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आख़िर सर्दियों में लोग इतने तन्हा क्यों हो जाते हैं
- Author, क्लाउडिया हैमंड
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
जब भी आप किसी के अकेलेपन का तसव्वुर करते हैं, तो आम तौर पर किसी बुज़़ुर्ग का विचार आता है, जो अकेले ज़िंदगी बसर कर रहा है. जिसकी किसी से मेल-मुलाक़ात नहीं होती.
अकेलापन महसूस करने के बारे वास्तविकता वो नहीं है जो कि बहुत से लोग सोचते हैं. क्लाउडिया हैमंड ने 'बीबीसी अकेलापन प्रयोग' नाम से एक सर्वे किया, जिसमें इसके पांच विपरीत परिणाम मिले.
बीबीसी के इस सर्वे के मुताबिक़, 75 साल से ज़्यादा उम्र के 27 फ़ीसदी लोगों ने माना था कि वो अक्सर अकेलापन महसूस करते हैं. ये किसी और सर्वे के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा है. लेकिन, यहां ध्यान रखना चाहिए कि ये सर्वे ऑनलाइन हुआ था तो, शायद ज़्यादा ऐसे लोग इस में शामिल हुए, जो तन्हा थे.
1. बुज़़ुर्गों के मुक़ाबले युवा ज़्यादा अकेलापन महसूस करते हैं-
फिर भी, सर्वे के अनुसार सबसे ज़्यादा अकेलापन 16-24 साल के युवा कर रहे थे. ऐसे 40 प्रतिशत लोगों का कहना था कि वो अक्सर अकेलापन महसूस करते हैं.
सवाल ये उठता है कि इतनी बड़ी तादाद में युवा क्यों अकेलापन महसूस करते हैं. शायद वो अपने तन्हा होने की हक़ीक़त को स्वीकार करने को ज़्यादा राज़ी हैं. बुज़ुर्गों को अपना अकेलापन स्वीकार कराने के लिए इस बात पर ज़ोर देना पड़ता है.
लेकिन, इन बुज़ुर्गों ने भी सर्वे में यही बताया कि वो तब सब से तन्हा महसूस करते थे, जब युवा थे.
यानी हम ये नहीं कर सकते है कि आज की जो जीवनशैली है, वो युवाओं को तन्हाई का अहसास करा रही है. आम तौर पर 16-24 बरस की उम्र को खिलंदड़पन की उम्र माना जाता है.
लोगों को आज़ादी का एहसास होता है. वो इस दौरान स्कूल की पढ़ाई से फ़ारिग हो कर कॉलेज या यूनिवर्सिटी में जाते हैं. मनमर्ज़ी की ज़िंदगी जीते हैं. लेकिन, उम्र का ये दौर बदलाव का भी होता है. युवाओं को पढ़ाई के लिए घर से दूर जाना पड़ता है. कई बार नई नौकरी की शुरुआत करनी पड़ती है. नए लोगों से मुलाक़ात होती है. नए दोस्त बनाने की चुनौती होती है.
ये वो दौर भी होता है जब दुनिया में अपनी हस्ती के बारे में लोग अपने ख़याल गढ़ रहे होते हैं. वो ये जान-समझ रहे होते हैं कि आख़िर वो कौन हैं. उनकी किसी माहौल में अहमियत और हैसियत क्या है.
इस दौरान तन्हाई का जो एहसास होता है, उससे निपटने के तरीक़े अक्सर युवाओं को नहीं मालूम होते. वो दोस्त बनाने में भी मुश्किल महसूस करते हैं.
2. 41 प्रतिशत लोग सोचते हैं कि अकेलापन अच्छी बात है-
मरहूम न्यूरोसाइंटिस्ट जॉन कैचिओप्पो जैसे बहुत से लोग मानते हैं कि अकेलापन भी काम की चीज़ है. भले ही इसका तजुर्बा ख़राब हो. इंसान सामाजिक प्राणी है. जब उसे अकेलेपन का एहसास होता है, तो वो नए दोस्त-साथी तलाशता है. पुराने रिश्तों मे नई जान फूंकने की कोशिश करता है.
दिक्कत ये है कि अकेलापन कई बार गंभीर बीमारी का रूप ले लेता है. ये हमारी सेहत पर गहरा असर डालता है.
अगर किसी को एक साल या इससे ज़्यादा वक़्त तक अकेलापन महसूस होता रहा, तो इससे डिप्रेशन भी हो सकता है.
हालांकि हमारे सर्वे में शामिल 41 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि अकेलेपन से फ़ायदा भी हो सकता है. लेकिन, जो लोग अक्सर तन्हा महसूस करते थे, उन में से केवल 31 प्रतिशत ने माना कि इस के लाभ हैं.
असल में तो अकेलापन इतनी बुरी चीज़ है कि लंबे वक़्त तक तन्हाई का एहसास आप का तनाव बढ़ा देता है. इस के बाद इसके किसी फ़ायदे का एहसास ख़त्म हो जाता है.
3. अकेलापन महसूस करने वाले भी समाज के दूसरे लोगों जैसे ही होते हैं-
कई बार ये माना जाता है कि लोग इसलिए अकेलापन महसूस करते हैं कि वो दोस्त नहीं बना पाते. नए रिश्ते क़ायम करने में नाकाम रहते हैं. पर, ऐसा नहीं है.
समाज में लोगों से हेल-मेल की कुंजी ये है कि हम ये बता सकें कि लोग कैसा महसूस कर रहे हैं. इसी आधार पर आप उनसे बात कर पाते हैं. कई बार आप कुछ ऐसी बात जाने-अनजाने में बोल देते हैं, जिससे लोगों को ठेस लगती है. वो कट जाते हैं.
ऐसे लोगों से हाव-भाव के ज़रिए संवाद बैठाया जा सकता है. जज़्बातों का लेन-देन करने के लिए कई बार शब्द काम नहीं आते. हाव-भाव, आंखों के इशारे काम आते हैं.
ऐसे मामलों में चाहे वो लोग हों जो आसानी से सब से घुल-मिल जाते हैं, या फिर वो लोग जो तन्हा रह जाते हैं, सब का हाल एक जैसा है.
होता असल में ये है कि लोग तन्हाई के हालात का ठीक से सामना नहीं कर पाते और अकेले पड़ते जाते हैं. यानी उनके लिए दूसरों से संवाद करना मुश्किल हो जाता है.
4. दूसरे मौसमों की तरह सर्दियां भी तन्हाई में गुज़रती हैं-
सर्दियों के दिनों में लोग ज़्यादा तन्हा महसूस करते हैं. कम से कम माना यही जाता है. बुज़ुर्गों की मदद करने वाली संस्थाएं इस दौरान ज़्यादा सक्रिय दिखाई देती हैं. ये छुट्टियों का वक़्त होता है. लोग एक-दूसरे के साथ वक़्त बिताते हैं. ऐसे में कोई अकेला है, तो उसे तन्हाई ज़्यादा सताती है, क्योंकि आस-पास के लोग एक दूसरे के साथ हंसते-बतियाते दिखते हैं.
मगर, हमारे रिसर्च में पता ये चला कि अकेलेपन का एहसास जितनी शिद्दत से सर्दियों में होता है, उतनी ही शिद्दत से बाक़ी सीज़न में भी होता है. सर्दी-गर्मी के मौसम का अकेलापन महसूस होने से कोई ख़ास ताल्लुक़ नहीं है.
हां, कुछ लोगों को ज़रूर ऐसा एहसास होता है, क्योंकि पश्चिमी देशों में सर्दियों के दिन लंबी छुट्टियों और त्यौहारों वाले होते हैं. जब लोग अपनों से, परिजनों-दोस्तों से मिलते-जुलते हैं. ऐसे में तन्हाई काटने को दौड़ती है.
यही हाल गर्मियों की छुट्टियों के दौरान भी होता है. इसलिए अकेलेपन को किसी ख़ास मौसम से जोड़ना ठीक नहीं होगा.
5. जो लोग अकेलापन ज़्यादा महसूस करते हैं, उनके दिल में दूसरों के लिए ज़्यादा हमदर्दी होती है-
बीबीसी के सर्वे में हमदर्दी को दो पैमानों पर मापा गया था. पहला तो ये कि लोग दूसरों के शारीरिक दर्द को किस तरह से महसूस करते हैं. अगर किसी ने अपनी ग़लती से ख़ुद को तकलीफ़ पहुंचा ली. जैसे दरवाज़े पर पैर फंसा लिया. या किसी को बर्र ने काट खाया, तो आप कितनी हमदर्दी रखते हैं.
दूसरा पैमाना किसी इंसान की सामाजिक तकलीफ़ के एहसास को साझा करने का था. जैसे किसी को उसके साथी ने छोड़ दिया.
हमारे सर्वे से पता ये चला कि अकेलेपन के शिकार लोगों की हमदर्दी और जो लोग तन्हाई में नहीं थे, उनके जज़्बात भी एक जैसे ही थे.
हां, जो लोग तन्हाई महसूस कर रहे थे, उन्हें दूसरों के दर्द का अहसास भी ज़्यादा हो रहा था. शायद इसकी वजह ये थी कि वो ख़ुद तन्हाई के दर्द के शिकार थे. ऐसे में उन्हें दूसरे की तकलीफ़ का एहसास भी ज़्यादा हुआ. क्योंकि सामने वाला भी उन्हें अपने जैसे हालात का शिकार लगा.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
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