समुद्री लुटेरे इस जहाज़ से लूटा करते थे सिर्फ़ मछलियां

    • Author, रिचर्ड ग्रे
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

आंद्रे डोलगोव या STS-50. हां यही नाम था उसका. कभी-कभी इसे सी ब्रीज़-1 नाम से भी पुकारा जाता था. ये वो जहाज़ था जो महासागरों को लूटता था.

आंद्रे डोलगोव जहाज़ एक अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क का हिस्सा था, जो बहुत संगठित तरीक़े से काम करता था. ये जहाज़ क़रीब 10 साल तक महासागरों से दुर्लभ मछलियां पकड़कर उनकी तस्करी करता रहा. इसे पकड़ने की कई कोशिशें नाकाम रहीं. क्योंकि ये जहाज़ हर बार चकमा देने में सफल हो जाता था.

लेकिन एक दिन लुटेरों का ये दल इंडोनेशिया की टास्क फ़ोर्स के हत्थे चढ़ गया. इस ज़ंग लगे, पुराने जहाज़ को देखकर कोई भी ये नहीं कह सकता था कि ये दुनिया का मोस्ट वॉन्टेड जहाज़ था.

जिस वक़्त इंडोनेशियाई नौसेना के अधिकारी आंद्रे डोलोगोव पर चढ़े तो वहां मछली पकड़ने वाले विशाल जालों का ढेर पड़ा था. ये इतने विशाल जाल थे कि इन्हें 29 किलोमीटर तक फैलाया जा सकता था.

इन्हीं की मदद से ये जहाज़, एक बार में साठ लाख डॉलर की मछलियां पकड़ लेता था. फिर या तो इनकी कालाबाज़ारी होती थी. या फिर, इन्हें वैध तरीक़े से पकड़ी गई मछलियों के साथ मिलाकर बेचा जाता था.

इन समुद्री लुटेरों के निशाने पर पूर्वी एशिया के मलय प्रायद्वीप और इंडोनेशियाई द्वीप सुमात्रा के आसपास का समुद्री इलाक़ा होता था.

पांच करोड़ डॉलर की मछलियां लूटीं

समुद्री व्यापार के विशेषज्ञ कहते हैं कि समुद्र में पकड़ी जाने वाली कुल मछलियों में से बीस फ़ीसद अवैध तरीक़े से पकड़ी जाती हैं. अवैध रूप से मछली पकड़ने की वजह से मछुआरों की रोज़ी-रोटी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है.

एक मोटे अनुमान के अनुसार, आंद्रे डोलोगोव ने पिछले दस साल में क़रीब पांच करोड़ डॉलर की मछलियां समुद्र से लूट ली होंगी.

ये लुटेरे जहाज़ अक्सर ऐसे इलाक़ों में घूमते हैं जो किसी भी देश के अधिकार क्षेत्र के बाहर होते हैं. इसीलिए इन्हें यहां अवैध गतिविधियां करने में आसानी होती है.

इस काम में अक्सर सरकारी अधिकारी भी शामिल होते हैं. भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और ग़ुलामी भी इनके काम के महत्वपूर्ण हिस्से हैं. इन जहाज़ों पर जो लोग काम करते हैं उन्हें अक्सर मानव तस्करी के माध्यम से यहां लाया जाता है और फिर जहाज़ पर ही बंधक बना लिया जाता है.

यही नहीं अवैध रूप से मछली पकड़ने वाले अक्सर ऐसे औज़ार इस्तेमाल करते हैं, मूंगे की चट्टानों जैसे नाज़ुक समुद्री इको-सिस्टम के लिए ख़तरनाक हैं. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इन अवैध जहाज़ों पर लगाम लगाने के लिए काफ़ी प्रयास किया है.

1985 में जापान में बना था जहाज़

मोस्ट वॉन्टेड जहाज़ आंद्रे डोलोगोव का असली नाम शिनसेई मारू नंबर-2 था. इसे वर्ष 1985 में जापान में बनााय गया था.

वर्षों तक ये जहाज़ जापानी सी-फूड कंपनी मारूहा निचिरो कॉर्पोरेशन के लिए काम करता रहा. तब जापान सागर और हिंद महासागर में मछलियां पकड़ने का काम करता था. इसके बाद भी आंद्रे डोलोगोव काफ़ी समय दूसरी कंपनियों के लिए मछली पकड़ने का काम करता रहा.

वर्ष 2008 और 2015 के बीच इस जहाज़ को अंटार्कटिक समुद्र में टूथफ़िश पकड़ने के लिए भी तैयार किया गया था. टूथफ़िश काफ़ी महंगी मछली है. इसे 'सफ़ेद सोना' कहा जाता है.

इस मछली को पकड़ने के लिए विशेष लाइसेंस की ज़रूरत होती है. लेकिन, आंद्रे डोलोगोव ये काम अवैध रूप से कर रहा था.

कब आया नज़र में

इसकी अवैध गतिविधियों पर पहली बार अक्टूबर 2016 में चीनी अधिकारियों की नज़र पड़ी थी. तब इस जहाज़ से बड़ी मात्रा में टूथफ़िश मछली उतारी जा रही थी.

इस वक़्त आंद्रे डोलोगोव ख़ुद को कम्बोडिया में रजिस्टर्ड जहाज़ के तौर पर पेश करने लगा था. हालांकि, चीन के अधिकारियों के कार्रवाई करने से पहले ही जहाज़ भाग निकला.

आंद्रे डोलोगोव इसके बाद भी कई बार कई देशों के शिकंजे में आया लेकिन हर बार ही ये किसी ना किसी तिकड़म से बच निकलता था.

लेकिन इस बार, नाव को अवैध, अनियमित और कहीं रजिस्टर न हुए जहाज़ के तौर पर नोट कर लिया गया. अब ये वैध रूप से किसी बंदरगाह पर नहीं रुक सकता था.

एक जहाज़ की अनेक पहचान

जनवरी 2017 में इस लुटेरे जहाज़ ने अपना नाम बदलकर सी-ब्रीज़-1 रख लिया. और ख़ुद को अफ्रीकी देश टोगो में रजिस्टर बताने लगा.

जैसे-जैसे ये जहाज़ अलग-अलग बंदरगाहों पर जाता, अपना नाम बदलता रहता और जाली दस्तावेज़ दिखाकर निकल जाता.

इस जहाज़ के चालक दावा पेश करते थे कि उनका जहाज़ क़रीब आठ देशों के लिए काम करता है जिसमें टोगो, नाइजीरिया और लैटिन अमरीकी देश बोलीविया भी शामिल हैं.

आख़िरकार 2018 में आंद्रे डोलोगोव को मेडागास्कर में एक बंदरगाह पर पकड़ लिया गया. लेकिन, इस बार भी जहाज़ के कप्तान अधिकारियों को चकमा देकर फ़रार हो गए.

हालांकि, इस बार ये समुद्री लुटेरे अपने निशान छोड़ गए. इस जहाज़ में स्वचालित ट्रांसपोंडर लगा था. जिसका इस्तेमाल समुद्र में जहाज़ों के बीच टकराव रोकने में होता है. इसे AIS के नाम से जाना जाता है. सैटेलाइट की मदद से इसकी लोकेशन का पता लगाना आसान हो जाता है.

इंडोनेशिया के अधिकारियों ने आंद्रे डोलोगोव के AIS का ही पीछा किया. कई दिनों की मशक़्क़त के बाद उसे क़ब्ज़े में ले लिया.

मालूम नहीं जहाज़ का मालिक कौन

इस तरह के अवैध जहाज़ों का पीछा करना, उन्हें ज़ब्त करना और उनके पूरे नेटवर्क का पता लगाना एक महंगा काम है. अक्सर देश इस काम में दिलचस्पी नहीं लेते.

जिस वक़्त आंद्रे डोलोगोव ज़ब्त किया गया, वो इंडोनेशिया की समुद्री सीमा में था. इंडोनेशिया ने 2014 में अवैध रूप से मछली पकड़ने वाले 488 जहाज़ पकड़े थे. इन जहाज़ों पर जो लोग इंडोनेशियाई नागरिक थे, उन पर भी कड़ी कार्रवाई की गई.

इस लुटेरे जहाज़ का असल मालिक कौन है? इसके जाली काग़ज़ात कौन तैयार कराता था? इससे कितनी मछली की तस्करी हुई और कहां-कहां पैसे का लेन देन हुआ? अब इन सवालों के जवाब इंटरपोल की मदद से तलाशे जा रहे हैं.

जानकारों का कहना है कि मछली पकड़ने का अवैध धंधा बड़े पैमाने पर फैला है. चंद जहाज़ पकड़ लेने भर से हालात सुधरने वाले नहीं. इसके लिए ठोस रणनीति बनाने की ज़रूरत है. इस दिशा में काम भी हो रहा है, जिसमें तकनीक की भी मदद ली जा रही है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से ये काम आसान होने की उम्मीद है.

(ये बीबीसी फ्यूचर की स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. मूल कहानी देखने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं. आप बीबीसी फ़्यूचर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)