कोरोना वायरस: आख़िर कब तक करनी होगी सोशल डिस्टेंसिंग

    • Author, अबीगैल बेल
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

कोरोना वायरस सारी दुनिया के लिए एकदम नया है. ये कहां से आया है?, कैसे रुकेगा? इसका इलाज क्या है? अभी किसी को कुछ नहीं पता.

लेकिन एक बात सौ फीसद सही साबित हो गई है कि इसे सोशल डिस्टेंसिंग से रोका जा सकता है. जिन देशों ने भी इस पर क़ाबू पाया, वहां यही हथियार अपनाया गया है. भारत में भी सोशल डिस्टेंसिंग करने को कहा जा रहा है. और इसीलिए सरकार को लॉकडाउन करना पड़ा. लेकिन ये सोशल डिस्टेंसिंग आख़िर कब तक चलेगी?

पिछली सदी की शुरुआत में जिस वक़्त पहला विश्व युद्ध ख़त्म हो रहा था, तो एक वायरस ने दुनिया पर हमला बोला था. जिसने दुनिया की एक चौथाई आबादी को अपनी गिरफ़्त में ले लिया था. इस महामारी को आज हम स्पेनिश फ्लू के नाम से जानते हैं. पूरी दुनिया में इस महामारी से पांच से दस करोड़ लोगों की जान चली गई थी.

स्पेनिश फ़्लू

साल 1918 में इस महामारी के दौरान ही अमरीका के कई शहर लिबर्टी बॉन्ड परेड की तैयारी कर रहे थे. इस परेड के ज़रिए यूरोपीय देशों को युद्ध में मदद करने के लिए पैसे जुटाए जा रहे थे. फ़िलाडेल्फ़िया और पेंसिल्वेनिया शहरों के प्रमुखों ने महामारी के बावजूद ये परेड करने का फ़ैसला किया.

जबकि इन शहरों में रह रहे 600 सैनिक पहले से ही स्पेनिश फ़्लू के वायरस से पीड़ित थे. फिर भी यहां परेड निकालने का फ़ैसला लिया गया. वहीं सेंट लुई और मिसौरी राज्यों ने अपने यहां होने वाली परेड रद्द कर दी. और लोगों को जमा होने से रोकने के लिए अन्य क़दम भी उठाए.

नतीजा ये रहा है कि फ़िलाडेल्फ़िया में एक महीने में दस हज़ार से ज़्यादा लोग स्पेनिश फ़्लू की चपेट में आकर मर गए. जबकि सेंट लुई जिसने लोगों को जमा नहीं होने दिया था वहां मरने वालों की संख्या 700 से भी कम रही. यानी सेंट लुईस में लोग सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से बच गए.

इतिहास में इसकी कई मिसालें

न्यूज़ीलैंड में महामारियों और संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ अरिंदम बसु का कहना है कि सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब दो या दो से ज़्यादा लोगों को निजी तौर पर मिलने से रोकना है. और वायरस के फैलने में ये बहुत बड़ी रुकावट का काम करता है. कोविड-19 को रोकने के लिए दुनिया भर में सोशल डिस्टेंसिंग का सहारा लिया जा रहा है.

इतिहास में इसकी कई मिसालें मिलती हैं. 1918 में अमरीका ने भी कई शहरों में सार्वजनिक समारोह पर पाबंदी लगा दी थी. स्कूल, थियेटर, चर्च सब बंद कर दिए थे. पूरी एक सदी बाद दुनिया एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही है. लेकिन इस इस सदी में दुनिया की आबादी उस दौर की आबादी की तुलना में 6 अरब ज़्यादा हो चुकी है.

कोविड-19 भी स्पेनिश फ्लू के वायरस जैसा नहीं है. वैज्ञानिकों के लिए भी ये वायरस रिसर्च का विषय है. फ़िलहाल इस पर क़ाबू पाने का एकमात्र उपाय है-सोशल डिस्टेंसिंग. इसके माध्यम से ही कोविड-19 की इन्फ़ेक्शन चेन तोड़ी जा सकती है.

सोशल डिस्टेंसिंग

लगभग सभी देश लोगों को घरों में रहने, लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की सलाह दे रहे हैं. इसका मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ लोगों को संक्रमित लोगों के संपर्क में आने से रोकना है. सेल्फ़ आइसोलेशन और क्वारंटीन सोशल डिस्टेंसिंग के ही अलग-अलग रूप हैं.

सोशल डिस्टेंसिंग का ये दौर अभी थोड़े और समय तक चलने वाला है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अमरीका में सोशल डिस्टेंसिंग का ये अमल 2022 तक जारी रह सकता है. हालांकि ये रिपोर्ट अभी किसी शैक्षिक पत्रिका में छपनी बाक़ी है. उम्मीद है कि 2022 तक कोविड-19 की वैक्सीन और दवा खोज ली जाएगी.

लेकिन तब तक सोशल डिस्टेंसिंग और क्वारंटीन का पालन करना होगा. अगर मौसम के चक्र का इस वायरस पर कुछ असर होता है, तो संभव है कि साल के अंत में ये वायरस फिर से सक्रिय हो जाए. कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति औसतन 2 से 3 व्यक्तियों को संक्रमित करता है.

वायरस के लक्षण

एक स्टडी के मुताबिक़ स्पेनिश फ़्लू के वायरस में प्रजनन की क्षमता 1.8 है. इनफ़्लुएंज़ा वायरस की क्षमता 1.06 से 3.4 है. जबकि नज़ला करने वाले रिनोवावायरस में प्रजनन क्षमता 1.2-1.83 है. वहीं कोविड-19 में प्रजनन क्षमता 1.4 से 3.9 है जोकि सभी तरह के वायरस की प्रजनन क्षमता के तुलना में सबसे ज़्यादा है.

कोडिव-19 पर चीन में हुई एक रिसर्च के मुताबिक़ इस वायरस के लक्षण 5 दिन में ही शरीर में फैलने लगते हैं और 14 दिन में साफ़ तौर पर नज़र आते हैं. इस बीच अगर कोरोना संक्रमित सामान्य इंसान की तरह लोगों से मिलता जुलता रहता है, तो वो 2 से 3 लोगों को संक्रमित करता है.

और फिर यही 2 से 3 लोग आगे इतने ही लोगों को संक्रमित करते हैं और कोरोना के फैलने का दायरा बढ़ता चला जाता है. इस तरह एक कोरोना संक्रमित एक महीने में लगभग 244 लोगों को संक्रमित बना देता है. अगर रोकथाम न की गई, तो अगले दो महीने में यही आंकड़ा 59 हज़ार 604 तक पहुंच सकता है.

साइलेंट ट्रांसमिशन

ये वायरस ऐसे लोगों से भी फैलता है, जो संक्रमित हो चुके हैं लेकिन उनमें कोई लक्षण नज़र नहीं आता. इसे साइलेंट ट्रांसमिशन कहते हैं. लगभग 10 फ़ीसद केस में ऐसा साइलेंट ट्रांसमिशन नज़र आता है. ऐसे लोग अगर ख़ुद अपने को लोगों से दूर कर लें, तो बहुत हद तक कोविड-19 को फैलने से रोका जा सकता है.

चीन के वुहान शहर में कोरोना वायरस के संक्रमण पर हुई रिसर्च के मुताबिक़ सोशल डिस्टेंसिंग से इस वायरस के प्रजनन की ताक़त को कम किया जा सकता है. इसका असर वुहान में लॉकडाउन के दौरान देखने को मिला भी. सोशल डिस्टेंसिंग से इस वायरस की प्रजनन क्षमता 2.35 से लगभग 1 पर आ गयी.

मतलब एक कोरोना संक्रमित सिर्फ एक व्यक्ति को ही संक्रमित कर सकता था. सोशल डिस्टेंसिंग का एक और मक़सद इसकी रफ़्तार को कम करना है. यानी अगर ये लोगों तक पहुंचने में समय ज़्यादा लेगा तो इसकी ताक़त कम हो जाएगी. ये कम से कम लोगों को ही नुक़सान पहुंचाएगा.

बाक़ी लोगों से अलग रखा जाए...

अगर लोग एक दूसरे के क़रीब आते रहेंगे तो वायरस के प्रकोप फैलता जाएगा. कोविड-19 का संक्रमण रोकने के लिए अलग-अलग देशों ने अलग-अलग तरीक़े अपनाए हैं. ब्रिटेन ने इसके लिए एक कंप्यूटर मॉडल को अपनाया ,है जिससे पता चलता है कि संक्रमण फैलता कैसे है.

ब्रिटेन के लिए ये मॉडल इम्पीरियल कॉलेज लंदन ने तैयार किया है और इसकी रिपोर्ट 16 मार्च को प्रकाशित हुई थी. इसी तरह अमरीका और ब्रिटेन की आबादी को देखते हुए दो तरह के मॉडल पर रिसर्च की गई. एक मॉडल के तहत इस बात पर ज़ोर दिया गया कि जिन लोगों में संक्रमण है या लक्षण हैं, उन्हें बाक़ी लोगों से अलग रखा जाए.

दूसरे मॉडल के तहत संक्रमित लोगों और उनके परिजनों को घर पर रखा जाए. और बाक़ी लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग कराई जाए. इस रिसर्च में ये डराने वाली बात सामने आई कि अगर ब्रिटेन में रोकथाम का कोई क़दम नहीं उठाया जाता तो वहां 5 लाख 10 हज़ार लोगों की मौत हो सकती है.

स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा सकती हैं...

जबकि अमरीका में 22 लाख लोगों के मरने की आशंका जताई गई. और अगर पहले मॉडल पर आधारित रणनीति पर अमल किया गया, तो मौत की ये संख्या आधी से भी कम रखी जा सकती है. जबकि स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में दो तिहाई की कमी आ सकती है.

फिर भी इस मॉडल को अपनाने के बावजूद हज़ारों लोगों की जान जा सकती है और स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा सकती हैं. ख़ास तौर से आईसीयू की भारी कमी हो सकती है. इस रिपोर्ट के आने से पहले ब्रिटेन ने हर्ड इम्युनिटी के फ़ॉर्मूले पर अमल करने की तैयारी की थी. जिसमें ऐसे लोगों की संख्या कम करनी थी जिन्हें संक्रमण हो सकता था.

हर्ड इम्युनिटी में किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाई जाती है, जिसके चलते सेहतमंद लोग इस वायरस से जीत हासिल करते हैं और इससे समाज के एक समुदाय की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जाती है.

संक्रमण की रफ़्तार

डॉक्टर अरिंदम बसु कहते हैं कि अभी तक ये पता नहीं है कि जिन लोगों में वायरस से लड़ने की क्षमता है, वो भी दोबारा संक्रमित होंगे या नहीं. कोविड-19 के फैलने में समाज के ताने-बाने और लोगों की उम्र का भी बड़ा हाथ है. मिसाल के लिए इटली में ज़्यादातर संयुक्त परिवार हैं और यहां बुज़ुर्गों की तादाद भी ज़्यादा है.

लोग एक दूसरे के नज़दीक रहते हैं. इसीलिए यहां कोविड-19 से सबसे ज़्यादा मौत भी हुई हैं. इटली में जितने लोग संक्रमण की वजह से मरे हैं, उनमें बड़ी संख्या बुज़ुर्गों की है. फिर भी इटली में जहां भी सोशल डिस्टेंसिंग का फ़ॉर्मूला अपनाया गया, वहां संक्रमण की रफ़्तार काफ़ी कम हुई है.

इटली में संक्रमण पर काबू पाने के लिए दो शहरों में अलग-अलग रणनीति अपनाई गई. लोडी शहर में 21 फ़रवरी को पहला केस सामने आया था. और इसके दो दिन बाद ही शहर में यात्रा पर पाबंदी लगा दी. 24 फ़रवरी को सभी स्कूल, यूनिवर्सिटी, स्टेडियम, कल्ब, सार्वजनिक कार्यक्रमों पर पाबंदी लगा दी गई.

लॉकडाउन की वजह से

वहीं, बरगामो शहर में भी 23 फ़रवरी को कोरोना के मरीज़ सामने आने लगे थे. लेकिन यहां पाबंदी लगाने की सिर्फ़ बातें होती रहीं. 8 मार्च को जब यहां पूरी तरह लॉकडाउन हुआ, तभी इस शहर में पाबंदियां लागू हुईं. 7 मार्च तक लोडी और बरगामो दोनों शहरों में 800 कोरोना मरीज़ थे.

लेकिन 13 मार्च तक बरगामो में मरीज़ों की संख्या 2300 तक पहुंच चुकी थी और लोडी शहर में ये संख्या लगभग आधी थी. जबकि दोनों ही शहरों में समान उम्र के लोग रहते हैं. दोनों ही शहरों में मोटे तौर पर 21 फ़ीसद आबादी 65 की उम्र वालों की है. लोडी शहर में मरीज़ों की संख्या सिर्फ़ लॉकडाउन की वजह से ही कम थी.

यही फ़र्क 1918 में अमरीका के फ़िलाडेल्फ़िया और सेंट लुई में देखने को मिला था. अमरीका के वॉशिंगटन स्टेट में हुई एक और स्टडी बताती है कि किसी भी तरह के रेस्पिरेटरी वायरस को रोकने में सोशल डिस्टेंसिंग अहम रोल निभाती है. मुश्किल तब आती है जब एक वक़्त के बाद लोग सामान्य तौर पर एक दूसरे से मिलने लगते हैं.

कोरोना को हराना है...

उस वक़्त वायरस फिर तेज़ी से फैलने लगता है. इसलिए वायरस को कमज़ोर करने के लिए लंबे समय तक सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना ज़रुरी है. ज़ाहिर है सोशल डिस्टेंसिंग का सख़्ती से पालन करना इतना आसान नहीं. हर किसी की ज़िंदगी में ऐसे मौक़े आते ही हैं जब लोग इकट्ठा होते हैं.

वैसे जानकार ख़ुद भी इस बात को मानते हैं कि ज़्यादा वक़्त तक एक दूसरे से दूर रहने पर ह्रदय रोग, तनाव और पागलपन का शिकार होने की संभावना बढ़ जाती है. आज हम 1918 के दौर में नहीं हैं जहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना मुश्किल हो.

आज हम तकनीक के सुनहरे दौर में हैं, जहां तकनीक के ज़रिए हम एक ही वक़्त में सारी दुनिया से जुड़ सकते हैं. अगर कोरोना को हराना है और स्वस्थ रहना है, तो एक लंबे वक़्त के लिए सोशल डिस्टेंसिंग बनाना ज़रूरी है.

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