलियों के नमूनों में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक फ़ार्मोलिन पाया गया है.
ये रसायन एक तेज़ ज़हर है जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानीकारण है. रिपोर्ट में आंध्र प्रदश से आने वाली मछलियों में इसके मिलने की पुष्टि की ख़बर का असर बिक्री और खपत दोनों पर पड़ा है.
दरअसल विभाग ने बीते साल अक्टूबर में पटना के दस अलग-अलग स्थानों से मछली के नमूने लेकर कोलकाता की एक लैब में जांच के लिए भेजे थे. इस जांच में दस में से सात मामलों में फॉर्मेलिन पाई गई है.
पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग की अपनी जांच में भी मछलियों में फार्मेलिन और अन्य हानिकारक तत्व पाए गए थे.
विभाग की सचिव एन. विजयलक्ष्मी ने बीबीसी को बताया, "करीब तीन महीने हमने पटना शहर से मछलियों के 25 सैंपलों की जांच की थी. इन सबमें फार्मेलिन, लेड और कैडमियम पाए थे. हमने ये जांच रिपोर्ट तुरंत ही स्वास्थ्य विभाग को भेज दी थी."
ये सारे नमूने ऐसी मरी हुई मछलियों के थे, जिन्हें आमतौर पर बर्फ में रखकर आंध्र प्रदेश से पटना मंगवाकर यहाँ बेचा जाता था.
इन जांच रिपोर्टों के बाद स्थानीय मीडिया की रिपोटों में र्आंध्र प्रदेश से आने वाली मछलियों पर रोक लगाने की मांग भी की जा रही है.
सूबे के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने बीबीसी को बताया कि सरकार अंतिम फैसला लेने से पहले रिपोर्टों का अध्ययन कर रही है.
क्या है फार्मेलिन
फार्मेलिन एक तेज़ ज़हर है. विज्ञान की शब्दावली में कहें तो यह एक तरह का फॉर्मलडिहाइड है.
फॉर्मलडिहाइड एक बेरंग और तेज़ गैस होती है, जिसका इस्तेमाल भवन निर्माण सामग्री और कई घरेलू उत्पादों में किया जाता है. इसका इस्तेमाल अन्य रसायनों को बनाने में भी किया जाता है.
पानी में घुलने पर इसे फार्मेलिन कहा जाता है. फॉर्मेलिन के औद्योगिक इस्तेमाल के साथ-साथ इसका उपयोग शव गृहों और मेडिकल लैब्स में एक संरक्षक के रूप में किया जाता है. यह एक प्रिज़र्वेटिव है.
पीएमसीएच के अधीक्षक डॉक्टर राजीव रंजन प्रसाद ने बताया, "फार्मेलिन का शरीर में पहुंचना बहुत हानिकारक है. इसका असर हाजमा बिगड़ने, पेट दर्द से लेकर डायरिया के रूप में सामने आता है. इससे किडनी और लीवर की गंभीर बीमारियों समेत कैंसर होने का भी ख़तरा होता है."
जानकारों के मुताबिक़, मछली को सड़ने से बचाने के लिए भी फार्मेलिन का इस्तेमाल होता है.
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शौक़ीन से लेकर व्यापारी तक सभी परेशान
बिहार का अपना मछली उत्पादन करीब 5.87 लाख मीट्रिक टन है और पूरे सूबे में करीब 6.40 मीट्रिक टन की खपत है.
खपत और उत्पादन के बीच क़रीब 50 हजार मीट्रिक टन की जो खाई है, उसकी भरपाई आंध्र प्रदेश से आने वाली मछलियों से होती है. इस राज्य से मुख्यतः रेहू, कतला और फंगेसिया प्रजाति की मछलियाँ बिहार आती हैं.
बिहार मछली थोक विक्रेता संघ के सचिव अनुज के मुताबिक़, आंध्र प्रदेश से क़रीब 350 टन मछली बर्फ के बक्सों से भरे ट्रकों के जरिए रोज़ बिहार के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचती है. पटना में मछली की होने वाली खपत में आंध्र प्रदेश की भागीदारी 80 फ़ीसदी की होती है.
अनुज कुमार के मुताबिक फार्मेलिन पाए जाने की ख़बरों के बाद पटना की थोक मंडी की बिक्री 90 फ़ीसदी तक कम हो गई है.
एक ओर मछली खाने वाले आंध्र प्रदेश की मछली को न कह रहे हैं तो दूसरी ओर इसका बुरा असर खुदरा और थोक व्यापार से जुड़े हज़ारों परिवारों पर पड़ना शुरू हो चुका है.
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आम लोगों का क्या कहना है?
मनोज प्रसाद पटना के मछुआ टोली इलाके के अमरुदी गली में रहते हैं.
उन्होंने बताया, "फार्मेलिन की ख़बर सामने आने के बाद हमने आंध्र वाली मछली खानी बंद कर दी है. पहले ज़िंदा मछली अच्छी नहीं मिलती थी तो आंध्र वाली मछली खाते थे. मगर दिमाग से अब निकल ही गया है कि आंध्र की मछली खाना है. अब जब भी मछली खाते हैं तो ज़िंदा मछली को लाकर खाते हैं."
नया टोला इलाके में रहने वाले प्रतीक जैसे कुछ शहरी इस ख़बर से अनजान भी है. उन्होंने मेरे सामने ही आंध्र प्रदेश वाली आधा किलो मछली खरीदी.
आंध्र प्रदेश की मछली और ज़िंदा मछली के भाव में करीब दोगुना अंतर होता है.
आंध्र प्रदेश की मछली पहले करीब 125 से 150 रुपये किलोग्राम के भाव बिकती थी और ज़िंदा मछली का भाव ढाई से तीन सौ रुपये था.
मछली में फार्मेलिन पाए जाने की ख़बरों के बाद ज़िंदा मछली का खुदरा भाव बढ़कर चार सौ रुपये तक पहुँच गया है.
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"आंध्र की मछली में फार्मेलिन नहीं"
मीना देवी मछुआ टोली में सड़क के किनारे मछली बेचती हैं. एक सप्ताह से उनकी बिक्री आधे से भी कम रह गई है.
उन्होंने बताया, "एक हफ्ता पहले जो हल्ला हुआ, उसके बाद आंध्र वाला मछली कोई पूछबे नहीं कर रहा है. अखबार में छपने के बाद बिक्री पर आफत है. पहले आधा मन तक आराम से बिक जाता था अब दस किलो भी नहीं बिकता है. बर्फ वाला मछली का भाव भी घटा है. पहले डेढ़ सौ रुपये किलो के भाव से बिक जाता है. अब जो आता भी है वो सौ रुपया किलो से ज्यादा का भाव नहीं देता है. सरकार आंध्रा वाला मछली बंद कर देगी तो हम सब का भुखमरी होगा."
वहीं अनुज कुमार का दावा है कि आंध्रप्रदेश से आने वाली मछली में फार्मेलिन बिल्कुल नहीं होता है.
उन्होंने बताया, "हम सही को सही साबित करने के लिए लड़ रहे हैं. आंध्र प्रदेश से आने वाली मछली को वहां का मत्स्य और स्वास्थ्य विभाग फार्मेलिन की जांच कर ही भेजता है. हर ट्रक का अलग से सर्टिफिकेट जारी किया जाता है. हम सरकार से कह रहे हैं कि आंध्रप्रदेश से आने वाले मछली के हर ट्रक की बिहार में भी जांच करे. जांच के लिए फार्मेलिन किट भी आ गया है जो कि भारत सरकार से मान्यता प्राप्त है. फार्मेलिन किट से डेढ़ से दो मिनट में जांच हो जाती है."
अनुज आगे कहते हैं, "सरकार के अलग-अलग विभागों ने कहाँ-कहाँ से नमूने लिए ये हमें नहीं पता लेकिन मछली के थोक मंडी से ये नमूने नहीं लिए गए हैं. अगर लोकल मार्केट में कहीं मिलावट हो रही है तो इसे रोकना बिहार सरकार का काम है. इस मिलावट के कारण आंध्र प्रदेश से आने वाली मछली पर प्रतिबंध लगता है तो यह कहीं से उचित नहीं होगा."
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