क्या सामान्य दिमाग़ जैसी कोई चीज़ नहीं होती

    • Author, हॉवर्ड टिंबरलेक
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

दुनिया की आबादी साढ़े सात अरब से ज़्यादा है. हर इंसान का फ़िंगरप्रिंट अलग होता है. आंखें अलग होती हैं. इसी तरह, उनके मिज़ाज अलग होते हैं. कोई समानता महज़ इत्तेफ़ाक़ होती है.

लेकिन, ज़हन को लेकर हमारा ख़याल है कि गिनी-चुनी दिमाग़ी बीमारियों के शिकार लोगों को छोड़ दें, तो सब के ज़हन एक जैसे होते हैं. लेकिन, वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसा नहीं है.

एडीएचडी (अटेंशन डेफ़िसिट हाइपरएक्टीविटी डिसऑर्डर) या ऑटिज़्म के शिकार लोगों के ज़हन बीमार नहीं, बल्कि कुछ ख़ास ख़ूबियों वाले होते हैं.

अब तक डॉक्टर, इन बीमारियों के शिकार लोगों के दिमाग़ को एबनॉर्मल कहते थे. और बाक़ी लोगों के ज़हन को 'नॉर्मल ब्रेन' कह कर बुलाया जाता था. लेकिन, नई रिसर्च और वैज्ञानिकों की हालिया पहल ने हर इंसान के ज़हन को ख़ास दर्जा देने की कोशिश की है.

दुनिया में क़रीब सवा छह करोड़ लोग ऑटिज़म, एस्पर्जर सिंड्रोम जैसी बीमारियों के शिकार हैं. वहीं क़रीब इतने ही लोग एडीएचडी के मरीज़ हैं. ऐसा भी हो सकता है कि इन में से कुछ लोगों को दोनों ही बीमारियां हों. इसके अलावा बहुत से लोग डिसलेक्सिया, टॉरे और विलियम्स सिंड्रोम जैसी दिमाग़ी बीमारियों के भी शिकार हैं.

दिमाग़ी तौर पर अलग

आज कल इन बीमारियों वाले लोगों को 'न्यूरोडाइवर्स' यानी दिमाग़ी तौर पर अलग कह कर बुलाया जाता है. जबकि बाक़ी लोगों को 'न्यूरोटाइपिकल' कहा जाता है.

न्यूरोडाइवर्स शब्द का सबसे पहले प्रयोग 1998 में ऑस्ट्रेलिया की समाजशास्त्री जूडी सिंगल ने किया था. उन्होंने अपनी रिसर्च थीसिस में ये शब्द इस्तेमाल किया था. इसे एक अमरीकी पत्रकार ने द अटलांटिक अख़बार में लिखा और उसके बाद दुनिया भर में इसका प्रयोग किया जाने लगा.

जूडी सिंगर कहती हैं कि उन्होंने ये शब्द अलग-अलग लोगों के ज़हन में पायी जाने वाली विविधता के लिए प्रयोग किया था. जूडी कहती हैं कि वो ये देख कर हैरान थीं कि दुनिया में हर इंसान का ज़हन अलग तरह से काम करता है. बहुत से लोगों को अपनी ख़ासियतों का अंदाज़ा ही नहीं होता है. और, डॉक्टर इन्हें एक ख़ास खाँचे में बांधने की कोशिश करते हैं, जो ठीक नहीं है.

जूडी कहती हैं कि, 'दिमाग़ की बनावट में इतनी विविधता है कि मैं हैरान हूं. और हमारी शिक्षा व्यवस्था उन्हें संकरे खांचे में बांध कर रखना चाहती है. जबकि होना ये चाहिए कि हमें इस विविधता के फ़ायदों पर ग़ौर करना चाहिए. हमें इसके लिए व्यापक आंदोलन चलाने की ज़रूरत है.'

जू़डी कहती हैं कि, 'आप न्यूरोडाइवर्स शब्द का प्रयोग किसी ख़ास दिमाग़ी अवस्था के लिए नहीं कर सकते. असल में तो ये विविधता का परिचायक होना चाहिए जैसे कि जैविक विविधता के लिए हम बायोडाइवर्सिटी शब्द इस्तेमाल करते हैं.'

जिस वक़्त न्यूरोडाइवर्सिटी का प्रयोग बढ़ रहा था, उसी समय हम देख रहे थे कि न्यूरोटाइपिकल शब्द से दिमाग़ी विविधता को एक ख़ास खांचे में बांधने की कोशिश की जा रही थी.

दिमाग कीअलग अलग खूबियां

न्यूरोबायोलॉजिस्ट और लेखक मो कोस्टांडी कहते हैं कि न्यूरोटाइपिकल शब्द का ईजाद वैज्ञानिकों ने नहीं किया. इसका प्रयोग उन लोगों के लिए शुरू हुआ था, जो ऑटिज़्म के शिकार नहीं थे. ऑटिज़्म पर रिसर्च कर रहे लोगों ने इसका प्रयोग शुरू किया था.

कोस्टांडी मानते हैं कि अब इन शब्दों की उपयोगिता ख़त्म हो गई है. अब हमें ऑटिज़्म या एडीएचडी जैसी दिमाग़ी परिस्थितियों के शिकार लोगों को अलग-अलग करने के लिए इन शब्दों का प्रयोग करने की ज़रूरत नहीं है. ये उनके दिमाग़ की अलग तरह की खूबियां हैं, बीमारियां नहीं.

हालांकि कुछ जानकार मानते हैं कि इन शब्दों को लेकर इतनी नकारात्मक सोच ठीक नहीं. अमरीकन इंस्टीट्यूट ऑफ़ लर्निंग के थॉमस आर्मस्ट्रॉन्ग कहते हैं कि, 'न्यूरोटाइपिकल का ये मतलब नहीं कि ये आदर्श दिमाग़ है. बल्कि ये कहता है कि इस तरह के ज़हन आम हैं. इसे हम नॉर्मल ब्रेन की जगह इस्तेमाल कर सकते हैं.'

वैसे ऑटिज़्म जैसी बीमारियों के शिकार लोगों को न्यूरोडाइवर्स शब्द से कोई गिला नहीं. उन्हें लगता है कि असामान्य कहे जाने से तो विविधता बताने वाला ये शब्द ही बेहतर है.

थॉमस आर्मस्ट्रॉन्ग का मानना है कि हमें अपने बंधे-बंधाए ख़यालात को चुनौती देनी चाहिए. ये सोचना चाहिए कि इन लोगों के ज़हन की अलग तरह की खूबियां हैं, न कि ये बीमार और असामान्य हैं.

थॉमस आर्मस्ट्रॉन्ग कहते हैं कि, 'किसी भी समाज में अनुशासन के लिए नियम क़ायदे होते हैं. लोगों से अपेक्षा की जाती है कि उसका पालन करें. वरना अराजकता हो जाएगी. लेकिन, इसका ये मतलब नहीं है कि इन नियमों से ज़रा भी हटना अजीबोग़रीब है.'

एडीएचडी बीमारियों

इन बहसों से ऑटिज़्म को लेकर जागरूकता बढ़ी है. लोगों को उनकी ख़ूबियों का एहसास हो रहा है. कंपनियों के लिए ऐसे लोग अहम साबित हो रहे हैं.

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की कैथरीन हारमर कहती हैं कि, 'हम सब ख़ास हैं. हमारे ज़हन हमारे फ़िंगरप्रिंट की तरह ही अलग-अलग हैं. दुनिया में दिमाग़ की बनावट के मामले में बहुत विविधता पायी जाती है.'

कैथरीन सलाह देती हैं कि हमें इन विविधताओं को बीमारी समझ कर ब्रैंडिंग करने के बजाय इनकी वजह और ऐसे लोगों की ख़ूबियों पर ज़ोर देने की ज़रूरत है.

बहुत से लोग ऐसे हैं, जो डॉक्टरी के पैमाने पर शायद एडीएचडी जैसी बीमारी के फ़िट न बैठते हों. लेकिन, वो कार की चाभियां भूलने या फिर किसी का नाम भूल जाने जैसी आदतों के शिकार होते हैं.

इसलिए बेहतर होगा कि एडीएचडी जैसी बीमारियों पर और रिसर्च हो और इसके शिकार लोगों की परेशानियों के साथ-साथ इनकी ख़ूबियों के बारे में भी पता लगाया जाना चाहिए.

एडीएचडी क्या है?

अटेंशन डेफिशिट हायपरएक्टिविटी डिसऑर्डर ये मानसिक अवस्था है, जो हमारे बर्ताव पर असर डालता है. हमारे दिमाग़ का ज़्यादातर हिस्सा सामान्य ढंग से काम करता है.

हम कई बार किसी चीज़ पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते. आराम करने में दिक़्क़त होती है.

रोज़मर्रा की याददाश्त को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है. इससे चिंता, डिप्रेशन, डिसलेक्सिया जैसी मुश्किलें होती हैं.

इस बीमारी का पता लगाना भी चुनौतीपूर्ण है. इसकी लंबी प्रक्रिया है. बचपन से एडीएचडी के शिकार लोगों को उम्र के तीसरे दौर में जाकर एहसास होता है कि उनका दिमाग़ अलग हट कर है.

लेकिन, इस बीमारी के शिकार ज़्यादा क्रिएटिव होते हैं, उनमें हमदर्दी का एहसास होता है और वो दूसरों के मुक़ाबले ऊर्जा से सराबोर होते हैं.

तो हर मानसिक अवस्था बीमारी नहीं है. ये न्यूरोडाइवर्सिटी की मिसाल है.

यह लेख मूल रूप से बीबीसी फ़्यूचर पर प्रकाशित हुआ था. मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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