बच्चे पैदा करने का फ़ैसला महिला का हुआ तो क्या बदल जाएगी दुनिया

    • Author, राशेल नूवर
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

दुनिया जब से बनी है यहां हर क्षेत्र में मर्दों का ही दबदबा रहा. औरत को हर लिहाज़ से कमतर और मर्दों के मातहत ही माना गया. मेडिकल साइंस के क्षेत्र में भी जितनी रिसर्च हुई मर्दों को ही केंद्र में रखकर और उन्हीं के नज़रिए से हुई हैं. कहना ग़लत नहीं होगा कि हमने दुनिया को मर्दों के चश्मे से ही देखा और जाना है.

बच्चे की पैदाइश के मामले में भी बहुत समय तक यही माना जाता रहा कि मर्द की वजह से ही महिला बच्चा पैदा करने के लायक़ हो पाती है. औरत का इसमें कोई रोल नहीं. लेकिन नई रिसर्च ने इन सभी दावों को ग़लत साबित कर दिया है. इनके मुताबिक़ बहुत सी प्रजातियों में मादाएं बच्चा पैदा करने के लिए बहुत से तरीक़े अपनाती हैं.

मिसाल के लिए महिला की बच्चेदानी अपनी पसंद के शुक्राणु को ही अंडे तक आने देता है. वो स्पर्म की गति को कम या ज़्यादा भी करता है. इसी तरह मादा ड्रोसोफिला मक्खियां शुक्राणु को विशेष अंगों में जमा कर सकती हैं. फिर बाद में पसंदीदा नर के साथ इन शुक्राणु का उपयोग कर सकती हैं.

आज महिलाओं के पास भी बच्चे पैदा करने या नहीं करने का निर्णय लेने की आज़ादी है.

बाज़ार में बहुत तरह के गर्भनिरोधक मौजूद हैं. इसके अलावा गर्भपात का विकल्प भी खुला है. लेकिन समाज का ताना-बाना ऐसा है कि महिलाएं इन विकल्पों का इस्तेमाल मर्ज़ी से नहीं कर सकतीं.

कई बार मर्द भी महिलाओं को इसकी इजाज़त नहीं देते. कभी समाज आड़े आ जाता है तो कभी धर्म और संस्कृति. बहुत से देशों में आज भी गर्भपात कराना असंवैधानिक है. अमरीका और आयरलैंड जैसे विकसित देशों में भी गर्भपात कराने में कई तरह के क़ानूनी पेंच हैं.

प्रजनन के नियंत्रण के तरीक़ों तक पहुंच बनाने का मतलब ये नहीं है कि वो सभी तरीक़े अचूक होंगे. बहुत बार गर्भनिरोधक भी विफल हो जाते हैं. सेक्स वर्कर्स पर सुरक्षा के लिए दबाव डाला जाता है. महिलाओं को कब और किन परिस्थितियों में सेक्स करना है, इसमें अक्सर महिलाओं की मर्ज़ी पूरी तरह दरकिनार होती है. अक्सर सेक्स वर्करों का बलात्कार होता है.

महिलाओं को मर्ज़ी के मर्द और मर्ज़ी से गर्भधारण का अख़्तियार मिल जाए तो इससे समाज और महिलाओं, दोनों का भला होगा. समाज में उनका रोल भी बड़ा हो जाएगा. इस बात की भी पूरी संभावना है कि ऐसी महिलाएं उन लोगों के निशाने पर आ जाएंगी जो इस तरह के नियंत्रण के पक्ष में नहीं हैं.

आज हम ख़ुद को सभ्य और विकसित समाज कहते हैं. लेकिन, सच तो ये है कि हम आज भी ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां महिलाओं का अपने ही शरीर पर अधिकार और नियंत्रण नहीं है.

अनचाही प्रेगनेन्सी

2012 के सबसे ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ दुनिया में हर साल क़रीब 8.5 करोड़ महिलाएं अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ गर्भधारण करती हैं. अमरीका जैसे देशों में तो ये अनुपात और भी ज़्यादा है. ग़ैर इरादतन प्रेग्नेंसी से बचने के लिए दुनिया में क़रीब 50 करोड़ महिलाएं गर्भ निरोधक गोलियां खाती हैं और कई परेशानियां मोल ले लेती हैं.

इसमें तनाव, माइग्रेन, चिंता, खून के थक्के जमना जैसी परेशानियां आम बात है. बहुत-सी महिलाएं अनचाही प्रेगनेंसी से बचने के लिए नसबंदी का सहारा लेती हैं. लेकिन ये सबसे ज़्यादा ख़तरनाक है. इसमें महिला की मौत तक हो सकती है.

कुछ जानकारों का कहना है कि नियंत्रण अपने हाथ में आ जाने के बाद महिलाओं के सेक्स पार्टनर बढ़ जाएंगे और असुरक्षित सेक्स करने से उन्हें तरह-तरह की यौन संक्रमण हो सकते हैं. लेकिन रिसर्च बताती हैं कि ऐसा नहीं है.

गर्भनिरोधक तक महिलाओं की पहुंच बन जाने से न सिर्फ़ अनचाहे गर्भधारण में कमी आई है बल्कि गर्भपात की दर में भी कमी आई है. एक अमरीकी स्टडी से पता चलता है कि गर्भनिरोधक का सबसे ज़्यादा फ़ायदा किशोरियों को हुआ है. उनके गर्भपात में भी भारी गिरावट आई है. WHO के मुताबिक़ हर साल 2.5 करोड़ महिलाओं का असुरक्षित गर्भपात होता है.

अक्सर गर्भपात करने वाले अनाड़ी होते हैं. साफ़ सफ़ाई का ख़याल नहीं रखा जाता जिसकी वजह से कई तरह के संक्रमण हो जाते हैं. और बहुतों की मौत हो जाती है. अमरीका में ऐसी महिलाओं के इलाज के लिए 5.5 करोड़ डॉलर ख़र्च करने पड़ते हैं.

जानकारों का कहना है कि पश्चिमी देशों में गर्भपात कराना बहुत सुरक्षित है. लिहाज़ा यहां किसी की सेहत को कोई ख़तरा नहीं होता. जबकि लैटिन अमरीका या सहारा क्षेत्र के अफ़्रीक़ी देशों में गर्भपात का मतलब जान को जोखिम में डालना है.

अगर गर्भधारण पर महिलाओं का नियंत्रण होगा तो उनकी प्रेगनेंसी भी योजनाबद्ध होगी. और अगले 9 महीने तक डॉक्टरों की देखरेख में वो अपना ध्यान भी रखेंगी. अगर वो किसी मेडिकल परेशानी या किसी और वजह से गर्भपात कराना चाहें, तो वो सुरक्षित होगा.

साथ ही प्लान्ड प्रेगनेंसी से जन्म दर भी कम होगी. इसका मतलब ये नहीं कि रातों रात आबादी पर नियंत्रण हो जाएगा. बहुत सी महिलाएं अभी भी कई बच्चों की ख़्वाहिश रखती हैं. कुछ पर ज़्यादा बच्चे पैदा करने का सामाजिक दबाव भी होता है. कई बार लड़के की चाहत में भी ज़्यादा बच्चे पैदा कर लिए जाते हैं.

गर्भधारण का फ़ैसला महिलाएं लें तो क्या होगा?

इन सबके बावजूद अगर महिलाओं का गर्भधारण पर नियंत्रण होगा, तो इससे न केवल महिलाओं को फ़ायदा होगा. बल्कि समाज के हित में भी लाभकारी होगा. समय रहते वो अपनी तालीम पूरी कर पाएंगी और कहीं काम करके आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो पाएंगी. उन्हें अपने फ़ैसले लेने की आज़ादी होगी. जिससे मर्द-औरत के रिश्ते की नई परिभाषा तैयार होगी.

प्रगतिशील देशों में तो ये बदलाव बहुत ही चमत्कारी साबित होगा. महिलाएं निर्णय लेने की स्थिति में होंगी तो उससे एक सुखी, दयालु और शांतिपूर्ण समाज तैयार होगा. महिलाओं का आत्मविश्वास एक तंदुरूस्त समाज के लिए ऑक्सीजन की तरह है. वो समाज में जितनी ज़्यादा ज़िम्मेदारियां निभाएंगी, समाज उतना ही बेहतर होगा. उनके पास अपने लिए पर्याप्त समय होगा.

गर्भधारण का फ़ैसला लेने की आज़ादी होने पर ज़्यादा उम्रवाली महिलाएं भी मां बनती नज़र आएंगी. वैसे भी महिलाओं की एक बड़ी संख्या अभी भी ज़्यादा उम्र में बच्चा पैदा करना पसंद कर रही हैं. अगर महिलाओं को आश्वासन होगा कि वो ज़्यादा उम्र होने पर भी मां बन सकती हैं, तो उन पर जल्द से जल्द पहला बच्चा पैदा करने का दबाव नहीं होगा.

हालांकि जानकार इस संभावना से भी इनकार नहीं करते कि बढ़ती उम्र में मां बनने से कई तरह के ख़तरे पैदा हो सकते हैं. लेकिन मेडिकल साइंस की तरक़्क़ी से उन पर क़ाबू पाया जा सकता है. कम उम्र की तुलना में थोड़ी ज़्यादा उम्र में बच्चा पैदा करना ज़्यादा सहज है.

आज मेडिकल साइंस इतनी विकसित है कि स्पर्म को भविष्य में इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है. महिला जब चाहे इसका इस्तेमाल करके गर्भधारण कर सकती है.

उसे आज़ादी होगी कि वो मर्ज़ी के मर्द का बच्चा अपनी कोख से पैदा कर सकती है. लेकिन जानकारों का कहना है कि हमारा समाज अभी इसके लिए तैयार नहीं है.

मर्द ये कभी बर्दाश्त ही नहीं कर पाएंगे कि उनकी औरत की कोख किसी और पुरुष के स्पर्म से भरे. बल्कि महिलाओं को इस तरह की आज़ादी मिलने के बाद पुरुष, हर महिला को सिर्फ़ शक की नज़र से देखेंगे.

महिलाओं को उनके शरीर और गर्भधारण की आज़ादी देने के लिए सबसे पहले मर्दों को अपनी सोच बदलनी होगी.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)