किरीसिमास: समुद्र तल से दो मीटर ऊंचा द्वीप, जिसे समुद्र कभी भी निगल सकता है

    • Author, टीम द कन्वर्सेशन
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर के लिए

जलवायु परिवर्तन का संकट अब इतना बड़ा हो चला है कि इससे इनकार करना नामुमकिन हो गया है. लेकिन, दिक़्क़त ये है कि दुनिया इससे निपटने में संजीदा होने के बजाय आना-कानी में जुटी है. तमाम देश अपने अपने सियासी और सामाजिक हितों के हिसाब से इस संकट को देखते हैं.

जलवायु परिवर्तन के प्रति देशों की इस उदासीनता का विरोध भी हो रहा है. इसके ख़िलाफ़ लोग एक्सटिंक्शन रिबेलियन (Extinction Rebellion) जैसे संगठन भी बना रहे हैं, जो अमीर देशों पर इस बात का दबाव बनाते हैं कि वो जलवायु परिवर्तन के संकट को गंभीरता से लें और इससे निपटने के लिए ठोस क़दम उठाएं.

छोटे द्वीपों के डूबने की आशंका को जलवायु परिवर्तन के ख़तरे की सबसे बड़ी मिसाल बताया जाता रहा है. ऐसे छोटे जज़ीरों का भविष्य क्या होगा, कोई नहीं बता सकता. उनके पास तो इतने संसाधन भी नहीं होते कि वो अपने अस्तित्व को बचाए रखने की ये महंगी लड़ाई लड़ सकें.

ऐसा ही एक छोटा सा द्वीप है किरीसिमास, जो मध्य प्रशांत महासागर में भूमध्य रेखा के बिल्कुल क़रीब है. ये दुनिया भर में मूंगे की चट्टानों से बना सबसे बड़ा जज़ीरा है. किरीसिमास की कहानी, ऐसे तमाम छोटे द्वीपों की कहानी जैसी है, जो जलवायु परिवर्तन की वजह से समुद्र में डूबने के ख़तरे का सामना कर रहे हैं.

किरीसिमास कभी अंग्रेज़ों का ग़ुलाम हुआ करता था. इसे 12 जुलाई 1979 को ब्रिटेन से आज़ादी मिली थी. तब किरीबाती गणराज्य की स्थापना की गई थी. ये द्वीप भी उन 33 द्वीपों में से एक था, जो इस गणराज्य का हिस्सा बने. अब ये सभी द्वीप एक पेचीदा संकट का सामना कर रहे हैं.

समुद्र तल से महज़ दो मीटर ऊंचा

किरीसिमास, समुद्र तल से महज़ दो मीटर ऊंचा है. ये दुनिया के केंद्र में स्थित है, और इसकी संस्कृति की बहुत समृद्ध परंपरा रही है. लेकिन, दुनिया में गिने-चुने लोग ही होंगे, जो इसे नक़्शे में खोज सकें. अब इस द्वीप के लोगों पर बड़ा संकट मंडरा रहा है.

आज किरीबाती से जाकर विदेश में बसने वाला हर सातवां इंसान किरीसिमास से ही होता है. पर्यावरण में आ रहे बदलाव की वजह से यहां की आधी आबादी पर बढ़ते समुद्र स्तर का अशर पड़ा है.

इससे यहां पर जमा एटमी कचरे के भी बिखरे का ख़तरा है. असल में कभी ब्रिटेन यहां पर अपने एटम बम के परीक्षण करता था. उससे पैदा हुए कचरे को यहीं ज़मीन में दबाकर रखा गया है. अगर ये द्वीप समुद्र के आगोश में समाता है, तो उस कचरे के फैलने का डर है.

जिन लोगों को बढ़ते समुद्र की वजह से घर-बार छोड़कर दूसरी जगह बसना पड़ा है, वो अपनी जड़ों से कट गए हैं. अपने समुदाय, रिश्तेदारों और संस्कृति से दूर हो गए हैं. ये समस्या और भी बढ़ने वाली है.

पानी के संकट की वजह से दुनिया भर में हर साल 2.41 करोड़ लोगों को अपना घर-बार छोड़ कर दूसरी जगह बसना पड़ रहा है. विश्व बैंक का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक 14.3 करोड़ लोग केवल अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमरीका में प्रभावित होंगे.

किरीसिमास के लोगों की मदद के लिए कुछ क़दम उठाए गए हैं. किरीबाती की सरकार यहां के लोगों को स्किल डेवेलपमेंट का प्रशिक्षण देती है, ताकि वो विदेश में सम्मान के साथ रह सकें. इसके अलावा यहां की सरकार ने फिजी में 6 हज़ार एकड़ ज़मीन ख़रीदी है, ताकि यहां अनाज पैदा कर के किरीसिमास के लोगों को दिया जा सके.

देशों के प्रयास

न्यूज़ीलैंड भी इस काम में मदद कर रहा है. न्यूज़ीलैंड आकर बसने वाले बाहरी लोगों के कोटे में से हर साल किरीबाती के 75 नागरिकों को बसने का अवसर दिया जाता है. हालांकि ये कोटा नहीं भरता है. क्योंकि किरीबाती के लोग अपना घर-बार छोड़ना नहीं चाहते हैं. इससे उनकी बसी-बसायी ज़िंदगी उजड़ जाती है.

विश्व बैंक ने ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से अपील की है कि वो अस्थायी रोज़गार की तलाश में किरीबाती से आने वालों को ज़्यादा मौक़े दें. उनके लिए नियमों में ढील दें, ताकि वो बेहतर ज़िंदगी का मौक़ा देखकर किरीसिमास द्वीप से दूर बसने का मन बनाएं.

भले ही अंतरराष्ट्रीय नियम-क़ायदों की मदद से किरीसिमास के नागरिकों का भला करने की कोशिश हो रही है. लेकिन, किसी को उसकी पुश्तैनी ज़मीन से उजाड़ना, जलवायु परिवर्तन से निपटने का अच्छा तरीक़ा तो नहीं हो सकता.

किरीसिमास के लोगों की मदद के लिए एक नया एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है, ताकि उन्हें अपने घर के पास ही रोज़गार मिल सके. लेकिन, ये भी किरीसिमास के लिए स्थायी समाधान नहीं है.

अगर, समुद्र में पानी का स्तर बढ़ने से किरीसिमास द्वीप डूबा, तो सिर्फ़ यहां के बाशिंदों का नुक़सान नहीं है. पर्यावरण के और पहलू भी प्रभावित होंगे. यहां पाया जाने वाला ख़ास पक्षी बोकीकोकिको भी विलुप्त हो जाएगा. क्योंकि ये परिंदा सिर्फ़ किरीसिमास में ही आबाद है.

इसी तरह मार्शल द्वीप हैं, जहां कोकोनट क्रैब पाया जाता है. ये दुनिया में कहीं और नहीं मिलता है. यानी ऐसे छोटे-छोटे द्वीपों में क़ुदरत की कई नेमतें आबाद हैं, जिन के हमेशा के लिए मिट जाने का डर है.

संयुक्त राष्ट्र से उम्मीदें

अंतरराष्ट्रीय मदद से ऐसी चुनौतियों से निपटा जा सकता है, बशर्ते नीयत सही हो. क्योंकि ख़ुद इन छोटे द्वीपों के पास इतने संसाधन नहीं हैं, जो जलवायु परिवर्तन की समस्या से पार पा सकें.

बहुत सी जगहों पर कृत्रिम द्वीप बनाए गए हैं, जैसे कि दुबई या दक्षिणी चीन सागर में. इसके अलावा समुद्र के किनारे ऊंचे तटबंध बनाकर भी इन द्वीपों को बचाने की कोशिश की जा सकती है. साथ ही समुद्र के किनारे की उथली ज़मीन पर मिट्टी और कंकड़ डालकर कुछ हिस्सों को दोबारा आबाद करने का विकल्प भी है. पर, इसके लिए बड़े और अमीर देशों को आगे आना होगा.

दिक़्क़त ये है कि अभी भी जलवायु परिवर्तन की वजह से शरणार्थी बने लोगों को शरणार्थी का दर्ज़ा नहीं मिलता है. यानी इन्हें शरणार्थी वाली सहूलतें नहीं मिल पाती हैं. विकसित देश शरणार्थियों की परिभाषा में बदलाव के लिए राज़ी नहीं हैं. जबकि, जलवायु परिवर्तन में उन्हीं का रोल सबसे बड़ा है.

23 सितंबर से संयुक्त राष्ट्र का जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन होने वाला है. उम्मीद है कि ऐसी चुनौतियों पर भी वहां चर्चा होगी. लेकिन, जलवायु परिवर्तन के संकट से प्रभावित दुनिया के लाखों लोगों के लिए सवाल जीवन मरण का भी है और इंसाफ़ का भी.

ऐसे लोगों को उनके आशियानों से उजड़ने को किसने मजबूर किया? उनकी मदद के लिए दुनिया को आगे आना ही होगा.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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