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कोरोना वायरस: हमेशा के लिए बदलेंगी लोगों की आदतें?
- Author, प्रवीण शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में इमरजेंसी के हालात पैदा कर दिए हैं. भारत समेत दुनियाभर की सरकारें इस वायरस से जंग लड़ने के लिए हर मुमकिन क़दम उठा रही हैं.
कोरोना वायरस की वजह से कारोबार ठप्प पड़ गए हैं, कई देशों में अंतरराष्ट्रीय यात्राएं रद्द कर दी गई हैं, होटल-रेस्त्रां या तो बंद कर दिए गए हैं या फिर लोग उनमें जाने से बच रहे हैं. कई कंपनियां ख़ासतौर पर, आईटी सेक्टर की कंपनियों ने लोगों को वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने की सुविधा दे रही हैं.
जिन पर वायरस से पीड़ित होने का शक़ है उन्हें बाकी लोगों से अलग-थलग रखा जा रहा है.
भारत में पहले से चल रही आर्थिक सुस्ती के दौर में कोरोना की दस्तक ने अर्थव्यवस्था को और मुश्किल डाल दिया है. इससे आने वाले वक्त में लोगों के आवाजाही, खाने-पीने, घूमने-फिरने, सामाजिक मेलजोल और कामकाज संबंधी व्यवहार और आदतों में भी बदलाव आने की संभावना है.
साथ ही कंपनियों के लिए और अर्थव्यवस्था के दूसरे सेक्टरों के लिए भी बहुत सारी चीजें बदलने वाली हैं और हो सकता है कि ये बदलाव बाद में स्थायी रूप ले लें.
क्या वर्क-फ्रॉम-होम स्थायी व्यवस्था बनने वाली है?
अभी तक इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) सेक्टर को छोड़कर बाकी सेक्टरों में वर्क-फ्रॉम-होम यानी घर काम की इजाज़त मिलना तकरीबन नामुमकिन था. कंपनियां दफ़्तर से ही काम करने को तरजीह दे रही थीं.
लेकिन, कोरोना वायरस के फैलने के बाद से अब कंपनियां और कर्मचारी दोनों ही सतर्क हैं. आईटी के अलावा दूसरे सेक्टर की कंपनियां भी अब अपने कर्मचारियों को घर से काम करने की इजाज़त दे रही हैं.
दुनिया की बड़ी एचआर (ह्यूमन रिसोर्स) फर्मों में से एक रैंडस्टैड इंडिया की चीफ़ पीपुल ऑफिसर अंजली रघुवंशी के मुताबिक़, "पहले जो रोल्स पारंपरिक रूप से वर्क फ्रॉम होम नहीं होते थे, वो भी अब इस दायरे में आने लगे हैं. पहले जिन सेक्टरों में वर्क फ्रॉम होम नहीं था उनमें भी अब इसके लिए दरवाजे़ खुल रहे हैं. मसलन, सेल्स वाले रोल्स में भी वर्क फ्रॉम होम मिलने लगा है. सेल्स के लोगों को कहा जा रहा है कि वे क्लाइंट्स के साथ वर्चुअल मीटिंग करें."
वह कहती हैं, "फ्यूचर में जरूरत पड़ी तो फ्लेक्सिबिलिटी होगी. हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टरों में अभी यह मुश्किल है."
अंजली बताती हैं, "लोगों के रिक्रूटमेंट के वक्त हम कोशिश कर रहे हैं उन्हें फॉर्म कुरियर कर दिए जाएं. यहां तक कि लैपटॉप वगैरह भी घर ही पहुंचाने के विकल्प तलाशे जा रहे हैं. अपनी फर्म में हम अगले हफ्ते तक 100 फीसदी वर्क फ्रॉम होम पर स्विच करने की कोशिश कर रहे हैं. और एक बार अगर ऐसा हो जाता है तो वह हमेशा कायम रहता है."
हालांकि, भारत में ऐसा होने में कुछ दिक्कतें भी हैं.
देश की प्रमुख स्टाफिंग फ़र्म टीमलीज़ सर्विसेज की ईवीपी और को-फ़ाउंडर रितुपर्णा चक्रवर्ती के मुताबिक, "मुझे नहीं लगता भारत अभी इसके लिए तैयार है. इंफ्रास्ट्रक्चर और कल्चरल तौर पर हम अभी तैयार नहीं हैं. हालांकि, कुछ कंपनियां टूल्स और टेक्नोलॉजीज के लिहाज से बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन भारत में ज्यादातर कंपनियां अभी भी यही चाहेंगी कि कर्मचारी काम करने के लिए दफ़्तर आएं."
लोगों का आने-जाने का तरीका बदलेगा ?
कोरोना वायरस के फैलने के बाद से लोग भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने और सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल से बच रहे हैं. खासतौर पर दिल्ली, मुंबई जैसे मेट्रो शहरों में लोगों में यह चिंता ज्यादा दिखती है.
टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के डीन (रिसर्च एंड रिलेशनशिप्स) प्रोफेसर शालीन सिंघल के मुताबिक, "हमने 2003 में आए सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (सार्स) और 2012 में आए मिडल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (मर्स) जैसी बड़ी बीमारियों से मिले सबक याद नहीं रखे. ये कोरोना के मुक़ाबले कहीं बड़ी बीमारियां थीं."
वो कहते हैं कि लोगों के बदलाव के संबंध में या फिर पॉलिसी लेवल पर जो भी बदलाव आएं वे पूरी तरह से रिसर्च पर आधारित होने चाहिए.
वह कहते हैं कि चूंकि भारत की आबादी ज्यादा है, ऐसे में लोगों को फिर से पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल शुरू करना होगा. लेकिन, रेलवे, मेट्रो और बसों जैसे साधनों को चलाने वालों को साफ-सफाई पर कहीं ज्यादा फोकस करना होगा.
प्रोफेसर सिंघल बताते हैं, "ट्रांसपोर्ट के संबंध में भी हमें सस्टेनेबल कंजम्पशन पैटर्न पर फोकस करना होगा. हमारे कंजम्पशन पैटर्न का सीधा असर हमारे ट्रांसपोर्ट पर पड़ता है."
वो कहते हैं कि हमारे ज्यादा खपत करने की आदत से हमारे अर्बन ट्रिप्स और यात्रा करने की संख्या भी बढ़ जाती है. फिलहाल पूरी दुनिया में ट्रैवल पर पाबंदियां लगी हुई हैं.
सिंघल कहते हैं कि इन पाबंदियों के बावजूद हमारा काम चल रहा है. कम ट्रिप्स और कम लंबे ट्रिप्स की हमें आदत डालनी चाहिए, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इसके लिए रूल्स और रेगुलेशन्स लाए जाएंगे.
ऑनलाइन होगी पढ़ाई
दुनियाभर में स्कूल्स और यूनिवर्सिटीज इस बात की कोशिश में हैं कि पढ़ाई के तरीके को बदला जाए. वर्चुअल क्लासेज का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ रहा है.
टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के डीन प्रोफेसर शालीन सिंघल के मुताबिक़, "हमारी यूनिवर्सिटी आज से ही ऑनलाइन पढ़ाई शुरू कर रही है."
तमाम स्कूल, कॉलेज भी इस तरह की संभावनाएं खंगाल रहे हैं. ऐसे में फ्यूचर में छात्रों को क्लासरूम की बजाय वर्चुअल क्लासेज से जुड़ने की आदत डालनी पड़ सकती है.
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मॉल्स में जाने और शॉपिंग की आदतें बदलेंगी
भीड़भाड़ वाली जगहों से कोरोना के संक्रमण फैलने के ख़तरे से लोग अब ऐसी जगहों पर जाने से बच रहे हैं. कई जगहों पर मॉल्स, सिनेमाघरों, स्कूलों, कॉलेजों को अगले कई दिनों के लिए बंद कर दिया गया है ताकि वायरस को फैलने से रोका जा सके.
लेकिन, क्या यह स्थिति भविष्य में भी लोगों को भीड़भाड़ वाले मार्केट्स और मॉल्स में जाने से रोकेगी? क्या लोग ऑनलाइन शॉपिंग करने में और तेजी लाएंगे?
हालांकि शॉपिंग सेंटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एससीएआई) के चेयरमैन अमिताभ तनेजा इस तरह की आशंकाओं को खारिज करते हैं. उनके मुताबिक़, "मॉल्स सुरक्षित एनवायरनमेंट हैं. लोगों के मॉल्स जाने से बचने की कोई वजह नहीं है."
तनेजा के मुताबिक, "मॉल्स, मल्टीप्लेक्सेज को बंद करने के ऐलान से अनिश्चितता का माहौल पैदा हुआ है. लोगों के साथ इंडस्ट्री भी इस स्थिति से चिंतित है. मॉल्स अपने रिटेल किरायेदारों के साथ संपर्क में हैं ताकि खरीदारों को भरोसा दिलाया जा सके कि कंज्यूमर्स की सेफ़्टी से ज्यादा अहम कुछ भी नहीं है."
उनका कहना है कि मॉल्स में सेल्स 25 से 50 फीसदी तक गिर गई है.
खान-पान और हाइजीन की आदतों में होगा बदलाव
कोरोना ने साफ-सफाई और हाइजीन की अहमियत को साबित किया है. भारत में अभी तक हाइजीन के स्टैंडर्ड विकसित देशों जैसे नहीं हैं. लेकिन, अब इनमें बदलाव आता दिख रहा है.
लोगों के खाने-पीने की आदतें भी इस वायरस के साथ बदलती दिख रही हैं.
नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनआरएआई) के नोएडा चैप्टर के हेड और रेस्टोरेंट देसी वाइब्स के डायरेक्टर वरुण खेरा के मुताबिक, "अब लोग क्वालिटी और हाइजीन वाले खाने को ही तरजीह देंगे. दूसरी ओर, रेस्टोरेंट्स और होटलों को भी अपने हाइजीन स्टैंडर्ड को ऊपर उठाना होगा."
वह बताते हैं कि रेस्टोरेंट्स का कारोबार पिछले कुछ दिनों में काफी गिरा है और गुज़रे एक हफ्ते में यह 90 पर्सेंट तक नीचे आ गया है.
खेरा के मुताबिक, "आने वाले वक्त में फूड के ऑनलाइन ऑर्डर में और इजाफा होगा."
गाजियाबाद के महादेव मेडिकोज के मालिक जयवीर शर्मा के मुताबिक़, "पैनिक होने की जरूरत नहीं है. लोग अब साफ-सफाई के महत्व को समझ रहे हैं. और भविष्य में इन चीजों को लेकर ज्यादा सतर्क रहेंगे."
कारोबारी जगत कैसे निपटेगा समस्या से?
कोरोना वायरस के आने से पहले से सुस्ती के दौर में चल रही अर्थव्यवस्था अब और मुश्किल में फंस गई है. कारोबारियों को समझ नहीं आ रहा है कि वे इस स्थिति से कैसे निपटें.
एसोचैम के प्रेसिडेंट डॉ. निरंजन हीरानंदानी कहते हैं, "कोरोना वायरस, कमज़ोर रुपये, सप्लाई चेन की मुश्किलें और बॉन्ड मार्केट में बड़ी गिरावट के चलते आर्थिक माहौल बिगड़ता जा रहा है."
वह कहते हैं, "अगर हम सिक्के के सकारात्मक पहलू को देखें तो भारत को ऑल्टरनेटिव सप्लाई हब के तौर पर खुद को खड़ा करना चाहिए. क्रूड ऑयल में गिरावट से सरकार के पास फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व की कमी नहीं रहेगी."
कई इंडस्ट्रीज इस वक्त जीएसटी रेट कट की मांग कर रही हैं. साथ ही डिमांड को बनाए रखने के लिए कारोबारी जगत सरकार से ब्याज दरों में कटौती की मांग कर रहा है. हीरानंदानी के मुताबिक, "ब्याज दरों में बड़ी कटौती और पर्सनल टैक्स में कटौती से लोगों के हाथ में पैसे बचेंगे."
सामाजिक असर
झारखंड के फूलेश्वर महतो दिल्ली में पेटीज और बर्गर का ठेला लगाते हैं. कोरोना के चलते पिछले कुछ दिनों से उनका धंधा आधा रह गया है.
दिक्कत यह है कि उनकी पत्नी, दो बेटे और एक बेटी गांव में ही रहते हैं.
महतो पर उनका परिवार वापस लौटने का दबाव बना रहा है. लेकिन, वह कहते हैं, "मरना तो एक दिन है ही, घर चले जाएंगे तो कमाएंगे क्या?"
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