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'मेरे खेत की ज़मीन पड़ोसी के खेत में चली गई'
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिन्दी के लिए
"मेरे खेत की ज़मीन मेरे पड़ोसी के खेत में चली गई है", इन दिनों किसानों के बीच ये चर्चा आम है. चाहें आप केरल में हों या फिर दक्षिणी कर्नाटक के कोडागु ज़िले में, किसान आपको इस बारे में बात करते मिलेंगे.
ये इलाक़ा लगभग एक महीने पहले भारी बारिश और बाढ़ की चपेट में था.
कई लोगों को देसी तरीक़े से कही गई किसानों की ये बात थोड़ी अटपटी लग सकती है. लेकिन उनका आशय ये है कि उनके खेत की ऊपरी मिट्टी बह गई है. कई जगहों पर तो क़रीब दस फुट तक मिट्टी का कटाव हुआ है.
किसानों का कहना है कि उन्हें खेत की मिट्टी को फिर से खेती लायक बनाने में कम से कम 7-8 साल का समय लगेगा, तब जाकर चाय और कॉफ़ी के बागानों में नए पौधे तैयार हो पायेंगे. तब तक हल्की गुणवत्ता वाला उत्पादन होगा और इससे आमदनी भी घटेगी.
बोस मंदन्ना चार पीढ़ी से कॉफ़ी का उत्पादन कर रहे हैं. कोडागु ज़िले में उनका बागान है. वो कहते हैं, "इस त्रासदी का सीधा मतलब है कि अगले एक दशक के लिए लगभग तीन हज़ार हेक्टेयर में फ़ैले कॉफ़ी बागान भारत के कॉफ़ी उत्पादकों की लिस्ट से कट जायेंगे."
भारत में क़रीब एक लाख हेक्टेयर में कॉफ़ी की खेती होती है.
कॉफ़ी की स्वदेशी किस्मों का नुकसान
कोडागु में कॉफ़ी उत्पादक सहकारी समिति के अध्यक्ष एम बी देवैय्या ने कहा, "स्थिति कितनी ख़राब है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगायें कि कई जगहों पर आप खेत देखकर ये कह नहीं सकते कि वहाँ कभी चाय या कॉफ़ी का बाग़ था."
'एसोसिएशन ऑफ़ प्लांटर्स ऑफ़ केरल' नाम की संस्था के महासचिव अजीत बालकृष्णन की राय मंदन्ना और देवैय्या की बात से मेल खाती है.
अजीत के अनुसार, बागानों को नए सिरे से तैयार करने के लिए जैसा बुनियादी ढांचा चाहिए, वो उनके पास नहीं बचा है. खेतों की मिट्टी तो अब एक समस्या है ही, साथ ही कॉफ़ी की जो स्वदेशी किस्में यहाँ के किसानों ने तैयार की थीं, उन्हें दोबारा तैयार करने में कई साल लगेंगे.
लेकिन केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में उगाई जाने वाली नकदी की फ़सलों, जैसे चाय, इलायची और रबड़ की स्थिति भी कॉफ़ी से अलग नहीं है.
यूनाइटेड प्लांटर्स एसोसिएशन ऑफ़ साउथ इंडिया (UPASI) ने बारिश और बाढ़ के कारण फसलों के नुक़सान का एक अनुमान लगाया है. इस संस्था के अनुसार, इस साल क़रीब 5,000 करोड़ रुपये से अधिक की फ़सल का नुक़सान हुआ है.
UPASI के अध्यक्ष टी जयरामन ने कहा, "बुनियादी ढांचे को कितना नुकसान हुआ है, इसका अनुमान कुछ वक़्त बाद लगेगा."
85,000 टन कॉफ़ी की कमी
जयरामन ने कहा, "एकमात्र फ़सल जो अगले कुछ महीनों में वापस उछाल पायेगी, वो चाय है. इस साल की कॉफ़ी की फ़सल तो गई. हमें लग रहा है कि रबड़ के पेड़ भी सड़ने लगेंगे क्योंकि पानी खेतों में स्थिर हो गया है और जो छोटे उत्पादक हैं वो बेचारे अभी भी राहत शिविरों में ही हैं."
जयरामन के अनुसार, "कॉफ़ी बोर्ड ने इस साल 85,000 टन कॉफ़ी की कमी का अनुमान लगाया है. क़रीब 1.25 लाख टन की कमी रबड़ के उत्पादन में देखने को मिलेगी. चाय का अनुमानित नुक़सान 27,000 टन है और मिर्च का 30,000 टन, जो पिछले साल के उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत है."
अजीत बालकृष्णन ने कहा, "बाढ़ की तुलना में 11 से लेकर 19 अगस्त तक हुई भारी बारिश से ज़्यादा नुक़सान हुआ. उस बारिश ने बागानों को तबाह कर दिया".
जयरामन ने कहा, "फिलहाल बागान उद्योग में नकदी का प्रवाह बहुत कम है और ये एक गंभीर समस्या है. आने वाले दिनों में बड़े उत्पादकों को अपनी ज़मीन साफ़ करवाने और मिट्टी को तैयार करवाने के लिए बड़ी संख्या में श्रमिकों की ज़रूरत पड़ेगी. और इसके लिए नकदी की बहुत आवश्यकता होगी."
आगे की चुनौतियाँ
वहीं एम बी देवैय्या का कहना है कि छोटे उत्पादकों की हालत तो बहुत ही ज़्यादा दयनीय हो गई है.
वो कहते हैं, "यदि बारिश और बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा के रूप में घोषित किया जाता है, तभी छोटे और बड़े उत्पादकों के लोन सेटल हो पायेंगे और उन्हें नए लोन मिलेंगे."
सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियन (CITU) और केरल के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों के वेलफ़ेयर बोर्ड के सदस्य ए एस राजन ने कहा, "श्रमिकों को फिलहाल एक सप्ताह में 2-3 दिनों के लिए ही काम मिल रहा है. हम चाहते हैं कि जब तक बागान उद्योग में स्थिति सामान्य नहीं हो जाती, तब तक श्रमिकों को सरकार अनाज देती रहे."
बोस मंदन्ना एक पुराने कॉफ़ी उत्पादक हैं. वो कहते हैं, "हमने अपने जीवन में काम के दौरान कई उतार-चढ़ाव देखे. लेकिन अब जो हमारे साथ हुआ है, उसने हमें निराश कर दिया है. हम चार पीढ़ी से कॉफ़ी का उत्पादन कर रहे हैं. अब उम्र भी हो गई है. मैं 71 वर्ष का हूँ. हमने कभी ये नहीं सोचा था कि अपने जीवनकाल में हमें इस किस्म का विनाश देखना पड़ेगा."
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