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बिना कैफ़ीन वाली कॉफ़ी का रहस्य क्या है
- Author, स्टीफ़न डाउलिंग
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
कॉफ़ी पूरी दुनिया में बेहद लोकप्रिय पेय है. इम्तिहान की तैयारी करने वाले छात्र हों या रात की शिफ्ट में काम करने वाले लोग सब इसे नींद भगाने, अपने अंदर ऊर्जा भरने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
कॉफ़ी में मौजूद कैफ़ीन हमें स्फ़ू्र्ति देता है. मगर, इसके कई नुक़सान भी पाए गए हैं. इससे चिंता करने, नींद न आने, बहुत पसीना आने, डायरिया, दिल की धड़कन बढ़ने और मांपेशियां ऐंठने की बीमारी हो सकती है. इसलिए, आज कल कॉफ़ी को कैफ़ीन से मुक्त कर के पीने का चलन बढ़ रहा है. इसे डिकैफ़िनेटेड कॉफ़ी कहते हैं.
अगर आप भी डिकैफ़िनेटेड कॉफ़ी पीने के शौक़ीन हैं, तो अगली बार जब ऐसी कॉफ़ी पी रहे हों, तो फ्रेडलिब फर्डीनेंड रंज को शुक्रिया कहना न भूलें.
फर्डीनेंड रंज उन्नीसवीं सदी के जर्मन रसायनशास्त्री थे. मशहूर जर्मन नेता और कवि गोथे उनकी प्रतिभा के क़ायल थे.
गोथे को एक बार कॉफ़ी के बीज मिले तो उन्होंने इसे फर्डीनेंड रंज को देकर इसकी ख़ूबियों का पता लगाने को कहा. रंज ने ही कॉफ़ी में पाये जाने वाले कैफ़ीन का पता लगाया.
इसकी ख़ूबियों को देखते हुए कॉफ़ी पीने का चलन पूरी दुनिया में बहुत तेज़ी से फैला. मगर, आज लोग बिना कैफ़ीन के कॉफ़ी का लुत्फ़ लेना चाहते हैं. सो, डिकैफ़िनेटेड कॉफ़ी का चलन बढ़ रहा है.
क्या कॉफ़ी से कैफ़ीन को निकाला जा सकता है
सवाल ये है कि क्या कॉफ़ी से कैफ़ीन को पूरी तरह से निकाला जा सकता है. डिकैफ़िनेटेड कॉफ़ी बेचने वाले तो इस सवाल का जवाब हां में ही देंगे. मगर, सच तो ये है कि कॉफ़ी से कैफ़ीन को पूरी तरह नहीं निकाला जा सकता. हां, इसकी मात्रा कम की जा सकती है.
लेकिन, कॉफ़ी से कैफ़ीन निकालने की प्रक्रिया बेहद पेचीदा है.
कॉफ़ी से कैफ़ीन को अलग करने का पहला तजुर्बा भी एक जर्मन ने ही किया था. उनका नाम था लुडविग रोज़ेलियस. रोज़ेलियस, कॉफ़ी कंपनी कैफी एचएजी के प्रमुख थे. एक हादसे की वजह से उन्हें कॉफ़ी से कैफ़ीन को अलग करने के नुस्खे का पता चला. 1903 में लुडविग ने जो कॉफ़ी के बीज मंगाए थे, वो सफ़र के दौरान समुद्र के पानी में भीग गए थे.
इसका नतीजा ये हुआ कि इसमें से कैफ़ीन तो निकल गया. मगर, कॉफ़ी का स्वाद वही था. बाद में लुडविग रोज़ेलियस ने कॉफ़ी के बीजों से कैफ़ीन निकालने का कारोबारी तरीक़ा खोज निकाला. वो कॉफ़ी के बीजों को भाप में उबालते थे.
इस दौरान इसमें कई तरह के एसिड डाले जाते थे. फिर इसमे बेंजीन नाम का सॉल्वेंट डाला जाता था. इस तरह कॉफ़ी के बीज, कैफ़ीन से मुक्त हो जाते थे.
बाद में पता ये चला कि बेंजीन एक ज़हरीला केमिकल है. अब एक ऐसे नुस्खे की तलाश थी, जिसमें कॉफ़ी से कैफ़ीन अलग हो जाए, मगर इससे कोई नुक़सान न हो, न ही कॉफ़ी के स्वाद पर कोई फ़र्क़ पड़े.
बिज़नेस बन गया है डिकैफ़ीनेशन
ब्रिटिश कॉफ़ी एसोसिएशन के क्रिस स्टेम्मन कहते हैं कि आज कॉफ़ी को डिकैफ़ीनेटेड करने के जो भी तरीक़े इस्तेमाल होते हैं, वो बीसवीं सदी की शुरुआत में ही ईजाद हुए थे. हालांकि प्रक्रिया में अब काफ़ी बदलाव आ गया है.
क्रिस स्टेम्मन कहते हैं कि, 'आज कॉफ़ी कंपनियां ख़ुद से कैफ़ीन को अलग करने का काम नहीं करतीं. डिकैफ़ीनेशन के लिए अलग कंपनियां बन गई हैं. इनमें से ज़्यादातर कंपनियां यूरोप, कनाडा, अमरीका और दक्षिण अमरीका में कार्यरत हैं.'
आप को लगता है कि डिकैफ़ीनेशन की प्रक्रिया आसान है. कॉफ़ी के बीजों को पीस कर उनसे एस्प्रेसो, फिल्टर या इंस्टैंट कॉफ़ी के मुताबिक़ पाउडर तैयार कर लिया जाता है और फिर उसे डिकैफ़ किया जाता है.
क्रिस स्टेम्मन कहते हैं कि ऐसा नहीं है. कॉफ़ी को तब डिकैफ़ीनेटेड किया जाता है, जब उसके बीज हरे ही रहते हैं.
क्रिस कहते हैं कि, "अगर आप कॉफ़ी के बीजों को भूनकर उनसे कैफ़ीन अलग करेंगे, तो उसका स्वाद ख़राब हो जाएगा. इसीलिए आज, 99.9 फ़ीसद कॉफ़ी को तभी डिकैफ़ किया जाता है, जब वो हरी होती है."
कॉफ़ी से कैफ़ीन निकालने के कई तरीक़े हैं. मगर,सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीक़ा है इसके बीजों को सॉल्वेंट में डालना. ये मीथाइलीन क्लोराइड या इथाइल एसीटेट नाम के केमिकल होते हैं. मीथाइलीन क्लोराइड का प्रयोग पेंट हटाने के लिए भी किया जाता है और कैफ़ीन अलग करने के लिए भी.
वहीं इथाइल एसीटेट क़ुदरती ईथर है. ये एसिटिक एसिड से तैयार होता है, जो सिरके में मिलता है. इससे नेल पॉलिश रिमूवर भी बनाए जाते हैं.
पहले कॉफ़ी के बीजों को पानी में भिगोया जाता है. फिर उन्हें इन केमिकल में डाला जाता है. इनकी मदद से कैफ़ीन अलग हो जाती है.
केमिकल वाला पानी कई बार इस्तेमाल हो सकता है. इस प्रक्रिया में कॉफ़ी के स्वाद में मामूली सा ही फ़र्क़ आता है.
वैसे कॉफ़ी के बीन्स को इन सॉल्वेंट यानी केमिकल में डालना कोई अच्छी बात नहीं मानी जा सकती. लेकिन, अमरीकी फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इन दोनों केमिकल को नुक़सानदेह नहीं माना है.
एक्टिवेडेट कार्बन का इस्तेमाल
कॉफ़ी से कैफ़ीन निकालने का एक नुस्खा स्विटज़रलैंड का भी है. इसमें कॉफ़ी के बीजों को पहले पानी में डाला जाता है. फिर इन बीजों को एक्टिवेडेट कार्बन से गुज़ारा जाता है. कार्बन, इन बीजों में मौजूद कैफ़ीन को सोख लेता है.
ये तरीक़ा 1930 के दशक में स्विटज़लैंड में ईजाद किया गया था. इसका कारोबारी इस्तेमाल 1979 से शुरू हुआ. कॉफ़ी से कैफ़ीन अलग करने की ये पहली प्रक्रिया थी, जिसमें कोई केमिकल इस्तेमाल नहीं होता.
क्रिस स्टेम्मन कहते हैं कि कॉफ़ी को कैफ़ीन से मुक्त करने का एक और तरीक़ा है. इसमें 'सुपर क्रिटिकल कार्बन डाई ऑक्साइड' का इस्तेमाल होता है. पानी में भीगे हुए कॉफ़ी के बीजों को बड़े से स्टील के कंटेनर में डाला जाता है. फिर इन पर लिक्विड कार्बन डाई ऑक्साइड की बौछार की जाती है. भारी दबाव पड़ने से कॉफ़ी के बीजों से कैफ़ीन अलग हो जाता है.
स्टेम्मन कहते हैं कि ये कैफ़ीन अलग करने का बहुत सरल तरीक़ा है. मगर ये महंगा बहुत है.
क्रिस स्टेम्मन के मुताबिक़, जब से इंस्टैंट कॉफ़ी का चलन बढ़ा है, तब से डिकैफ़ीनेटेड कॉफ़ी की मांग बहुत बढ़ गई है. लेकिन न तो इंस्टैंट कॉफ़ी में वो मज़ा है और न ही डिकैफ़ीनेटेड कॉफ़ी में.
अब जब कि पूरी दुनिया में कॉफ़ी की मांग बढ़ती जा रही है, तो लोग इसमें स्वाद तलाश रहे हैं. कॉफ़ी की लोकप्रियता का आलम ये है कि आज ब्रिटेन में 24 हज़ार से ज़्यादा कॉफ़ी शॉप हैं.
डिकैफ़ीनेशन बेहद पेचीदा प्रक्रिया है. इसी वजह से बड़ी कंपनियां ही ये काम कर रही हैं.
मज़े की बात ये है कि कई देशों में डिकैफ़ीनेटेड कॉफ़ी की मांग घट भी रही है. जैसे ब्रिटेन में इसकी मांग में पिछले तीस सालों में 15 फ़ीसद की गिरावट आई है.
क्रिस स्टेम्मन कहते हैं कि उन्हें तो नॉर्मल कॉफ़ी ही पसंद है. आख़िर डिकैफ़ीनेशन के बाद भी कॉफ़ी पूरी तरह से तो कैफ़ीन-मुक्त होती नहीं. फिर, ये ढोंग किया ही क्यों जाए?
अगर आप कैफ़ीन से दूर रहना चाहते हैं, तो बेहतर है कि आप कॉफ़ी पिएं ही ना.
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